प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

रविवार, 22 जनवरी 2017

चौथी ई बुक




सुधा भार्गव 



अभी हाल में जनवरी 2007 में मेरी यह ई बुक प्रकाशित हुई है।  इसमें बालोपयोगी 26 छोटी छोटी कथायें  हैं. इन कथाओं का आधार प्राचीन जातक लघुकथाएं ही है।  इनका सरल भाषा में पुनर्लेखन  किया गया है।
 ऑन  लाइन पर इसके 70 पेज सरलता से पढ़े जा सकते हैं. लिंक है-

/pothi.com/pothi/book/ebook-सुधा-भार्गव-हडप्पा-कडप्पा
इसके बारे में अपने विचार अवश्य बताइयेगा.


शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

देवपुत्र पत्रिका में प्रकाशित -वीर सिपाही



                              देवपुत्र पत्रिका 
            (ऊपर क्लिक करने से आप पत्रिका में भी यह कहानी पढ़ सकते हैं।)     

वीर सिपाही/सुधा भार्गव 

सूरज से दमकते चन्दन बाबू के घर में उमड़ते घुमड़ते काले बादलों का साया छा  जाना चाहता था। एक पल खामोश न रहने वाली उनकी लाड़ली आज खामोशी के जंगल में दिखाई दे रही थी।  उसके लिए तो चुप रहना उतना ही कठिन था जैसे बादलों में छलांग लगाना। उसका उदास चेहरा माँ-बाप की बेचैनी ही बढ़ा रहा था। वे तो उसे कल की वही शैतान चंचल पारो देखना चाहते थे।

विद्यालय  से आते ही न उसने खाया न पूरे विद्यालय की चकल्लस सुन माँ ने कानों में उँगलियाँ ठूँसी। बस बिस्तर पर लोटन कबूतर हो गई।
घर में घुसते ही पर्वत ने अपनी बहन को असमय लेटे देखा तो उछल पड़ा –ए पारो –कोपभवन में कैसे लेटी है?एकदम फुल्ले फुल्ले गाल—बिलकुल कैकई लग रही है।माँ से कितनी बार कहा –तुझे दूरदर्शन की हिन्दी धारावाहिक न देखने दें । बिगड़ जाएगी ---बिगड़ जाएगी। बिगड़ गई न तू!
-देखो भैया ,मुझे छेड़ो मत –वरना बहुत बुरा होगा।
-बुरा तो हो ही रहा है। तेरी चुप्पी ने सिर दर्द कर दिया है। इससे बुरा अब क्या होगा! मेरी अच्छी बहना अपने  भाई को तो बता दे –तेरे दिमाग में क्या चल रहा है?
-भैया,विद्यालय की दीदी कह कह रही थीं –सेना में भर्ती हो रही है लड़कों के साथ लड़कियों की भी। मैं भी तुम्हारी तरह एन ॰सी ॰सी॰ की ट्रेनिंग लेना चाहती हूँ । सेना में भर्ती होकर देश का वीर सिपाही बनूँगी।पता नहीं मम्मी-पापा इसके लिए सहमत होंगे या नहीं। 
-तू पागल हो गई है क्या?अगर नहीं हुई है तो एन॰सी॰सी ॰की ट्रेनिंग के समय रात -दिन मेहनत करके पागल हो जाएगी। शिविर में तो सुबह ही जगा देते हैं । भोर की किरणों के साथ दौड़,व्यायाम और ऊंचाई पर चढ़ने का अभ्यास शुरू हो जाता है। अच्छे-अच्छे मुर्गे बन जाते हैं और कूकड़ू करते भाग जाते हैं । फिर तू किस खेत की मूली है।
-भैया देखो—तुम मुझे फिर चिढ़ा रहे हो। न जाने तुम मुझको अपने से कम क्यों समझते हो ? मैं तुम्हारी तरह यह सब कर सकती हूँ और हाँ, समय आने पर सीमा पर भी लड़ने जाऊँगी।
-हिन्द पाक की सीमा पर जब देखो दुश्मनों की फौज से मुठभेड़ होती रहती है। न बाबा !मैं अपनी इकलौती बहन को  सेना में भर्ती नहीं होने दूंगा। माँ तो जल्दी से लड़का खोजकर तेरी शादी करने की सोच रही है  फिर तू जाने और –हमारे जीजा जी जाने।
-ओह भैया !तुम कभी मेरी मदद नहीं कर सकते सिवाय खिल्ली उड़ाने के। जाओ तुमसे नहीं बोलती।

भाई की बातों से पारो का मन बुझ सा गया। । इतने में पिताजी आ गए। काफी देर से भाई-बहनों की तकरार सुन रहे थे। पापा को देख पारो बड़ी उम्मीद के साथ बोली—पिताजी, क्या आप भी चाहते हैं किमैं घर साफ करने ,खाना बनाने,फटे कपड़े सीने में ही गुजार दूँ। दुनिया कितनी आगे बढ़ रही है। घर के साथ -साथ मैं बाहरी दुनिया में भी तो कदम रख सकती हूँ। मुझे आप घर की चारदीवारी में ही बंद क्यों रखना चाहते हैं---बोलिए न पिताजी?
-बेटी ! तुम गलत समझ रही हो। हम तो तुम्हें इतना आराम और प्यार देना चाहते हैं कि हमेशा गुलाब की तरह खिली रहो।
-पिताजी ,ऐसा प्यार,आराम किस काम का जो मुझे  अपाहिज बना दे।अपने काम के लिए हमेशा दूसरों का मुँह ताकूँ। ।  मुसीबत आने पर मैं बेचारी नहीं बनना चाहती। नहीं चाहिए किसी की दया ।
-बिटिया,तुम्हें दूसरों की जरूरत पड़ेगी । क्या अपनी रक्षा खुद कर पाओगी?
-मैं बंदूक चलना सीखूंगी –जूड़ो कराटे सीखूंगी। केवल अपनी ही नहीं देश की भी रक्षा करूंगी।
-पारो की माँ!सुन रही हो अपनी बेटी की बातें । लगता है हमारे घर में झांसी की रानी ने दुबारा जन्म ले लिया है। चन्दन बाबू अपनी बेटी के साहस और देशभक्ति की भावना को  देख बहुत खुश थे।
-आप भी किसकी बातों में आ गए। भला यह सीख पाएगी।
-सीखने के लिए लगन होनी चाहिए। यह लगन हमारी बेटी में है। वसंत कुंज में रहनेवाली भारत की पहली महिला आकाश गोताखोर (स्काई ड्राइवर )रीचल थॉमस ने तो नानी-दादी बनने के बाद नॉर्थ पोल से छ्लांग लगा दी। लगन के कारण न जाने कब से अभ्यास कर रही होंगी। देखना –हमारी बेटी भी एक दिन देश का नाम ऊंचा करेगी। और हाँ पारो जब तुम्हें एन॰सी॰सी ॰की ट्रेनिंग लेनी ही है तो देरी किस बात की है। कल ही विद्यालय से आवेदन पत्र ले आओ। चन्दन बाबू उसकी ओर देख मुस्कुरा उठे।  
-ओह मेरे अच्छे पिताजी !कहकर वह उनके गले लग गई।
पारो के चेहरे ए उदासी का घाना कोहरा छंटचुका था। वह कमर कसकर वीर सिपाही बनने का अपना सपना सच करने में लग गई।



सोमवार, 5 दिसंबर 2016

तीसरी ई बुक -बालोपयोगी लोक कथाएँ


गंगे-यमुने 




 आवरण पृष्ठ के ऊपर लिखे 'गंगे यमुने'के ऊपर क्लिक करने से आप ई बुक पढ़ सकेंगे। 
आज ही यह पुस्तक प्रकाशित हुई है।बालोपयोगी लोककथाओं का प्रतिनिधित्व करती हुई इसकी कहानियाँ - गुणों का खजाना हैं। इनमें मनोरंजन का पुट तो है ही साथ में दया,दोस्ती ,सच्ची,ईमानदारी और मेहनत की कमाई जैसे  जीवन के मूल्यों को सिखाने के लिए दिन रात पंखों पर सवार हो ज्ञान बांटती दिखाई देती हैं।जिससे बच्चों का चरित्र गठन तो होता ही हैं साथ ही हम अपनी परम्पराओं और संस्कृति से जुड़े रहते हैं।

गंगे यमुने बाल पुस्तक में कुल मिलाकर 89 पृष्ठ हैं। जिनपर 20 कहानियाँ अंकित हैं। मुख्य आवरण का चित्रांकन खुद लेखिका ने किया है। मेरा आग्रह है इसका अवलोकन कर अवश्य ही अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराएं।  

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

ई बुक 1-मनोवैज्ञानिक बाल कहानियाँ

अंतरजाल पर मेरी प्रथम प्रकाशित ई बुक 
उलझन भरा संसार 
यह मेरा प्रथम प्रयास है। अपनी खुशी आपके साथ साझा करने में खुशी हो रही  है।  यह पुस्तक बाल मनोविज्ञान  से संबन्धित  है।  इसमें कुल मिलाकर 10 कहानियाँ है। जो यदा कदा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। 
लिंक है 

pothi.com/pothi/book/ebook-sudha-bhargava-uljhan-bhara-sansar

रविवार, 4 सितंबर 2016

उत्सवों का आकाश 8-गणेश चतुर्थी के अवसर पर डमरू के दोस्त से एक मुलाक़ात

गणेश चतुर्थी प्यारे -प्यारे बच्चों को और बड़ों को   मंगलमय हो ।
कल भी  ,आज भी  और कल भी |
मतलब --पूरे वर्ष 


आओ 
एक साथ दिल से बोलें ----
एक -दो -तीन -चार 
गणपति की जयजयकार।
पाँच -छह- सात -आठ 
गणपति करते मालामाल।
नौ- दस -ग्यारह- बारह 
हरते कष्ट बारम्बार।
तेरह- चौदह- पन्द्रह -सोलह 
गणपति हैं सबसे भोले ।
सत्रह- अठारह -उन्नीस- बीस 
गणपति रहते हमारे बीच ॥

 बच्चों, तुम्हारी जान पहचान कुछ तो गणपति(गणेश ) जी से  हो गई है पर  अभी डमरू के दोस्त से मिलना बाक़ी है |

तुम भी जरा सोचो डमरू  का दोस्त कौन हो सकता है  !
नहीं दिमाग में आया ----चलो ---हम बताते हैं |

डमरू कल अपनी माँ के साथ पूजा पंडाल गया।वहाँ उसकी मुलाकात गणेश जी से हुई । पहले पहल तो वह उनको देखकर डर गया 
-लम्बी सी सूढ़ .मोटा सा पेट ,लम्बे नुकीले वह भी दो बड़े दांत ! दरवाजे से ही वह तो भागा बाहर की ओर ------



गणेश जी भी उसका पीछा छोड़ने वाले कब थे  ।उन्होंने तुरंत अपनी सूढ़ लम्बी करके उसे लपेट लिया और  ले आये अपने पास।

बोले ---डरो नहीं बच्चे ,लो यह लड्डू खाओ --मुझे लड्डू बहुत
पसंद हैं ।
 -नहीं, मैं नहीं खाऊँगा  ।मेरा पेट भी तुम्हारे पेट की तरह लड्डू हो जायेगा।
-हा ---हा ---हा !तुम तो बहुत हँसाते हो  । एक लड्डू से कुछ नहीं होता ।मैं तो कटोरा  भरकर लड्डू खाता हूं।
-बाप रे --!डमरू आश्चर्य से अपनी आँखें झपकने लगा लेकिन उसका डर जाता रहा।

डमरू गणेश  जी के पास खिसक आया।उनका सिर छूते हुए बोला --
--तुम्हारा सिर हाथी सा क्यों  है ?
-तुमने सुना नहीं ---सिर बड़े  सरदारों के ,पैर बड़े  गवांरों के ,तो समझ लो हाथी की तरह मैं बहुत बुद्धिमान हूं।

--और यह इतनी लम्बी सूढ़ ! किस काम की ----न जाने चलते भी कैसे हो । मुझे तो आफत की पुड़िया लगती है।
--यह आफत की पुड़िया नहीं --आफत भगाने की पुड़िया है । कदम बढ़ाने से पहले ही इससे सूँघ कर पता  लगा लेता हूं कि आगे कोई खतरा तो नहीं ---!

-तुम्हारे कान कहाँ है ?सुनते कैसे  हो ----कान तो तुम्हारे हैं ही नहीं हा --हा ।
-पंखों से ही मेरे कान हैं  ।दूसरों की बातें मैं बहुत ध्यान से सुनता हूं और कान  में बंद करके उन्हें निकलने नहीं देता ।
--मैं तो अपने मम्मी -पापा की बातें एक कान से सुनता हूं और दूसरे कान से निकाल देता हूं ।
-यह आदत ठीक नहीं । इससे तुम्हारा नुकसान ही होगा।
--तुमभी कहाँ ठीक से सुनते हो। तुम्हारी मम्मी जरूर कहती होंगी --गणेशा कम खाओ --कम खाओ जिससे पेट पिचक जाये।
-यह पिचक तो सकता ही नहीं है । मैं दूसरों की  बातों को अपने पेट में रखता हूं और अपनी बातें किसी को बताता नहीं।
वे भी मेरे पेट में समाई  रहती है  ।इससे पेट फूल जाता हैं
 ।

--तुम तो बहुत चतुर हो-- दुनिया का  भेद पा लिया और अपना भेद किसी को नहीं दिया , लेकिन इससे क्या फायदा !
-फायदा यही  कि  दुश्मन हो या दोस्त -मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
जब तुम बड़े हो जाओगे और अपना कोई काम(व्यापार) शुरू करोगे ,तब मेरी बातें समझ में आयेंगी।
--हां याद आया---दुकानमें तुम्हारी बड़ी सी फोटो लगी है। सुबह -सुबह सबसे पहले पिताजी तुम पर  फूलमाला चढ़ाते हैं ,पूजा करते है------
जय गणेश जय गणेश
जय गणेश देवा--
---------------

-तुम तो सच में गणेश देवा हो !
-तुम्हारे लिए मैं केवल गणेश हूं --तुम्हारा दोस्त ।


एकाएक माँ की आवाज आई --अरे डमरू --!कहाँ गया ?                         
--घर में पूजा का समय हो गया ।
डमरू चलने-चलते बोला ---
-दोस्त अब कब मिलेंगे ?
-जब याद करोगे मुझे अपने पास पाओगे । मैं अपने चाहने वालों को बहुत प्यार करता हूं।

डमरू  की आंखों में अपने दोस्त की प्यारी  छवि थी  और अपनी माँ के साथ मग्न होकर गा रहा था ---
जय गणेश जय गणेश

जय गणेश देवा  
माता जाकी  पार्वती
पिता महादेवा |
* * * * * * * 

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

उत्सवों का आकाश -7

कृष्णोत्सव 

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नन्हें-मुन्नों ,आज जन्माष्टमी है । कुछ ही देर में बालगोपाल (कृष्ण)का जन्म हो जाएगा। हम उनके इंतजार में आँखें बिछाए बैठे है।जैसे तुम अपना जन्मदिन केक काटकर मनाने लगे हो उसी तरह उनके जन्मदिवस को हर्षोल्लास के साथ मनाने के लिए घर -घर हलुआ, पूरी ,खीर ,पूरी -कचौड़ी पहले से ही बन चुके हैं। पहले उनका भोग लगेगा फिर घर के लोग खाएँगे।  इस मौके पर मुझे एक कहानी याद आ रही है --नाम ?हाँ ,नाम है 
   
                          मीठी खीर

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सारंगी की दादी ने 80 वर्ष पार कर लिए थे। छड़ी के सहारे ठक -ठक करती धीरे- धीरे चलती थीं। आज जैसे ही वह घर में घुसा अपनी दादी को रसोई में खड़ा देख उछल पड़ा-
-मेरी प्यारी दादी तुम रसोई में ,आह आज तो तुम्हारे हाथ का समोसा खाने को मिलेगा । कितने दिन हो गए तुम्हारे हाथ का खाए हुए।
-अरे क्यों तंग करता है माजी को । समोसा बाजार से आ जाएगा।
-ओह माँ !कैसे बताऊँ तुम्हें। दादी के हाथ के बने खाने का स्वाद ही कुछ दूसरा है।एक की जगह दो खा जाता हूँ।
-अरे बहू ,काहे को मेरे पोते का मन छोटा करने में लगी हो। अभी तो मुझमें इतनी शक्ति है कि उसे दो समोसे बना सकूँ।
-अच्छा दादी समोसा फिर कभी---। बहुत थकी थकी लग रही हो। बस यह बता दो आज क्या बनाया है।
-अरे सारंगी,आज तो खीर बनाई है वह भी  किशमिश डालकर। चाटता ही रह जाएगा। 
-तो देरी किस बात की है। मुझे दे दो न मीठी खीर भरा कटोरा ।
-तुझे अभी नहीं मिलेगी। आज जन्माष्टमी है। बालगोपाल का जन्मदिन। हजारों वर्ष पहले रात के बारह बजे उनका जन्म हुआ था। उनकी याद में तब से लोग अब तक जन्मदिवस मनाते चले आए हैं।  पहले उनको खीर चटाई जाएगी  फिर कोई दूसरा खा सकता है। माँ के माथे पर बल पड़ गए।
-बाप रे इतने साल से उनकी वर्षगांठ मनाते हैं। कोई उन्हें भूला नहीं।
-माना वे बहुत नटखट थे पर तब भी सबके प्यारे थे। अपनी मीठी बातों से माँ यशोदा और दोस्तों का मन मोह लेते थे। यही नहीं बड़े होने पर उन्होंने सबकी सहायता की और बुरे काम करने वाले दुष्टों से लोगों को बचाया। ऐसे लोगों को कोई भूला जाता है।  
-पर रात के बारह बजे –तब तक तो मैं सो भी जाऊंगा। दादी माँ तुम ही कुछ करो न।
-बहू, क्यों तरसा रही है मेरे सारंगी को। मेरा बाल गोपाल तो यही है। ऐसा कर ,तू अपने गोपाल की खीर एक कटोरी में पहले निकाल ले तब मेरा कन्हैया खा लेगा।

तभी दरवाजा भड़भड़ा उठा। सारंगी  की माँ ने दरवाजा खोला। फटे-पुराने कपड़े पहने एक बच्चे को खड़ा देख हड़बड़ा उठी -- तू कहाँ से आ गया! कृष्ण की पूजा तो हुई नहीं!उससे पहले तुझे खाने को कैसे दे दूँ।
 दादी माँ तो बुरी तरह भड़क उठी- काम न धाम --आज के दिन भी मुंह उठाए भीख मांगने चला आया। आग लगे ऐसे पेट को।
-माई ,मैं भिखारी नहीं। यह आधा गिलास दूध और थोड़े से चावल है। मेरी खीर बना दे।
-घर में क्या काम कम है जो तेरी खीर बनाने बैठूँ। सुबह से काम करते कमर टूट गई।भाग जा यहाँ से।
- माई तेरे हाथ जोड़ूँ । मेरी माँ ने भी  व्रत कर रखा है पर गिर जाने से उससे उठा भी न जा रहा। माई मेरी, खीर बना दे --। वह भी तो बिना भोग लगाए कुछ न खा सके।
-एक बार कहा न खीर नहीं बन सकती। बहरा है क्या। माँ शेरनी की तरह दहाड़ी।  
बच्चा उदास होकर पेड़ के नीचे जा बैठा। सारंगी को माँ और दादी की बात अच्छी न लगी।

लड़के के जाते ही सारंगी का दिमाग बड़ी तेजी से काम करने लगा और चहका –अरे दादी माँ ,मुझे खीर तो दो। भूख के मारे मेरा तो पेट एकदम पिचक गया।
उसकी पुकार सुन दादी माँ अपने को रोक न सकी और अपने लाडले को खीर का भरा
कटोरा थमा दिया।
वह माँ-दादी की आंखों से बचता -बचाता उस बच्चे के पास जा पहुंचा जो पेड़ के नीचे बैठा हुआ था।
उसने पूछा -
-तुम्हारा नाम क्या है?
-माँ मुझे प्यार से कबीरा कहती है।
-लाओ मैं तुम्हारी खीर बना देता हूँ।
-तुम ,तुम खीर कैसे बना सकते हो? खीर तो चूल्हे पर बनती हैं।
-जादू से चुटकी में बना दूंगा। पहले चावल की कटोरी और गिलास दो। फिर दिखाता हूँ अपना जादू।
-सच में तुम जादू से मेरी  खीर बना दोगे। हैरत भरी निगाहों से कबीरा उसे ताकने लगा।
-हाँ कह रहा हूँ न,बना दूंगा। मैं तुमसे बड़ा हूँ इसलिए तुमसे बहुत कुछ ज्यादा जानता हूँ।
कबीरा की आँखें चमक उठीं और उसने कटोरी सारंगी को दे दी।

सारंगी ने फुर्ती से चावलों के ऊपर दूध डाला और बोला -
- अब अपनी आँखें मींचो।जब तक मैं नहीं बोलूँ तब तक नहीं खोलना। तुम्हारी आँखें बंद होते ही मेरा जादू शुरू हो जाएगा।
भोले कबीरा ने कसकर आँखें बंद कर ली। साथ ही छोटे -छोटे हाथों से उन्हें ढाप लिया। सारंगी ने उसके दूध से लथपथ चावलों को छिपा दिया और अपना जादू शुरू कर किया -
धूमधड़ा ---धूमधड़ा
मेरा जादू धूम धड़ा
छूं-छूं --काली मंतर
धूँ-धूँ ---देवी जंतर
धड़-धड़ाधड़ -पड़पड़
मीठी-मीठी खीर बना  
कुछ मिनट बाद ही सारंगी  बड़े प्यार से बोला-
कबीरा आँखें खोलो। मेरा जादू चल गया ,खीर कटोरा भर गया।
कबीरा ने फटाक से आँखें खोल दीं ।वह तो उछल पड़ा  –आह खीर बन गई –मीठी खीर बन गई। पर---पर --मेरी कटोरी कहाँ गई?
-कटोरी का कटोरा बन गया और दूध –चावल से खीर बन गई। यही तो मेरा जादू है।
- आह,अब मेरी माँ भूखी नहीं रहेगी और उसके बाल गोपाल भी भूखे नहीं रहेंगे।
कबीरा की आँखों से खुशी के आँसू टप-टप टपकने लगे।
दादी को तो बिना सारंगी के एक मिनट चैन न पड़ता था। आस-पास उसे न देख बेचैन हो उठी। आवाज देते- देते दरवाजे तक लाठी टेकती आन पहुंची। बूढ़ी सास को अकेला जाते देख सारंगी  की माँ भी साथ हो ली। उन्होंने दूर खड़े दोनों बच्चों को बतियाते देखा। कबीरा के हाथ में कटोरा देख तो वे ठगी सी रह गईं।
सारंगी की माँ ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा-
-माँ जी कुछ देख रही हो ?
-बहू, ये बूढ़ी आँखेँ सब देख रही हैं। एक दुखिया को खुशी देकर हमारे घर के कन्हैया ने तो सच्चे अर्थों में जन्माष्टमी मनाई है।    

-हाँ माँ जी,आपने ठीक कहा। हम बड़े, समझदार होते हुए भी नासमझ है और ये छोटे, नासमझ होते हुए भी हम से ज्यादा समझदार निकल गए। 

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

उत्सवों का आकाश -6




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बच्चों ,आज राखी का त्योहार है जो भाई-बहन के पवित्र प्यार का प्रतीक है । उनके प्यार की गहराई को बताना बड़ा कठिन है ।  वे दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त होते हैं। लड़ते हैं झगड़ते हैं,एक दूसरे के बाल खींचते हैं  पर कुछ ही देर में सब भुलाकर  सरलता से अपने दिल की बात कह बैठते  हैं। सुख-दुख में एक साथ खड़े रहते  हैं । हम दुनिया के लिए कितने ही बड़े-बुड्ढे  हो जाएँ पर जैसे ही भाई-बहन मिलते हैं एकदम स्कूल के बच्चे बन जाते हैं। वही हंसी-ठट्टा ,गप्प -शप्प ,बहसबाजी। है न अजीब बात। 
भाई-बहन दिवस 



कुछ राखी बंधवाकर बड़े खुश होंगे ,कुछ इंतजार कर रहे होंगे कि कब प्यारी बहन आए और  सूनी कलाई पर रंगबिरंगी राखी खिल खिल जाए। इस प्रेममय आकाश के नीचे बैठे -बैठे  हम तुम्हें एक कहानी सुना देते हैं इससे तुम्हारा मन और भी खिल उठेगा। 


टी चा 

राखी का त्योहार आने वाला था । भाइयों की मंडली बातों में मगन थी। कोई कहता—मैं तो अपनी बहन को घड़ी दूंगा ---अरे मैं तो उसे बातूनी गुड़िया दूंगा –ऊह--मेरी बहन के पास तो गुड़ियाँ बहुत हैं उसे पैन देना ठीक रहेगा,पढ़ाई में काम आएगा। । गुट्टू खड़ा सोच रहा था –मैं अपनी बहन चंपी को क्या दूँ? मैं तो इनकी तरह पैन -घड़ी दे भी नहीं सकता लेकिन उसे बहुत प्यार करता हूँ और कुछ न कुछ  जरूर दूंगा।
घर जाकर अपनी गुल्लक उलट- पुलट की । बड़ी बेचैनी  से सिक्के गिनने शुरू किए –एक –दो ---तीन । अरे ये तो 20 रुपए ही हुए।सब तो खर्च नहीं कर सकता । दादा जी हमेशा कहते हैं गुल्लक को कभी खाली नहीं छोड़ना चाहिए इसलिए 10 रुपए मैं इसी में रख देता हूँ। गुल्लक बंद करके दिमागी घोड़े दौड़ाने लगा –कान  के कुंडल तो दस रुपए में आ ही जाएंगे पर उसके तो कान ही नहीं छिदे हैं।  पहनेगी कैसे?गले की माला कैसी रहेगी? न बाबा उसे नहीं ख़रीदूँगा। कोई चोर गले से खींचकर ले गया तो --। दस रुपयों की तो बहुत सी टॉफियाँ आ जाएंगी पर उन्हें तो वह मिनटों में चबा जाएगी । अच्छा किताब खरीद लेता हूँ । पहले मैं पढ़ लूँगा फिर वह पढ़ लेगी । हम दोनों के ही काम आ जाएगी।
किताब कैसी दी जाए ?वह फिर उलझ गया । कहानी की किताब तो उसे देना बेकार है पहले से ही उसके पास किताबों का ढेर लगा है । तब क्या दूँ?चुटकुलों की किताब ठीक रहेगी । पढ़ते –पढ़ते खुद भी  हँसेगी और दूसरों को सुनाएगी तो उन्हें भी गुद्गुदी होने लगेगी । अपने दिमाग की खेती पर वह मंद-मंद मुस्कराने लगा जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। दस रुपए उसने जेब के हवाले किए और इठलाता हुआ बाजार चल दिया । तभी चंपा  दरवाजा रोककर खड़ी हो गई –क्यों भैया, इस बार भी क्या रुपए देकर टरका दोगे। वैसे तुम बहुत सयाने हो।पिछली बार पाँच रुपए का नोट दिया था । अगले दिन वापस भी ले लिया। बड़े प्यार से बोले थे-ला छोटी बहना पाँच का नोट,तुझसे खो जाएगा। इस बार तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाली।
-मेरी चंपा  ,इस बार रुपये तो नहीं दूंगा पर जो भी दूंगा उसमें मेरा भी थोड़ा हिस्सा रहेगा।
-जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती। मीनू-छीनू के भाई बहुत अच्छे हैं। वे उन्हें गुड़ियाँ देते हैं,बिंदी-चूड़ी देते हैं और तुम –तुम ही एक ऐसे भाई हो जो देकर ले लेते हो या उसमें हिस्सा-बाँट करने की  सोचते हो।
-तूने भी तो घर में आकर  मेरे हिस्से का प्यार बाँट लिया। अकेला होता तो मम्मी-पापा का सारा प्यार मैं लूटता। न जाने क्या सोचकर माँ ने तुझे कल्लो भंगिन से पाँच किलो नमक के बदले ले लिया।
चंपा खिसियाकर रो पड़ी। माँ—माँ—देखो गुट्टू मुझे तंग कर रहा है।
माँ के आने से पहले ही वह वहाँ से खिसक गया। जानता था,हर बार की तरह माँ उसे ही डांटेगी।
गुट्टू बड़ी शान से किताबों की दुकान पर जा पहुंचा कि बन जाएगा उसका काम चंद मिन्टों में। वहाँ जाकर तो उसका दिमाग घूम गया जब उसने देखा किताबों का पहाड़!कहीं लिखा था इतिहास ,कहीं भूगोल,कहीं संगीत तो कहीं चित्रकला। मन ललचाने लगा-यह भी ले लूँ—वह भी ले लूँ पर जेब में थे केवल 10 रुपए। अचानक उसकी निगाहें एक किताब से जा टकराईं जिसका नाम था चटपटी चाट। उसकी जीभ चटकारे लेने लगी। उसने तुरंत उसे खरीद लिया और रंगबिरंगे कागजों से सजाकर बीच में भोले मुखड़ेवाली चम्पा की फोटो चिपकाई । नीचे लिखा था –
दो चुटइया वाली चम्पी को
भइया की चटपटी चाट
राखी के दिन चम्पा ने बड़े उत्साह से अपने भैया को राखी बांधी। बेचैनी से इधर उधर तांक-झांक भी कर रही थे –देखें क्या देता है गुट्टू उसे।
गुट्टू ने उसके हाथों  में किताब थमा दी पर यह क्या---वह तो
चम्पा की जगह चंपी लिखा देख तुनक पड़ी—नहीं लेती तुम्हारी किताब –लो वापस लो –अभी लो। मेरा नाम ही बदल दिया !क्यों बदला बोलो –बोलो।
-अरी बहन इसे खोल तो। इसमें चाट -पापड़ी ,गोलगप्पे,समोसे भरे हुए हैं।
-यह जादू की किताब है क्या जो खोलते ही पानी से भरे गोलगप्पे प्लेट में सजे धजे हाजिर हो जाएंगे और कहेंगे-हुजूर हमें खाइये। उसने झुककर ऐसी अदा से कहा की गुट्टू को हंसी आ गई।
-हाँ—हाँ –आ जाएंगे पर इन्हें बनाने में कुछ मेहनत तो करनी पड़ेगी।
-कौन बनाएगा?
-मेरी बहना और कौन? गुट्टू ने उसे खिजाने की कोशिश की।
-मुझे तो खाना आता है बनाना नहीं। मासूम चम्पा बोली।
-कोई बात नहीं। बड़ी होने पर बना देना। मैं इंतजार कर लूँगा।
-मैं बड़ी कब होऊँगी?
-यह तो मुझे भी नहीं मालूम। चलो माँ से पूछते हैं।
तभी गुट्टू के दोस्तों ने खेलने के लिए आवाज लगा दी। वह तो वो गया वो गया। रह गई चम्पा। माँ को खोजती आँगन में आई।
-माँ-माँ मैं कब बड़ी होऊँगी?
माँ ऐसे प्रश्न के लिए तैयार न थी। एक पल बेटी का मुख ताकती रही फिर दुलारती बोली-मेरे बेटी को बड़ी होने की क्या जरूरत आन पड़ी। तू छोटी ही ठीक है।
-भैया चटपटी चाट की किताब लाया है । समझ नहीं आता उसके लिए कैसे बनाऊँ?वह कह रहा था बड़ी होने पर मुझे सब आ जाएगा।
-मैं किसी दिन चाट बना दूँगी। खिला देना अपने चटटू भैया को । अपने मतलब के लिए यह किताब खरीद लाया है।
-ऐसे न बोलो । मेरा भैया बहुत अच्छा है। माँ आज ही उसके लिए कुछ बना दो। चम्पा गिड़गिड़ाते हुए बोली।
माँ उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी इसलिए चाट पापड़ी बनाने को तैयार हो गई। एक तरह से वह इन भाई-बहन के स्नेह को देख खुश भी थी। आखिर गुट्टू अपनी बचत के पैसों से बहन के लिए उपहार लेकर आया था। इस त्याग का मूल्य किताब से कहीं—कहीं ज्यादा था।
खेलने के बाद गुट्टू की भूख राक्षस जैसी हो जाया करती थी। हाथ-पैर-मुंह धोकर चटपट रसोई की तरफ जाने लगा । भुने जीरे की खुशबू से उसकी नाक कुछ ज्यादा ही मटकने लगी। उसी समय चम्पा
प्लेट लेकर आई-गुट्टू पापड़ी-चाट  खाएगा?
-भला चाट कैसे छोड़ सकता हूँ?मगर इतनी जल्दी बन कैसे गई!
-माँ ने कहा –मेरे बड़े होने से पहले भी चाट बन सकती है। मैं माँ को देख कुछ कुछ सीख रही हूँ। माँ ने तो जादू से कुछ मिनटों में ही चाट बना दी।
-जुग जुग जीओ मेरी छोटी बहना!अब तू जल्दी जल्दी सीखती जा और मैं जल्दी जल्दी खाता जाऊं। हे भगवान  हर जनम में चंपा को ही मेरी बहन बनाना।   
-चम्पा को तंग न कर। अभी उसके खाना बनाने के दिन नहीं। खेलने-खाने के दिन हैं।
-ओह माँ,मगर मेरे तो खाने के दिन हैं। फिर मैंने उसे खेलने को मना तो नहीं किया। मैं तो बस यह चाहता हूँ कि रोज कुछ चटर-पटर चटपटा मिल जाए। आज आलू की चाट तो कल आलू की टिक्की—आह तो परसों पानी से भरे मटके की तरह फूले गोलगप्पे ।
-बस बस बंद कर पेट का राग अलापना। मैं सब जानती हूँ स्कूल से आकर तुझे दूध पीना तो पसंद नहीं इसी कारण यह किताब उठा लाया।
-ओह माँ, भैया को डांटो मत। यह किताब तो सबके काम आने वाली  है। हाँ याद आया -- मुझे भी तो गुट्टू को कुछ देना होगा।
-मुझे तो उपहार मिल गया—दुनिया का सबसे अच्छा --।
-किसने दिया?
-माँ ने।
-मुझे भी तो दिखाओ।
-चल दिखाता हूँ।  
गुट्टू ने उसे शीशे के सामने ला खड़ा किया।
-दिखाई दिया?
-क्या दिखाई दिया--! इसमें तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा । बस मैं ही मैं दीख रही हूँ ।
-यही तो हैं मेरा प्यारा सा उपहार जो मुझे माँ ने दिया है।
चम्पा खुशी की लहरों में डूब सी गई जिसमें उसे  गुट्टू का चेहरा ही नजर आ रहा थाउसका भाई तो दुनिया का सबसे अच्छा भाई था।
समाप्त