प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 13 मार्च 2017

प्रकाशित -बाल किलकारी पत्रिका


बाल कहानी
प्यार की भूख 


एक हाथी था जिसका नाम था मंगलू | उसकी कुछ अलग ही शान थी। शान तो होनी ही थी राजा का हाथी जो ठहरा। मंगलू को अच्छी किस्म के भरपूर चावल दिए जाते।वैसे चावल दूसरे हाथियों की तकदीर में न थे। उन्हें खा-खाकर वह मोटा और ताकतवर हो गया।
उसकी आदत हो गई थी कि खाते समय अपने चारों तरफ चावल छिटकाता और बड़ी मस्ती से झूमता उन्हें चबाता । उन चावलों की खुशबू हवा में घुल - घुल जाती। एक दिन वह खुशबू कुत्ते की नाक से जा टकराई।
-अरे वाह!क्या चावल है। खाने वाले की तो किस्मत ही खुल गई होगी । जरा देखूँ तो वो कौन भाग्यवान है?
यह सोचकर वह सूंघते-सूंघते हाथीशाला तक आ पहुंचा। मोती से दमकते सफेद चावलों को देख उसकी तो लार टपकने लगी।
-आह!आज तक ऐसा महक वाला चावल न देखा और न खाया। एक  मिनट में ही जमीन के सारे चावल सफाचट कर देता हूँ।
पालक झपकते ही चावलों को वह सपासप खा गया। चावल उसे इतने अच्छे लगे कि उनके लालच में अब वह हाथीशाला रोज आने लगा। जो भी चावल के दाने वहाँ बिखरे होते उन्हीं को खाकर बस अपना गुजारा करता। भूखा रहने पर भी वह  दूसरी जगह जाकर नहीं खाता था क्योंकि वहाँ के चावल उसे इतने स्वादिष्ट नहीं लगते थे।
अपनी शाला में कुत्ते को देखकर हाथी बड़ा खुश होता । अकेले –अकेले रहते वह उकता जाता था। कुछ ही दिनों में दोनों की अच्छी खासी दोस्ती हो गयी। इस दोस्ती पर प्यार का रंग ऐसा चढ़ा कि एक मिनट अलग रहना भी उनके लिए मुश्किल हो गया। कुत्ते को देखकर हाथी उसे सूड़ से बार –बार छूता और वह भी हाथी की सूड़ को इधर –उधर कर उससे खेलता। उसे प्यार से चाटता।
अब तो हाथी आप जानकर ज्यादा से चावल सूंड़ से इधर -उधर फैला देता ताकि कुत्ते को कम न पड़ जाएँ और वह भूखा न रहे। पेट भर खाने से कुत्ते की सेहत भी अच्छी हो गई।  उसके बाल मक्खन की तरह चिकने और चमकदार दिखाई देने लगे।     
एक दिन शहर से हाथीवान का रिश्तेदार बांगड़ू आया। कुत्ते को देख वह उस पर रीझ गया और बोला –चाचा,कुत्ते को मुझे दे दो। बड़ा ही प्यारा है।इसका हाथीशाला में क्या काम।
-अरे लल्ला, यह राजा के हाथी का दोस्त है। सारे दिन इखट्टे रहते हैं। इसे तो तुझे मैं नहीं दे सकता।
-मैं इसके बदले तुम्हें खूब सारा पैसा दूँ तो भी न दोगे ?
पैसे के नाम उसका मन डोल गया।
-अच्छा चल अपने प्यारे भीतीजे की ही बात मान लेता हूँ।
बाँगड़ू अच्छी -खासी कीमत देकर कुत्ते को अपने साथ ले गयाकुत्ता जाते हुए पीछे मुड़मुड़कर देखने लगा।शायद हाथीवान को उस पर दया आ जाए। पर उस बेदर्दी ने कुत्ते का दर्द समझते हुए भी अंजान बनने की कोशिश की। बाँगड़ू बड़ी बेदर्दी से आगे की तरफ खींचता चला जा रहा था।
कुत्ते के बिना हाथी बड़ा ही दुखी हुआ और ज़ोर ज़ोर से चिंघाड़ने लगा। ऐसा लगा मानो वह रो रोकर कुत्ते को पुकार रहा हो। उसने खाना -पीना ,-नहाना सब छोड़ दिया।बुझी -बुझी ,गीली आँखें साफ बता रही थीं कि वह किसी कष्ट में है। 
 लोगों ने राजा को इसकी खबर दी । राजा घबरा गया।  उसने तुरंत अपने मंत्री को बुलाया और कहा – मंत्री जी ,हमारे प्यारे हाथी ने खाना -पीना छोड़ दिया है इससे तो वह कमजोर हो जाएगा। उसकी परेशानी का कारण  जल्दी ही पता कीजिये। वरना हमें चैन न मिलेगा।
मंत्री ने हाथी की अच्छी तरह जांच –पड़ताल की पर उन्हें उसके शरीर में कोई बीमारी न दिखाई दी
उन्होंने हाथीवानों से पूछा – हाथी किसी को प्यार करता था क्या ?इससे इसका कोई प्रिय तो नहीं बिछुड़ गया ?कहीं उसी के गम में दुखी हो।
-हाँ मालिक !इसकी एक कुत्ते से बहुत दोस्ती थी ।दोनों घंटों खेला करते थे। कुछ दिनों पहले उसे एक आदमी ले गया है । तभी से यह हाथी बेचैन है। एक हाथीवान बोला।
मंत्री को उसकी बात जंच गई ।
उसने राजा को बताया –महाराज,हाथी अपने दोस्त कुत्ते से बिछुड़ जाने के कारण बहुत दुखी है। इसी से सब कुछ त्याग  बैठा है। राज्य में घोषणा करवा दीजिए कि जिसके घर में हाथी का मित्र  पाया जाएगा उसे आप सजा देंगे।
राजा ने घोषणा करवा दी। । इस समाचार को सुनकर बाँगड़ू घबरा गया और उसने कुत्ते को तुरंत छोड़ दिया।
कुत्ता सरपट दौड़ता हुआ आया और हाथी से चिपट गया जैसे वर्षों बाद मिला हो। उसकी आँखों से तो बहते हुए खुशी के आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
हाथी ने  दोस्त को सूड़ से बड़े प्रेम से खाना खिलाया ,बाद में खुद ने खाया।बहुत दिनों के बाद दोस्तों ने भरपेट चावल के दानों का स्वाद लिया।

 वहाँ खड़े लोग उनकी दोस्ती को  दे चकित थे और पहली बार उन्होंने जाना कि पशु भी प्यारभरी हवा मेँ सांस लेना चाहते हैं।

रविवार, 5 मार्च 2017

पाँचवी ई बुक


                                 बदलते रंग 
                                              सुधा भार्गव 

ई बुक 

फरवरी 2017 में मेरी  नई ई बुक प्रकाशित हो चुकी है। इसमें बालकों के लिए छोटी -छोटी  प्राचीन कथाओं को  दुबारा लिख उनका नवीनीकरण किया है। एक तरह से 'बदलते रंग'  कथाओं का तीसरा भाग है।  इनका  आधार  नैतिकता ,मनोरंजन व संस्कारों का बीजारोपण करना तो है ही। साथ ही बच्चों को  भविष्य के लिए तैयार करना है ताकि बड़े होने पर वे  जीवन मे आने वाली मुश्किलों का सामना सरलता से कर सकें।

ऑन लाइन पर इसके 60 पेज पुस्तक के शीर्षक पर क्लिक करते ही पढ़े जा सकते हैं। लिंक है-
https://pothi.com/pothi/book/ebook-sudha-bhargava-badalte-rang
पढ़कर अपने अमूल्य विचार अवश्य दें।


रविवार, 22 जनवरी 2017

चौथी ई बुक




सुधा भार्गव 



अभी हाल में जनवरी 2007 में मेरी यह ई बुक प्रकाशित हुई है।  इसमें बालोपयोगी 26 छोटी छोटी कथायें  हैं. इन कथाओं का आधार प्राचीन जातक लघुकथाएं ही है।  इनका सरल भाषा में पुनर्लेखन  किया गया है।
 ऑन  लाइन पर इसके 70 पेज सरलता से पढ़े जा सकते हैं. लिंक है-

/pothi.com/pothi/book/ebook-सुधा-भार्गव-हडप्पा-कडप्पा
इसके बारे में अपने विचार अवश्य बताइयेगा.


शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

देवपुत्र पत्रिका में प्रकाशित -वीर सिपाही



                              देवपुत्र पत्रिका 
            (ऊपर क्लिक करने से आप पत्रिका में भी यह कहानी पढ़ सकते हैं।)     

वीर सिपाही/सुधा भार्गव 

सूरज से दमकते चन्दन बाबू के घर में उमड़ते घुमड़ते काले बादलों का साया छा  जाना चाहता था। एक पल खामोश न रहने वाली उनकी लाड़ली आज खामोशी के जंगल में दिखाई दे रही थी।  उसके लिए तो चुप रहना उतना ही कठिन था जैसे बादलों में छलांग लगाना। उसका उदास चेहरा माँ-बाप की बेचैनी ही बढ़ा रहा था। वे तो उसे कल की वही शैतान चंचल पारो देखना चाहते थे।

विद्यालय  से आते ही न उसने खाया न पूरे विद्यालय की चकल्लस सुन माँ ने कानों में उँगलियाँ ठूँसी। बस बिस्तर पर लोटन कबूतर हो गई।
घर में घुसते ही पर्वत ने अपनी बहन को असमय लेटे देखा तो उछल पड़ा –ए पारो –कोपभवन में कैसे लेटी है?एकदम फुल्ले फुल्ले गाल—बिलकुल कैकई लग रही है।माँ से कितनी बार कहा –तुझे दूरदर्शन की हिन्दी धारावाहिक न देखने दें । बिगड़ जाएगी ---बिगड़ जाएगी। बिगड़ गई न तू!
-देखो भैया ,मुझे छेड़ो मत –वरना बहुत बुरा होगा।
-बुरा तो हो ही रहा है। तेरी चुप्पी ने सिर दर्द कर दिया है। इससे बुरा अब क्या होगा! मेरी अच्छी बहना अपने  भाई को तो बता दे –तेरे दिमाग में क्या चल रहा है?
-भैया,विद्यालय की दीदी कह कह रही थीं –सेना में भर्ती हो रही है लड़कों के साथ लड़कियों की भी। मैं भी तुम्हारी तरह एन ॰सी ॰सी॰ की ट्रेनिंग लेना चाहती हूँ । सेना में भर्ती होकर देश का वीर सिपाही बनूँगी।पता नहीं मम्मी-पापा इसके लिए सहमत होंगे या नहीं। 
-तू पागल हो गई है क्या?अगर नहीं हुई है तो एन॰सी॰सी ॰की ट्रेनिंग के समय रात -दिन मेहनत करके पागल हो जाएगी। शिविर में तो सुबह ही जगा देते हैं । भोर की किरणों के साथ दौड़,व्यायाम और ऊंचाई पर चढ़ने का अभ्यास शुरू हो जाता है। अच्छे-अच्छे मुर्गे बन जाते हैं और कूकड़ू करते भाग जाते हैं । फिर तू किस खेत की मूली है।
-भैया देखो—तुम मुझे फिर चिढ़ा रहे हो। न जाने तुम मुझको अपने से कम क्यों समझते हो ? मैं तुम्हारी तरह यह सब कर सकती हूँ और हाँ, समय आने पर सीमा पर भी लड़ने जाऊँगी।
-हिन्द पाक की सीमा पर जब देखो दुश्मनों की फौज से मुठभेड़ होती रहती है। न बाबा !मैं अपनी इकलौती बहन को  सेना में भर्ती नहीं होने दूंगा। माँ तो जल्दी से लड़का खोजकर तेरी शादी करने की सोच रही है  फिर तू जाने और –हमारे जीजा जी जाने।
-ओह भैया !तुम कभी मेरी मदद नहीं कर सकते सिवाय खिल्ली उड़ाने के। जाओ तुमसे नहीं बोलती।

भाई की बातों से पारो का मन बुझ सा गया। । इतने में पिताजी आ गए। काफी देर से भाई-बहनों की तकरार सुन रहे थे। पापा को देख पारो बड़ी उम्मीद के साथ बोली—पिताजी, क्या आप भी चाहते हैं किमैं घर साफ करने ,खाना बनाने,फटे कपड़े सीने में ही गुजार दूँ। दुनिया कितनी आगे बढ़ रही है। घर के साथ -साथ मैं बाहरी दुनिया में भी तो कदम रख सकती हूँ। मुझे आप घर की चारदीवारी में ही बंद क्यों रखना चाहते हैं---बोलिए न पिताजी?
-बेटी ! तुम गलत समझ रही हो। हम तो तुम्हें इतना आराम और प्यार देना चाहते हैं कि हमेशा गुलाब की तरह खिली रहो।
-पिताजी ,ऐसा प्यार,आराम किस काम का जो मुझे  अपाहिज बना दे।अपने काम के लिए हमेशा दूसरों का मुँह ताकूँ। ।  मुसीबत आने पर मैं बेचारी नहीं बनना चाहती। नहीं चाहिए किसी की दया ।
-बिटिया,तुम्हें दूसरों की जरूरत पड़ेगी । क्या अपनी रक्षा खुद कर पाओगी?
-मैं बंदूक चलना सीखूंगी –जूड़ो कराटे सीखूंगी। केवल अपनी ही नहीं देश की भी रक्षा करूंगी।
-पारो की माँ!सुन रही हो अपनी बेटी की बातें । लगता है हमारे घर में झांसी की रानी ने दुबारा जन्म ले लिया है। चन्दन बाबू अपनी बेटी के साहस और देशभक्ति की भावना को  देख बहुत खुश थे।
-आप भी किसकी बातों में आ गए। भला यह सीख पाएगी।
-सीखने के लिए लगन होनी चाहिए। यह लगन हमारी बेटी में है। वसंत कुंज में रहनेवाली भारत की पहली महिला आकाश गोताखोर (स्काई ड्राइवर )रीचल थॉमस ने तो नानी-दादी बनने के बाद नॉर्थ पोल से छ्लांग लगा दी। लगन के कारण न जाने कब से अभ्यास कर रही होंगी। देखना –हमारी बेटी भी एक दिन देश का नाम ऊंचा करेगी। और हाँ पारो जब तुम्हें एन॰सी॰सी ॰की ट्रेनिंग लेनी ही है तो देरी किस बात की है। कल ही विद्यालय से आवेदन पत्र ले आओ। चन्दन बाबू उसकी ओर देख मुस्कुरा उठे।  
-ओह मेरे अच्छे पिताजी !कहकर वह उनके गले लग गई।
पारो के चेहरे ए उदासी का घाना कोहरा छंटचुका था। वह कमर कसकर वीर सिपाही बनने का अपना सपना सच करने में लग गई।



सोमवार, 5 दिसंबर 2016

तीसरी ई बुक -बालोपयोगी लोक कथाएँ


गंगे-यमुने 




 आवरण पृष्ठ के ऊपर लिखे 'गंगे यमुने'के ऊपर क्लिक करने से आप ई बुक पढ़ सकेंगे। 
आज ही यह पुस्तक प्रकाशित हुई है।बालोपयोगी लोककथाओं का प्रतिनिधित्व करती हुई इसकी कहानियाँ - गुणों का खजाना हैं। इनमें मनोरंजन का पुट तो है ही साथ में दया,दोस्ती ,सच्ची,ईमानदारी और मेहनत की कमाई जैसे  जीवन के मूल्यों को सिखाने के लिए दिन रात पंखों पर सवार हो ज्ञान बांटती दिखाई देती हैं।जिससे बच्चों का चरित्र गठन तो होता ही हैं साथ ही हम अपनी परम्पराओं और संस्कृति से जुड़े रहते हैं।

गंगे यमुने बाल पुस्तक में कुल मिलाकर 89 पृष्ठ हैं। जिनपर 20 कहानियाँ अंकित हैं। मुख्य आवरण का चित्रांकन खुद लेखिका ने किया है। मेरा आग्रह है इसका अवलोकन कर अवश्य ही अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराएं।  

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

ई बुक 1-मनोवैज्ञानिक बाल कहानियाँ

अंतरजाल पर मेरी प्रथम प्रकाशित ई बुक 
उलझन भरा संसार 
यह मेरा प्रथम प्रयास है। अपनी खुशी आपके साथ साझा करने में खुशी हो रही  है।  यह पुस्तक बाल मनोविज्ञान  से संबन्धित  है।  इसमें कुल मिलाकर 10 कहानियाँ है। जो यदा कदा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। 
लिंक है 

pothi.com/pothi/book/ebook-sudha-bhargava-uljhan-bhara-sansar

रविवार, 4 सितंबर 2016

उत्सवों का आकाश 8-गणेश चतुर्थी के अवसर पर डमरू के दोस्त से एक मुलाक़ात

गणेश चतुर्थी प्यारे -प्यारे बच्चों को और बड़ों को   मंगलमय हो ।
कल भी  ,आज भी  और कल भी |
मतलब --पूरे वर्ष 


आओ 
एक साथ दिल से बोलें ----
एक -दो -तीन -चार 
गणपति की जयजयकार।
पाँच -छह- सात -आठ 
गणपति करते मालामाल।
नौ- दस -ग्यारह- बारह 
हरते कष्ट बारम्बार।
तेरह- चौदह- पन्द्रह -सोलह 
गणपति हैं सबसे भोले ।
सत्रह- अठारह -उन्नीस- बीस 
गणपति रहते हमारे बीच ॥

 बच्चों, तुम्हारी जान पहचान कुछ तो गणपति(गणेश ) जी से  हो गई है पर  अभी डमरू के दोस्त से मिलना बाक़ी है |

तुम भी जरा सोचो डमरू  का दोस्त कौन हो सकता है  !
नहीं दिमाग में आया ----चलो ---हम बताते हैं |

डमरू कल अपनी माँ के साथ पूजा पंडाल गया।वहाँ उसकी मुलाकात गणेश जी से हुई । पहले पहल तो वह उनको देखकर डर गया 
-लम्बी सी सूढ़ .मोटा सा पेट ,लम्बे नुकीले वह भी दो बड़े दांत ! दरवाजे से ही वह तो भागा बाहर की ओर ------



गणेश जी भी उसका पीछा छोड़ने वाले कब थे  ।उन्होंने तुरंत अपनी सूढ़ लम्बी करके उसे लपेट लिया और  ले आये अपने पास।

बोले ---डरो नहीं बच्चे ,लो यह लड्डू खाओ --मुझे लड्डू बहुत
पसंद हैं ।
 -नहीं, मैं नहीं खाऊँगा  ।मेरा पेट भी तुम्हारे पेट की तरह लड्डू हो जायेगा।
-हा ---हा ---हा !तुम तो बहुत हँसाते हो  । एक लड्डू से कुछ नहीं होता ।मैं तो कटोरा  भरकर लड्डू खाता हूं।
-बाप रे --!डमरू आश्चर्य से अपनी आँखें झपकने लगा लेकिन उसका डर जाता रहा।

डमरू गणेश  जी के पास खिसक आया।उनका सिर छूते हुए बोला --
--तुम्हारा सिर हाथी सा क्यों  है ?
-तुमने सुना नहीं ---सिर बड़े  सरदारों के ,पैर बड़े  गवांरों के ,तो समझ लो हाथी की तरह मैं बहुत बुद्धिमान हूं।

--और यह इतनी लम्बी सूढ़ ! किस काम की ----न जाने चलते भी कैसे हो । मुझे तो आफत की पुड़िया लगती है।
--यह आफत की पुड़िया नहीं --आफत भगाने की पुड़िया है । कदम बढ़ाने से पहले ही इससे सूँघ कर पता  लगा लेता हूं कि आगे कोई खतरा तो नहीं ---!

-तुम्हारे कान कहाँ है ?सुनते कैसे  हो ----कान तो तुम्हारे हैं ही नहीं हा --हा ।
-पंखों से ही मेरे कान हैं  ।दूसरों की बातें मैं बहुत ध्यान से सुनता हूं और कान  में बंद करके उन्हें निकलने नहीं देता ।
--मैं तो अपने मम्मी -पापा की बातें एक कान से सुनता हूं और दूसरे कान से निकाल देता हूं ।
-यह आदत ठीक नहीं । इससे तुम्हारा नुकसान ही होगा।
--तुमभी कहाँ ठीक से सुनते हो। तुम्हारी मम्मी जरूर कहती होंगी --गणेशा कम खाओ --कम खाओ जिससे पेट पिचक जाये।
-यह पिचक तो सकता ही नहीं है । मैं दूसरों की  बातों को अपने पेट में रखता हूं और अपनी बातें किसी को बताता नहीं।
वे भी मेरे पेट में समाई  रहती है  ।इससे पेट फूल जाता हैं
 ।

--तुम तो बहुत चतुर हो-- दुनिया का  भेद पा लिया और अपना भेद किसी को नहीं दिया , लेकिन इससे क्या फायदा !
-फायदा यही  कि  दुश्मन हो या दोस्त -मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
जब तुम बड़े हो जाओगे और अपना कोई काम(व्यापार) शुरू करोगे ,तब मेरी बातें समझ में आयेंगी।
--हां याद आया---दुकानमें तुम्हारी बड़ी सी फोटो लगी है। सुबह -सुबह सबसे पहले पिताजी तुम पर  फूलमाला चढ़ाते हैं ,पूजा करते है------
जय गणेश जय गणेश
जय गणेश देवा--
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-तुम तो सच में गणेश देवा हो !
-तुम्हारे लिए मैं केवल गणेश हूं --तुम्हारा दोस्त ।


एकाएक माँ की आवाज आई --अरे डमरू --!कहाँ गया ?                         
--घर में पूजा का समय हो गया ।
डमरू चलने-चलते बोला ---
-दोस्त अब कब मिलेंगे ?
-जब याद करोगे मुझे अपने पास पाओगे । मैं अपने चाहने वालों को बहुत प्यार करता हूं।

डमरू  की आंखों में अपने दोस्त की प्यारी  छवि थी  और अपनी माँ के साथ मग्न होकर गा रहा था ---
जय गणेश जय गणेश

जय गणेश देवा  
माता जाकी  पार्वती
पिता महादेवा |
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