प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

अंधविश्वास की दुनिया

॥7॥ भगवान भरोसे 
सुधा भार्गव 

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       बिरजू और मटरू दो दोस्त थे । एक पढ़ाकू तो दूसरा खिलाड़ी। मटरू खेल-खेल में किसी से भी भिड़ जाता। पर एक बात तय थी। दोनों की दोस्ती बड़ी गहरी थी।  
      कुछ दिनों से पढ़ाकू अनुभव कर रहा था कि उसका दोस्त पहले से भी ज्यादा खिलंदड़ हो गया है। पहले वह हमेशा गणित के सवाल उससे पूछा करता था पर अब--अब तो  खेल की बातों से ही उसे फुर्सत नहीं । एक दिन उसने पूछ ही लिया- “दोस्त तू पढ़ाई कब करता है ?लगता है रात में करता है। अच्छा है परीक्षाएँ भी पास हैं।’’
      “ऊँह! किसने कहा मैं पढ़ता हूँ? मेरी दादी रोज मंदिर जाती है। कुछ दिन पहले  उसने प्रसाद देते कहा था –बिटूआ,ले प्रसाद खाले। भगवान सब तरह से तेरा भला करेंगे। उसपर भरोसा करने से तेरी पढ़ाई की गाड़ी छुकछुक चलेगी। मैंने तो तब से परीक्षा की चिंता करना ही छोड़ दिया ।पढ़ना बंद सा ही हो गया है। हाँ, सजा के डर से मैडम का काम जरूर कर लेता हूँ।  मैं तो कहूँ तू भी रात दिन क्यों किताबों में दिमाग खपाता है। पढ़ाई  छोड़ और दादी का प्रसाद खा लिया कर। दादी का भगवान तेरी भी मदद करेगा।’’
     “मेरा भगवान भी तो है। वह हमेशा मेरे साथ रहता है।”
     “अच्छा, तेरे साथ रहता है!  फिर तू इतना पढ़ता क्यों है? वह तेरी मदद नहीं करता!”
     “करता है पर उसे मेहनत करने वाले बच्चे अच्छे लगते हैं। आलसी और लापरवाही करने वालों को छोड़कर चला जाता है। इसलिए मुझे पढ़ना ही पढ़ता है।”
     “ऊँह, तुझसे अच्छा तो दादी का भगवान है।”
     परीक्षा खतम हो गई । एक हफ्ते बाद दोनों दोस्त  परिणाम जानने के लिए स्कूल गए। बिरजू उछलता-कूदता अपना रिजल्ट कार्ड लेकर निकला पर मटरू का मुंह लटका हुआ । पढ़ाकू अपने दोस्त को उदास देख दुखी हो उठा। रूआँसा सा वह  बोला-“पढ़ाकू मैं फेल हो गया । तू मुझे अपने भगवान से मिला दे। तब मैं जरूर पास हो जाऊंगा।’’
     “वह तुझसे नहीं मिल सकता।’’
     “क्यों?
     “मैंने कहा था न ,वह मेहनत करने वालों से ही मिलता है। तू तो खेलता रहता है या लड़ता रहता है।’’
    “तू जैसा कहेगा मैं वैसा ही करूंगा। बस एक बार तेरे भगवान से मिल लूँ।’’
    “तू मन लगाकर पढ़ना शुरू कर दे। तुझे परिश्रम करता देख भगवान खुद भागे चले आएंगे।’’
    “ठीक है मैं आज से ही पढ़ाई शुरू कर दूंगा। मगर जो मेरी  समझ में नहीं आयेगा वह तुझे बताना पड़ेगा।’’
    “मैं कभी पीछे हटा हूँ क्या?’’ उसने दोस्त का हाथ थाम उसे विश्वास दिलाना चाहा।
    घर पहुँचकर उसने दादी के हाथ में अपना रिजल्ट कार्ड थमाते हुए कहा –“तुम्हारे भगवान ने मेरा कोई भला नहीं किया। मैं फेल हो गया। मैं उनसे बहुत गुस्सा हूँ। अब से मैं अपने दोस्त के भगवान के साथ रहूँगा । वे जरूर मेरी मदद करेंगे।’’
    “अरे मेरे पास दो मिनट तो बैठ बच्चे। ’’
     दादी की बात अनसुनी करते हुए ज़ोर से चिल्लाया –“ओ माँ जल्दी से खाना दे दे । मुझे अपनी किताबें ठीक-ठाक करनी है। इस वर्ष तो मुझे वे ही किताबें गले लगानी पड़ेंगी।फेल जो हो गया हूँ।’’
    “सपूत जी ,मुझे तो पहले से ही इस बात की आशंका थी। चल तुझे अकल तो आई। माँ झुँझलाते हुए बोली।
    खिलाड़ी अब दूसरा पढ़ाकू बनने लगा । बाबा को घेरकर कहता–“बाबा पहले मुझे गणित के सवाल समझा दो न और फिर अँग्रेजी भी पढ़ूँगा।’’ 
     बाबा अपने पोते में इस परिवर्तन को देख फूले न समाते।
     इस बार क्षमाई परीक्षा के रिजल्ट से तो लड़ाकू इतना खुश कि जमीन पर पैर रखना ही भूल गया। कक्षा से बाहर बड़ी उत्सुकता से अपने दोस्त का इंतजार करने लगा। पढ़ाकू को देखते ही उछल पड़ा-“दोस्त मैं पास हो गया। तेरा भगवान बहुत अच्छा है। देख न --उसने मेरी सहायता कर दी। मैं उसे धन्यवाद देना चाहता हूँ।अब तो उससे मिला दे।’’
      “भगवान तो तेरे साथ है’’
     “क्या कहा! मेरे साथ है---मुझे तो दिखाई नहीं दे रहा।’’ वह अपने दायें-बाएँ नजर दौड़ाने लगा।
     “पर वह तो देख रहा है तुझे मेहनत करता हुआ। तभी तो उसने तेरी मदद की और तू पास हो गया।’’
     “मैं तो कुछ समझा नहीं।’’ मटरू अपना सिर खुजलाने लगा।
     “अरे बुद्धू , जो अपनी सहायता खुद करते हैं भगवान उसी का साथ देता है। केवल उसके भरोसे अपनी गाड़ी छोड़ दी तो गाड़ी का चक्का फिस।
     “कभी अगाड़ी का तो कभी पिछाड़ी का।’’ मटरू ने बिरजू के सुर में सुर मिलाया।  
      
               दोनों दोस्त खिलखिलाकर हंस पड़े।
 समाप्त 



1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-09-2018) को "तीस सितम्बर" (चर्चा अंक-3110) (चर्चा अंक-3103) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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