प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

बालकहानी

मन की रानी/सुधा भार्गव 




    ठंडी –ठंडी मस्त हवा के झोंके मन को लुभाने लगे । सूझे पत्ते फड़फड़ाकर हँसते ,फुदकते ,दौड़ लगाते । झाड़ी में बैठी एक स्ट्रोबरी चंचल हो उठी । झटके से झुकी ,डाल नीचे हो गई । उसका  मन किया धरती पर लोटती –पोटती सूखे पत्तों का पीछा करे । तभी पीछे से माँ ने उसे अपनी ओर खींच लिया –ज्यादा न झुक ,गिर जाएगी । स्ट्राबरी डर गई । डाल में लगे पत्तों की अंधेरी गुफा में अपने को उसने तुरंत छिपा लिया। 

   स्ट्रोबरी रात में टुकुर –टुकुर तारे देखती । पत्तों के बीच में से आती झीनी रोशनी से अपना मन बहलाती । एक बार वह उकताकर आलसी की तरह उबासी लेने लगी । तभी कनखियों से उसने बादल देखा । उससे बात करने को पत्तों से अपना सर निकाला । बादल को वह बहुत अच्छी लगी । उसने प्यार से पानी की एक बूंद उस पर टपका दी । स्ट्रोबरी उसमें नहाकर ताजी हो गई । पहले से ज्यादा चमकने लगी । पीछे से किसी ने उसे अपनी ओर खींच लिया –क्या कर रही है ,ठंड लग जाएगी । उसकी छोटी-छोटी आँखों में आँसू भर आए।

Image result for drop of water clipart-हिम्मत रखो !ऐसे आँसू न बहाओ। यदि तुम धरती पर आना चाहती हो तो आ जाओ ।  मेरा घर बादल है । उसे छोडकर धरती पर आई हूँ । धरती पर आकर तुम्हें बहुत प्रसन्नता होगी । यह बहुत सुंदर है । इसका लहंगा हरा ,ब्लाउज पीला है । वह चांदी का मुकुट पहने है । बूंद ने दिलासा दी।  
-आऊँ कैसे ?
-जैसे मैं आई हूँ । घर से तुम्हें बाहर निकलना ही होगा ,तभी तो  दूसरी निराली दुनिया की सैर कर सकोगी  । बूंद ने कहा ।
-स्ट्रोबरी में हिम्मत आई और आँखें मटकाकर इधर –उधर देखने लगी –कहीं कोई देख तो नहीं रहा । माँ तो जरूर कहती  –खेलने –कूदने की जरूरत नहीं ,चोट लग जाएगी । बिना हिले डुले डाली से चिपकी रह ।

उसने बिना शब्द किए झाड़ी से अपना पूरा शरीर निकाला । दम लगाकर उछली । डाली से टूटकर धम्म से मिट्टी मेँ जा पड़ी । प्यारा सा मुखड़ा धूल से भर गया । फिर भी ताजी हवा मेँ  सांस लेने से उसके अंग मुस्कराने लगे । हवा भी खुश , स्ट्रोवरी की खुशबू से जो भर गई थी।

बूंद आगे बढ़ी । उसने स्ट्राबरी को उठाया । झपझप करके धूल झाड़ी । बोली -चलो मेरे साथ।
-कैसे चलूँ ?घर में मुझे न देखकर माँ रोएगी । बहनें तो सो भी न पाएँगी । स्ट्राबरी उनकी याद में उदास हो गई।
- कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है । बूंद ने स्ट्रोबरी को समझाया।

स्द्रोबरी आगे बढ्ने लगी । पीछे मुड़कर भी देखती जाती ।उसे माँ का प्यार पुकारता सा लगा । तभी मुर्गे ने बांग दी । झाड़ी में सब जाग गए । स्ट्रोबरी को न देखकर कोहराम मच गया । 

माँ ने छाती पीट ली –हाय मेरी स्ट्रोबरी जान से गई । किसी ने साबुत का साबुत निगल लिया होगा।
बहन बोली –भालू स्ट्रोबरी को खा गया है । अपनी लपलपाती जीभ होठों पर फेर रहा होगा –वाह !क्या रसीली गूदेदार हैं । बड़ी निडर बनती थी।

बहन ने पत्तियों को हटाकर बाहर नजर घुमाई । उसे स्ट्रोबरी की एक झलक मिल गई। वह चिल्लाई –लौट आओ –लौट आओ । जान को खतरा है । स्ट्रोबरी ने अपनी चाल और तेज कर दी । उसे झाड़ी मेँ कैद होना मंजूर न था । खुली हवा मेँ सांस लेने का सुख वह जान चुकी थी।

नाजुक स्ट्रोबरी बूंद के साथ –साथ चलते थक गई । वह धीमें स्वर में बोली –मुझे धरती से जल्दी मिलाओ न । 
-तुम धरती पर ही तो खड़ी हो । बूंद ने कहा।
-यह तो बहुत लंबी -चौड़ी है । मेरे घर से बहुत बड़ी है। आश्चर्य से स्ट्रोबरी ने आँखें झपकाईं ।
-अब पूरी धरती ही तुम्हारा घर है । चलो ,तुम्हें भाई से मिलाती हूँ।  
-बूंद एक पेड़ के नीचे ठहर गई । स्ट्रोबरी उसकी ऊंचाई देखती ही रह गई ।
-पेड़ भाई ,तुम्हारा घर कहाँ  है ?उसने पूछा ।
-यह धरती मेरा भी घर है । इसी की मिट्टी में मेरा जन्म हुआ है ।
-तब तो हम सबका घर एक ही हैं । हमें हिल मिलकर रहना होगा।
  -तूम तो बड़ी समझदारी की बात करती हो । मुझसे  छोटी हो पर बुद्धिमानी में बड़ों –बडों को हरा दोगी । पेड़ बोला । 
Image result for strawberry plant clipartस्ट्रोबरी अपनी तारीफ सुनकर इतराने लगी । पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए वह उत्साहित हो उठी ।
बोली –मुझे जल्दी से धरती का मुकुट दिखाओ।  
-अभी दिखाती हूँ –कहकर बूंद बर्फ ढकी चोटी पर बैठ गई । वहीं से ज़ोर से बोली –बर्फ से ढकी चोटियाँ ही धरती का शानदार मुकुट हैं । तुम भी यहाँ आ जाओ ।

स्ट्रोबरी तो उमंग के पंखों पर सवार थी । उसने बर्फ पर चढ़ना शुरू किया । जरा सा चढ़ती ,फिसल जाती । फिर चढ़ती –फिर फिसल जाती । वह बार –बार ऐसा करती रही । ठंड से बदन अकड़ गया लेकिन बूंद के पास जाने की इच्छा नहीं छोड़ी।


सूरज को उस पर दया आ गई ।वह ज़ोर से चमका । किरणों की गर्मी से बर्फ जगह –जगह से पिघल गई।स्ट्रोबरी सरलता से चोटी पर चढ़ी और ऊंचाई से धरती की सुंदरता देखी ।उसके रूप पर वह मुग्ध हो गई । बर्फ पर सुनहरी किरणों के पड़ने से नीली ,पीली रोशनी निकल रही थी जिसमें धरती नहाकर खिल उठी।  

-मुझे अब हरा और पीला ब्लाउज भी दिखा दो । बच्चे की तरह स्ट्रोबरी मचल उठी ।
-चोटी से नीचे झाँको!पृथ्वी हरी –हरी घास का मखमली लहंगा पहने हुए है और सरसों के लहलहाते पीले खेत उसका  ब्लाउज हैं । सभी तो दिखाई दे रहा है । सुरभि का सितार बजाते रंग बिरंगे बाग –बगीचे हमें बुला रहे हैं । सूरजमूखी  का फूल मस्त होकर नाचना चाहता है । उस पर मंडराती तितलियाँ कुछ गाती सी लग रही हैं।
--मेरा  मन भी करता है नाचने को –गाने को । भोली सी स्ट्राबरी बोली ।
-किसने रोका है तुम्हें !खूब नाचो –खूब गाओ ।
-मुझे कोई नहीं रोकेगा !क्या तुम्हें पूरा –पूरा विश्वास है ?झाड़ी वाले घर में तो मैं अपने मन से कुछ कर ही नहीं सकती थी । हर समय टोकाटाकी होती  –यह मत करो ,वह मत करो ।
- हाँ –हाँ !मैं अच्छी तरह जानती हूँ । इस धरती पर तुम अपने मन की रानी हो । बूंद ने उसे यकीन दिलाना चाहा ।
-सच में !
आह तब तो मैं--------


खाऊँगी –खेलूँगी
नाचूँगी –गाऊँगी ,
ताल में उछलूँगी
झरने में नहाऊँगी ,
पीछे पड़ी यदि गिलहरी
चोटी पर चढ़ जाऊँगी।

स्ट्राबरी अपने में ही खोई थी । उसे पता ही न चला कि कब –कब में बूंद दूसरी दिशा में हवा के साथ उड़ गई । उसे अब दूसरों का भला करना था ।


समाप्त  Related image
(प्रकाशित)


सोमवार, 21 सितंबर 2015

बाल कथा

अंतर्जाल पत्रिका अनहदकृति में प्रकाशित 

http://www.anhadkriti.com/sudha-bhargava-story-bhoori-maa

भूरी माँ

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जानवर के अगाध स्नेह के आगे आज का सभ्य मानव मूक 
नैपाली कक्षा चार में पढ़ता था। माँ दांतों की डॉक्टर और बाप दिल का पर न उसके दाँत ठीक थे और न दिल ही खुश था। स्कूल से आकर वह नौकरानी के पास रहता। रविवार को भी उसकी माँ और पापा घर में नहीं होते थे। फिर तो छुट्टी का दिन उसे पहाड़ लगने लगता। आया घर का काम निपटा कर सोने की ताक में रहती। अकेलेपन से उसका जी घबराता और बुरे विचार उसे बेचैन किए रहते –यदि मैं गिर गया तो कौन उठाएगामुझे बुखार चढ़ गया तो दवा-दारू कौन करेगा। दोस्तों को फ़ोन करता तो वे एक मिनट बातें करतेफिर धम से रिसीवर नीचे रख देते। वे अपने भाईबहनों मे मस्त। माँ की उसे याद सताती पर डायल करतेकरते उँगलियाँ थम-सी जातीउन्होंने कह रखा था कम से कम फ़ोन करना क्योंकि मरीज़ों को देखते समय उनका दिमाग़ बँटता है। सारे दिन फ़्रिज में रखे टॉफ़ीचाकलेट खाने से उसके दाँत गड़बड़ा गए। घर में कोई समझाने वाला तो था नहीं जो मन में आता करता। यहाँ तक कि घर की चारदीवारी में इंसान कीआवाज़ सुनने को उस बालक के कान तरस जाते। मन को समझाने के लिए दूरदर्शन के चैनल बदलता रहताकब नींद ने उसे थपकी देकर सुला दिया पता नहींपर टी वी चलता रहता। ठंड से उसके पैर पेट से जा लगते मगर चादर ओढ़ाने वाली नौकरानी पहले से ही व्यस्तता का बहाना बना कर अपना पीछा छुड़ा लेती।

शाम के पाँच बजते ही वह पास के पार्क में घूमने निकल जाता। दोस्त तो संध्या घिरते ही अपनेअपने घरों का रास्ता नापते पर वह लावारिस-सा घूमता रहता। थक कर पेड़ के नीचे बैठा माँ का इंतज़ार करता। ज्यों-ज्यों अंधेरा होताउसके अंदर का अंधेरा बढ़ता जाता।
एक दिन माँ के आने पर चुपचाप वह उसके पीछे घर में दाख़िल हुआ ।

नैपी,तुम अकेले इतनी देर तक बाहर क्यों थेरामकली तुमने इसे क्यों नहीं बुलाया?
मेमसाहब। बाबा रोने लगते हैं। उन्हें देखकर हमारा कलेजा फटने लगता है। बाहर रहते हैं तो पेड़पौधों को ही देखकर मन बहलाते रहते हैं।
न जाने क्यों यह भूत की तरह मुंह लटकाए रहता है। इसे मैंने क्या नहीं दिया। अभी नया मोबाइल दिया। खूब गाने सुनोपिक्चर खींचोकौन रोकता है! कल ही नए जूतेटी शर्ट लेकर आई हूँ।
रोहिणी नाराज होने की बात नहीं। वह तुम्हारा साथ चाहता है। शांत भाव से घर में प्रवेश करते हुए नैपाली के पापा बोले।
तब क्या मैं अस्पताल जाना बंद कर दूँ। आप क्यों नहीं अपनी प्रेक्टिस बंद करके उसकी देख-रेख करते।
मैं तब भी माँ की कमी पूरी नहीं कर पाऊँगा। माँमाँ ही होती है।
मैं अपना कैरियर बर्बाद नहीं कर सकती।
मैं तो केवल यह चाहता हूँ कि उसे थोड़ा समय दो और बेटा होने के नाते उसका अधिकार  बनता है। बच्चे को जन्म देने से पहले तुम्हें सोच लेना चाहिए था कि उसके प्रति तुम्हारा कर्तव्य भी हैउसे निभा पाओगी या नहीं।
पति की तर्कसंगत बात से रोहिणी चुप हो गई। माँबाप के बीच गरमागर्मी होने पर नैपाली अख़बार लेकर बैठ गया।
हठात बोला –माँ देखो इसमें लिखा हैबिल्ली ने एक छोटे बच्चे की जान बचाई। मुझे भी एक बिल्ली का बच्चा ला दो। आप लोगों के पीछे से यदि मुझे कुछ हो गया तो वह बचा लेगी।
उसके मन का भय उसकी ज़बान पर आ गया। उसमें पनपती असुरक्षा की भावना को महसूस कर रोहिणी भी हिल गई।
दूसरे दिन वह क्लीनिक से लौटते समय सफ़ेद बालों वाला बिल्ली का प्यारा-सा बच्चा उठा लाई। भूरीभूरी आँखेंरेशम से बालनैपाली तो उसकी झलक पाते ही उछल पड़ा। अपने हाथों से बड़ी सावधानी से ऐसे उठाया जैसे माँ नवजात शिशु को उठाती है। उसका चुंबन ले सीने से लगा लिया। वह सोचने लगामेरी तरह यह भी अपनी माँ को याद करेगा पर मैं इसे इतना प्यार दूंगा कि माँ की कमी खलेगी ही नहीं।
नैपी बिल्ली के बच्चे को भूरी ही कहता। वह उससे इस तरह हिल-मिल गई थी मानो उसकी दुनिया नैपी ही हो।

स्कूल जाते समय वह बड़े रौब से कहतारामकली! घर का काम हो न हो पर भूरी का पूरा ध्यान रखना। वह भी उसकी बात न टालती। उसे नैपी से पूरी सहानुभूति थी। उसे लगता –नैपी के माँबाप नोट छापने की मशीन बन कर रह गए हैं।
एक छोटे से जीव ने नैपी की दिनचर्या ही बदल दी। अंधेरे गए बाहर तक घूमने पर तो उसने ताला लगा दिया। शाम को भूरी को घुमातामैदान में दौड़ाता और उसमें अच्छी आदतें डालने की कोशिश में रहता। भूरी दूधरोटी खाती तो वह भी खाने बैठ जाता। भूरी के रूप में उसे एक साथी मिल गया जिसकी उसे परवाह थी और भूरी को नैपी की। एक मिनट को वह उसकी आँखों से ओझल हो जाता तो म्याऊँ –म्याऊँ करती पूरे घर में ढूंढ आती।

एक बार रामकली कुछ दिनों को अपने गाँव गई। पीछे से नैपी को वायरस फ़ीवर हो गया। अस्पताल जाने से पहले उसकी माँ ने दवाइयों का लिफ़ाफ़ा बेटे के सिरहाने रख दिया और कहा –ठीक से दवा लेते रहना। कोई बात हो तो मुझे फ़ोन कर देना। पड़ोसी आंटी को घर की चाबी दिये जा रही हूँ। वे आकर तुम्हारा हालचाल पूछ जाएंगी।
माँ से रुकने के लिए कहना बेकार था। वह अनमना-सा उनके आदेश सुनता रहा। दोपहर होतेहोते उसका बुख़ार बढ़ने लगा। ज्वर के ताप से वह बड़बड़ाने लगाभूरी मुझे बचा लो --भूरी अपना नाम सुनकर चौंक गई। अपने साथी के सिरहाने बैठकर उसने धीरे से पंजा उठाया और उसका सिर सहलाने लगी। बुख़ार की गर्मी का शायद उसको अनुमान लग गया था। वह रसोई के वाशबेसिन पर चढ़ गई। पंजे से नल की टोंटी घुमाई और बहते पानी के नीचे अपना सिर रख दिया। जब उसके बाल अच्छी तरह भीग गएएक छलांग में अपने छोटे मालिक के पास आन बैठी। उसके माथे पर झुककर उसने अपना सिर हिलाया। झरझरा कर उसके बालों से ठंडे पानी की बूंदे नैपी के चेहरे पर गिरने लगीं। उसको ठंडक महसूस हुई और आँखें खोल दी लेकिन फिर से उस पर बेहोशी छाने लगी। भूरी घबरा कर इधरउधर चक्कर काटने लगी। कुछ  मिनटों की कसरत के बाद वह दूसरी मंजिल की खिड़की से पाइप के सहारे नीचे कूद गई। पड़ोसिन आंटी का दरवाज़ा भड़भड़ करने लगी। वह यहाँ कई बार नैपी के साथ आ चुकी थी। आंटी भूरी को देखकर चौंक गईं। भूरी उनके कदमों में लोटकर बाहर जाने की ओर इशारा करने लगी। आंटी अनहोनी की आशंका से काँप उठी। उन्होंने नैपी के घर की चाबी उठाई और भूरी के पीछे चल दीं।

दरवाजा खोलते ही आंटी से पहले भूरी घर में घुस गई। नैपाली के सिरहाने दो पैरों से खड़े होकर वह अजीब-सी आवाज़ निकालने लगी। आँखों की चमक से लगता था वह बहुत खुश है और उसे पूरा भरोसा है कि उसके साथी को कष्ट से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा।

आंटी ने नैपाली के माथे पर हाथ रखा। वह तवे की तरह जल रहा था। उन्होंने उसे दवा देकर रोहिणी को फ़ोन कियातुम तुरंत चली आओ। बेटे की तबियत ठीक नहीं। भूरी के कारण आता संकट टल गया।

आंटी ने ठंडे पानी की पट्टियाँ नैपी के माथे पर रखनी शुरू कर दी और भूरी! उसको किसी तरह चैन नहीं मिल रहा था। वह बारबार दरवाज़े तक जातीएकदो बार उचककर बाहर झाँकती फिर निराश-सी म्याऊँ कहकर लौट आती। उसे शायद रोहिणी के आने का इंतज़ार था।

रोहिणी को आने में आधा घंटा लग गया। बदहवास-सी बेटे के पास आकर खड़ी हो गई। वह अपने बेटे की ओर एकटक देखे जा रही थी और अपने को अपराधी महसूस कर रही थी। तभी नैपी की आँखें खुलींउसने कमज़ोर-सी आवाज़ में पुकारा---भूरीभूरी। भूरी फुदककर अपने साथी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने पंजे में लेकर चाटने लगी । जो कर्तव्य माँ का था वह भूरी-माँ बनी निभा रही थी।

जानवर के अगाध स्नेह के आगे आज का सभ्य मानव मूक था।
 रोहिणी के मुख से केवल इतना निकलाबेटामुझे माफ़ कर दे ।
सुधा भार्गव 
बैंगलोर