प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

शनिवार, 28 नवंबर 2020

प्रकाशित -देवपुत्र मासिक पत्रिका ,अंक नवंबर 2002


छमछम आई दीवाली 

सुधा भार्गव

      दीवाली का दिन और लक्ष्मी पूजन का समय पर बच्चे तो ठहरे बच्चे।  वे फुलझड़ियाँ ,अनार छोड़ने में मस्त -- । तभी दादाजी की रौबदार आवाज ने हिला दिया --देव,दीक्षा ,शिक्षा जल्दी आओ --मैं तुम सबको एक कहानी सुनाऊंगा ।

     कहानी के नाम भागे बच्चे झटपट घर की ओर । हाथ मुंह धोकर पूजाघर में घुसे और कालीन पर बिछी सफेद चादर पर बैठ गये । सामने चौकी पर लक्ष्मीजी कमल पर बैठी बड़ी मनमोह लग रहीं थीं। पास में गणेश जी हाथ में लड्डू लिए मुस्करा रहे थे। 
     बातूनी देव  कुछ देर उन मूर्तियों को बड़े ध्यान से देखता रहा । उसका जिज्ञासु मन बहुत सी बातों को जानने के लिए मचल उठा।  बस लगा दी प्रश्नों की झड़ी।  “दादाजी, लक्ष्मी जी कमल पर क्यों बैठी हैं ?’’
       
कमल अच्छे भाग्य का प्रतीक है और लक्ष्मी धन की देवी है। जिस घर में वह जाती है उसके अच्छे दिन शुरू हो जाते हैं। खूब अच्छा  खाते हैं ।रोज नए कपड़े पहनते हैं। बच्चे अच्छे स्कूल में खूब पढ़ते हैं।’’

       हमारे घर में लक्ष्मी जी कब आएंगी दादा जी?उन्हें जल्दी बुला लाओ और कहो –हमारे घर में खूब सारा  रुपया –पैसा भर दें।आह फिर तो क्या  मजा! मैं तो खूब चॉकलेट खाऊँगा—खूब बम-पटाखा करूंगा।’’
          दीक्षा को अपने भाई की बुद्धि पर बड़ा तरस आया और बोली -“अरे बुद्धू !इतना भी नहीं जानता –लक्ष्मीजी  को बुलाने के लिए ही तो हम उनकी पूजा करेंगे।’’
     
देखो दीदी मुझे चिढ़ाओ मत । अच्छा तुम्ही बता दो –लक्ष्मी जी कमल के साथ कब से रहती हैं ?’’दीक्षा  सकपका कर अपने दादाजी का मुँह ताकने लगी
    बेटे,इसके पीछे भी एक कहानी है ।तुमने अपनी माँ को देखा है न !मलाई को जब वह मथती है तो मक्खन निकल आता  है। उसी तरह जब राक्षस और देवताओं ने समुद्र का मंथन किया तो सबसे पहले कमल बाहर निकला। उससे फिर लक्ष्मीजी  का जन्म हुआ। तभी से वे उसके साथ रहती हैं और उसे बहुत प्यार करती हैं।कमल का फूल होता भी तो बहुत सुंदर है।मुझे भी बहुत अच्छा लगता है।’’ दादा जी बोले। 

     ‘’आपने  तो हमारे बगीचे में ऐसा सुंदर फूल उगाया ही नहीं। ’’देव बोला। 
   बच्चे ,यह बगीचे में नहीं ,तालाब की कीचड़ में पैदा होता है।’’
   कीचड़ –वो काली काली –बदबूदार ! फिर तो कमल को मैं छुऊंगी भी नहीं।`` दीक्षा ने नाक चढ़ाई।
     पूरी बात तो सुनो !कीचड़ में रहते हुआ भी फूल ऊपर उठा मोती की तरह चमकदार रहता है।उस  पर गंदगी का तो एक दाग भी नहीं । लक्ष्मी जी तभी तो इसे पसंद करती है।''
    कमाल हो गया --गंदगी में पैदा होते हुए भी गन्दा नहीं।यह कैसे हो सकता है।``
   यही तो इसका सबसे बड़ा गुण है।तुम्हें भी गंदगी में रहते हुए गन्दा नहीं होना है।’’
     दादा जी हम तो कीचड़ में रहते नहीं ,माँ धूल में भी नहीं खेलने देती --- फिर गन्दे होने का प्रश्न ही नहीं।’’ दीक्षा बोली ।  

     “शाला  में तो तुम्हें दूसरे  बच्चे भी  मिल सकते हैं जो गंदे हों।’’

   “हमारे शाला  में कोई गंदे कपड़े पहन कर  नहीं आता। मेरी  सहेलियाँ तो रोज नहा कर आती हैं।’’ 

    “दूसरे तरीके की भी गंदगी होती है,दीक्षा बिटिया । जो झूठ बोलते हैं,,नाक- मुँह में उंगली देते हैं,दूसरों की चीजें चुपचाप उठा लेते हैं ,वे भी तो गंदे बच्चे हुए।’’

     “हाँ,याद आया परसों मोनू ने खेल के मैदान में बागची को धक्का दे दिया था और नाम मेरा ले दिया। उसके कारण शिक्षक ने मुझे बहुत डांटा। तब से मैंने उससे एकदम बोलना बंद कर दिया।’’ देव चंचल हो उठा।  

    “ठीक किया।तुमको बुरे बच्चों के साथ रहते हुए भी उनकी बुरी आदतें नहीं सीखनी है।’’  
   समझ गया समझ गया  दादा जी, हमें कमल की तरह बनना है तभी तो लक्ष्मी जी से भर -भर मुट्ठी पैसे मिलेंगे और जेब में खन-खन बजेंगे। हा –हा –खनखन –खनखन। खाली जेब में हाथ डालकर झूमने लगा।
    अब बातें एकदम बंद --। मुंह पर उंगली रखो। आँखें मीचकर लक्ष्मीजी की पूजा में ध्यान लगाओ।अरे शिक्षा तुम्हारी आँखें खुली क्यों हैं?``

     “दादा जी –मैं तो पहले गणेश जी वाला बड़ा सा पीला लड्डू खाऊँगी तब आँख मीचूंगी। मैंने आँखें बंद कर ली तो नटखट देवू खा जाएगा।’’ 

     “अरे पगली मेरे पास बहुत सारे लड्डू हैं। पूजा के बाद प्रसाद में तुझे एक नहीं दो दे दूंगा। खुश ! ’’

   “सच दादा जी ---मेरे अच्छे दादा जी।’’ उसने झट से खूब ज़ोर लगाकर आँखें मींच लीं।
    कुछ पल ही गुजरे होंगे कि बच्चे  झपझपाने लगे अपनी पलकें। बड़ों की बंद आँखें देख कुछ इशारा किया और भाग खड़े हुए तीनों, तीन दिशाओं की ओर ,पर ---पकड़े गये ।
    कहाँ भागे --पहले दरवाजे पर मिट्टी के दिये जलाओ। फिर बड़ों को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लो।’’ दादाजी ने प्यार से समझाया ।
     बच्चे दीयों की तरफ मुड़ गए। टिपटिपाते दीयों की रोशनी उन्हें बहुत भाई। उमंगभरे बच्चे दीप जलाते –जलाते गाने लगे ---
दीप जलाकर हम खुशी मनाते
छ्म छ्म आई आह दिवाली
रात  है काली काल कलूटी
फिर भी छिटका जियाला
घर लगता हमको ऐसा जैसे
पहनी हो दीपों की माला।

    गान खतम करते ही उन्होंने बड़ों के पैर छुए। इसके बाद तो हिरण सी चौकड़ी भरते बाहर भागे जहां उनके दोस्त इंतजार कर रहे थे।

    “ओए देवू --देख मेरी फुलझड़ी,ये रहा मेरा बम---- धमाके वाला-- आह अनार छोडूंगा तो फुस से जाएगा आकाश में। तू देखता ही रह जाएगा।‘’

     आई दिवाली आई –छोड़ो पटाखे भाई—मित्र मंडली चहचहा उठी।बच्चों के कलरव को सुनकर दादा जी उनकी खुशी में शामिल हुए बिना न रहे।लड्डुओं का थाल लिए बाहर ही आ गए। लड्डुओं को देख बच्चों के चेहरे चमक उठे।सबने अपनी हथेलियाँ लड्डुओं के लिए उनके सामने पसार दीं।

     “हे भगवान ! तुम्हारी हथेलियाँ इतनी गंदी—। किसी के हाथ में लड्डू नहीं रखा जाएगा। आज मैं अपने हाथों से तुम्हें लड्डू खिलाऊंगा।’’

     दादा जी देव,शिक्षा,दीक्षा के अलावा उनके मित्रों को भी बड़े प्यार से लड्डू खिलाने लगे।ऐसा लग रहा था उनके चारों तरफ आनंद और उल्लास की छ्मछ्म बरसात हो रही है । लक्ष्मी जी भी उन्हें देख पुलकित हो उठीं और पूरे वर्ष हंसने-मुस्कुराने का वरदान देकर चली गईं।

समाप्त   

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

कोरोना के समय

 

 बहनों का मिलन

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      अमीरी गरीबी दो बहनें हैं। उनमें हमेशा झगड़ा होता रहता है।  दोनों साथ-साथ  तो रह ही नहीं सकतीं। जहाँ गरीबी होती है वहां अमीरी  रहना पसंद नहीं करती  और जहाँ अमीरी होती है वहां गरीबी को घुसने की आज्ञा नहीं होती। पर कुछ दिनों से लगता है  दोनों में मेलजोल हो गया है। 

      इस बारह हजारी वकील को ही ले लीजिये  । बारह कमरे वाले शानदार घर में रहते हैं। पेशे से वकील हैं इसीलिए पूरा शहर उन्हें बारह हजारी वकील कहता  है। घर में केवल तीन प्राणी।वे, लाडला बेटा सुरखिया और मेमसाहब।मेमसाहब तो पूरी तीस हजारी हैं।तीस-तीस हजार के जेवरों से लदी -फदी रहती हैं।

      घर की देखभाल के लिए रामकटोरी हैं। बड़ी सुघड़ -!घर का सारा काम बड़ी होशियारी से निबटाती हैं। उसके बिना तो घर में पत्ता भी नहीं हिलता। मेमसाहिबा  तो उसके कारण  इतनी बेफिक्र हो गई हैं कि अपने बेटे को उसके भरोसे ही छोड़ रखा हैं। रामकटोरी अपने बेटे मुरखिया की तरह ही उसे प्यार करती हैं। दोनों के बेटे एक ही उम्र के होंगे --होंगे करीब 9 -10 साल के ।    

     मेमसाहब ने अपनी सुविधा के लिए घर के पिछवाड़े बना एक कमरा रामकटोरी को दे रखा है। ताकि सुबह ६बजे ही वह उनकी बेड टी लेकर हाजिर हो  सके। जाता तो मुरखिया भी स्कूल है पर वह बिलकुल टाट वाला--- ईंटों से बना---खपरैल से ढका मरियल  सा है। भला सुरखिया से  बराबरी कैसी !कहाँ पब्लिक स्कूल में
जाने वाला अमीरजादा और कहाँ अमीर के टुकड़ों पर पलने वाला गरीबजादा। 
    आँखें लेकिन धोखा नहीं खा सकतीं--कुछ तो बदल रहा है।वे दोनों बहनें --क्या कहते हैं अमीरी गरीबी !आमने सामने दिखाई देने लगी हैं।शायद कोई उन्हें बराबर करने -समझने वाला पैदा हो गया है।  
    गली-गली  एक ही चर्चा है--भागो--भागो कोरोना आया।उससे दूर रहो। उसके रास्ते में जो भी आता बिना भेदभाव किये वह उसे निगलने की कोशिश करता । यह जानते हुए भी मेमसाहब एक पार्टी में सजधज कर चली गईं।सोचा - “मेरे  आगे अच्छे- अच्छे सर झुकाते हैं-मजाल कि कोरोना मेरे पास फटक भी जाए।

      गई तो अकेली थी पर लौटी  दुकेली--कोरोना के साथ ।फिर तो वकील साहब ने कोरोना वायरस से छुटकारा दिलाने में हजारों खर्च कर दिए पर उनकी अमीरी के आगे कोरोना ने झुकना पसंद न किया।वह मेमसाहब के  प्राण लेकर ही रहा। अस्पताल से बाहर खड़े वे आंसू बहा रहे थे।उन्हीं के पास खड़े कुछ औरों  के चेहरे भी गमगीन थे। उन्होंने भी अपने किसी प्रिय को खोया था। वे वकील साहब की  तरह  संपन्न तो न थे पर व्यथा एक थी,आसुंओं का रंग एक था।वकील साहब बिखर से गए ।सबसे बड़ी बात जो उन्हें चुभ रही थी कि करोड़ों की संपत्ति  कुछ काम न आई।

      रामकटोरी ने अब पूरी तरह सुरखिया को संभाल लिया था ।उसके प्यार और सेवा भाव को  देख उन्हें अपने ऊपर ग्लानि होने लगी । बार बार उनके दिमाग मेन आने लगा , “जब वह उनके बेटे  की देखभाल अपने बेटे की तरह करती है तो मैं क्यों नहीं उसके बेटे को सुरखिया की तरह पब्लिक स्कूल में पढ़ा सकता हूँ।

     कुछ महीनों के बाद स्कूल खुलने पर मुरखिया को भी पब्लिक स्कूल में दाखिला दिला दिया गया । मूरखिया तो था ही बुद्दि का कुबेर और सदव्यवहारी । कक्षा में दूसरों की सहायता करने को हमेशा कमर कसे रहता।जल्दी ही उसके बहुत से दोस्त बन गए।जो उसे बहुत प्यार करते थे।  

       एक दिन हजारी वकील बोले-"मुरखिया मन करता है तुम्हारा नाम बदल दूँ। यह नाम न जाने तुम्हारा क्यों रख दिया। तुम तो बड़े चतुर हो । तुम्हारा नाम तो चतुरिया होना चाहिए। आज से हम तुम्हें चतुरिया कहेंगे।

      "यह  नाम मेरी माँ का दिया हुआ ही है। गलती होने पर मुझे डांटती  -"अरे मूरख तुझसे कूछ नहीं होगा।  एकदम मुरखिया है। लेकिन उसकी डांट भमुझे बहुत अच्छी लगती है।

        "तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली। मुझे भी अपनी माँ की डांट में मिठास लगती थी। अब मेरे दो बेटे हो गए। एक सुरखिया और दूसरे तुम चतुरिया। आओ दोनों मेरे गले मिलो।"    चतुरिया की आँखेँ खुशी से छलक पड़ीं। अपने बापू के मरने के बाद वह बड़ा दुखी रहने लगा था। पिता की तरह इतना प्यार और अपनापन उसे कई साल बाद मिला था।       

     यह मिलन का नजारा देख अमीरी और गरीबी दोनों ही कुछ देर को तो हैरान रह गईं। जो कभी न हुआ वह अपनी आँखों के समक्ष होता देख रही थीं। तभी उन्हें  कोरोना की याद आ गई। जिसके सामने उन्होंने भी घुटने टेक दिये हैं । 

     कोरोना ने गरीबी -अमीरी को मिला दिया है । जब देखो एक दूसरे की सहायता करने को तैयार रहती हैं और मृदु हास्य बिखेरती हाथ में हाथ डाले  घूमती दिखाई पड़ जाती हैं।अच्छा हो ये हमेशा प्यार -प्यार से रहें।

सुधा भार्गव


मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

बच्चों को ऑनलाइन सुनाई कहानी



बच्चों को ऑनलाइन सुनाई कहानी बाल प्रहरी तथा बालसाहित्य संस्थान अल्मोड़ा द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बैंगलोर की बालसाहित्यकार सुधा भार्गव ने बच्चों को ‘गुट्टू की बगिया दादी’ कहानी ऑनलाइन सुनाई। कहानी सुनने के बाद ऑनलाइन जुड़े बच्चों ने कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया दी। छोटे बच्चों ने बहुत ही सुंदर ढंग से अपने सवाल कहानीकार के सामने रखे। प्रारंभ में बालप्रहरी के संपादक तथा बालसाहित्य संस्थान के सचिव उदय किरौला ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए साहित्यकार सुधा भार्गव, मुख्य अतिथि मनोहर चमोली ‘मनु’ तथा अध्यक्ष डॉ. महावीर रवांल्टा का परिचय बच्चों से कराया। बच्चों की प्रतिक्रिया के बाद मुख्य अतिथि प्रख्यात बालसाहित्यकार मनोहर चमोली ‘मनु’ ने कहा कि कहानी अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। कहानी पाठक के विचारों को परिवर्तन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सुधा भार्गव की कहानी पर उन्होंने कहा कि कहानी बच्चों को आपसी प्रेम, भाईचारा तथा बढ़ों का सम्मान करने की सोच विकसित करती है। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रख्यात कहानीकार डॉ. महावीर रवांल्टा ने कहा कि बच्चों ने कहानी के बारे में सटीक टिप्पणी देकर हम सबको हैरान किया है। ‘हम कैसे कहानी लिख सकते हैं?’ एक बच्चे के सवाल पर डॉ. रवांल्टा ने कहा कि कहानी लिखने से पहले हमें दूसरे लोगों की कहानियों का पढ़ना जरूरी है। तभी हम कहानी के तत्वों को समझ पाएंगे। अंत में सुधा भार्गव ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए बच्चों को अपने बचपन के किस्से सुनाए। उन्होंने कहा कि वह कक्षा 3 से अभी तक रोज डायरी लिखती हैं। उन्होंने कहा कि बच्चे डायरी लेखन से अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आप खाली समय में दूसरों के बोलने, हंसने, गुस्से का एकांत में नकल करो। इससे आपके स्वर में उतार-चढ़ाव के साथ ही आपकी झिझक भी दूर होगी। ऑनलाइन सेमिनार में कहानीकार शील कौशिक, रेखा लोढ़ा, कीर्ति श्रीवास्तव, संतोषकुमार सिंह, गोवर्धन यादव, डॉ.(मेजर) शक्तिराज, प्रभा उनियाल,कृपालसिंह शीला, मोहन चौहान, अनीता चमोली, खजान चौहान,उद्धव भयवाल, सुधा शर्मा, महेश रौतेला,ललित लोहनी, किरन जोशी, प्रेमा गड़कोटी, हीरासिंह राना,कुसुम जैन, डॉ. संजीव शर्मा, मंजू गुप्ता, कुंदन रावत,भैरवदत्त पांडेय, वैखाख रावत, सरोजनी देवी,डॉ. इंदिरा पांडेय, रमेश तिवारी सहित कई अभिभावकों, साहित्यकारों तथा बच्चों ने प्रतिभाग किया।



गुट्टू की बगिया दादी की इतनी चर्चा हो गई । अब इस कहानी को पढ़ा भी जाए। तो आइये इसका आनंद उठाये

  


    भूरी-भूरी  आँखों वाला एक बालक था जिसका नाम था गुट्टू। शरारत तो उसके अंग अंग में समाई हुई थी । बातूनी इतना मानो  उसके पेट में कोई गपोड़िया गहरा कुआं  हो  जो खाली होने का नाम ही नहीं लेता था । 

     वह अपनी दादी को बहुत प्यार करता था। कुछ दिनों से उनका बाहर जाना बंद था पर गुट्टू से उनकी खूब चटर पटर होती रहती। गुट्टू खुश कि उसकी कोई बात तो सुनने वाला है --दादी खुश कि चलो समय कट रहा

है ।

     कभी कभी उसकी दादी बहुत उदास हो जाती ।उसे  वे दिन याद आते जब अपनी सहेली रामकली और हरप्यारी  के साथ  मंदिर जाती।  कभी आइसक्रीम का स्वाद लेने पोते के साथ बाजार चल पड़ती । अब तो आह भर कर ही रह जाती --न जाने वो दिन लौटकर आएंगे भी या नहीं। 

      एक दिन दादी बड़बड़ा उठीं- 

      “ क्या तमाशा लगा रखा है !कभी लॉक डाउन ख़तम हो जाता तो कभी फिर से लोकडाउन शुरू कर देते ।पर क्या फर्क पड़ता ---हम राम तो घर में पहले की तरह ही लॉक  हैं।   जिंदगी में कभी इतने दिन लगकर घर में न रही।न जाने क्या पाप किया था जो ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं।"

 फिर  ऊंची आवाज में बोली,"ओ लक्खी बेटा -मुझे आज जरा कार में बैठाकर सैर करा  ला।सुना है कुछ बाजार खुल गए हैं । और हाँ मेरे साथ मेरा गुट्टू भी चलेगा। बेचारा चारदीवारी में कैद होकर रह गया है।” 

     “माँ ले तो चलूँगा पर किसी  दुकान पर नहीं उतरोगी ।” 

     “तो फिर जाकर क्या करूँगी ।  आधा घंटा तैयार होने में लगाऊँ ,नई साड़ी  की तह  ख़राब करूँ और कार में ही बैठी रहूं । रहने दे --मैं घर में ही भली।  घर में बैठी रहूँ  या कार में बात तो  एक  ही हुई ।” बूढ़ी मॉ झल्ला उठी । 

         माँ की व्याकुलता देख बेटा उदास हो गया । उसका मन बहलाने को बोला-“अच्छा माँ तुझे कुछ खरीदना हो तो बता, मैं एमोजॉन से मंगा  देता हूँ ।” 

     "ये अम्माजान तेरी कौन सी आ गई!सामान बेचे है क्या ?"

    "ओह मेरी माँ यह एमोजॉन बहुत बड़ी दुकान है । घर बैठे ही सामान  पहुंचा देगी ।" 

      “अरे मुझे कुछ न खरीदना । दूकान पर जाकर कोई जरूरी है कि खरीदो ही खरीदो । नई सुन्दर चीज देख आँखें भी तो मुस्कुराती हैं । मन खुशी से हवा में उड़ने लगता । तभी तो बाजार जाने को मन मचल उठा। ।” 

         इतने में गरमी से तपती गौरी बहू घर में घुसी । उसका खाली थैला देख गुट्टू के पापा  और उसकी बूढ़ी माँ दोनों ही चकित हो गए ।

      “एक घंटे में तुम्हें कोई सब्जी नहीं मिली!गुट्टू के लिए चार आम ही ले आतीं ।”गुट्टू के पापा बोले ।  

    “आपको आमों की पड़ी है बाहर जाकर देखिये कितनी लम्बी लाइन है । ज्यादातर लोगों ने मास्क ही नहीं लगा रखे ।दुकानों पर भुक्कड़ों की तरह टूटे पड़  रहे हैं। २ गज की बात छोड़ो दो इंच की भी दूरी नहीं बना रखी है । लगता है कोरोना उनका दोस्त है----किसी भी हालत में उनके पास नहीं फटकेगा ।  उफ !मैंने तो दूर खड़े बहुत इन्तजार किया---- अब बारी आये --अब बारी आये ।मेरी तो बाबा हिम्मत जबाब दे गई  भीड़ में घुसने की ।” 

     “पहले की तरह होम डिलीवरी क्यों न  करवा ली बहू । दुकानें तो खुल गई हैं।”दादी बोली ।  

    “माँ, मालिकों ने दुकाने तो खोल दी हैं पर उनकी मदद को कोई कर्मचारी न आया होगा ।”बेटे ने समझाया ।  

    “ओह समझी । अब तो घर में बैठे मुझे भी कुछ करना  पड़ेगा। हो  गया  बहुत आराम !मेरा पोता  कहाँ है?--अरे गुट्टू --ू ओ गुट्टू   कहाँ हैं बच्चे ?”

      खरगोश की तरह फुदकता गुट्टू आन  खड़ा हुआ -प्यारी दादी तुम्हारा गुट्टू आ गया!” 

    “तेरी मुठ्ठी में क्या है रे ?”

वह मुट्ठी खोलता बोला-”पांच गुट्टे!कल तुमने पांच गुट्टे का खेल सिखाया था न!उसी को बार- बार खेल रहा था। आज तो तुम्हें हरा कर रहूँगा।” 

    “ओह,पचगुट्टा--हो--हो --हो।” दादी जोर- जोर से हंसने लगी।  हँसी थमी तो बोली-”गुट्टू आज मैं तुझे दूसरा खेल सिखाऊंगी ।”

    “माँ मुझे भी सिखा दो।”गुट्टू का लक्खी पापा बोला। 

    “अरे तू बड़ा हो गया है--तुझे क्या सिखाऊँ !”

    “माँ मैं भी तो तेरा बच्चा हूँ ।कभी कभी मन करता है पहले की तरह तू मेरे बालों में अपनी अंगुलियां घुमाये --मेरे नखरे उठाये ।मुझे तो लगे तू मुझसे ज्यादा अपने पोते को प्यार करने लगी है। "

    "क्या कह रहा है !जो मन में आता बोल देता। रे--रे तेरी कोई जगह ले सकता है क्या!”बेटे के दिल में अपने लिए इतनी चाहत देख माँ का दिल बाग़  -बाग़ हो गया । 

    “अच्छा चल पिछवाड़े ---वो हमारी फुलबाड़ी है न ,उसी के पास सागबाड़ी बनाते हैं। ।सब्जियों की किल्लत कुछ तो कम होगी ।”

   “ओह दादी किचिन गार्डन !पर बिना माली के कौन जमीन खोदेगा ,कौन उनकी देखभाल करेगा। 

     "अरे मैं सब जानूँ हूँ। मेरा चाचा किसान था । सारे दिन खेतों में तितली की तरह उड़ती रहती। 

      "पर माँ कुछ भी बोने के  लिए तो बीजों की जरूरत होगी ।तुम  बताओ  क्या -क्या चाहिए मैं एमोजोन  से मँगा दूँगा।” 

     “तूने तो एजी  --ओजी  की रट  लगा रखी है  ।बीज तो रसोई में ही मिल जायेंगे।”फिर अपनी बहू को दमदार आवाज लगाई -”ओ  गौरी ज़रा सुन तो--थोड़ा सा साबुत कुचला  धनिया ,मेथी दाना  ,सौंफ ,पुदीना  ,और  सूखी मिर्चे तो दे दे।  आज इन्ही से अपनी साग-भाजी की बगिया शुरू करती हूँ।” 

     “अरे वाह दादी  वाह !फिर तो मेथी दानों से मिथिला रानी ,धनिये से धन्नो रानी छनकने लगेंगी । अब खाने को मिलेंगे मेथी के पराँठे और धनिये की चटपटी सब्जी। "

     "मन के गुब्बारे ज्यादा न फोड़ । चलकर कुछ कामकर । देख तेरे पापा ने क्यारियाँ बना दी हैं। तू इनमें से पत्थर और घास बीनकर निकाल। "

    दादी ने एक मिनट की भी देर किए बिना  अपने अनुभवी हाथों से एक में कुचला धनिया दूसरी में मेथी दाना और तीसरी में सौंफ छिड़क दी।  पुदीना उठाकर बड़ी चतुरता से उसकी जड़ें काटी और मिट्टी में घुसेड़ दीं।

    “,दादी  मिर्ची  तो सूखी बीमार सी लग रही हैं।  इसे फ़ेंक दो । मैं फ्रिज से अभी मोटी ताजी निकालकर लाता हूँ ।” गुट्टू बोला ।

      “अरे ठहर तो --कुछ ही दिनों में ये  सूखी मिर्ची ही हरी -हरी मोटी  मिर्चों को जन्म दे देंगी।” 

      गुट्टू और उसके पापा अचरज से दादी माँ को देखने लगे । दादी ने भी कमाल कर दिया। मिर्ची को तोड़ा और झट से उसके बीज अलग एक क्यारी में फैला दिए । उसकी  आँखों में खुशी झिलमिलाने लगी।रोज दिन में दो बार तो वह अपनी बगिया के चक्कर लगा ही लेती पर अकेली नहीं अपने दुलारे पोते के साथ । उसके बिना तो दादी की दाल गलती ही न थी। इंतजार करती कब छोटी -छोटी सुकुमार कोंपलें निकले! कब हवा में सौंफ और  मेथी की खुशबू घुल जाए! दादी की देखभाल और प्यार का यह असर हुआ कि जल्दी ही नन्हें पौधे हँसते -खिलखिलाते निकल आये । दादी को देख उसकी  और झुक झुक जाते और कहते - दादी माँ तुम बहुत बहुत प्यारी हो  । कच्ची सौंफ की पत्तियां बहुत बारीक थीं ।उनके सुंदर गुच्छे तो हवा में लहराते दादी के पैरों को चूमने  लगे ।  धीरे से फुसफुसाते -तुम हमारी भी दादी हो । हमें भूलना नहीं ।

     धीरे -धीरे दादी की बगिया महकती हुई बढ़ती  गई । गुट्टू को इस बगिया में बड़ा आनंद आता। उसमें छोटे -छोटे लाल टमाटर अपनी गोल गोल आँखें घुमाते उसकी ओर देखते तो लगता वे उसी का इंतजार कर रहे हों । अदरक -मूली को किसी की चिंता न थी । वे तो  बड़े मजे जमीन में पैर पसारती सोती रहतीं।  पर लौकी बड़ी सावधानी से मचान पर चढ़ कर पहरा देती । गुट्टू को तोरई बड़ी अच्छी लगती क्योंकि वह उसी की तरह  शैतान थी । उसकी बेल ने बांस से बनी छत पर बड़ी तेजी से कब्जा जमा लिया। उससे लटकती तोरई खूब इतराती और  हवा में मस्ती से कलाबाजियाँ करती।  लौकी  को छेड़ने के लिए आप जानकर उसके सिर से बार -बार टकराती --टक--टक --।  गुट्टू यह देखकर खूब उछलता और तालियाँ बजाता। बेचारी लौकी अपना सिर थाम कर रह जाती। पर गुस्सा जरा भी  न करती । तोरई को  छोटी बहन समझकर माफ कर देती । पोधीना, धनियाँ ,मेथी   की  कोमल पत्तियाँ हवा में  झूमतीं   तो  लगता जैसे हरा लहंगा पहने नन्ही-नन्ही  परियाँ गुट्टू  से मिलने आई हैं। उसका मन करता उन्हें गले लगा ले। 

     दादी -पोते के प्यार को पाकर सब्जियाँ बहुत खुश हुईं।और तेजी से बढ्ने लगीं। ज्यादा उगने पर दादी ने उन्हें पास-पड़ोस में भेजना शुरू कर दिया । पड़ोसी तो अवाक रह गए।  --दादी का यह कैसा करिश्मा !घर बैठे ही  ताजी सब्जी। गुट्टू की तो बस पूछो ही मत। जब भी मौका मिलता फोन पर डट जाता और शुरू हो जाते  चतुर दादी के किस्से  । थोड़े दिनों में ही गुट्टू की दादी मोहल्ले भर की बगिया दादी बन गई।

समाप्त