प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

शुक्रवार, 12 जून 2020

कोरोना आया लॉकडाउन लाया

बालकहानी /सुधा भार्गव






।1बस पांच मिनट

      नादान अनारू समझ  नहीं पा रहा है माँ को क्या हो  गया है। उसके हर  काम  में देरी करती  हैं।उस दिन  भरी  दुपहरिया में  बिजली चली गई । एक तो गरमी से परेशान दूसरे पेट में जोर जोर से चूहे  कूद रहे थे ।मेज खाली देख उबाल खा गया “ --माँ --माँ ! कुछ खाने को तो दे दो ।”
‘लाई बेटा--बस पांच मिनट रुक जा--।इतने  में तू साबुन से हाथ धोकर आजा ।कोरोना माहमारी से बचने के लिए हाथ धोने जरूरी हैं ”
अनारू भुनभुनाता चल दिया ,"हूँ --हाथ धोकर आ !घड़ी -घड़ी हाथ धोने को बोलती हैं। पर मेरे हर काम में देरी लगा देती है।पांच मिनट --तो कहने के लिए हैं। पच्चीस मिनट से कम नहीं लगेंगे । पहले तो मेज पर कभी आम का पन्ना होता था जिसे पीते ही मैं सारी गरमी भूल जाता था । वो मीठा रसभरा  आम  तो मुझे अब  भी याद है जिसे मैं चूसता ही रह  गया ।गजब  का मीठा  आम था ।अब तो मेरा ध्यान रखने वाला ही कोई नहीं ।’
अनारू का मूड एकदम ख़राब था । जी अच्छा करने के लिए अपने दोस्त से फ़ोन करने लगा -"हेलो कमल,  तूने खाना खा  लिया ?”
“हाँ --अभी -अभी मैंने खिचड़ी खाई है।”
‘तू बीमार है  क्या !खिचड़ी  तो बीमारों का खाना है ।”
“अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं! कोरोना के कारण लॉकडाउन है न। कोई घर से निकल ही नहीं सकता। इसलिए कनिका बाई भी नहीं आ रही हैं । मेरी माँ को उसके बदले का काम भी करना पड़ता है। बहुत काम हो गया है उन्हें -- ।सुबह तो बड़ी थकी -थकी लग रही थीं ।इसलिए मैंने और पापा ने निश्चय किया कि आज तो खिचड़ी चलेगी ।”
“अब समझ में आया मेरी माँ को आजकल हर काम में देरी क्यों लगती है!”
“देरी तो लगेगी !सच मुझे तो माँ पर बहुत तरस  आता है ।कभी नहीं कहेगी मैं थक गई !आज तो जबरदस्ती पापा ने उनको सुला दिया है । अच्छा अब चलूँ पापा और मैं मिलकर कपड़े सुखाएँगे ,अपने खाये बर्तन भी धो डालेंगे ।”
“यह सब काम तू ---तू करता है ?मैं तो माँ की कुछ भी मदद नहीं करता ।”
“फिर तो तू बड़ी गलती करता है ।”
“हूँ! कहता  तो ठीक है ।अच्छा मैं भी चला।”
झट से अनारू रिसीवर रख रसोईघर में पहुँच गया ।देखा-माँ उसके लिए गरम -गरम आलू के परांठे बना रही हैं। बीच-बीच में पल्लू से माथे का पसीना भी पूछती जाती। उसे अपने व्यवहार पर बहुत शर्म आई।थाली लेकर माँ के सामने खड़ा हो गया। “अरे तू यहाँ क्यों आ गया बच्चे ? रसोई गरमी से भभक रही है ।तू जाकर ठंडक में बैठ --मैं बाहर ही आकर तुझे दे जाऊँगी।”
अनारू की आँखें भर आईं।बोला-'माँ मुझे माफ कर दो।आप कितना काम करती हो और मैं बैठा- बैठा हुकुम चलाता हूँ।आज से मैं आपके काम किया करूँगा। बोलो माँ--क्या करूँ मैं?”
माँ एक नए अनारू को अपने सामने खड़ा देख रही थी जो दूसरी ही भाषा बोल रहा था।उसने मन  ही मन कोरोना का धन्यवाद किया जिसने थोड़े से समय में ही उसके बेटे को सहृदयी  व समझदार बना कर वह चमत्कार कर दिखाया जिसे वह शायद जिंदगी भर न कर पाती।
समाप्त
4अप्रैल 2020






कोरोना आया लॉक डाउन लाया

प्यारे बच्चो 
उत्सवों के आकाश के नीचे  ख़ुशी ख़ुशी हम घूम रहे थे कि न जाने कहाँ से कोरोना महामारी आन  धमकी। चंद  दिनों में बस फिर तो हमारी लाइफ स्टाइल ही बदल गई। सोचने का तरीका भी बदल गया। और बदल गई सारी  दुनिया।   

कोरोना आया लॉक डाउन लाया


बुरा हुआ--- बहुत ही बुरा हुआ
पर कुछ -कुछ अच्छा भी हुआ
अच्छा ही नहीं बहुत अच्छा हुआ
यह हमें बहुत कुछ सिखा रहा है
हम वह सब सीख भी  रहे हैं 
और बहुत कुछ कर भी रहे हैं

      अब मुझे  ही देख लो --घर में तीन महीने से  एक तरह से बंद ही हूँ ।न पहले की तरह सैर सपाटे ,न दोस्तों से गले में हाथ डाल  गप्प बाजी न जन्म पार्टी।पर एक बात बहुत अच्छी हुई -मुझे बहुत सारी कहानियां लिखने का समय मिल गया ।हाँ याद आया तुम्हारे साथ भी तो कुछ ऐसा ही घट रहा होगा ।  तुम्हारे तो स्कूल भी बंद हैं ।फिर तो समय ही समय। आशा है तुमने भी जरूर कोई नया काम शुरू किया होगा और बहुत सी बातें सीखी होंगी ।
      वैसे मुझे समाचार पत्रों को पढ़ने से और दूरदर्शन के परदे पर नजर डालने पर पता लग जाता है कि  किस तरह तुम समय का सदुपयोग कर रहे हो ?इससे मुझे बहुत खुशी मिलती है।
     मैं भी सोच रही हूँ तुम्हें अपनी लिखी एक कहानी सुना ही डालूँ ।हूँ --लगता है मुझे कुछ समय लगेगा ।बस कुछ पल दे दो ।
सुधा दी

शनिवार, 14 मार्च 2020

उत्सवों का आकाश



बालकहानी  

      जंगल में मंगल  कहानी का आधार  सर्वप्रिय हिन्दू पर्व होली है। पशु -पक्षियों के मध्य होली के रंग बिखरे पड़ रहे हैं। कहानी की भाषा अति सरल है । साथ ही हास्य का  पुट देने की कोशिश की गई है ताकि बच्चे दिल खोलकर हंसें-हँसाएँ।
       यह कहानी देवपुत्र मार्च अंक २०२० में प्रकाशित हुई है। 



जंगल में मंगल

सुधा भार्गव 
     एक जंगल में पलाश का पेड़ था। उसका एक दोस्त था –मुर्गा। वह हमेशा पलाश के साथ रहता था। मुर्गा उसके सुख-दुःख का साथी था।
       जब पेड़ चमकदार लाल, पीले,केसरिया रंग के फूलों से लदा रहता तो बड़ा सुंदर लगता । हवा में तिरती फूलों की खुशबू मन को लुभाए बिना न रहती। चिड़ियाँ उस पर घोंसला बनाकर उसके इर्दगिर्द उड़तीं और अपने कलरव से मधुर संगीत पैदा करतीं ।सुनने वाला एक पल को जरूर रुक जाता और हैरत सा पलाश की  खूबसूरती को निहारता। ये दिन पलाश के सुख के दिन हुआ करते थे।
      दिसंबर-जनवरी की कड़क ठण्ड में  पलाश के दुख का ठिकाना न था। वह थर-थर कांपने लगा।  उसके सुन्दर चटक लाल फूल झड़ गए।ठूंठ सा खड़ा बड़ा बदसूरत लगने लगा । उसके बुरे समय में पेड़ पर बसेरा करने वाले पक्षियों ने उसका साथ नहीं दिया।  वे उड़ गए और दूसरा ठिकाना खोज लिया। अकेला ही वह बड़ी हिम्मत से अपने अच्छे दिनों के आने का इन्तजार करने लगा । मुर्गे को अपने दोस्त की यह बात बहुत अच्छी लगती थी और मन ही मन उसकी प्रशंसा करता। हांलाकि पतझड़ के समय पलाश मुर्गे को न छाया दे पाता था और न ही बरसते पानी और कड़ी धूप से बचा पाता था पर उसे पलाश से दूर रहना किसी हालत में मंजूर न था। सच्चा दोस्त जो ठहरा!

         फरवरी से ही पलाश के भाग्य ने पलटा  खाया।सूरज की किरणों ने धरती पर आँख –मिचौनी खेलनी शुरू कर दी। गुनगुनी धूप पाकर पेड़ -पौधे ,जीव जंतु अंगड़ाई ले उठ बैठे। पलाश का भी कोमल-कोमल नये पत्तों से शरीर ढक गया। लाल-नारंगी रंग की कोंपलें फूटने लगीं ।  देखते ही देखते  सुर्ख रंगों में नहाया जंगल का राजकुमार लगने लगा । फिर वही सुगंध भरी हवाएँ बहने लगी। चिड़ियाँ चोंच में तिनके भर घोंसले बनाने की तैयारी में लग गईं। उनके मीठे गीत सुनकर देवपुत्र भी अपने को रोक न सके । उन्हें सुनने के लिए  ऊपर देवलोक से वे धरती पर उतर पड़े।
      जंगल में जब मंगल ही मंगल था एक प्यारे से खरगोश को उदास देख पलाश को बड़ा अचरज हुआ।
      पूरी धरती इस समय हंस रही है और तुम खरगोशिया इस कदर दुखी! क्या बात है मुझे बताओ न !शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ।

      हाँ,मैं बहुत दुखी हूँ। गाँव-शहर में बच्चे होली खेलने की तैयारी में लगे हैं  । कोई बाजार रंग  लेने गया है तो कोई पिचकारी  । मेरा मन भी  होली खेलने को करता है 
     तो किसने मना किया है मेरे छोटे खरगोशिया! होली तो मस्ती  का त्यौहार है । तुम अपने साथियों के साथ खेलो । मुझे भी अच्छा लगेगा।” 
      उफ --खेलूं कैसे ? रंग तो है ही नहीं !”

      रंग तो मैं चुटकी बजाते ही तुम्हें दे सकता हूँ । कल जब तुम यहाँ आओ तो अपने साथ बड़ी सी मटकी ले आना।” 
      “उफ !मटकी कहाँ से लाऊँगा?”
       “हाथी से बोलो !वह अपनी चतुराई से मटकी जरूर ढूंढ निकालेगा।’’
        खरगोश ने पुकारना शुरू कर दिया –‘हट्टू हाथी,हाथी तुम कहाँ हो?जल्दी --- आओ।
      हट्टू हाथी दौड़ता हाँफता आया-“खरगोशिया तुझे क्या हो गया?”
     “अरे हट्टू इसे एक मटकी चाहिए।” पलाश बोला।
      “बस एक ही---, यह तो चुटकी भर  मिनटों का काम है।”
       वह खरगोश को अपनी पीठ पर बैठा कर तेजी से चल दिया और एक कुम्हार की झोंपड़ी के आगे ही रुककर दम लिया।
      कुम्हार लंबी गरदन वाली सुराही बना रहा था और उसके आसपास मिट्टी से बने मटके-मटकी पसरे बैठे थे। किसी का पेट छोटा था तो किसी का मोटा। पर सब चमकते-खिलखिलाते---।  वे उन्हें अपनी ओर बुलाने लगे। मानो कहना चाहते हों –हमको भी अपने साथ ले चलो। हम भी होली खेलेंगे।
     हाथी ने सूंढ से एक मटकी उठाई और खरगोश को थमा दी।आह!कितनी चिकनी है।खरगोशिया गुलाब की तरह खिल उठा ।

     दूसरे दिन धूप निकलते ही खरगोश मटकी लेकर पलाश के पास आया पर परेशान सा लौट पड़ा।  पागलों की तरह चिल्लाया-“ भागो --भागो - दूर जंगल में आग लगी है।’’ 
    “कहाँ?पलाश  चौंका।
    “देखो—देखो –वो—वो । घबराते हुए दूर उसने इशारा किया।
    “अरे डरपोक,वहां तो मेरे भाई -बहन खड़े हैं।सूर्य की किरणें जब हमारे  पत्तों पर पड़ती हैं तो वे आग की तरह चमकने लगते हैं।पलाश ने समझाया।”
    “अच्छा ! ऐसा भी होता है!’’ खरगोश आश्चर्य से उछल पड़ा। एक मिनट को  तो यह ही भूल गया कि नाजुक सी मटकी वह पकड़े हुए है । उछलने के कारण उसकी पकड़ ढीली हो गई और मटकी हाथ से दूर जा पड़ी। वह तो रोने बैठ गया।
     “उफ !ऐसे कोई रोता है । ले तू मेरी मटकी ले ले।बहुत दिनों से वह काम में भी नहीं आई है।”  पलाश ने प्यार से कहा।
     “न -न -मैं तुम्हारी मटकी नहीं लेता। कहीं वह भी टूट गई तो—’’
    “तू तो बड़ा भोला है। पहले मेरी मटकी देख तो ले! वह  तो लोहे सी मजबूत है टूटेगी ही नहीं कभी ।
    “सच में ऐसी है !तब लाओ , मुझे दे दे।’’
    “सम्हालो जरा भारी है। इसे मेरे नीचे रख दो ।”
    पलाश ने  खूब जोर से अपनी टहनियों को हिलाया ।  झर -झर करके उसके केसरिया फूल मटकी के साथ -साथ खरगोश पर भी बरसने लगे।फूलों के चटक लाल रंग ने उसका मन मोह लिया।
     अब मेरे जितने फूल तुम चाहो ले जाओ।” 
     लेकिन मैं करूँगा क्या इनका!” 
     इनका जादू देखोगे तो हैरान हो उठोगे। फूलों को आज रात  में पानी भरी मटकी में भिगो देना, सुबह तक उनका केसरी रंग तैयार।कल उससे खूब होली का हुल्लड़ मचाना ।’’
      खरगोश अचरज से अपनी आँखें झपझपाने लगा।  फूलों का करिश्मा देखने को उतावला हो उठा।
      खरगोश ने जल्दी -जल्दी फूलों को मटकी में भरा औ फुदकना शुरू कर दिया- 
आजा रे
आ रे हाथी
आजा घोड़ा
बिल्ली–भालू
तू भी आजा
सब मिलकर
उछलेंगे कूदेंगे
रूँठारूठी छोड़छाड़ के
रंगों से होली  खेलेंगे ।

      जल्दी ही  खरगोश के दोस्त भागे –भागे चले आए और फूलों की मटकी को घेर कर बैठ गए ।
      हट्टू हाथी पास के तालाब से अपनी सूढ़ में पानी भर कर ले आया और मटकी में   भर दिया । रात  भर कोई  भी नहीं सोया।  झाँक -झाँक कर देखते--- पानी रंगीन हुआ कि  नहीं !पानी का रंग कैसा है?उनके लिए तो यह एक बहुत बड़ा आश्चर्य था।   

सूर्य देवता के निकलते ही सूरजमुखी खिलखिलाकर हंस पड़ी।
      उसकी आवाज सुन दोस्तों को होश आया -अरे दिन निकल आया। 
“आह पानी तो केसरिया रंग का हो गया । सोने जैसा चमक रहा है! अब तो तुम सब पर  खूब रंग  डालूँगा और अपने को बचा कर रखूँगा।” खरगोश इतराते हुए बोला ।
     न --न --ऐसा बिलकुल न करना । मेरे फूलों के पानी में तुम्हारा भी भींगना जरूरी है । इससे तुम चंगे रहोगे। तुम्हारे चारों तरफ भिनभिनाने वाले मच्छर तो दुम दबा कर भागेंगे।” पलाश का पेड़ बोला।  
       “अरे पलाश, मैंने तो अभी तेरे ऊपर दो -तीन मच्छर भिनभिनाते देखे हैं। तुझसे तो डरते  भी नहीं।” बिल्ली आँखें मटकाते हुए बोली। 
      तुझे नहीं मालूम बहना --मेरी खुशबू से मच्छर खिंचा चला आता है और मुझसे  टकराते ही बच नहीं पाता। अगर भूले -भटके मेरे फूल में इसने अंडे दे भी दिए तो उसमें से बच्चे कभी जिंदा निकल ही नहीं सकते।”
“तुझमें तो बड़ी ताकत है। पेड़ों का राजा है राजा । मेरे घर भी चल , बहुत मच्छर  हैं वहां। तुझे देखते ही भागेंगे अपनी जान बचाकर।देख मना न कर वरना मैं रूठ जाऊँगी।”
      बिल्ली की बात सुन पलाश उदास हो गया।पलाश को उदास देख बिल्ली परेशान हो उठी।
“एकाएक तू  इतना उदास क्यों हो गया पलाश । क्या मैंने तेरा  दिल दुखा दिया।”
“न –न तेरा कोई कसूर नहीं!कितना अच्छा होता बिल्लो यदि मेरे पैर होते!भाग भागकर दूसरों का खूब भला करता  और बीमार को ठीक कर देता। 
    “क्या कहा! बीमारी भगा देने का जंतर मंतर भी तेरे हाथ में है?अरे वाह!डॉक्टर बाबू । ”
      हाँ !कल देखना तमाशा ! होली के बाद का।पलाश फिर से चहकने लगा।
      “कैसा तमाशा रे !”
       बताता हूँ ---बताता हूँ।देख, होली के दिन  सारे दिन मस्ती के बाद शहरों में  बच्चे खूब पकवान ,मिठाई खाएँगे और फिर पेट बड़बड़ाएगा खाने वाला कराहयेगा --दर्द --हाय दर्द । उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा -- मेरा एक फूल चबाकर खाने से दर्द रफू चक्कर हो जाता है।”  
     हम तो भैया जरूर दो -एक  फूल बचाकर रखेंगे ,मोटे हट्टू हाथी के काम आयेंगे। इसका पेट तो देखो नगाड़े जैसा --। यह भी खूब छक के खाता है ।”चुलबुली बिल्ली ने उसे चढ़ाया।
      “देख बिलौटी ऐसा कहेगी तो –।”
      “तो, तो क्या  करेगा?”बिल्ली ने आँखें दिखाईं।
      “बताऊँ—।”
      “हाँ हाँ बता
      “अभी बताता हूँ!”
      हाथी गुस्से में अपनी सूंड हिलाता जल्दी-जल्दी वहाँ से चल दिया। बिल्ली भी जासूसी करने के लिए दबे पाँव उसका पीछा करने लगी।
      हाथी ने फुर्ती से  बिल्ली को सूँढ से उठाकर रंगीले पानी की मटकी पर बैठा दिया। उसकी पूंछ पानी में तैरने लगी।
      सब एक साथ चिल्ला उठे—
             बुरा न मानो होली है!होली है रे होली है ।
              धूमधड़क्का हय धूमधड़क्का  होली  है  
      भालू भी अपने को ज्यादा रोक न सका ,केसरिया पानी अपनी हथेली में भरकर दूसरों पर डालने लगा । हाथी ने तो अपनी  सूँढ को पिचकारी बना लिया और साथियों को एक बार में ही स्नान करा दिया।
      पलाश भी इस होली का आनंद उठा रहा था।पर उसे चिंता लग गई कि पानी मेँ ज्यादा भीगने से उसका कोई साथी बीमार न हो जाए।
       बोला- तुम सब बहुत थके -थके लग रहे हो ।अब कुछ गाना -शाना भी हो जाये।” 
      जंगल में मंगल करने वाले जल्दी ही गोला बनाकर खड़े हो गए और बीच में बैठ गया मुर्गा।
किसी के हाथ में गिटार था तो किसी ने थामा बिगुल ।लोमड़ी तो कहीं से ढोलक ही उठा लाई।  ढोलक की थाप पर शुरू हुआ मस्ती में गाना --- 
होली की धूम मची रे
जंगल – - - जंगल
हाँ-हाँ जंगल जंगल
जंगल में हो गया मंगल
हाँ --हाँ मंगल—मंगल।

आपस  में हम  अब
दंगल-वंगल नहीं करेंगे
पहनेंगे प्यार का कंगन
हाँ-हाँ ,प्यार का कंगन
होली की धूम मची रे
जंगल ---------जंगल।

    होली के हुड़दंग में सच ही यह टोली थक गई थी, भूख भी लग आई थी। पिछले साल तो उनकी होली फीकी ही थी ।न इतने प्यारे साथी थे न ही पलाश के पेड़ से मुलाक़ात हुई। पलाश ने उनके जीवन में ऐसे रंग घोल दिये कि वे आपस में हिलमिल कर रहना सीख गए । अगले साल फिर इसी तरह होली मनाने का उन्होंने वायदा किया और भोजन की तलाश में घने जंगल में गायब हो गए। 
समाप्त 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

कहानी


तितलियों का मोहल्ला
सुधा भार्गव 


      बिल्लू की दादी रोज मंदिर जाया करती थीं। एक दिन वह भी उनके साथ गया। वहाँ रंगबिरंगे फूल पंक्ति में खड़े मुस्करा रहे थे । मानों वे भगवान के भगतों का स्वागत कर रहे हों। उन पर उड़ती,बैठी तितलियां देख तो वह हक्का-बक्का रह गया।
      उत्तेजित होते हुए वह चिल्लाया-दादीदादी देखो तितली ---कितनी सुंदर! मैं तो इतना सुंदर हूँ भी नहीं। इन्हें किसने बनाया ?”
      “सबको बनाने वाला तो एक ही है भगवान। ’’
      “लगता है वह मुझसे भी अच्छी चित्रकारी जानता है।’’
      “हाँ चित्रकार तो है ही। ये रंगबिरंगे पेड़-पौधे-फूल सब उसकी ही तो कारीगरी है ’’
      “ओह! तभी उसने तितली के पंखों में इतने सुंदर रंग भरे हैं। मैं भी उसकी तरह सुंदर तितली बनाऊँगा।’’
      “अच्छा अच्छा बना लीजो पर अभी तो अंदर चल। आरती का समय हो गया है।’’
बिल्लू बेमन से दादी के साथ चल दिया।
     अगले दिन स्कूल से आते ही वह तितलियों के पास दौड़ा दौड़ा चला आया। एक काली गुलाबी तितली उसे टुकुर -टुकुर देख रही थी। बिल्लू ने कुछ दूरी से ही कहा –“तितली मुझे देख कर भागना नहीं । मैं तुम्हारा कुछ बिगाड़ूँगा नहीं । बस मुझे अपना एक चित्र बनाने दो।तितली उसकी बात मान गई।
     चित्र बनाकर बिल्लू ने उसका धन्यवाद किया और बोला – “प्यारी तितली तुम कहाँ से आई हो?तुम्हारे मम्मी-पापा कहाँ है?”  
     “मैं तो फूल-फूल उड़ती रहती हूँ। उनसे मेरा जन्म से ही नाता है । होश आते ही सबसे पहले फूल को ही देखा।
     “और तुम्हारे मम्मी-पापा ?”
     “पापा का तो पता नहीं पर मेरी माँ पौधे पर अंडा देकर न जाने कहाँ उड़ गई।’’
     “उसके बाद वह मिलने नहीं आई क्या?”
     “नहीं।’’
     “फिर तुम्हारी देखभाल  किसने की?”
     “मैं तो अपने आप ही बड़ी हो गई।  अंडे से बाहर निकली तो बड़ी  लिजलिजी  सी थी । पौधों की पत्तियाँ खाकर कुछ ताकतवर बनी। तब भी डर लगा रहता था कोई मुझे खा न जाये। ’’
     “अपनी माँ को आवाज देकर तो देखतीं--- सुनकर तुम्हारी मदद को जरूर आती। मैं जब भी किसी मुसीबत में होता हूँ तो बुलाने पर मेरी माँ दौड़कर आती है। ’’
     “मेरी माँ कभी नहीं आती।अपनी रक्षा अपने आप ही करनी पड़ती है। इसी कारण मैंने मुंह से बारीक रेशम का सा धागा निकाला और अपने आसपास एक खोल सा बुन लिया।’’
     “अरे रे तुम्हारा उसमें दम नहीं घुटा।’’
     “दम घुटा इसीलिए तो मैंने एक दिन इतना ज़ोरइतना ज़ोर लगाया कि खोल में एक सुराख हो गया। बस फिर तो मुझमें हिम्मत आ गई और पूरी ताकत लगा कर धीरे धीरे बाहर आने लगी। उस दिन तो कमाल हो गया,धमाके से खोल के दो टुकड़े हो गए।  मैंने अपने मुड़े-दबे पंख फड़फड़ाए और हवा में उड़ती पूरे बाग की सैर करने लगी।’’
     “एक साथ तुम इतना उड़ीं। थककर गिर जाती तो---।मेरी  दादी बताती हैं ---मैंने धीरे-धीरे चलना सीखा। थोड़ा चलता गिर पड़ता फिर चलता फिर गिर पड़ता   
     “मेरे पंखों में तो गज़ब की ताकत आ गई थी। सोच-सोच कर मुझे तो खुद हैरानी होती है। वह तो मुझे भूख लग आई वरना पहाड़ नदी की भी सैर कर आती । खोल से बाहर निकलते पर मैं सुंदर सी तितली बनकर एक नई दुनिया में आ गई थी। उसे मैं जल्दी से जल्दी देखना चाहती थी।’’
     “भूख लगने पर तुमने क्या खाया?इतनी नन्ही सी तो हो। रोटी चावल तो खा नहीं सकती!
     “रोटी चावल हाहाहा। जो तुम खाते हो वह मैं नहीं खा सकती और जो मैं खाती हूँ वह तुम नहीं खा सकते।’’
     “बड़ी अजीब बात है। फिर तुमने क्या खाया?”
    “खाना क्या--- भूख  लगी तो गुलाब की गोद में जा बैठी। मैंने उसके कान में प्यार भरा गीत गुनगुनाया,उसे सहलाया और इसके बदले उसने अपना मीठा पराग पीने की पूरी छूट दे दी।’’
    “ही-ही-ही--तुम्हारा तो न मुंह है और न जीभ । रस कैसे चूसा?”
    "ये मेरी लंबी सूढ़ देख रहे हो। देखो हिलाकर दिखाती हूँ।’’
     “अरे वाह क्या आगे-पीछे तुम्हारी सूढ़ हिल रही है। अभी तक तो हाथी की सूढ़ ही देखी थी। तुम्हारी तो निराली बातें है।’’
     “अब निराली हूँ तो निराली बातें ही तो बताऊँगी। सुनकर ताज्जुब करोगे कि यही सूड़ मेरी जीभ है।  इसी से स्वाद ले लेकर फूलों का पराग जी भरकर चूसती हूँ।’’
    “मान गया तुम्हारा निरालापन! मेरी निरालीमुझे हफ्ते में एक दिन मिलता है तुम्हारे पास आने का।  मगर तुमको तो मेरे लिए फुर्सत ही नहीं। एक फूल से दूसरे फूल पर कुदकती रहती हो। मेरे लिए भी थोड़ा समय निकाल लिया करो।’’
    “बिल्लूमेरा फूल-फूल पर जाना जरूरी है। मैं एक फूल का पराग  दूसरे फूल तक ले जाती हूँ इससे नए- नए फूल बनते हैं और फूलों से ही फल और बीज मिलते हैं।’’
     “तुम्हारे लिए टोकरी भर फूल लाकर तो मैं अपने घर मैं भी रख सकता हूँ। निरालीमेरे बात मानो ---आज मेरे साथ चलो। वरना मैं तुम्हें पकड़ कर ले चलूँगा।’’
     “बिल्लू मुझे भूलकर भी पकड़ने की कोशिश न करना। फूल पर ही मैं मंडराती अच्छी लगती हूँ। मुझे बुलाना है तो पहले घर के बाहर फूल लगाओ घर के अंदर नहीं।’’
     बिल्लू के पापा ने घर के बाहर फूलों की क्यारियाँ-लगवा दीं । गेंदा,सदाबहार ,चाँदनी की खुशबू से गली महकने लगी। निराली की सहेलियाँ लिल्ली,पिल्ली,निल्ली ने उधर आकर आँख-मिचौनी खेलना शुरू कर दिया। उन्हें देख आसपास के बच्चे वहाँ आ जाते और  मुदित मन से तालियाँ बजाते।  
     बिल्लू क्यारियों के पास बैठा अकसर एक किताब पढ़ा करता।  जिसका नाम था तितलियों की सुरक्षा। उसने एक तख्ती भी लटका दी थी जिस पर लिखा था-तितली पकड़ना सख्त मना है। प्यार की वर्षा करते हुए कोई तितली अपने इस रक्षक के कंधे पर आन बैठती  तो कोई उसकी किताब पर। अब तो पड़ौसियों ने भी अपने घर के सामने फूल-पौधे  लगाने शुरू कर दिये।झुंड के झुंड  तितलियों के उनपर मटरगश्ती करते  ,फूलों का पराग चूसते नजर आते। कुछ दिनों में बिल्लू की गली का नाम पड़ गया तितलियों का मोहल्ला।
समाप्त 



शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

बालकहानी


गुरू का शत्रु  
सुधा भार्गव

       एक शिक्षक थे उनका नाम था आकाश--- ज्ञान का असीम भंडार । हमेशा कुछ न कुछ पढ़ते रहते  और अपने ज्ञान के  भंडार को बढ़ाते रहते। जो जितना ले सकता था उसमें से उतना उसको बड़े प्यार से दे देते। जो अपना टिफिन भूल आता वह दौड़ा-दौड़ा इनके पास आता और ये अपने सब्जी -रोटी का उसे हिस्सेदार बनाकर बड़े खुश होते। पाठ न समझने पर कोई रोता आता तो एक बार नहीं चार बार समझाने को तैयार रहते । गुस्सा और झुंझलाहट तो उनसे कोसों दूर भागती थी।
       वे खाली समय में कहानी कविता लिखकर अपने रचना संसार में डूबे रहते । पढ़ाई  के बीच -बीच में बच्चों को कहानियाँ सुनाकर उन्हें गुदगुदा देते। वे हँसते हुए और मन से पढ़ाई करते। उनके छात्र और उनके बीच हमेशा प्यार का सागर लहरा रहता।
      शिक्षक तिवारी जी के पढ़ाए शिष्य बड़े हो गए और उनकी उम्र ढलने लगी। पढ़ाना तो बंद कर दिया पर कुछ न कुछ बच्चों के लिए लिखते रहते।
      एक दिन  एक युवक उनसे मिलने आया । वह कीमती सूट पहने हुए था ,हाथ में सोने की घड़ी बंधी थी । तिवारी जी अपने शिष्य को तुरंत पहचान गए । उसने श्रद्धा से अपने गुरू के पैर छूए । उसे यह देख बड़ा कष्ट हुआ कि दूसरों का ध्यान रखने वाला आज खुद से बेखबर है। बदरंग चारपाई,घिसी-पिटी चप्पलें,कपड़ों के नाम पर दो जोड़ी कपड़े खूंटी से लटकते देख उसकी आँखें भर आईं।
     “आपने अपनी विद्यता से मेरे जीवन में रोशनी ही रोशनी भर दी । अब मेरी  बारी है । मैं आपको इस हालत में यहाँ न रहने दूंगा।‘’ कहते-कहते युवक का गला भर्रा गया।
      “बेटा ,मैं अकेली जान ,मेरी  जरूरते भी कम हैं । मैं ठीक ही हूँ।“
     “पर आपको देखकर मैं ठीक नहीं हूँ। मेरा घर बहुत बड़ा है । वहाँ रहने से आपको कोई असुविधा नहीं होगी और आप निश्चिंत होकर कहानियाँ लिखिएगा। पहले आपसे मैं सुनता था ,अब मेरा बेटा सुनेगा ।“
     गुरू जी उसकी बात सुनकर गदगद हो गए और बोले –“मैं अवश्य तुम्हारे पास आऊँगा लेकिन उससे पहले मुझे अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेने दो ।’’
     “क्या आप जैसे सज्जनों के भी दुश्मन होते हैं ?”युवक ने आश्चर्य से पूछा ।
     “पता नहीं! पर मेरे हैं ।“ शिक्षक ने सहजता से कहा । युवक उनकी बात टाल न सका और अकेला ही घर लौट गया ।
      दो वर्षों के बाद अपने शिक्षक को दरवाजे पर खड़ा देख युवक के आनंद की सीमा नहीं रही । उसकी समझ में नहीं आ रहा था उनका कैसे आदर –सत्कार करे । उनकी एक कमरे में रहने की व्यवस्था की गई । युवक खुद बाजार गया और उनके लिए  कपड़े ,जूते ,चप्पल आदि खरीदकर उन्हें अलमारी में करीने से सजा दिया  । वैसे तो घर में नौकर-चाकर थे पर उसने अपनी पत्नी से विशेष आग्रह था किया कि भोजन अपने हाथ से ही गुरूजी को परोसे।  थाली में सब्जी –रोटी के अलावा नमकीन ,चटपटा ,चरपरा ,मिठाई सभी होती थीं पर गुरू जी दो सब्जी –दो रोटियाँ निकालकर सभी लौटा देते । इसी तरह कपड़ों के मामले में दो जोड़ी कपड़ों से गुजारा करते ।
     उनका यह रवैया देख युवक बेचैन हो उठा । उसने गुरू जी से पूछा –“क्या मेरी सेवा में कोई त्रुटि रह गई हैं?”
     “तुम्हें मालूम है कि मैं अपने शत्रु को जीतकर आया हूँ । उस दुश्मन का नाम है लालच । यदि मैं आराम दायक ज़िंदगी का आदी हो गया ,जीभ का गुलाम बन कर रह गया तो चिंतन -मनन नहीं कर पाऊँगा । मेरे कलम भी सुस्त पड़ जाएगी।  अपनी मंजिल पाने के लिए सादा जीवन जरूरी हैं ।’’
     “तब गुरू जी सुख –सुविधाओं का उपयोग करके क्या मैं गलती कर रहा हूँ ?”युवक व्याकुल हो उठा ।
     “पुत्र ,तुम्हारा उद्देश्य है गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए दूसरों की सुविधाओं का ध्यान रखना । यह कर्तव्य तुम अच्छी तरह निभा रहे हो । सबके जीवन के लक्ष्य अलग –अलग होते हैं । उनको पाने कि लिए उसी के अनुसार जीवन बिताना होता है। ’’
      आकाश गुरू के सामने नतमस्तक हो गया और उसने निश्चय किया कि वह उन्हें कहीं नहीं जाने देगा। अपने गुरू से आजन्म कुछ न कुछ सीखता रहेगा।

प्रकाशित -  बालवाटिका -सितंबर अंक