प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

रविवार, 30 दिसंबर 2012

2013 -नए साल से मुलाक़ात

बच्चो 

नव वर्ष का अभिनन्दन 

साथ में मनभाती बालकहानी 

नए वायदे  -नये कायदे

 सूर्य रथ

नया साल सूर्य रथ पर सवार होकर निकलने वाला ही है | सारी पृथ्वी उसकी सुनहरी आभा से चमचमाने लगेगी ।आह ! हम कितने उत्साह से उसका स्वागत करने को बेचैन हैं ।पूरे 365 दिन वह मित्र बनकर हमारे साथ रहेगा -सोच -सोच कर ही आनंद की सीमा नहीं ।पर इसे मुट्ठी में बंद करके रखना है क्योंकि इसके रहते हुए ही हमें वे कार्य पूरे करने हैं जो हमने निश्चित किये हैं ।वे वायदे पूरे करने हैं जो हमने दूसरों से किये हैं ।हाँ याद आया  कूछ काम पिछले साल के अधूरे भी तो रहगए हैं ,उनको भी तो पूरा करना है ।अरे यह क्या !नया साल तो हम से लुका छिपी खेल रहा है--देखो -देखो सर्रू  के घर की ओर  उड़ा जा रहा है ।ज़रा देखें -यह सर्रू कौन है ?








सर्रू तो चंदू की गली में रहता है ।दोनों में बड़ी पक्की दोस्ती है  ।


इनके बारे में एक कहानी सुनानी होगी जिसका नाम है -

नए वायदे  -नये कायदे


एक दिन सर्रू बड़ा दुखी -दुखी सा  स्कूल पहुँचा ।उसे देखकर चंदू को बड़ा आश्चर्य हुआ ।

  -अरे इसे क्या हुआ !कलतक तो  बड़ा खुश नजर आ रहा था । न जाने क्या -क्या कह रहा था --नए वर्ष से गले मिलने से पहले घर सजाऊंगा ,बड़े  बड़े रंगबिरंगे  गुब्बारे  फुलाऊंगा दोस्तों को टॉफियाँ दूँगा एक रात में इसका सारा जोश  ठंडा पड़  गया ।पूछूँ तो ज़रा ।
-भईये --दो दिन बाद 2013 नया  वर्ष  शुरू होने वाला है पर तेरे चेहरे पर तो काले बादल मंडरा रहे हैं ।लगता है आँखों के रस्ते अभी बरस पड़ेंगे ।ऎसी हालत में तू नए साल का कैसे स्वागत करेगा ।

-मेरे पापा मुझसे बहुत गुस्सा हैं ।सर्रू  रुआंसा हो गया ।
-तो इसमें नई बात क्या है ?मेरे पप्पा भी तो गुस्सा होते हैं ।
-केवल गुस्सा ही नहीं भूखे भी हैं ।रात  से खाना नहीं खाया है जबकि मैं दो बार खा चुका हूँ ।
-खाने में क्या बना था ?
-मूंग की दाल ,पालक की सब्जी और रोटी ।
-तुम्हारी मम्मी नाश्ता भी बनाती होंगी ।
-हाँ !लेकिन नाश्ते की अलमारी छूने की हमें आजादी नहीं  हैं ।
-पापा को तो होगी ।
-  उनको कौन रोक सकता   है !
-नाश्ते में क्या -क्या बना रखा है ?प्रश्नों की झड़ी लग गई ।
-गाजर का हलुआ ,मठरी ,बेसन के लड्डू --।



-अरे वाह !मेरी जीभ तो इन्हें खाने को बेचैन हो उठी  है।चंदू ने लपलपाती जीभ निकाली ।
-तुम्हें अपनी पड़ी है ।मुझे पापा की चिंता सता रही है ।दादी कह रही थीं -न खाने से कमजोरी आ सकती है ।
-चिंता न कर ।पापा ने खाना नहीं खाया तो क्या हुआ --नाश्ता जरूर चार बार किया होगा ।डिब्बे खोलकर देखना ,सब खाली पड़े होंगे ।कमल ने राज की बात बताई ।।
सर्रू का तो दिमाग दौड़ने लगा ,पापा के लिए नहीं अपने लिए ।



परसों ही तो माँ ने गाजर का हलुआ बनाया था ।माँ ने उसे मुश्किल से आधा कटोरी दिया होगा ।
पढ़ाई से उसका ध्यान हट गया ।मैडम उसे क्या पढ़ा गईं ,कुछ पता नहीं ।किताब की जगह उसे केवल कटोरदान दिखाई दे रहा था ।वह केवल एक बात समझने की कोशिश कर रहा था यदि पापा ने सारा हलुआ खा लिया तो उसका क्या होगा !


स्कूल की ट्टी के बाद वह घर में घुसा  तो देखा -नौकरानी हलुए का खाली छुकटोरदान माँज रही है ।


-माँ --माँ सारा हलुआ कहाँ गया ।सर्रू  पूरी ताकत से चिल्लाया ।
-ख़तम हो गया ।माँ ने सरलता से जबाब दिया और अपने काम में लग गईं ।
-पर इतना सारा ---किसने खाया ?
माँ चुप !पर सर्रू  की समझ में आ गया था पापा के भूखे रहने का रहस्य ।नाश्ते पर हाथ साफ करने की तिकड़म वह भी भिड़ाने लगा ।
अगले दिन स्कूल जाने से पहले माँ ने दूध दिया ।उसने दूध का गिलास एक ओर सरका दिया ।
-दूध पीयो --दूध पीओ बस कहती रहती हो ।मैं नहीं पीता इसे ।माँ समझ नहीं सकी कि बेटा खौलते तेल की तरह उबल क्यों रहा है ।

दोपहर को वह घर लौटा ।बिस्तर  पर जा लेटा ।मुरझाया -बेजान सा ।
आदत के अनुसार माँ ने उसका बैग खोलकर देखा ।सर्रू  ने परांठे का एक टुकडा भी नहीं तोड़ा था ।माँ का दिल भर आया ।जरूर बेटे की तबियत ठीक नहीं है ।वह एक प्याले में गर्म दूध लाई ।
बोली -सुबह से कुछ नहीं खाया है ।बोर्नविटा वाला दूध पी  ले ।ताकत आयेगी ।
-केवल पीने को दे रही हो ,खाने को तो कुछ  दो ।
-अभी खाने को लाती हूँ ।तेरी मनपसंद के दाल -चावल बनाये हैं ।मैं सुबह से भूखा  हूँ ।भूखा कोई खाना खाता है ।
-तब क्या खाता है !माँ हैरान थी ।
-नाश्ता !नाश्ता भी कहाँ हैं ।सब तो पापा खा गए ।
-अंतिम शब्द कानों में पड़ते ही माँ की हँसी फूट पड़ी  ।प्यार से सर्रु को उठाते हुए पूछा --मेरा अच्छा बेटा  क्या खायेगा !
-वही गर्म -गर्म मीठा हलुआ और आलू की पकौड़ी , समोसे जो पापा अक्सर खाते हैं ।




माँ तो रसोईघर में चली गई पर भूखा सूरज जल्दी ही सो गया ।यह देख माँ का ह्र्दय बेचैन  हो उठा ।उसने जल्दी -जल्दी हाथ चलाये तब भी हलुआ-पकौड़ी समोसे बनाते -बनाते आधा घंटा तो लग ही गया ।भुने बेसन की खशबू से  पूरा घर महक उठा ।जैसे ही सर्रू ने करवट बदली महक से उसके नथुने   भर गए ।वह उठा ।हलुआ --हलुआ कहता माँ से चिपट गया ।-एक  कटोरी नहीं दो कटोरी खा ।तेरे लिए ही तो बनाया है ।माँ ने स्नेह बरसाया ।

सर्रू सोचने लगा --भूखे रहने का तो बड़ा फायदा है ।
शाम को उसके पापा आफिस से आये ।माँ ने उनके सामने भी प्लेट में हलुआ-पकौड़ी रख दीं ।वे तो देखते ही उछल पड़े --यह सब किस खुशी में !
-आज आपका बेटा सवेरे से भूखा है ।वह केवल नाश्ता करेगा ,खाना नहीं खायेगा ।
पत्नी की बात सुनकर सूरज के पापा को झटका लगा मानो किसी  ने   उन्हें आकाश से नीचे फ़ेंक दिया हो ।

जैसे -तैसे नाश्ता  गटकने लगे ।
-गलत तो गलत ही है ।भोजन करने के समय  केवल लड्डू -मठरी -हलुआ खाना किसने बताया है ?
तुम ठीक कह रही हो ।नया वर्ष शुरू होने वाला है ।इसमें कुछ वायदे किये जाते हैं नए कार्य को कायदे से शुरु करने के सपने संजोये जाते हैं  और अधूरे कामों को पूरा करने में जी जान से जुट जाते हैं ।
-मेरी सहेली ने तो मन में ठान ली है कि नए साल -पहली जनवरी से सुबह 7 की बजाय 6बजे बिस्तर छोड़ देगी और सुबह की  सैर करेगी ।




-मैं भी तुमसे और अपने बेटे से नए साल में एक वायदा करता हूँ कि भोजन के समय भोजन ही करूंगा और नाश्ते के समय नाश्ता --मगर --।
हाँ --हाँ कह डालिए जो भी मन में है ।
-मगर  लड्डू -मठरी खाना नहीं छोडूंगा ।
-पापा की शरारत  भरी बात को सुन सर्रू और उसकी माँ ठहाका मारकर हँस पड़े । उस दूधिया हँसी की  गूँज घर -बाहर  फैल गई ।जिसे नये साल  ने  भी सुना ।वह उल्लास से भर उठा और  उसके कदम सर्रू  के घर की ओर  बढ़ गए ।

यह तो मालूम हो गया कि  नया साल सर्रू के घर की ओर क्यों उड़ चला था ।
अब इन बच्चों की बातें भी सुनी जाएँ -----
 नया साल मुबारक हो 


नए वर्ष का नया दिन हर एक का जन्मदिन होता है ।



नए साल में हम एक  किताब खोलेंगे जिसके पन्ने खाली होंगे । हम खुद उन पर लिखकर अपना भाग्य बनायेंगे । 




मैं किसी तूफान से नहीं घबराता |
समुद्री तूफान को भी तैरकर पार कर लूंगा ।





हम सात बार गिरेंगे तो आठ बार खड़े हो जायेंगे ।



नये साल में प्रसन्नता -सफलता सबको गले लगाए ।

नया साल शुभ हो 

(समस्त चित्र गूगल से साभार )
* * * * * *

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

बालकहानी /सुधा भार्गव




  भोले बच्चों 


हर त्यौहार प्रेम एकता और सद्व्यवहार का सन्देश देता है चाहे वह होली -दिवाली हो चाहे ईद -क्रिसमस । तुमको खुशियाँ देने वाला क्रिसमस बस आने वाला है ।  आज हम इससे सम्बन्ध रखने वाली 
कहानी सुनाते हैं ।कहानी का नाम है ----------------------

लो , मैं आ गया 




एक छोटे से घर में दो लड़के रहते थे । एक  का नाम था मंकी  दूसरे का नाम था टंकी । 


  उस दिन रात के  करीब दस  बजे होंगे  और वे खाना खाने ही बैठे थे कि दरवाजे पर खट खट की  आवाज सुन चौंक पड़े ।
-इतनी रात गए हमारे घर कौन आ गया वह भी इतने तेज  ठण्ड और बरसते पानी में ।मंकी  बुदबुदाया ।
टंकी भी चिल्लाया -दरवाजा न खोल देना ।अम्मा  भी घर पर नहीं है ।

दरवाजे की थाप रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी ।मंकी ने लकड़ी के दरवाजे में लगे गोल शीशे में झांककर देखा -उसी की उम्र का एक लड़का भीगा हुआ ठण्ड से थर थर काँप रहा है ।मंकी को उस पर दया आ गई और  हिम्मत करके  दरवाजा खोल दिया ।
टंकी ने जल्दी से अपने सूखे कपड़े देते हुए कहा -इनको पहन कर जलते कोयलों की अंगीठी  के पास हाथ तापने बैठ जाओ ।ठण्ड से छुटकारा  मिलेगा ।

कपडे बदलते ही लड़का बोला - मेरा नाम पेड़ है और मुझे भूख लगी है ।
-पेड़ !बड़ा अजीब नाम है  ।हमने तो किसी दोस्त का यह  नाम सुना नहीं ।
- न सुना हो---  पर मेरा नाम तो पेड़ ही है ।
-पेड़ ही सही ।हमारा क्या जाता है 

मंकी झटपट  उस  थाली को  ले आया जिसमें उनकी माँ उसके लिए और टंकी के लिए दही -रोटी और अचार रख गई थी ।
बोला  -हमारे साथ बैठकर खा लो ।


-तुम्हारे हिस्से का मैंने खा लिया  तो तुम भूखे रह जाओगे ।
-तुम्हारे खाने से हमें खुशी मिलेगी और हमारी माँ कहती है जो है उसे बाँटकर खाना चाहिए ।

लड़का समझदार था ।उसने मंकी -टंकी का थोड़ा -थोड़ा हिस्सा खाया और बाक़ी खाली पेट पानी से भर लिया ।

-मुझे नींद आ रही है ।लड़का बोला ।
-हमारी चारपाई पर सो जाओ।मंकी ने कहा ।
-तुम कहाँ सोओगे ?
-हम दोनों जमीन पर सो जायेंगे ।
नहीं --नहीं --मैं जमीन पर सोऊंगा ।तुम्हारी कमर ठण्ड से अकड़ जायेगी ।
-हमको कुछ नहीं होगा --सब तरह की आदत है ।यदि हम चारपाई पर लेट भी गए तो सो नहीं पायेंगे ।रातभर करवटें बदलते रहेंगे और सोचेंगे -तुम्हें जमीन पर लेटाकर अच्छा नहीं किया ।
लड़का आराम से चारपाई पर सो गया ।

सुबह मंकी -टंकी सोकर उठे ।लड़का चारपाई पर नहीं था ।वे परेशान हो उठे -इतनी सुबह कड़ाके की ठण्ड में लड़का कहाँ चला गया ।बाहर निकले तो देखा कोने में एक हरा-भरा पेड़ खड़ा है । उसकी टहनियों से रंगबिरंगे  गोल -गोल गुब्बारे लटके हुए हैं ।टंकी -मंकी की नजरें एक -दूसरे की ओर उठ गईं जो कह रही थीं -यह कैसा चमत्कार ।रात में तो यहाँ कुछ न था ।

-पेड़ --पेड़ ,तुमने यहाँ से किसी लड़के को जाते देखा है ?टंकी ने पूछा ।
-वह लड़का मैं ही तो हूँ ।मैंने रात में कहा था --मेरा नाम पेड़ है ।देखो ---मैं पेड़ हूँ कि  नहीं ।
-कौन सा पेड़ !कोई  नाम -गाँव है तुम्हारा ?
--ओए, तुम इतने  खुश नजर क्यों आ रहे हो  ?मंकी पूछ बैठा ।
-एक साथ इतने प्रश्नों की बौछार !
-तुम्हें इतना भी नहीं मालूम कि आज क्रिसमस है -यीशु  (Jesus Christ) का जन्मदिन ।ये दूसरों की खातिर सूली पर चढ़ गए थे ।इन्हें भगवान् की तरह याद करते हैं और मैं  हूँ क्रिसमस ट्री ।

पेड़ झूमता बोला-

क्रिसमस  ट्री है मेरा नाम 
पूरी धरती मेरा गाँव  
गली -गली मैं जाऊँगा 
बच्चों को बुलाऊँगा 
खेल खिलौने दूँगा उनको 
चाकलेट से पेट भरूँगा 
मोज़े -स्वटर    देकर  
ठण्ड से बचाऊँगा |

-तुम सब बाँट दोगे  तो तुम्हारे पास क्या बचेगा ?
-तुमसे ही तो मैंने सीखा  है -बाँट -बाँट कर खाओ ।मिलकर राह बनाओ ।तुमने मुझ भूखे को रोटी दी , पहनने को कपडे दिए ।आराम से चारपाई पर सोया ।अब मैं भी तुमको कुछ देना चाहता हूँ ।मेरे पास बहुत से उपहार के पैकिट हैं   ।मंकी ,तुम उनमें से कोई एक चुन लो और उसे खोलकर देखो ।

मंकी ने लाल रंग का बैग चुन लिया ।खोलते ही उछल पड़ा ---

अरे इसमें तो  केक रानी  है ।गुलाबी -गुलाबी  चेरी से सजी हुई ।आँखें मटकाकर ,हाथ नचाकर मानो कह रही हो -

मंकी आओ टंकी आओ 
गपागप मुझको खाओ 
मैं कोमल सी मीठी मीठी
स्वाद में हूँ बड़ी निराली  ।

-लेकिन इसको खाने से तो केक रानी ख़तम हो जायेगी ,मर जायेगी ।मंकी दुखी हो उठा ।
-यही तो  इसकी खूबसूरती है । यह जानती है कि खाने से वह ख़तम हो जायेगी पर दूसरों के काम आते -आते ख़तम हो जाना उसे पसंद है |

-टंकी तुम भी एक  बैग ले लो ।
टंकी ने भी एक बैग लेकर खोला |
-इसमें तो  तीन  स्वटर हैं ।मुझे तो केवल एक चाहिए ।

-ठण्ड लगने पर तुम तो अपना स्वटर मंकी को दे दोगे और खुद ठिठुरते रहोगे ।इसलिए सोचा दो रख दूँ फिर ध्यान में आया कोई  मांगने आ गया  तो उसे  भी देने को  चाहिए ।,इसलिए तीन ही ठीक रहेंगे ।
-ओह !कितना सोचते हो दूसरों के बारे में !
-यह मैंने यीसु से सीखा  है ।अच्छा अब मैं चलूँ ।दूसरों को भी उपहार देने हैं ।

-अब कब आओगे ।मंकी ने पूछा ।
-अगले साल । मैं हर साल  क्रिसमस के साथ आऊंगा ।
-जरूर आना ।तुम्हारे दिए उपहारों से हमें बहुत खुशी मिली है ।तुम खुशियाँ लाने वाले क्रिसमस ट्री हो ।
दोनों लड़के चिल्लाए --
प्यारे पेड़ -----मेरी   क्रिसमस !

क्रिसमस का पेड़ वहां से फुदक -फुदक चल दिया लेकिन तब से अपने वायदे के अनुसार वह  हर वर्ष बच्चों को खुशियाँ देने आता है और बच्चे भी उसका स्वागत खूब उमंग व् उत्साह से करते हैं ।




* * * * * *

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

दशहरे के अवसर पर बालकथा





बच्चों 
विजयदशमी  
अगरबत्ती सी खुशबू लिए 
तुम्हारे घर  आँगन में आ चुकी है 
जो कह रही है
अच्छे काम  करो
 बुराई से  बचो 
जो बता रही है
 राम अच्छा था
 रावण बुरा था
 राम ने अच्छा किया
 बुरे का अंत किया ।
पर इससे भी ज्यादा जानना तुम्हारे  लिए जरूरी है
इसके लिए एक  कहानी सुनाती हूँ  ।कहानी की कहानी और जानकारी की जानकारी ।

घर का भेदिया 

मनचला मन का बड़ा चंचल था | मिठाई देखकर तो उसका मन हिरन  की तरह कुलाचें  मारने लगता | मन ही मन हिसाब लगाता -एक खाऊँ ---दो खाऊँ-- या-- सब खा जाऊँ |






एक दिन वह सरपट के जन्मदिन पर उसके घर गया |सरपट बहुत सरल हृदय का था |उसको जो भी नई चीज मिलती अपने दोस्तों को दिखा -दिखाकर खुश होता |मनचला तो उसका खास दोस्त  था |जन्मदिन पर वह उसे अपने कमरे में ले गया |


उपहारों के पैकिट देखकर मनचला का मन चल निकला --


-इनमें क्या -क्या है | उसने पूछा  |
-ज्यादातर टाफियां -चाकलेट के डिब्बे हैं |
-एक डिब्बा खोलकर दिखाओ न |
-हाँ --हाँ अभी दिखाता  हूँ |

अरे सर्रू---सरपट आ --|केक काटने का समय हो गया है | सरपट को प्यार से घर  में सरू कहते थे |
माँ की आवाज कानों से टकराते ही सरपट भागा पर मनचला-- मनचला जो ठहरा ---सो वहीं ठहर गया |


उसके दिमाग ने शुरू कर दी अपनी कसरत ---  डिब्बा खुल तो गया ही हैं जरा हाथ डालकर देखूँ,क्या चमकीला -चमकीला सा है |

अरे टाफी --इतनी बड़ी --खुशबूदार !एक तो खा ही लूँ इतनी सारी टाफियों में एक कम हो गई तो क्या पता लगेगा |
बंद मुँह में टाफी का रस चूसता हुआ कमरे से निकला |उसके साथी केक  का स्वाद ले लेकर खा रहे थे |






वह दबे पाँव लौट गया कमरे में और इस बार मुट्ठी भरकर टाफियां  जेब के हवाले कीं |चुस्ती से  बाहर आकार केक खाने में लग गया जिससे किसी को उस पर शक न हो | |केक समाप्त करके बच्चे खेलने में लग गये पर मनचले को चैन कहाँ ! दिमाग में शैतान आन बैठा ----अभी तो डिब्बे  में बहुत टाफियां हैं क्यों न एक मुट्ठी दूसरी जेब में भी  भर लूँ फिर तो घर जाना ही है |घर में तो मुझे कोई इतनी टाफियां  देता भी नहीं हैं |उसने इच्छा पूरी की और अपनी विजय पर मुस्काता जल्दी -जल्दी  घर की राह  ली |

मेहमानों के जाने के बाद  दादा जी बोले --सरपट जरा अपने उपहार तो दिखाओ |
-अभी लाया दादाजी --|
दादा जी इंतजार करते रहे पर सरपट के आने का  नाम ही नहीं |हैरान से वे उसके कमरे में गये |सरपट के आगे टाफी का एक डिब्बा खुला पड़ा था और वह सुबक रहा था |

--क्या हुआ बेटा ?खुशी के दिन यह रोना -धोना क्यों | 
-मेरी टाफियां कोई खा गया ---बहुत सी  चुरा ले गया |

--किसी को मालूम था क्या कि तुम्हें मिले उपहार यहाँ रखे हैं !
-हाँ ,मनचले को !मैं उससे कुछ नहीं छिपाता  |वह तो मेरा सबसे अच्छा दोस्त है |

-यह तुम गलत करते हो |कल को कह दिया -मेरी गुल्लक माँ की अलमारी में रखी रहती है और उसमें बहुत सुन्दर -संदर साड़ियाँ भी है तो आज छोटा चोर मिला है कल बड़ा भी मिल सकता है |घर के भेदी  ने तो लंका भी ढा दी थी |
-वही लंका ---- जिसका राजा रावण था ----- |वह  दुष्ट   तो  सीता जी को चुरा कर ले गया था  और देखने में भी पूरा राक्षस --दस सिर --बीस हाथ |अच्छा किया राम ने उसे मारकर ।



-- बिना जाने बूझे तुम उसकी हँसी उड़ा रहे हो |राक्षसों जैसे बुरे काम करने के कारण वह दुष्ट कहलाया  पर था बहुत विद्वान् !दस दिमागों  के बराबर उसमें बुद्धि थी  और बीस हाथों के बराबर उसमें शक्ति | उस साहसी और युद्ध कला में चतुर  योद्धा को लड़ाई  में राम चन्द्र जी भी  नहीं हरा पा रहे थे ---एक सिर उसका धड़ से अलग करते दूसरा आन लगता |

-फिर वह  कैसे मारा  गया ?
-घर के भेदिये के कारण ---|
-कौन था दादाजी--- भेदिया ?
--तुम सुनकर ताज्जुब करोगे---  भेदिया था उसका ही  छोटा भाई विभीषण जिसे रावण   बहुत प्यार करता था |उसपर विश्वास करके  




अपनी और  अपने राज्य की सारी बातें उसको बता दिया करता |पर वही सगा भाई राम से जाकर  मिल गया और उसने रावण के सारे रहस्य राम के सामने उगल दिए।

 - दुश्मन से दोस्ती कर ली !तब तो वह देश द्रोही था ।

-तुम ठीक कह रहे हो !युद्ध के मैदान में विभीषण  ने चिल्लाकर  कहा --- हे राम ! रावण की नाभि में  उसकी मृत्यु का भेद  छिपा है |पहले 
उसमें भरा  अमृत का तालाब  नष्ट करो वरना वह अमर रहेगा  | वह कभी नहीं मरेगा ।

बस फिर क्या था -- बिना देर किये ,राम ने नाभि पर   निशाना लगाकर उसके टुकड़े -टुकड़े कर दिये और रावण के  सीने में तीर मार कर सदैव के लिए उसे सुला दिया  | 

 मरते समय रावण को मरने या हारने का इतना  दुःख नहीं था जितना विश्वासघात का |विभीष ने अपने भाई को कम दुःख नहीं पहुँचाया था ||रावण को  लगता मानो ,उसके भाई  ने उसके दिल में कीलें ठोक दी हों और उनसे खून बह रहा है ।






घर का भेदिया तो बड़ा खतरनाक होता है |मैं ऐसा खतरा कभी नहीं बनूंगा -सरपट बुदबुदा उठा |
दादाजी उसकी मनोदशा समझ गये |प्यार से बोले --बेटे, कल की बात छोड़ो आगे की सोचो | 
--तुम को तो एक  ऐसा  वीर सिपाही बनना है जो देश की रक्षा करेगा ,जो न देशद्रोही होगा न किसी का जी दुखायेगा ।

--मैं जरूर वीर सिपाही बनूंगा ।सर्रू उत्साह से भर उठा ।

* * * * * * 

सोमवार, 17 सितंबर 2012

कहानी


गणेश चतुर्थी के अवसर पर 




आओ हम कर  लें    
 कुछ काम  की बातें 
कुछ ध्यान की बातें 
कुछ रसभरी बातें 
कथा कहानी की --
(पूत के पाँव पालने  में )





 बच्चों ,गणेश जी का आगमन होने वाला है |वैसे तो वे  होशियार  बच्चों के  मध्य हमेशा रहते हैं | देवलोक में अपनी बुद्धि और चतुरता के कारण देवताओं के देवता कहलाते हैं और  उनके भक्त  शुभ काम करने से पहले सबसे पहले उनकी पूजा करते हैं |


कहते हैं पूत के पाँव पालने में ही दिख  जाते हैं |मतलब छुटपन में ही मालूम हो जाता है कि बच्चा कैसा है |यह कहावत गणेश जी के लिए तो पूरी तरह से खरी उतरती है | बचपन में ही उनकी बुद्धिमानी का अंदाजा लगने लगा था |उनकी बुद्धि के चर्चे करती हुई  अनेक कहानियाँ  हैं ।
मैं भी  तुम को ऐसी ही  एक कहानी  सुनाती हूँ  जिसमें कल्पना की चाशनी  भी बिखेर दी है ताकि कहानी की मिठास बढ़ जाये ।

कहानी

पूत के पाँव पालने  में 

दो भाई थे -गणेश और कार्तिकेय |गणेश बड़ा था और कार्तिकेय छोटा ।उनके माता -पिता शिव -पार्वती कैलाश पर्वत पर रहते थे ।






दोनों झगड़ते भी थे और उनमें प्यार भी बहुत था |कार्तिकेय जब  बहुत छोटा था तभी  अपनी सवारी मोर पर गणेश को बैठा लेता और फिर वे चहकते हुए दूर -दूर की उड़ान भरते ।




धीरे -धीरे छोटे भाई के  दिमाग में यह बात बैठ गई कि गणेश  किसी  भी तरह दौड़  में तो मुझसे जीत नहीं सकता क्योंकि उसकी सवारी चूहा है |

एक दिन दोनों भाइयों   में झगड़ा हो गया |

बालक गणेश बोला -मैं बड़ा हूँ क्योंकि मैं तुझसे पहले दुनिया में आया |
कार्तिकेय बोला -मैं बड़ा हूँ क्योंकि तुम मुझसे तेज नहीं जा सकते |हर हालत में मैं तुमसे पहले निकल जाऊंगा |जो जीता वही बड़ा |

उसी समय  ब्रह्मा जी के पुत्र नारद मुनि आ पहुँचे |वे विष्णु भगवान् का कोई संदेशा  लेकर शिवजी के पास कैलाश  पर्वत पर जा रहे थे |धरती पर शोरगुल मचता देख रुक गये |

बोले  --नारायण ---नारायण |अच्छे बच्चे झगड़ा नहीं करते |

-अंकल .आप ही बताइए --हम दोनों में से कौन बड़ा है ?

-रुको --रुको --मुझे जरा सोचने दो -- अच्छा बताओ ,तुम दोनों किसको सबसे ज्यादा प्यार करते हो ?

-माँ को ।दोनों एक साथ बोले ।

तो सुनो

 , -- जो  पूज्य माँ के तीन चक्कर  लगाकर सबसे पहले मेरे पास आएगा वही बड़ा होगा ।

कार्तिकेय बहुत खुश हुआ--आह !क्या कहने --|मैं तो मोर पर बैठकर कुछ मिनटों में ही कैलाश पर्वत  पर पहुँच जाऊंगा और माँ पार्वती  के तीन चक्कर लगाकर लौट भी आऊँगा पर बेचारा गणेश --हा --हा |चूहे पर  बैठ तो जायेगा पर जैसे ही तेजी से फुदक -फुदककर चलेगा ---गिरेगा धडाम से ।

|कार्तिकेय  धरती छोड़ उड़ चला आकाश की ओर पर गणेश जहाँ खड़ा था वहाँ से हिला तक नहीं ।

|सोचने लगा -माँ ने जन्म दिया ,उसका दूध पीकर  बड़ा हुआ पर अब तो मैं दाल- चाव् ल , लड्डू सब खाता हूँ | लड्डू में पड़ती है चीनी ,चीनी बनती  है गन्ने से |गन्ना पैदा होता है धरती में |
मुझे नुक्ती के लड्डू तो बहुत पसंद हैं |नुक्ती बेसन  से तैयार  होती है .बेसन बनाया जाता है चने की दाल से और दाल भी मिलती है धरती से |जब धरती का अन्न खाकर बड़ा हुआ ,फिर तो वह भी मेरी माँ हुई |अब किस किस के चक्कर लगाऊँ --क्या करूँ  क्या न करूँ ।

गणेश बालक सोच में पड़ गया |

-देरी हो रही है-----|जल्दी करो ----मुझ पर बैठो |मैं तुरंत पार्वती माँ के पास ले चलता हूँ | चूहा घबराया |
-मूसक  महाराज, जन्म देने वाली माँ का चक्कर लगाऊँ  या  पालने वाली धरती माँ का लगाऊँ |
-दोनों के लगा डालो |

गणेश की आँखें चमक उठीं --|

उसने तुरंत एक कागज और पेन्सिल ली |पहले धरती बनाई |तुरंत उस पर हरियाली छा गई |उसके बीच पार्वती माँ का चित्र बना दिया। 
आँखें मूंदकर माँ का ध्यान किया ,आँखें खोलीं तो लगा वे सामने सिंहासन पर बैठी उसी की और देख  रही हैं और अपनी  शुभ कामनाएं दे रही हैं। उसने  झुककर प्रणाम किया और कागज पर लिख दिया -धरती माँ -- प्यारी  माँ ! 



धरती माँ --माँ 


धरती पर  खुश होकर फूल खिलखिलाने लगे  और कागज --

उसकी तो पूछो ही मत ----

एक मिनट पहले जो  कोरा सफेद था ,किसी की उसकी तरफ    नजर ही नहीं जाती थी, अब वह रंग- बिरंगा होकर  बड़ा सुन्दर लग रहा था ।   पार्वती माँ का साथ होने  से उसने अपने को भाग्यशाली  समझा ।




चूहे पर  जल्दी से  गणेश जी बैठे और जोश में बोले

चल मेरे साथी जल्दी चल 
धरती माँ पर बैठीं मेरी  माँ 
खट से लगा उनका  चक्कर

धरती माँ का चक्कर लगाने के बाद वे नारद जी की बगल में  खड़े हो गये | कुछ देर में कार्तिकेय भी आ गया |

-अरे गणेश ,तुम गये नहीं !छोटा भाई बोला |
-इसने तो  माँ का ही नहीं  पूरी धरती  का चक्कर लगा किया |नारद जी ने कहा ।
-कैसे ?वह भी इतनी जल्दी |

-देखो उधर गणेश की लीला |

चित्र को देखकर कार्तिकेय अपने भाई के बुद्धिबल को समझ गया ।
रसगुल्ले की   सी आवाज में बोला -भाई तुम  मुझसे वाकई में बड़े हो |तुम जैसे  भाई को पाकर मेरे  मन  का मोर नाच रहा है   |

 कहानी तो ख़तम हो गई पर गणेश चतुर्थी के दिन तुम सब  जरूर कहना ---


गणेश पूजा 



विनती सुन लो हे गणनायक
हम है छोटे  प्यारे बालक
हम को खूब बनाना लायक  
खूब पढ़ाना ,खूब लिखाना 
अच्छे अच्छे काम सिखाना 
बड़े -बड़े हम यश पाएंगे 
तुम्हें  कभी नहीं बिसरायेंगे 

विनती  सुन लो हे गणनायक 
हम हैं छोटे  प्यारे  बालक |


सोचो -समझो 

बुद्धि ----

बुद्धि का कटोरा 


महान दिमाग 

महान दिमाग विचारों पर चर्चा करते हैं
औसतन दिमाग घटनाओं पर चर्चा करते हैं
छोटे दिमाग लोगों पर चर्चा करते हैं
एलिएनार रूजवेल्ट ऐसा कहते हैं 















शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

बालकथा निशाने बाज


बच्चों
मुझे कुछ कहना है ----
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो चखी जाती हैं ,कुछ सटक ली जाती हैं मगर कुछ खूब अच्छी तरह चबाई जाती है तब भी हजम नहीं होतीं | लगता है उनके बारे में दूसरों से बातें करो ,दूसरों को उन्हें सुनाओ |ऐसी ही एक कहानी मैं इस ब्लॉग पर पोस्ट करने जा रही हूँ |यदि कोई शब्द समझ में न आये तो अपनी मम्मी से पूँछ लेना इससे तुम्हारा  शब्द भंडार बढ़ेगा ,यदि कोई वाक्य समझ में न आये तो पापा से समझ लेना |इससे तुम समझदार बनोगे |
हाँ तो अब पढ़ना शुरू करो --अरे याद आया !पढ़ो तो जोर -जोर से |यदि तुम कुछ गलत पढ़ोगे तो सुननेवाला उसे ठीक कर देगा ,फिर तो कक्षा में पढ़ाई की परीक्षा  (reading test )के समय सबसे ज्यादा अंक आयेंगे |
 तो शुरू करते हैं कहानी ----
निशाने बाज /सुधा भार्गव
एक गाँव में गेंदाराम रहता था |
वह निशाना लगाने में बहुत चतुर था |सुबह उठते ही बहुत से पत्थर बटोर लेता और कुँए की तरफ गुलेल लेकर निकल जाता | 
उस समय लड़कियां और औरतें कुएं से पानी खींचकर घड़े भरतीं ,फिर उन्हें सिर पर उठाकर घर की ओर धीरे -धीरे

कदम बढ़ातीं|गेंदाराम दूर से भरे घड़े पर निशाना लगाकर उन्हें फोड़ देता  और खिलखिलाता----

हो गया छेद 
फूट गया मटका 

पानी गिरा टप से 

उसे लगा झटका |
गाँव वाले बड़े परेशान !सब उसे छेदाराम-छेदाराम कहकर चिढ़ाने  लगे |चिढ़कर तो वह और भी तेजी से घड़े फोड़ता
|बच्चे -बड़े पानी के लिए तरसने लगे |

एक बार उस गाँव में दाढ़ी वाले  साधुबाबा आये |
परेशान गांववाले  उनके पैरों पर गिर गये और चिल्लाये ---
--महाराज,बचाओ ---बचाओ --इस छेदीराम ने घड़ों में छेद कर- करके  हमारा जीना हराम कर दिया है |
--क्यों छेदीराम !क्यों सताते हो इन लोगों  को  ?
--मेरा नाम छेदीराम नहीं गेंदाराम है |इन्होंने मेरा नाम बिगाड़ दिया है |मैं भी गुस्से में आकर इनके घड़ों की शक्लें बिगाड़ देता हूँ|
--तुम्हें जितना गुस्सा करना है करो ,जितने घड़े फोड़ने हैं  फोड़ो ,पर एक शर्त है ---
--साधुबाबा ,आप  तो बहुत अच्छे हैं |घड़े फोड़ने को मना भी नहीं किया !आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ |
--सुनो ,जितने घड़े तुम फोड़ोगे,उतने तुम्हें  बाजार से खरीदने होंगे |फिर उन्हें भरकर घर -घर पहुँचाओगे|
--यह तो मेरा चुटकियों का काम है दीये तो मुझे बनाने आते ही हैं घड़े भी बना लूंगा  फिर पानी भरने में क्या देर !

अब तो वह पेड़ की ऊंची सी डाली पर बैठकर खूब निशाना लगाता|रात घड़े बनाने में गुजर जाती और दिन में उन्हें भरकर घर -घर पहुँचाता रहता | 
गाँव वाले खुश --पुराने घड़ों की जगह उन्हें नये घड़े मिलने लगे |औरतें खुश -बिना मेहनत के पानी भरे घड़े उनके घर पहुँच रहे थे |गेंदराम खुश -निशानेबाजी के शौक को जी भरकर पूरा कर रहा था |पर उसका यह शौक कुछ दिनों तक ही पूरा  हो सका |
रात -दिन के जागने से और पानी की ठंडक ने गेंदराम को बुखार ने आन दबोचा |घड़े बनाने से जो आमदनी होती थी वह कम होने लगी क्योंकि बने घड़े तो बाजार की जगह गांववालों के घरों में पहुँच जाते | 
धीरे -धीरे घड़ों पर निशाना लगाना उसका कम हो गया |एक दिन ऐसा आया जब न ही उसने किसी के घड़े पर निशाना लगाया और न छेदीलाल कहने से चिढ़ा |
औरतें परेशान हो उठीं ---
-अरे इसे क्या हो गया है --न घड़े फोड़ता है और न चिढ़ता है |हमें सारा पानी भरना पड़ रहा है |इस ढोया-ढाईसे तो हमारे कंधे दुखने लगे |
--अब वह समझ दार हो गया है --एक लड़की बोली |
-गेंदा राम हँसकर बोला --सच में मैं समझदार हो गया हूँ |
अब न मैं अपने लिए गड्ढा खोदूंगा और न ही उसमें जाकर पडूँगा |

कुछ सोचना है कुछ समझना है --
-कहानियों में बच्चों का भविष्य समाया हुआ होता है |
-अच्छी कहानी उनका मार्गदर्शक ,शिक्षक और अनुरागी मित्र होती है |
-बिना कहानियों के बचपन अधूरा है |
* * * * * *

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कहानी -गुल्लक की करामात

राखी का त्यौहार
सबको
मुबारक हो

आज राखी का त्यौहार है ।इस अवसर पर मैं एक  नई कहानी पोस्ट कर रही हूँ जिसका नाम है --

गुल्लक की करामात

तुम जरूर कहोगे राखी  पर राखी  की कहानी होनी चाहिए यह  गुल्लक कहाँ से आ गई !थोड़ा धैर्य रखो --समझ जाओगे --मैंने यही क्यों लिखी  है ।

 टीटू और छुटकी कोयलिया की माँ को अपने भाई के घर राखी बाँधने जाना था  |जाने से पहले मेज पर उनके   लिए लड्डू रख दिये पर जल्दी -जल्दी में वह कुछ कहना भूल गई |
लड्डुओं को देखते ही टीटू की आँखें चमक उठीं और शुरू कर दिया भोग लगाना ।खाते -खाते उसका मुंह भी लड्डू की तरह गोल हो गया ।कोयलिया  तिरछी नजर से देखने  लगी कि वह अब रुके ,अब रुके  --- ।जब दो ही लड्डू रह गये तो चिल्लाई 
-सब खा जायेगा या मेरे लिए भी छोड़ेगा ?
टीटू सोते से जागा--हैं --माँ तो ऐसा कुछ कह कर नहीं गई --!
--तो यह भी तो कहकर नहीं गई कि तुम सब खा लेना |मुझे भी तो भूख -- लगी है |उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे |
--ठीक है --ठीक है , टपकन बाजी  छोड़ |ये दो लड्डू बचे हैं इसी से पेट भर ले |
कुछ देर में ही उनकी माँ आगई |साथ में बहुत से उपहार भी लाई जो उनके मामा ने दिये थे |
टीटू ,अब तुम भी राखी बंधवा लो और इन्हीं में से जो उपहार कोयलिया को अच्छा लगे दे दो |
राखी तो उसने खुशी -खुशी बाँध दी मगर उपहारों के नाम अड़ गई ---


मुझे नहीं लेना इसमें से ,ये तो आपके भाई ने दिये हैं |मैं तब लूंगी जब मेरा भाई लायेगा |
--ठीक है --टीटू ये ले ५० रूपये और ले आ बाजार से |
--नहीं ! इन रुपयों का भी नहीं लूंगी
-तो मैं कहाँ से लाऊँ  रूपये --?
--मैं नहीं जानती !
कोयलिया पैर पटकती हुई कमरे से बाहर हो गई |
--माँ की भी त्यौरियां चढ़ गईं -ओह !क्या जिद लगा रखी है |आज का दिन क्या मुँह फूलाने  का है |मुझे तो हजार काम !मैं तो चली ---|
टीटू समझ नहीं पा रहा था -कोयलिया  क्या चाहती है उसका अपना तो कुछ है ही नहीं, सब  माँ -बाप का है।

अचनक दिमाग में कौंधा ---अरे है-- मेरा है --मेरी गुल्लक! वह खुशी से उछाल पड़ा |जो गुल्लक उसे जान से भी प्यारी  थी उसे टीटू ने  एक झटके में  तोड़ दिया |सारे पैसों को जेब के हवाले कर बुदबुदाया -- ऐसा सुन्दर उपहार खरीदूंगा जैसा किसी भाई ने अपनी बहन को न दिया होगा |
बाजार में बड़े -बड़े फूलों वाली फ्रोक उसे बहुत पसंद आई |जेब के सारे पैसे पलटते हुए दूकानदार से  बोला -इनके बदले वह फ्रोक दे दो |
पहले इन्हें गिनने तो दो --एक --दो --तीन ----।अरे, ये तो केवल  पाँच रूपये हैं |फ्रोक तो पचास रुपयों की है |
--पचास रूपये !टीटू उदास हो गया |पैसों को बटोर कर आगे चल दिया |
चप्पल की दुकान पर रूककर उसने उसके भी दाम पूछे | उसके बीस रूपये सुनकर  पूरी तरह निराश तो  नहीं हुआ |हां ,उसे अपने पर गुस्सा जरूर आया -यदि मैं कल दो रूपये की टाफी न खाता ,परसों पेन्सिल  न खरीदता तो और पैसा बचा सकता था और वह पैसा आज काम आता |
बाजार की खाक छानते -छानते उसने देखा -छोटे से  डिब्बे  में दो  हेयर पिन (hair pin )पड़े हैं मानो कह रहे हों  --हमें  इस कोठरी से निकालो --हम किसी के बालों की शोभा बनना चाहते हैं ।
-कोयलिया के बाल तो काले और चमकीले हैं यदि ये  पिन उसके बालों में लगा दिए जाएँ  तो बाल और भी सुन्दर  लगने लगेंगे -यह सोचकर उसने दुकानदार से कहा -मेरे पास पाँच रूपये हैं ,उनके बदले  दोनों गुलाबी  हेयर  पिन(hair pin) दे दो |
-इनकी  कीमत तो छ ;रूपये है |
-

-मेरे पास और नहीं हैं |पाँच रुपयों में ही दे दो वरना मैं अपनी बहन को राखी का उपहार नहीं दे पाऊँगा |
--तुमने तो बहुत अच्छे कपड़े पहन रखे हैं लगता नहीं कि तुम्हारे पास केवल पाँच रूपये हैं |
-मैं अपनी गुल्लक के पैसों से बहन को कुछ देना चाहता हूँ |
--यह तो तुम्हारी बचत की कमाई है |सब बहन पर खर्च कर दोगे !
--हां !उसे मैं बहुत प्यार करता हूँ |
--तब तो ये  पिन तुमको देने  ही पड़ेंगे और हां --अपनी बहन को मेरी ओर से भी राखी की मुबारकबाद देना |
-जरूर --जरूर--- कहता हुआ टीटू पिन लेकर घर की ओर उड़ चला ||

उस ने सोती हुई कोयलिया के बालों में धीरे से क्लिप लगा दिये  |कागज पर कुछ लिखा और उसे भी मोड़कर उसके सिरहाने रख दिया |दूर बैठकर वह उसके उठने का इंतजार करने लगा |
अंगडाई लेते ही कोयलिया का हाथ कागज पर पड़ा |वह फड़ -फड़ करने लगा | दोनों हेयर पिन की उस पर नजर गई |वे मटक -मटक कर गाने लगे  -

-मेरी बहन फुलझड़ी
रोये तो बिजली गिरी
हंसे तो जुगनू की लड़ी
लड़े तो झांसी की रानी
प्यार करे  तो महक उठे
बेला ,चमेली चंपा  सी
मेरे दिल की क्यारी |
कोयलिया की नींद भाग गई |लगा सिर पर कोई रेंग रहा है |उसने दोनों  हाथ ऊपर मारे  ,खट से हेयर पिन उसके हाथ में आ गए  |
-तुम कहाँ से आये ?वह हैरान थी |

हम आये हैं बाजार से
टीटू भैया लाया है
जगह -जगह वह भटका है
राखी का तोफा लाया है
जाकर उसको प्यार करो
झगड़ा उससे बंद करो ।

कोयलिया, भैया -भैया कहती टीटू की ओर दौड़ी |एक दूसरे के गले लगकर दोनों भाई -बहन स्नेह के धागों में न जाने कितने देर तक गुंथे रहे |

* *    *       *      * *
प्यारे बच्चों



तुम्हारे हाथ उसी तरह जुड़े होने  चाहिए जैसे ऊपर के चित्र में हैं ।तुम्हें एक रहस्य की बात बताएं --जिन भाई -बहन के हाथ मिले रहते हैं उनके दो हाथ दो पैर नहीं --चार हाथ -चार पैर होते हैं ।अगर यह बात समझ में न आये तो अपने मम्मी -पापा से पूछना और सबको बताना ।