प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 12 मार्च 2018

अंधविश्वास की दुनिया



    समय कहाँ से कहाँ चला गया। गांवों में शहरी हवा बहने लगी और शहरों में विदेशी हवा। पर अंधविश्वास की हवा बहने से नहीं रुकी। विश्वास करना अच्छी बात है पर जब विश्वास करने वाला बिना सोचे-समझे अंधमार्ग पर चल पड़े तब अंध विश्वास का जन्म होता है। मूर्ख,अनपढ़ आँख मींचकर पुराने  रीतिरिवाजों को माने यह बात तो समझ में आती है पर शिक्षित वर्ग भी अंधविश्वास की जंजीरों में जकड़ा रहे यह बात गले से नहीं उतरती। नई पीढ़ी कितनी भी चेतन व बुद्धिजीवी  हो मगर अंधविश्वास की जड़े इतनी गहरी हैं कि पैदा होते ही उनके दिलोदिमाग पर इसकी गहरी छाप होगी। इससे वे कैसे बचें हमें सोचना होगा। मैंने कुछ कहानियों के माध्यम से अंधविश्वास की दुनिया में प्रवेश करने की कोशिश की है ताकि बच्चे खुद निर्णय ले सके कि उन्हें क्या करना है।
1-रास्ता काट गई रे टिपुआ
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    स्कूल बस के आने का समय हो गया था।  टिपुआ जैसे ही अपना स्कूल बैग लेकर दरवाजे से निकला ,पीछे से आवाज आई – “बिल्ली रास्ता काट गई रे टिपुआ --- जरा रूक जा।कहीं  कुछ बुरा न  हो जाए।”
    “क्या बुरा हो जाएगा माँ ?” टिपुआ सहम सा  गया।
    “हो सकता है तेरा पेपर ही खराब हो जाय।परीक्षा के दिन हैं—सावधान तो रहना ही पड़ेगा। ”
    टिपुआ रुक तो गया पर दूर से स्कूल बस के ड्राइवर ने उसे देख लिया जो उसका ही इंतजार कर रहा था।  उसने गुस्से से हॉर्न पर हॉर्न बजाना शुरू कर दिया। पर टिपुआ वह तो  टस से मस न हुआ। ड्राइवर हैरान था , चलते-चलते इसके पैरों को क्या हो गया। बस में बैठी मैडम भी झुँझला उठी। पलक झपकते ही बस से उतरकर टिपुआ के पास जा पहुंची। हाथ खींचते हुए बोलीं-“तुम्हारे  कारण बस को देर हो रही है। तुम आते क्यों नहीं?बस छूट गई तो स्कूल कैसे पहुंचोगे। आज तो इतिहास का पेपर भी है।”
  
    मैडम के गुस्से  को देख टिपुआ एक मिनट को  सकपका गया क्या करे क्या न करे। मैडम का वह विरोध भी न कर सका। बस में वह उदास सा बैठ गया। 
    मैडम को उस पर बड़ी दया आई। बड़े प्यार से बोलीं-“ टिपुआ तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?तुम बड़े दुखी लग रहे हो।”
    टिप्पू की रुलाई फूट पड़ी-“मैडम आज मेरा पेपर जरूर खराब हो जाएगा।”
    “मगर क्यों ?”
    “माँ ने बिल्ली के रास्ता काटने पर मुझे रुकने को कहा था। यह भी कहा था कि नहीं रुका तो कुछ बुरा हो सकता है। मेरा पेपर जरूर खराब हो जाएगा अब तो मैडम।” वह सुबकने लगा।
     “ओह रोना बंद करो। अच्छे बच्चे आँसू नहीं बहाते। कुछ बुरा नहीं होगा।”
    मैडम मैडम  यह तो मेरी मम्मी भी कहती है----मेरी  मम्मी भी कहती है।आगे पीछे से आवाजें उठने लगीं।
    “अच्छा तो ऐसी बात है!बच्चो, बिल्ली के रास्ता काटने पर रुकने को क्यों कहा जाता है इसका असली कारण मैं बताती हूँ। ध्यान से सुनो।”उन्होंने ऊंचे स्वर में कहना शुरू किया।
     “बहुत पहले आज की तरह रेल हवाई जहाज नहीं थे। लोग बैलगाड़ी-ऊंटगाड़ी- घोड़ागाड़ी से यात्रा करते थे। अकेले कभी नहीं जाते थे। । झुंड बनाकर जाते थे ताकि मुसीबत आने पर उससे  मिलकर टकरा सकें। रात में घने जंगल पार करने पड़ते थे। चारों तरफ गुप्प अंधेरा। कहीं से उल्लू के बोलने की आवाज आती तो कहीं चमगादड़ उड़ती फट फट करती।शेर  की दहाड़ से कलेजा काँप उठता।इन सबसे बचते-बचाते  मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेन की हल्की सी रोशनी में आगे बढ़ते। ”
    “लालटेन से तो बहुत कम रोशनी होती है। उससे तो ठीक से दिखाई ही नहीं देता। हमारे यहाँ जब लाइट चली जाती है तो माँ लालटेन जलाती है। मैं तो बिस्तर में दुबक जाता हूँ। कोई काम ही नहीं कर पाता । न खेल सकता हूँ न पढ़ सकता हूँ। गाड़ी में बैठे-बैठे यात्रियों को तो बहुत डर लगता होगा मैडम। लिट्टू बोला।
    “हाँ डर तो लगता ही था। अक्सर उनका सामना जंगली बिल्लियों से हो जाता जो लंबी-चौड़ी और बड़ी भयानक होती थीं। उनकी चमकदार आँखें देख  गाय घोड़े और बैल भयभीत  हो उठते।  बिल्ली को जरा भी अपने आगे रास्ता पार करते देखते, यात्रियों का समूह रुक जाता और पास ही कोई सुरक्षित जगह देखकर कुछ समय के लिए पड़ाव डाल लेता। इससे उनके जानवरों को  आराम भी मिल जाता और जंगली बिल्ली उनके रास्ते से इधर उधर हो जाती। आने वाले  यात्रियों को भी चेतावनी देते कहते बिल्ली रास्ता काट गई है---रुक जाना ।
    र्धीरे धीरे लोग जंगली बिल्ली को तो भूल गए पर यह वाक्य कहना न भूले- बिल्ली रास्ता काट गई रे ---रुक जा। नतीजा यह हुआ कि घरेलू बिल्ली के रास्ता काटने पर भी लोगों ने कुछ देर रुकना शुरू  कर दिया। जबकि घरेलू बिल्ली तो घर में पाली जाती है। बहुत सीधी होती है।”
    “हाँ ,आप ठीक कह रही हो।  मेरे घर में छोटी सी भूरी पूसी है।बड़ी प्यारी है। मुझे तो उससे बिलकुल डर नहीं लगता। जब मैं स्कूल से आता हूँ तो मेरे पैरों से चिपट चिपट  जाती है। वह तो मेरा कुछ बिगाड़ ही नहीं सकती।टिल्लू ने बड़ी शान से कहा।  
   "क्यों टिपुआ, अब तो तुम्हें मालूम हो गया कि बिल्ली के रास्ता काटने पर कुछ नुकसान नहीं होता।”
टिपुआ के चेहरे की खोई रौनक लौट आई। उसके अंदर का डर जाता रहा ।  बड़े  उत्साह से बोला –“हाँ मैडम मैं समझ गया। मेरा पेपर तो बहुत अच्छा होगा।”
वह उछलता हुआ बस से उतरा और हिरण की तरह भागता हुआ स्कूल में घुस गया। 

सुधा  भार्गव  
  

शनिवार, 3 मार्च 2018

अनुराग पत्रिका में प्रकाशित बालकहानी


अंक जुलाई-सितंबर 2009


जूठा गाल/सुधा भार्गव
      
      रात भर दूधिया बादल नींद की गोद में चुप रहा !सुबह होते ही वह चंचल हो उठा और खेलने लगा सूर्य के साथ आँख मिचौनी ! सूर्य भी कभी उसके पीछे छिप जाता ,कभी हँसता हुआ निकल आता !बड़ी शान से कहता _देखो मैं फिर आ गया !बादल के रास्ते में कभी पर्वत आते कभी पेड़ , वह उन्हें झुक झुककर प्यार करता !जिन्हें प्यार नहीं कर पाता उनकी ओर हाथ हिलाकर कहता --शुभ -प्रभात !
     उड़ते -उड़ते बादल थक गया !सुस्ताने के लिए वह नीचे उतरा !वहाँ घर के चबूतरे पर एक लड़की बैठी थी १ उसका नाम हंसिका था !हंसिनी की तरह गोरी -गोरी ,लम्बी गर्दन वाली !बादल ने उसका गाल चूमा और उड़ गया !हंसिका रोने लगी ! बादल को बड़ा अचरज हुआ !वह ठहर गया ! बोला -मैंने तो तुम्हें धीरे से चूमा था !इसमें बड़े-बड़े आंसुओं को टपकाने की क्या जरुरत आन पड़ी।'
       '
तुमने मेरा गाल जूठा कर दिया !'
        '
मैंने तुम्हें खाया था क्या जो तुम जूठी हो गयी !'बादल बिगड़ गया !'
       '
हाँ ---हाँ --मैं जूठी हो गयी !मेरा गाल भी ख़राब हो जाएगा !'
       '
ये बेसिर -पैर की बातें तुम्हें किसने बताईं ?'
       '
मेरी दादी ने और किसने !वे कभी झूठ नहीं बोलती हैं !'
        
दादी ने हंसिका के रोने की आवाज सुन ली थी !वे बेचैन हो उठीं !लाठी टेकती किसी तरह अपने को संभालती आईं !उन्हें देखते ही हंसिका के रोने का ढोल और जोर से बजने लगा !'
       '
दादी माँ -----बादल ने मेरा -----गाल जू ---ठा करके रख दिया !'वह अपना गाल जोर -जोर से रगड़ने लगी जिससे वह साफ हो जाय !'
       '
यह तो मेरे पीछे बिना बात पड़ गई है !मैंने तो इसे जरा सा छुआ था !मैं अभी आपको दिखाता हूँ कैसे छुआ था !'बादल ने एक बार फिर हंसिका के गाल पर अपने होठों की छाप लगा दी !अब तो हंसिका जमीन पर लोट गयी और हाथ पैर पटककर भोंपू की आवाज अपने मुंह से निकालने लगी !
        
बादल उसके रंगढंग देखकर सकपका गया !बोला -'दादी माँ आप ही बताओ अगर इसके गाल को चूम लिया तो क्या गलती कर दी !'
        '
बच्चों के गाल बहुत कोमल होते हैं !बार -बार पप्पी लेने से वे फट जाते हैं !उनमें जलन होने लगती है !फिर क्रीम लगाकर उनको चिकना करना पड़ता है !'
        '
तब क्या हंसिका के गाल फट जायेंगे !कोई बात नहीं ,मैं इनकी सिलाई कर दूंगा।
        '
फिर तो उसको ओर परेशानी हो जायेगी !गाल सीने के लिए सुई चुभोनी पड़ेगी !सुई चुभोने से खून निकल आएगा !'
        '
ओह तब मैं क्या करूँ !'बादल ने अपना माथा पकड़ लिया !
       '
इसमें क्या है !गाल पर प्यार करना बंद कर दो !'
       '
लेकिन हंसिका बहुत प्यारी है !प्यारे बच्चे तो ,सबको अच्छे लगते हैं !मन चाहता है उन्हें गोद में ले लूँ ,बाहों में सुलाऊं और -----और गुलाबी गाल का चुम्मा ले लूँ !'
शरारती बादल अपनी गोलमटोल आंखों से हंसिका की ओर देखने लगा !
        '
देखो दादी ,यह फिर मुझे तंग करेगा !'हंसिका दादी के पीछे छिपने की कोशिश करने लगी !'
          
नादान बादल की शरारत का आनंद दादी मन ही मन ले रही थीं !वे हंसिका को नाराज भी नहीं करना चाहती थीं !बादल को समझाने के अंदाज में बोलीं -तुम्हारी ज्यादा छेड़खानी अच्छी नहीं !हंसिका तुमसे बहुत छोटी है !तुम गाल की बजाय उसके माथे को चूमकर अपनी इच्छा पूरी कर सकते हो !'
           
हंसिका को दादी की बात अच्छी नहीं लगी !उसके दिमाग में उछल कूद होने लगी -'यह बादल दूधिया क्यों लगता है !शायद इसके पेट में दूध भरा है !जैसे ही यह मेरे माथे पर बैठेगा मैं इसके पेट में नाखून चुभोकर सुराख़ कर दूंगी !दूध झर -झर बहने लगेगा !आकाश की ओर सिर उठाऊंगी तो सीधा मेरे मुहँ में जाएगा !उसको ऐसा मजा   चखाऊँगी कि फिर मुझे परेशान करने की हिम्मत नहीं करेगा !'
            '
बादल उसके मन की बात भाँप गया और सतर्क हो गया! वह हंसिका के माथे पर टिका ! स्नेह की वर्षा करके उसे भिगो दिया और पल में ही तेजी से उड़ चला ! उसके चेहरे पर मुस्कान थी !हृदय में लोगों के लिए प्यार था और मन में विश्वास था कि  प्यार  के  बदले प्यार ही मिलेगा !
                                      

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

देवपुत्र अंक नवंबर 2017 में प्रकाशित



निशानेबाज 
    एक गाँव में गेंदाराम रहता था |वह निशाना लगाने में बहुत चतुर था।  सुबह उठते ही बहुत से पत्थर बटोर लेता और कुँए की तरफ गुलेल लेकर निकल जाता।  
   उस समय लड़कियां और औरतें कुएं से पानी खींचकर घड़े भरतीं ,फिर उन्हें सिर पर उठाकर घर की ओर धीरे –धीरे कदम बढ़ातींगेंदाराम दूर से भरे घड़े पर निशाना लगाकर उन्हें फोड़ देता और खिलखिलाता----
   हा-हा हो गया छेद 
   फूट गया मटका 
   पानी टप-टपका
    ज़ोर से लगा झटका
    हा - - हा - -हा !
  
   गाँव वाले बड़े परेशान! सब उसे छेदाराम-छेदाराम कहकर चिढ़ाने  लगे। चिढ़कर तो वह और भी तेजी से घड़े फोड़ता। बच्चे-बड़े पानी के लिए तरसने लगे।
   उस गाँव में एक बार दाढ़ी वाले  साधुबाबा आये |परेशान गांववाले उनके पैरों पर गिर गये और चिल्लाये -महाराज,बचाओ ---बचाओ --इस छेदीराम ने घड़ों में छेद कर- करके  हमारा जीना हराम कर दिया है।”
   “क्यों छेदीराम !क्यों सताते हो इन लोगों  को ?साधुबाबा ने पूछा।
   “मेरा नाम छेदीराम नहीं गेंदाराम है। इन्होंने मेरा नाम बिगाड़ दिया है। मैं भी गुस्से में आकर इनके घड़ों की शक्लें बिगाड़ देता हूँ।”
   “तुम्हें जितना गुस्सा करना है करो ,जितने घड़े फोड़ने हैं  फोड़ो ,पर एक शर्त है!”
   “साधुबाबा ,आप  तो बहुत अच्छे हैं। घड़े फोड़ने को मना भी नहीं किया! आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ।”
   “सुनो,जितने घड़े तुम फोड़ोगे,उतने तुम्हें  बाजार से खरीदने होंगे। फिर उन्हें भरकर घर-घर पहुँचाओगे।”
   “यह तो मेरा चुटकियों का काम है दीये तो मुझे बनाने आते ही हैं घड़े भी बना लूंगा, फिर पानी भरने में क्या देर!वह इतराता हुआ बोला।”
   अब तो वह पेड़ की ऊंची सी डाली पर बैठकर खूब निशाना लगातारात घड़े बनाने में गुजर जाती और दिन में उन्हें भर-भरकर घर-घर पहुँचाता रहता
   गाँव वाले बड़े खुश! पुराने घड़ों की जगह उन्हें नये घड़े मिलने लगे। औरतें खुश! बिना मेहनत के पानी भरे घड़े उनके घर पहुँच रहे थे। गेंदाराम भी खुश! निशानेबाजी के शौक को जी भरकर पूरा कर रहा था। पर उसका यह शौक कुछ दिनों तक ही पूरा  हो सका।
   रात -दिन के जागने से और पानी की ठंडक ने गेंदराम को बुखार ने आन दबोचा। घड़े बनाने से जो आमदनी होती थी वह कम होने लगी क्योंकि बने-बनाए घड़े तो बाजार की जगह गांववालों के घरों में पहुँच जाते।  
   धीरे -धीरे घड़ों पर निशाना लगाना उसका कम हो गया। एक दिन ऐसा आया जब न ही उसने किसी के घड़े पर निशाना लगाया और न छेदीलाल कहने से चिढ़ा।
   औरतें परेशान हो उठीं ---। री बहना, इसे क्या हो गया है --न घड़े फोड़ता है और न चिढ़ता है।हमें सारा पानी भरना पड़ रहा है। इस ढोया-ढाई से तो हमारे कंधे दुखने लगे।”
   “अब वह समझदार हो गया है।” एक औरत  बोली।
   गेंदाराम  हँसकर बोला –“सच में मैं समझदार हो गया हूँ। अब न मैं अपने लिए गड्ढा खोदूंगा और न ही उसमें जाकर पड़ूँगा।” 

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

बालकहानी




वनभोज/सुधा भार्गव
      धनिया –पोधीना दो मित्र थे। उनके खेतों में सब्जियों की बहार थी। हरे-भरे पालक ,मेथी, बथुआ हवा के साथ लहराते रहते। लाल टमाटर सिर उठाए अठखेलियाँ करते। टमाटर- मूली -गाजर तो सब समय बतियाते और बैगन राजा उनपर हुकुम चलाते।
     सुबह ही धनिया –पोधीना ताजी-ताजी खिलखिलाती सब्जियों को सावधानी से तोड़कर टोकरी में रखते और उन्हें बेचने सब्जी बाजार चल देते। उस दिन भी बाजार ही जा रहे थे कि बादल घड़घड़ा उठे और बरसने लगे धड़-धड़ । सब्जी मंडी पहुँचते-पहुँचते पूरी तरह भीग गए। काफी समय बैठे रहे पर मुश्किल से 3-4 खरीदार ही आए।
    “धनिया ,मुझे तो लगे अब कोई न खरीदने आएगा। इन सब्जियों का  क्या होगा?पानी से बुरी तरह गीली हो गई है। जल्दी ही सड़ जाएंगी।”
    “कैसे सड़ेंगी?मैं इन्हें सड़ने ही न दूंगा। पोधीना तू तो नाहक चिंता कर रहा है।” धनिये ने बड़े इतमीनान से कहा।
    “कैसे बचाएगा इन्हें नष्ट होने से—मैं भी तो जरा सुनूँ।”
    “इसमें कहने-सुनने की क्या बात है?अपने पड़ोसियों में बाँट देंगे। जो पैसा दे दे ठीक है न दे तो भी ठीक । कम से कम किसी के पेट में तो जाएंगी।”
    “तेरी सूझ तो अच्छी है।”  
    घर पहुँचकर यह बात दोनों ने अपनी पत्नियों से कहा। धनिया  की पत्नी धन्नो  इस बात के लिए राजी नहीं हुई और बोली- “कच्ची सब्जी क्या देना। इन्हें पकाकर पड़ोसियों के घर पहुंचा दूँगी।”
    “तू अकेली कैसे करेगी मेरी धन्नो ?”
    “यह सब मुझ पर छोड़ दो। मेरी सहेलियाँ बुलाते ही मदद को दौड़ी-दौड़ी आएंगी।”
    “ठीक है तू सब्जी पकाने का इंतजाम कर । मैं और पोधीना उसे घर -घर पहुंचा देंगे।”
    पड़ोसियों को जब यह मालूम हुआ तो बहुत  खुश हुए। एक बुजुर्ग महिला बोली –“सब्जियाँ तो बनकर आ ही रही हैं,क्यों न कुछ मिलकर पूरी -पराँठे बना लें और खेतों के पास पेड़ों के नीचे बैठ सब मिलकर आनंद से खाये।”
    सबको यह सुझाव पसंद आया। दोपहर के एक बजते -बजते औरत, मर्द और बच्चे पेड़ों के नीचे इखट्टे होने लगे।रोटी-सब्जी के अलावा जो जिससे बना अपने साथ ला रहा था। कोई गन्ने के रस की खीर लाया तो कोई गुड़-आटे की बर्फी। कोई आम-नींबू का आचार तो कोई पापड़ और मसालेदार मिर्ची । चमन तो अपने खेतों से गन्ने के गन्ने ही तोड़ लाया कि भोजन के बाद इनको चूसकर दाँत मजबूत करेंगे।
    गुदगुदी हरी घास पर सबने अपना डेरा जमाया। बच्चे कहाँ बैठने वाले। उन्होंने तो पहुँचते ही हुल्लड़ मचाना शुरू कर दिया।
   
    अक्कड़ बक्कड़ बंबे  भौं
    अस्सी नब्बे पूरे सौ
    सौ पर पड़ा डाका
    डाकू निकल कर भागा।
    डाकू को पकड़ जकड़ लो  
    माफी मांगे तो छोड़ो -छोड़ो ।
  
कुछ तेजी से कबड्डी खेलने चल दिए। धूम मच गई --
   
   छल कबड्डी छल कबड्डी
   बाप तेरा बुड्ढा
   माई तेरी लंगड़ी ,
   पकड़ ले बेटा टँगड़ी।
   छल कबड्डी छल कबड्डी
   चल खेल कबड्डी ।
    
औरतें एक तरफ बैठ गईं और मर्द दूसरी तरफ। दोनों के बीच तालियों की ताल पर गूंज उठे भजन-
    
    शंकर जी भोले भाले
    गले में नाग डाले
    जटा के बाल काले
    हम पर दया करो ।
    
तभी एक छोटा सा बच्चा रोने लगा । उसकी माँ उठकर उसे मनाने लगी ---     
   
   लल्ला लल्ला लोरी
   दूध की कटोरी
   दूध में बताशा
   मुन्ना करे तमाशा
   
    कुछ देर में ही बच्चा हंसने लगा । माँ का उदास चेहरा भी गुलाब की तरह खिल गया।  
बच्चों की टोली भी खेलते खेलते थक गई थी।
 एक बोला-
    भूख लगी भूख लगी।
दूसरे शैतान लड़के ने जोड़ दिया 
    खाले बेटा मूँगफली
तीसरी आवाज आई-
    मूँगफली में दाना नहीं
चौथी आवाज हंसी
    आज से तू मेरा मामा नहीं।
     
     अनगिनत हंसी के फब्बारे छूटने लगे। साथ ही खाने के कटोरदान और डिब्बे खुलने लगे। घी और मसालों की महक से भूख और बढ़ गई। पहले बुजुर्गों और बच्चों को खिलाया गया। बाद में महिलाओं ने खाया।
    आनंद की घड़ियों में सारी दोपहरिया कैसे बीत गई पता ही न चला। पर घर तो जाना ही था--।  
     एक बोला –“भैया, इसी तरह का वृक्ष भोज अब कब होगा? मन तो किसी का भी जाने को नहीं कर रहा।”
    “दादू, अगले महीने ठीक रहेगा।”
    “हाँ रे सुक्खू, महीने में एक बार तो होना ही चाहिए। साथ - साथ खाने,उठने-बैठने ,एक दूसरे के दुख -दर्द बांटने से प्यार बढ़े ही है। मुझे तो ऐसा  लगा  जैसे कोई त्यौहार मना रहे हों।”
    तब से उस गाँव में हर माह वृक्ष भोज होने लगा। बाद में इसे वन भोज कहने लगे जो ग्रामवासियों के लिए वनमहोत्सव से कम नहीं था।  

समाप्त 

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

देवपुत्र अंक जुलाई 2017 में प्रकाशित





विश्व का सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक देवपुत्र अंक जुलाई 2017 में प्रकाशित मेरी कहानी 
आनन्द


    आज तो हमारे लिए बड़ी खुशी का दिन है। हमारे बेटे आनंद का शिशु वाटिका में दाखिला हो गया है । अरे राधा तुम किस सोच में पड़ गईं?” कुश ने कहा ।  
    “ हम दोनों के कार्यालय जाने का समय और शाला की बस के आने का समय एक ही है । दोनों के रास्ते अलग –अलग हैं । बस स्टॉप तक आनंद  को  कौन छोड़ने जाएगा । अकेला तो वह जा नहीं सकता।’’ 
    “अरे चिंता न करो, माँ जी सब सम्हाल लेंगी ।”
  “कैसे ?वे तो खुद छड़ी के सहारे चलती हैं । लगता है बच्चे के लिए एक नौकरानी रखनी पड़ेगी।  
    “हाँ ,इसके अलावा कोई चारा नहीं । पर उसके शाला जाने के पहले दिन तो छुट्टी ले लो। शायद तुम्हारी उसे जरूरत पड़ जाए।
    “कैसे ले लूँ । बैंक की नौकरी लगे एक माह ही तो हुआ है।”
    अनमने से आनंद के पिता कुश चुप हो गए।
    जल्दी ही हैपी की देखभाल के लिए चन्दा मिल गई जो उनके माली की बहन थी ।  आनंद को एक सप्ताह  बाद स्कूल जाना था पर उल्लास उसके अंग –अंग में फूट पड़ता था ।जिससे भी मिलता कहता –क्या तुम्हें मालूम हैं मैं शाला  जाने वाला हूँ । दादी के पास बैठा तो अपने सपनों का जाल बुनता रहता । दादी कहती –“बच्चे,तुझे स्कूल जाकर ,पढ़लिखकर बहुत बड़ा आदमी बनना है।” 
    “हाँ –हाँ दादी ,घबराओ नहीं ! मैं पेड़ की तरह बहुत बड़ा बनूँगा । फिर तुम मेरी  टहनियों पर बैठकर झूले की तरह झूलना।”
    “अरे बच्चे, जरा सोच तो -मैं टहनियों तक कैसे पहुँचूँगी ?”
    “ओहो ! दादी माँ देखो मैं इतना झुक जाऊंगा।” आनंद उनके पैरो को छूकर कहता।  
    दादी माँ तो निहाल हो जाती।
    “तू ओर क्या करेगा रे मेरे लिए।”
    “मैं –मैं बड़ा होकर एक बड़ी सी चिड़िया बनाऊँगा।”
    “चिड़िया !चिड़िया का मैं क्या करूंगी ?”
    “ओह सुनो तो –उस पर मेरी दादी माँ बैठकर जहां चाहेगी उड़ जाएगी फिर इस छड़ी की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
     “हा –हा –खूब कहा !वह तो  मेरा उड़नखटोला हो गया।”
    दादी –पोते की बातें खतम ही न होतीं अगर राधा आकर उन्हें न टोकती-“ आनंद ,कल तो तुम्हें स्कूल जाना है । जल्दी सोना भी है।”  
    बिना आनाकानी किए वह माँ के साथ सोने चल दिया ।
    अगले दिन राधा जल्दी उठी । बेटे को तैयार कर उसने उसकी मनपसंद के पकौड़े बनाए और टिफिन लगा दिया । इतने में चन्दा आ गई ।
    “चन्दा तू समय  पर आ गई ।शाला की बस भी आती होगी ।आनंद को छोड़ने जा।”
    आनंद ठिठक गया और लगा माँ को घूरने।
   “क्या हो गया। शाला क्यों नहीं जाता । अभी तो तू खुश नजर आ रहा था।”
    “मैं नहीं जाऊंगा।”
    “क्यों नहीं जाएगा?”
    “आप छोड़ने चलो।”
    “मैं –मैं कैसे जा सकती हूँ । मुझे कार्यालय जाना  है। देरी हो जाएगी । चंदा के साथ ही तुम्हें जाना होगा।”
    चंदा उसका हाथ पकड़े बाहर निकली और खींचती हुई ले जाने लगी । वह डरी हुई थी कि कहीं बस न छूट जाए । आनंद का शाला जाने का सारा उत्साह फीका पड़ गया । पहली बार वह इस तरह काफी देर के लिए माँ –बाप से अलग हो रहा था। चाहता था माँ से नमस्ते करते हुए बस में चढ़े और माँ उसकी चुम्बी ले। वह  अपने को किसी तरह बस की ओर घसीट रहा था ,लग रहा था मानो दोनों पैरों से 1-1 किलो के पत्थर लटक रहे हैं।  
    बस स्टॉप पर आनंद  ने देखा - कोई दोस्त अपनी माँ के साथ आ रहा है तो कोई बतियाते हुये अपने बाबा का हाथ थामे हुये हैं । उसके दिल में कुछ चुभ सा गया और उदासी की परतें गहरी हो गईं । । वह बस में बैठ तो गया लेकिन जैसे ही बस चली उसकी रुलाई फूट पड़ी ।
    बच्चों का ध्यान रखने के लिए बस में हमेशा कुंती रहती थी। उसने कुछ देर तक तो फुसलाया –“बेटा चुप हो जा शाला  में तुझे सब बहुत प्यार करेंगे।” लेकिन जब आनंद  ने चुप होने का नाम नहीं लिया तो गुर्रा पड़ी –“अरे चुप हो जा वरना अभी बस से नीचे उतार दूँगी।”
    आनंद भयभीत हो चुप तो हो गया पर स्कूल तक सिसकियां भरता रहा ।
    शाला में कुछ बच्चे माँ से अलग होने के कारण दुखी थे,कुछ नए वातावरण से घबराए हुए थे पर आनंद  तो कुछ और ही कारण उदास था।वह सोचने लगा –माँ उसे प्यार नहीं करती । इसीलिए तो वह बस तक नहीं छोडने आई। माँ की मजबूरी समझने के लायक उसकी उम्र न थी। बस उसे तो चन्दा की जगह माँ चाहिए थी ।
    कक्षा में शिक्षिका ने हँस-हँस कर नन्हें –मुन्नों का स्वागत किया । एक –दूसरे की तरफ दोस्ती के कोमल हाथ बढ्ने लगे । कुछ देर के लिए आनंद  सब कुछ भूलकर नए साथियों में मग्न हो गया ।
    टिफिन का समय होने पर आवाज लगी –बच्चों नैपकिन निकालकर अपना –अपना टिफिन खाओ। कुछ ने अपना टिफिन बॉक्स खोला ,कुछ की मदद की गई पर आनंद  गुम सा बैठा रहा । पास बैठी एक छोटी बच्ची ने अपने टिफिन में से सेव का एक टुकड़ा उठाया और आनंद की ओर बढ़ाते हुए मैना की सी आवाज में बोली-“भैया ,खा लो ,भूख लगेगी।”आनंद  ने उसके स्नेह को देख झट से मुँह खोल दिया और माँ की मीठी –मीठी याद आने लगी ।
    इतने में घंटी बज गई और आनंद  भूखा ही रह गया ।
    शाला की छुट्टी होने पर,माँ  मिलने की खुशी में बच्चों के चेहरे कमल की तरह खिले हुए थे। बस स्टॉप आने से पहले ही आनंद  माँ की एक झलक पाने को खिड़की से झाँक -झाँक कर देख रहा था । माँ की जगह चन्दा को खड़ा देख वह मन ही मन उबल पड़ा ।
    बस रुकने पर बोला –“मैं नहीं उतरूँगा।”बस की आया ने उसे जबर्दस्ती उतारा और चन्दा एक हाथ पकड़कर उसे बाहर की ओर खींचने लगी । इस खींचातानी में उसके कंधे में झटका लगा और वह दर्द से चीख पड़ा । नौकरानी ने उसे गोद में लेना चाहा पर वह तो  रोता हुआ उसके हाथों से सरककर भाग निकला । आगे –आगे आनंद  पीछे –पीछे चन्दा । बच्चे की तरह तो वह क्या भागती –हाँ भागते –भागते हाँफने जरूर लगी ।
    पोते के रोने की आवाज सुन दादी माँ तड़प उठी ।
    “दादी –दादी मेरे हाथ में बहुत दर्द हो रहा है। कहकर उससे चिपट गया मानो एक अरसे के बाद मिला हो । प्यार की गरमाई पा वह दादी के बिछौने पर भूखा ही सो गया ।
    चन्दा भी आनंद के दर्द को देख परेशान थी । उसे अपनी नौकरी खतरे में नजर आई। उस समय तो उसने जल्दी से जल्दी वहाँ से निकल जाना ठीक समझा। आनंद के माँ-पिता के आते ही बोली –“मुझे थोड़ा जल्दी घर जाना है।” 
    “ठीक है ,मैं तो आ ही गई हूँ पर कल समय से आ जाना।
    राधा की हाँ में हाँ मिलाते हुए चंदा तो वहाँ से खिसक गई ।
  कुछ देर बाद आनंद  सोकर उठा । पिता  ने प्यार से उठाना चाहा पर वह तड़प उठा –पिता जी  बहुत दर्द ---।
    राधा भागी –भागी आई –“क्या हुआ बेटा !”
    “चन्दा ने मेरा हाथ बहुत ज़ोर से खींचा । माँ तुम बस स्टॉप पर मुझे लेने आ जाती तों ऐसा नहीं होता । आप मुझे प्यार नहीं करती हो इसीलिए तो नहीं आईं। माँ ,कल मुझे छोड़ने चलोगी ---बोलो न माँ ।” आनंद  का गला भर्रा उठा ।
    बेटे के दुख से भरी आवाज सुन राधा व्याकुल हो उठी और आनंद को कलेजे से चिपकाते हुए बोली –“हाँ बेटा जरूर चलूँगी।”
    “मज़ाक करती हो !कैसे छोडने जाओगी ?अभी –अभी तो कार्यालय जाना शुरू किया है । नहीं गईं तो अधिकारी  नाराज हो जाएँगे।”आनंद  के पिता  ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली।  

    “नाराज होने दो । मुझे उसकी चिंता नहीं !चिंता है अपने आनंद की । उसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ।” वाक्य पूरा होते ही खुशियाँ घर की देहली पार कर अंदर आ गईं।