प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 14 मई 2018

अंधविश्वास की दुनिया



॥5॥ लाड़ला शीशा
सुधा भार्गव
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       राधे अपनी पत्नी और बेटे नीलू के साथ माँ से मिलने कलकत्ता आया हुआ था। माँ,बाप-दादा की  बनाई कोठी में रहती थी। कोठी मुस्कराती पुराने वैभव की कथा सुना रही थी। अंदर से वह शीशमहल से कम न थी। चारों तरफ बेलबूटेदार छोटे- बड़े शीशे लगे हुए थे। दादी का बच्चों को सख्त आदेश था कि उन्हें न ही छुएँ,न ही उनके पास जाएँ।
      खिलंदड़ नीलू इस नियम से परेशान हो उठा। कोठी के किसी भी कोने मेँ वह गेंद से नहीं खेल सकता था। जैसे ही गेंद हाथ मेँ लेता दो आँखें उसका पीछा करती और दादी का स्वर सुनाई देता –“ओ नीलू जरा बाहर जाकर खेल। तेरी गेंद से शीशा जरूर टूटेगा।"  
      एक दिन अकेले में नीलू ने शीशे से पूछा –“मेरे छूने से क्या तुम मैले हो जाओगे?” जब देखो दादी टोकनबाजी करती रहती हैं। तुम्हारे सामने तो मैं खड़ा भी नहीं हो सकता। ये देखो मेरे बाल---- भालू से लगते हैं न। तुम ही बताओ --बिना तुम्हारे इनमें ठीक से कंघी कैसे करूँ?
      शीशा उसे समझाते हुए बोला-“दोस्त, जन्म के समय मैं और मेरे भाई-बहन कमजोर ही पैदा हुए। जरा से धक्के से बीमार हो जाते थे और फिर टूट जाते थे। इसलिए हमारा बहुत ध्यान रखा जाता। दादी भी इसीलिए तुम्हें हाथ लगाने को मना करती हैं कि कहीं तुम मुझे ज़ोर से दबा दो और मुझे चोट लग जाये। वे मुझे इतना प्यार करती हैं कि अपने हाथ से मेरे ऊपर जमी मिट्टी साफ करती हैं । गीले मुलायम कपड़े से मेरा मुंह पोंछती हैं। मानो मैं छोटा सा बच्चा हूँ। मजाल है कोई नौकर मेरे हाथ तो लगा दे।”
      “हूँ --छोटा सा बच्चा! लगता है ज्यादा लाड़-प्यार ने तुम्हें बिगाड़ दिया है। वैसे तुम हो कितने बरस के?”
      “करीब 70 साल का तो होऊँगा।“ 
     “हो—हो--फिर तो तुम बुढ़ऊ हो गए। अब समझा ---तुम्हारी चमक कम क्यों होती जा रही है।  रे—रे--शरीर पर छोटे-छोटे काले दाग भी पड़ गए हैं। अब तो तुम्हारा जाना ही ठीक है। तुम जाओगे  तो तुम्हारी जगह मेरे पापा मजबूत सा--- चमकीला शीशा लगा देंगे।"
      “तौबा रे तौबा! क्या कह रहे हो! ऐसी बात दादी के सामने न कह देना। कान पकड़ कोठी से तुम्हें निकाल देंगी।”
      “ओह! तो तुमने दादी को पूरी तरह अपनी मुट्ठी मेँ कर रखा है। ये तुम्हारी तानाशाही नहीं चलेगी। तुम्हारे सामने ही तुम्हें चिढ़ा-चिढ़ाकर गेंद खेलूँगा। यहाँ जब से आया हूँ प्यारी गेंद को छुआ तक नहीं। वह भी सोचती होगी कहाँ आन फंसी। दादी तो मुझे भी प्यार करती हैं। देखना ----मेरा ही पक्ष लेगी।” 
      “तो ठीक है ---मुझे बदलने की बात एक बार कह कर तो देखो। न सजा मिले तो कहना।”
      “तुम्हें अपने पर इतना भरोसा!”
      “हाँ –एकदम—।”
     “ठीक है –मैं भी देखता हूँ।”
      नीलू को एक दिन गेंद खेलने का मौका मिल ही गया। दादी पूजा घर में ज़ोर-ज़ोर घंटी बजाती हुई भजन गा रही थीं। नीलू का दिमाग तेजी से काम करने लगा –आह! इस शोर में गेंद को ज़ोर-ज़ोर से जमीन पर पटकूंगा तो भी उसकी भनक दादी के कानों में पड़ने से रही।
      अब तो गेंद हवा में बल खाती हुई जमीन पर फुदकने लगी।
      अचानक धड़ाक—धड़ाक ---मानो बम फूटा हो।
      “अरे क्या हुआ ?”दादी ज़ोर से  चिल्लाईं और पूजा अधूरी छोड़ बदहवास सी दौड़ी आईं। उनका प्यारा शीशा जमीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया था। उसे देख दुख से बौरा गई।
      ज़ोर से चीखी –“अरे राधे कहाँ गया?”
      माँ की आवाज सुन बेटा भी घबरा गया। नाश्ता छोड़ भागता आया। टूटे-बिखरे शीशे को देखकर वह भी सहम गया। जानता था-माँ को वह जान से भी ज्यादा प्यारा है।
      “गज़ब हो गया रे राधे—यह किसने करा रे ?--–इस शीशे में तो तेरे बाप की आत्मा बसी थी। 10 साल पहले उन्होंने शरीर जरूर छोड़ दिया पर आत्मा तो इसी घर में थी। आज तो वह भी उड़ गई। इसका नतीजा बहुत बुरा होगा। शीशा टूटा है –अब घर टूटेगा ,दिल टूटेगा और क्या मालूम किसी के हाथ-पैर भी टूटें। माँ एक सांस में सब कह गई।  कहते –कहते उसकी रुलाई फूट पड़ी।
      “यह सब तुमसे किसने कह दिया माँ?”
       “कोई क्या कहेगा ---?मैं तो घर-बाहर हमेशा से यही सुनती आ रही हूँ। सात साल से पहले बदनसीबी पीछा न छोड़ेगी। माँ ने गहरी सांस ली।”
      नीलू को देखते ही पागलों की तरह  ठाकुर माँ उसके कंधों को  झझोड़ती बोलीं –“जरूर इस दुष्ट की कारिस्तानी होगी। कितनी बार कहा है जहां-जहां शीशे लगे हैं वहाँ गेंद से न खेलाकर मगर चिकना घड़ा है एकदम चिकना। कोई असर हो तब ना। देख लिया तूने गेंद खेलने का नतीजा।”
       “माँ इतना परेशान क्यों होती हो? मैं एक के बदले दो ला दूंगा। अब तो बहुत सुंदर-सुंदर शीशे बनने लगे हैं।” राधे ने माँ को सांत्वना देने की कोशिश की।
      “लाने से क्या होगा। शीशा तो टूट ही गया। कुछ न कुछ किसी का नुकसान जरूर होगा।"
     “फिर वही बात ---मैंने कहा न --- कुछ नहीं होगा। पहले जमाने में शीशे की किस्म अच्छी न होने से बड़े नाजुक थे। इसके अलावा महंगे भी बहुत थे। जरा टूटे तो नुकसान ही नुकसान। बाबा जैसे शौकीन तबियत वाले ही शीशे घर में लगा सकते थे। अब तुम पहले की सुनी-सुनाई बातों का  मतलब तो समझने की कोशिश करती नहीं—बस जैसा किसी ने कहा दिल में बैठा लिया।"  
      पापा को देख नीलू में हिम्मत आई और धीरे से बोला-“दादी शीशा भी मुझसे कुछ इसी तरह की बातें कर रहा था।”
      “तू तो चुप ही रह। बड़ा अक़्लमंद बनता है।”  
      “कुछ भी कह राधे –तेरे बापू तो इस शीशे पर बड़े रीझे हुए थे। लगता था उनकी आत्मा  उसी में है। ” 
     “उन्हें शीशा बहुत अच्छा लगता था इसीलिए माँ ऐसा कहती हो। तुम भी तो नीलू को बहुत प्यार  करती हो। तुम्हें कई बार कहते सुना है –नीलू मेँ तो मेरी जान बसी है। मुझे तो लगता है तुम्हारी आत्मा भी उसी में बस गई है।” बेटा हल्के से मुस्कुरा दिया।
      “सच में प्यार तो उसे बहुत करूँ हूँ। मैंने गुस्से में न जाने क्या -क्या कह दिया। नाहक बच्चे को कोसकर जी दुखाया। आ बेटा--- मेरे पास आ--।”
      नीलू झट से दादी के आंचल में जा छिपा। उसके सिर पर स्नेहभरा हाथ फेरते हुए बोली –कोई बात नहीं बेटा! शीशा टूट गया तो टूट जाने दे। तेरा पापा दूसरा लगवा देगा।”
      “दादी तुमने मुझे माफ कर दिया?”
      “माफी किस बात की---? गलती तो मेरी भी थी। अंधे की तरह बेकार की बातों पर विश्वास कर रही थी।”
      दादी की टोकाटोकी खतम हो गई थी पर नीलू स्वयं सावधान रहने लगा। वह दूसरा शीशा तोड़कर दादी का जी नहीं दुखाना चाहता था।
समाप्त 

सोमवार, 7 मई 2018

अंधविश्वास की दुनिया




॥4॥ भूतइया पेड़ 

सुधा भार्गव 



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पीपल का पेड़ 
    
     भोलू ने जैसे ही सुना रिटायर होने के बाद उसके बापू को सरकारी क्वार्टर छोड़ना पड़ेगा ,वह खुशी से उछल पड़ा—“बापू—बापू अब शहर में एक बड़ा सा बंगला खरीदेंगे। ”
      “हाँ –हाँ जरूर अपने लाडले के लिए बड़ी सी कोठी ख़रीदूँगा पर तू उसका करेगा क्या? हम तीन के लिए तो दो कमरे ही बहुत ।” बिहारी बोला।
      “ओह बापू आप समझते क्यों नहीं।!बंगला होने पर मैं अपने दोस्तों पर रौब झाड़ूँगा।  वो मटल्लू है न पीली कोठी वाला –सीधे मुंह बात ही नहीं करता।”
     “बेटा कोठी खरीदने को खूब सारा पैसा कहाँ से आयेगा?”
     “अभी तो आप खरीद लो फिर बड़ा होने पर मैं खूब सारा पैसा कमा कर लाऊँगा, वो सब तुम्हें दे दूंगा।”
    भोलू की भोली बातें सुन वह हरहरा उठा। उसे प्यार से गोदी में उठा लिया।
     “चल अच्छा सा घर देखने चलते हैं। तेरी माँ को भी साथ ले लें।”
     “हाँ हाँ चलो चलो।”  
     आगे आगे भोलू और पीछे पीछे उसके बापू और माँ । जो मकान बिहारी को पसंद आता उसका किराया औकात से बाहर--- जिसका किराया वह  आसानी से दे सकता उसको देखते ही बेटा नाक भौं सकोड़ने लगता – अरे यहाँ बॉल कहाँ खेलूँगा? मेरी  बिल्ली कहाँ रहेगी? भोलू माँ-बाप की आँखों का तारा —दोनों ही  उसकी इच्छा पूरी करना चाहते थे।            
     ऐसी परेशानी में उसके एक मित्र ने घर बताया और कहा-बिहारी तू एक बार मालकिन से मिल ले।  घर भी अच्छा है। वह कम किराए पर ही देने को तैयार हो जाएगी।  लेकिन---
     लेकिन  क्या --?”
     घर के चारों तरफ भूत मँडराते हैं। वो–वो भूतइया घर है।” हकलाता सा बोला।
    “भूत! हा—हा-- मैं यह सब नहीं मानता।” उसने ज़ोर से अट्ठास किया।
    “उड़ा ले—उड़ा ले मेरी हंसी! सच मान उसके दरवाजे पर पीपल  का पेड़ लगा है। रात में भूतों का वहीं पर बसेरा होता है। और तो और पिछवाड़े नीम और बरगद भी लगा है। संकट ही संकट! कितनी बार बेटे ने कहा होगा माँ यह भुतइया पीपल कटवा दे कहीं कुछ अशुभ न हो जाय  पर नहीं! आखिर में  बेटा माँ को अकेला  छोड़कर चला गया। बुढ़िया है जिद की पक्की--- सारे दिन पेड़ों की देखभाल करती रहती है या नए पेड़ लगाती रहती है।”
     “बलिहारी तेरी बुद्धि की! कुछ भी कह मैं एक बार उस घर को जरूर देखूंगा । मेरे साथ चल न।”
     दरवाजे पर दो अजनबी को देख बूढ़ी मालकिन बाहर निकल कर आई। बिहारी ने हाथ जोड़ नमस्ते की। बूढ़ी गदगद हो उठी। मृदुलता से बोली-बेटा कैसे आना हुआ? मुझसे कोई काम है क्या?”
     “हाँ माँजी। ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से घिरा आपका घर बहुत सुंदर लग रहा है। मैं अपने परिवार के साथ इसमें रहना चाहता हूँ। इसका आप क्या किराया लेंगी?”
     “किराया! क्या कहे है बिटुआ---तू तो मेरे बेटे समान है। तुझसे किराया क्या लेना! तू आ गया तो रौनक ही रौनक । इसकी देखभाल से मेरा पीछा तो छूटे।” बुढ़िया का चेहरा चमक उठा।
     “किराया तो आपको लेना पड़ेगा। जितना मैं दे सकता हूँ उतना तो दूंगा।”
     “ठीक है, पर कोई पेड़ काटने को न कहियो।”
     “पेड़ काटने के लिए भला क्यों कहने लगा। इन्हीं  के कारण तो यहाँ इतनी ठंडक है। पेड़ों के कारण न बाहर की धूल धक्कड़ घर में आएगी और शोरगुल भी कम सुनाई देगा।”
     “तूने तो मेरे दिल की बात कह दी। मेरे बेटे की समझ से तो यह परे है।” बूढ़ी माँ के चेहरे पर उदासी घिर आई। 
     लौटते समय रास्ते में उसका मित्र अनमना सा बोला-अगले महीने क्या तू इस भूतइया घर में सच में आ रहा है । अच्छी  तरह सोचसमझ ले। कुछ अनहोनी न हो जाये। कम से कम पीपल का पेड़ तो कटवाने को कह देता।”
     “तू भी अजीब है --वैसे तो  पीपल को महादेव कहता है --- मंदिर जाते समय उस पर जल चढ़ाना नहीं भूलता। घर में लगे पीपल से  फिर क्या बैर ! पीपल चाहे  घर में हो या बाहर बात तो एक ही है।”
     “एक ही बात कैसे! बाहर, रात में इसके नीचे महादेव आसन जमा लेते हैं। उन्हें देखते ही भूत भाग जाते हैं पर घर में महादेव कहाँ आने वाले--- सो भूत आकर  जम जाते हैं।”
     “तुझसे पार पाना बड़ा मुश्किल है। अच्छा एक बात बता तू पीपल को महादेव क्यों कहता है?”
     “माँ बताती थी बाहर के पीपल पर महादेव  का वास होता है। महादेव के खुश रहने से वह हमारी रक्षा करता है । इसीलिए वह जल चढ़ाती थी, मैं भी चढ़ा देता हूँ।  इसमें सोचने- समझने की क्या बात है?”
     “सोचने समझने की ही बात है। पीपल पर न महादेव रहते हैं और न कोई भूत। पीपल भी रात-दिन हमारी रक्षा करता है इसलिए उसे ही महादेव कहा जाता है  और उसकी पूजा करते हैं।
     “माना दिन में पीपल छाया देता है। पर रात में असुरक्षा का गढ़ ही समझ ।  तू रात में इसके नीचे गया तो भूत को देखते ही तेरी तो बच्चू, डर के मारे घिग्घी बंध जाएगी। न जाने वह तेरी पिटाई ही कर दे।  मेरा तो सोच-सोचकर ही बुरा हाल हो रहा है।”
      “तुझे कुछ पता तो है नहीं! पीपल एक ऐसा निराला पेड़ है जो रात -दिन आक्सीजन देता है। संध्या हो या रात --इसके नीचे बैठ तू गपशप कर या चारपाई बिछाकर झपकी ले शुद्ध वायु ही मिलेगी। कोई भूतला-बूतला  नहीं चिपटेगा—तुझे बस वहम की बीमारी  है।”
      “अच्छा मज़ाक कर लेता है । इतना बुद्धू नहीं कि तेरी बात पर आँख मीचकर विश्वास कर लूँ। रात में तो पेड़ कार्बन डाई आक्साइड ही निकालते हैं और आक्सीजन ग्रहण करते हैं। सुबह ही उनसे आक्सीजन मिलती हैं। तभी तो पार्क में सुबह घूमने जाते हैं।”
      “तू नहीं समझेगा --मैं तो कहूँ बुढ़िया ने पीपल के साथ बरगद- नीम लगाकर अच्छा ही किया है। बरगद और नीम भी दूसरों से ज्यादा आक्सीजन देते हैं। घर बैठे ही आज के प्रदूषण में शुद्ध वायु मिल जाये इससे अच्छा और क्या! ”
      “हाँ कुछ धुंधला धुंधला सा याद आ रहा है --।”मित्र सिर खुजलाते बोला।
      “क्या याद आ रहा है ?लगता है तेरी बुद्धि करवट बदल रही है। ”
     “दादी माँ बरगद की पूजा करती थी। एक बार मैंने पूछा भी दादी बरगद की पूजा क्यों करते हैं?’ कहने लगी-पूजा तो उसीकी की जाती है जो बिना स्वार्थ के दूसरों का भला करे।बरगद कुछ ऐसा ही पेड़ है। नीम की डंडी के बिना तो उसके दाँत ही साफ नहीं होते थे। वह नीम को डॉक्टर बाबू--- डॉक्टर बाबू कहती थी।”
     "अब तेरे दिमाग ने ठीक से काम करना शुरू कर दिया है।”
     “हूँ---ठीक ही कह रहा है --भूतइया घर तो परोपकारी  निकला। अरे वाह! क्या किस्मत पाई है! अब तू जल्दी से यहाँ आजा फिर तेरी भावी के साथ मिठाई खाने आऊँगा।”
     दोनों दोस्त हँसते हँसते आगे बढ़ गए।

बुधवार, 2 मई 2018

बाल उपन्यास




          बाल उपन्यास ‘बुलबुल की नगरी’ की कल्पना सचमुच अनोखी है। यह एक ऐसी नगरी है जहां गुड्डे-गुड़ियाँ रहते हैं। पर उस के शासन की बागडोर नटखट बच्चे बड़ी खूबसूरती से मिलजुलकर सँभाले अपनी कुशलता का परिचय दे रहे हैं।  मनोरंजन से तो भरपूर है ही साथ ही एक बार पढ़ना  शुरू  किया तो मन ऐसा रमेगा --ऐसा रमेगा कि छोड़ने को मन ही नहीं करेगा। 
          बस बुलबुल की नगरी पर क्लिक कीजिये और  डाउनलोड कर लीजिये।   

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

अंधविश्वास की दुनिया

    


॥3॥ बालों का जंगल 

सुधा भार्गव

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     ताराचंद पढ़ी-लिखी बहू पाकर फूले नहीं समा रहे थे। सोचा करते, “ बेटा बुद्धिमान , तो बहू भी उससे कम नहीं। मेरे पोता -पोती तो इनसे भी बढ़कर निकलेंगे।”
     एक दिन हँसते हुए पत्नी से बोले –“जंगल बड़ा घना उग आया  है। इसे मैं कटवाने जा रहा हूँ।”
    घना जंगल’?
    अरे देख न रही ये मेरे सिर पर ---बालों का जंगल !”
    पत्नी भी उनकी इस विनोदप्रियता पर मुसकाए बिना न रही।
    अचानक बहू का स्वर उभरा- “बाबू जी आज तो मंगलवार है, बाल न कटवाओ ।”  
    “क्यों बहू----?” आश्चर्य से वे बहू नीलू  को देखते रह गए। उनके चेहरे का हास्य कपूर की तरह उड़ गया।
    “इससे अपशकुन ही अपशकुन होता है।”
    “अपशकुन---! यह बात तुमसे किसने कही?”
    “मेरी दादी कहा करती थीं।इसलिए भैया और पिताजी कोई भी मंगलवार को बाल नहीं कटवाता।”
    “तुमने इसका  कारण तो पूछा होगा उनसे।”
    “पहले तो मुझे यह बात बड़ी अजीब सी लगी----हिम्मत करके पूछा भी तो बड़ी ज़ोर से डांट पीने को मिली , “छोरी दो अक्षर क्या पढ़ गई बड़ी कानूनबाजी करने लगी है। बाप ने तो एक बार न पूछी। कान खोलकर सुन ले ---यह रिवाज  हमारे घर में दादा—परदादा के समय से चला  आ रहा  हैं ----तुझे भी मानना होगा।”
      “उसके बाद तो कुछ पूछने का साहस ही नहीं हुआ। धीरे- धीरे यह सुनने और देखने की आदत सी पड़ गई। विश्वास भी होने लगा है कि मंगलवार को बाल कटवाने से कुछ अनहोनी जरूर हो जाएगी  
    “बिना कारण पता किए इस रिवाज पर कैसे विश्वास कर लिया! एक अनपढ़ , सड़ी-गली रीति-रिवाजों के अनुसार चले तब भी ठीक है। पर तुम –ओह तुम बिना तर्क किए कैसे इस विचार की अनुयायी हो गईं। इसी को तो कहते हैं अंधविश्वास। पढ़े-लिखे भी इतने अंधविश्वासी!” ताराचंद इस झटके से कराह उठे।
नीलू का शर्म से सिर झुक गया और इस अंधविश्वास की जड़ तक पहुँचने की उसने ठान ली।  दिमाग पर ज़ोर डालते हुए बोली- बाबू जी कोई बात तो जरूर हुई होगी जिससे लोगों के दिमाग में आया कि मंगलवार को बाल नहीं कटवाने चाहिए।”
    “तुम ठीक कह रही हो नीलू। अब तुमने अपने दिमाग से काम लिया। बहुत पहले हमारे देश  में 75% लोग  गांवों में रहते थे जो किसान थे।  हमारे तुम्हारे पूर्वजों में से कोई न कोई गाँव में रहकर खेती जरूर करता होगा । पूरे हफ्ते कड़ी मेहनत के बाद किसानों को सोमवार का दिन ही आराम करने को मिलता था। वे उस दिन घर की सफाई करते, ढाढ़ी बनवाते, बाल कटवाते। नाई भी सारे दिन व्यस्त रहता। मंगलवार को इक्का-दुक्का ही उसकी दुकान पर जाता। वह भी सोचता होगा दो जन को कौन दुकान खोले। इसलिए उस दिन वह  उसे बंद ही  रखता। कोई नाई से बाल कटवाने की सोचता भी तो लोग कहते -भैया---मंगल को बाल न कट सकें। यह वाक्य इतना प्रचलित हो गया कि मंगल को बाल न कटवाने की प्रथा ही बन गई है। तुम जैसे शिक्षित लोगों को भी इस अंधविश्वास ने अपने  जाल में जकड़ रखा है। अब मैं क्या बोलूँ –बोलूँगा तो बोलोगी –बाबू जी ऐसा बोलते हैं---तुम्हारी तरह उनके मन में भी डर समा गया है कि मंगल को बाल कटवाने से जरूर कोई अमंगल होगा। होगा। कारण कोई जानना  ही नहीं चाहता है।
    “आप ठीक कह रहे हैं । रीति-रिवाजों की गहराई में उतरने की मैंने ही कब चेष्टा की!”
    “अब तो पहले और आज के रहन सहन में जमीन-आसमान का अंतर है। जगह- जगह सैलून खुल गए हैं। शहरी सभ्यता गांवों में भी पैर पसार रही है। आँखें खुली होने पर भी लकीर के फकीर होना क्या ठीक है!”
    “बाबू जी ,आप बड़े है। आप कुछ बताएँगे  हमारे भले के लिए ही तो बताएँगे ।अब से किसी प्रथा को मानते समय मैं अपनी आँखें हमेशा खुली रखूंगी।”
समाप्त


मंगलवार, 20 मार्च 2018

अंधविश्वास की दुनिया


(2) पगला गया क्या!नाखून काटेगा 

सुधा भार्गव
     
     स्कूल पहुँचते ही खरबूजे  को याद आया –अरे नाखून कटवाना तो भूल ही गया। कल जामुनी मिस ने चेतावनी भी दी थी। आज तो जरूर पकड़ा जाऊंगा। हे भगवान फिर तो डांट डांटकर मेरा हलुआ बना दिया जाएगा।
      वही हुआ जिसका उसे शक था। प्रात: ईश प्रार्थना के बाद मिस ने उसे रंगोहाथ पकड़ लिया। आँखें तरेरती बोलीं- –“खरबूजे,आज भी नाखून नहीं कटे। तुरंत मैदान में जाकर खड़े हो जाओ। तुम्हें प्रिन्सिपल के पास जरूर ले जाऊँगी। खरबूजे का तो डर के मारे रंग ही बादल गया।
      सारे बच्चे कक्षाओं में चले गए । जामुनी मिस ने गुस्से में कहा-“चलो, तुम जैसे बच्चों के  एक बार की कही बात समझ में ही नहीं आती।”
     प्रिन्सिपल ने कनखियों से खरबूजे  को देखा फिर मिस से आने का कारण पूछा।
     “मैडम, हम हर मंगलवार को नाखूनों की जांच करते हैं कि वे गंदे या बढ़े हुए तो नहीं हैं। नाखून बढ़े होने पर खरबूजे से कहा था-नाखून काट कर आए आज मैं देखूँगी। पर इसके कान पर तो जूं भी न रेंगी। देखिये न इसके नाखून कितने भद्दे लग रहे हैं।”
     “बेटे क्या तुम्हें मालूम है नाखून को काटने के लिए क्यों कहा जाता है?”
     “हाँ मैडम। नाखून बढ्ने से गंदगी उनमें भर जाती है। खाना खाते समय वह शरीर के अंदर जाकर बीमारियाँ कर देती है।”
     “अरे तुम तो बड़े होशियार हो। इतना सब जानते हुए भी तुम नाखून कटवा कर नहीं आए?”
     "मैंने शाम को माँ से कहा था पर दादी बोलीं- “पगला गया है क्या--नाखून न काट रे संझा हो गई है। कल सुबह माँ को याद दिला दीजो।”
     “और सुबह कहना तुम भूल गए और माँ भी भूल गईं। ठीक कह रही हूँ न।” मैडम शांत स्वर में बोलीं ।
     “हाँ ,पर आप कैसे जान गईं?”खरबूजा चकित था।  
     “इसलिए कि सुबह हर माँ को बहुत काम होते हैं और बच्चों को स्कूल आने की जल्दी होती है।”  उसे  मैडम की बातें बहुत अच्छी लगीं। हल्के से मुस्कुरा दिया।
     “शाबाश! बच्चे ऐसे ही मुस्कराते अच्छे लगते हैं। बेटे एक बात बताओ। तुम्हारी माँ ने शाम को नाखून काटने से मना क्यों कर दिया?”
     “मुझे तो नहीं मालूम।”
     “मैं बताऊँ!”
     “हाँ—हाँ जल्दी बताइये।” कारण जाने के लिए खरबूजा उतावला हो उठा।
      “देखो,हमारे बाबा,परबाबा के समय न तो बिजली थी और न ही आजकल की तरह नाखून काटने का नेलकटर। अंधेरा होते ही घर-घर मिट्टी के दीये जलते थी। उनमें सरसों का तेल और रुई की बत्ती होती। इससे थोड़ा ही उजाला होता था।  


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      कुछ घरों में लालटेन और मिट्टी के तेल के लैंप  रोशनी देते थे। पर पढ़ाई,सिलाई के कामों में तो कठिनाई होती ही थी। कम रोशनी से आँखों पर ज़ोर पड़ता था। नाखून काटने में तो और भी खतरा था। उस समय पैनी धार वाले चाकू से नाखून काटे जाते थे। जरा सी भूल-चूक होने से नाखून ज्यादा कट गया या उसके के अंदर की खाल कट गई तो मुसीबत।  साफ खून झलकने लगता । इसलिए शाम के बाद नाखून नहीं कटे जाते थे। कोई काटने भी बैठता तो उसे टोक देते –संझा हो गई नाखून न काट भैया।  लेकिन आज यह बात लागू नहीं होती।  बल्बों की जगमगाती रोशनी से अंधेरा भागता ही नजर आता है। पर बहुत से लोग बुद्धि का प्रयोग किए बिना पिछली बात ही दोहराते  रहते हैं –नाखून न काटो—नाखून न काटो। खुद भी नहीं काटते  और दूसरों को भी नाखून नहीं काटने देते। अब तुम्ही बताओ बल्ब की रोशनी  मेँ नेलकटर से मैं नाखून रात को काट लूँ तो क्या कोई खतरा है?
  


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    "बिलकुल नहीं मैडम! मैं भी उल्टे हाथ के काट सकता हूँ पर सीधे हाथ के नहीं काट पाऊँगा।”
   
    "अभी तुम बच्चे हो। जरा बड़े होने पर बहादुरी दिखाना। पर रात में नाखून न काटने का रहस्य घर जाकर बताना और कल जरूर नाखून काटकर आना।"
      खरबूजा 'हाँ' में जोरदार गर्दन हिलाता कक्षा की ओर चल दिया और सोचने लगा -मैडम सबसे ज्यादा होशियार हैं। इनके पास तो सब प्रश्नों के उत्तर हैं। जरूरत पड़ने पर इनके पास ही भागा भागा आऊँगा। 
समाप्त