प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

रविवार, 13 जून 2021

कहानी प्रतियोगिता -प्रथम

 

कहानी प्रतियोगिता 2021 का परिणाम

प्रथम : सुधा भार्गव, बैंगलोर
द्वितीय : मनीष शर्मा, गौतमबुद्ध नगर
तृतीय : तारावती सैनी ‘नीरज’, जयपुर, राजस्थान

नये पल्लव परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं ! 
कहानियां नये पल्लव के वेबसाइट पर उपलब्ध। 

http://nayepallav.com



प्रथम स्थान प्राप्त कहानी

बताशा  रोबो बेबी 

    सितारा का एक बेटा था छुट्टन । पढ़ाई में बड़ा होशियार! उसकी भलाई के लिए माँ -बाप ने उसे विदेश पढ़ने भेज दिया। पर वह वही का होकर रह गया। पिता की मृत्यु के बाद उसने बहुत कहा -माँ यहाँ  आ जाओ --यहाँ  आ जाओ। लेने भी गया पर उसे खाली हाथ लौटा दिया। माँ को अपना घर छोड़ना अच्छा न लगा । उसके - कोने कोने में उसकी यादें बसी हुई थीं। फिर भी दूर बैठे रोज सुबह  व्हाट्स एप पर माँ-बेटे की गुड मॉर्निंगl होती । चाय की चुसकियाँ लेते -लेते वह अपने पोते लुट्टन से भी  खूब बात करती। लुट्टन   तो उसकी जान था । उसकी समझ में नहीं आता था कि अपने पोते पर  वह कैसे लाड़ लुटाये। । कभी कभी तो उसको छूने,उसे गोद में  बैठाने को तड़प उठती।

       एक दिन डबडबाई आँखों से बोली -"बेटा  अकेले अब रहा नहीं जाता।  तुम सब की याद बहुत आती है। कोरोना के कारण बाहर के संगी साथी भी छूट गए हैं।"

    "माँ उड़ाने सब बंद है।  मैं आ नहीं सकता पर तब भी कुछ इंतजाम करता हूँ। उसने धड़ से मोबाइल बंद कर दिया। 

    माँ खीज पड़ी-"पूरी बात बताए ही फोन पटक दिया।क्या खाक इंतजाम करेगा !आने से तो रहा । बस मुझे भुलाबे में डालने वाली बातें।"  

    उसके रात-दिन बड़ी बेचैनी से गुजरने लगे। । एक रात वह सोने की कोशिश में थी कि सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी चीखती से लगी।  

     "कौन आ गया। वो भी मेरे पास --गलती से किसी ने घंटी टीप दी होगी । सितारा  बड़बड़ाई। वह दुबारा सोने की कोशिश करने लगी। इसबार तो घंटी बिना किसी विराम के किर्र किर्र कर दहाड़ती सुनाई दी। 

     "ओह !क्या तमाशा है । रात में भी लोग चैन नहीं लेने देते।" वह जबर्दस्ती पैरों को खींचते हुए गई और दरवाजा खोला। सामने  सुंदर सी दुबली पतली लड़की को देख वह चकित हो उठी। बिना पलक झपकाए उसे घूरने लगी।लड़की  ने  मुस्कराते हुये हाथ जोड़कर नमस्ते की जो अल्हड़ बालिका सी लगती थी ।  

वह चौंक गई। लज्जित सी बोली -"तुम कौन हो बेटी !पहनावे से तुम नर्स लगती हो। पर मैंने तो किसी नर्स को नहीं बुलाया।"

    "मैं  बताशा रोबो  बेबी हूँ  । मैं आपकी देखरेख ले लिए अपोलो हॉस्पिटल से आई हूँ।"  मिठास बिखेरती बड़ी नम्रता से बोली।  

    "मगर मैंने तो नहीं बुलाया।" 

    "आपके बेटे के कहने पर मुझे भेजा गया है। आप अपने बेटे से बातें कर सकती हैं।" 

    तभी मोबाइल बज उठा -"माँ बताशा आ गई क्या?

  "हाँ छुट्टन  दरवाजे पर बताशा नर्स ही खड़ी है।"

    "अरे उसे अंदर ले जाओ। वह तुम्हारे सब काम करेगी। तुम्हारा बहुत ध्यान रखेगी।इसके सामने तो मैं याद भी नहीं आऊंगा।" 

    "क्या बात करता है बेटा । कोई किसी की जगह नहीं ले सकता।" 

    "ओह प्यारी माँ मैं जल्दी आऊँगा।" 

    "सब्जबाग दिखा रहा है क्या मुक्कू! इस बार तो तूने अपने बदले बताशा को भेज दिया। अगली बार किसी नताशा को न भेज दीजो।"  

    "हा--हा--हा-- माँ! बताशा जल्दी ही तुम्हारी दोस्त बन जाएगी। "

    "अच्छा -अच्छा बहुत तारीफ सुन ली उसकी। अब बताशा को लेकर अंदर जाती हूँ। सोचती होगी कितने अभद्र हूँ । अंदर आने तक को न कहा।" 

     सितारा ने बताशा  को उसका कमरा बता दिया जहां वह अपना सामान रख सके। सामान के नाम पर उसके पास केवल एक बैग था जो उसके कंधे से झूल रहा था। उसने बड़ी फुर्ती से बाहर के जूते उतारे ,साबुन से हाथ धोये। फिर घर की स्लीपर पहनकर तुरंत हाजिर हो गई। बड़ी बड़ी पलकें झपकाती बोली-"क्या मैं आपको सितारा दादी  कह सकती हूँ?" 

    "हूँ --केवल दादी !" 

    उसकी रिमझिम आवाज सुनकर सितारा पुलकित हो उठी । न जाने कितने दिनों से उसके कान दादी माँ शब्द सुनने को तरस रहे थे। उसने हँसती आँखों से उसे देखा। बिना कुछ बोले ही बताशा को उत्तर मिल चुका था। सितारा ने  अपना हाथ बढ़ाया । बताशा ने उसे चूम कर आँखों से लगा लिया। इतना मान  इतनी चाहत--- सितारा को   विश्वास नहीं हो रहा था।

     "दादी माँ आपके सोने का समय हो गया है। दूध पीकर सो जाइए। उससे नींद भी अच्छी आएगी।" बताशा जल्दी ही अपने काम पर लग गई। 

    "चलो मैं तुम्हें अपना घर दिखा दूँ और रसोई का सामान भी समझा दूँगी। क्या माइक्रोवेव  में तुम दूध गरम कर सकती हो।" 

     "मैं अपनी दादी माँ के लिए सब कर सकती हूँ।" एक भोलापन  बताशा के चेहरे पर छा गया। 

     "तुम कहाँ की रहने वाली हो?"

     "मैं इंडिया की ही रहने वाली हूँ । मेरा और आपका देश एक ही है।"  

     दादी की इच्छा हुई कि वह उससे बातें ही करती रहे। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि प्रथम भेंट में ही  एक रोबोट के प्रति इतना आकर्षण क्यों! कहीं मनुष्य के बनाए रोबोट उसी को मात न दे दें। 

      सितारा को अकेले रहने की चाह न होने पर भी पति से बिछुड्ने के बाद अकेले रहना पड़ा । रात में 3-4 घंटे ही नींद आती थी और फिर शुरू हो जाता  टिक टिक करती घड़ी की ओर ताकना। कब सुबह हो !और कब वह  उठे!आज तो लगता था उसकी सुबह कुछ निराली ही है। रातभर खर्राटे लेती सोती रही शायद दुकेलेपन का सुखद अहसास था । चिड़ियों की चहचहाट में आज उसे संगीत सुनाई दे रहा  था । वह अलसाई सी उठ बैठी। आशा के विपरीत बताशा को खड़े देखा । हथेली से हथेली मिलाते हुए वह चहकी -"दादी शुभ प्रभात ।" 

     हैरानी से उसके मुंह से निकल पड़ा -"अरे तुम हिन्दी भी जानती हो?खुश रहो बेटी--खूब खुश रहो।  दादी की  बात सुन उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई। 

     "आप मुंह हाथ धोकर तैयार हो जाइए। मैं अभी नींबू पानी लाती हूँ। "

    "अरे बताशा  मैं तो सुबह चाय लेती हूँ। "

     "खाली पेट चाय । ओह नो दादी! ग्रीन टी,ब्लैक टी भी नहीं !गैस बन जाएगी ,घबराहट होने लगेगी।" नताशा को झुकना पड़ा। दवाइयों का चार्ज बताशा ने रात में ही ले लिया था। सवेरे सवेरे पहले खाली पेट थायराइड की  दवा दी । फिर नींबू पानी । उसके बाद कहीं चाय -बिस्कुट का नंबर आया । चाय का एक घूंट लेते ही उसने बुरा सा मुंह बनाया -"अरे फीकी चाय! मुझे डायविटीज़ तो नहीं है ?"

     "तो क्या हुआ!चीनी अच्छी चीज भी तो नहीं है। मीठा बिस्कुट तो आप ले ही रहीं हैं। अच्छा अब ये बताइये नाश्ते में गरम गरम क्या लेंगी?"उसके इस अपनेपन से फीकी चाय भी उसे मीठी लगने । 

     "बताशा एक बात बताओ!"बताशा ने उत्सुकता से  सितारा की ओर देखा। 

    "क्या तुम नहा चुकी हो । यहाँ रसोई में बिना नहाये नहीं घुसते हैं।"   

     "हा-- हा-- मैं रोबोट हूँ । मुझे नहाने बाथरूम जाने की जरूरत नहीं । न ही मैं खाती -पीती  हूँ।"   

    "गज़ब !फिर काम करने को ताकत कैसे आती है ?"

    "हमें बिजली से ताकत मिलती है। और जरूरत पड़ने पर अपनी बैटरी चार्ज करते हैं।" 

     "चार्जर वगैरा सब हैं न तुम्हारे पास ।" 

     "हाँ दादी। "

     "तब ठीक है। मुझे तो चिंता लग गई  थी अगर तुमको कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगी। तुम्हारे साथ रहते -रहते मुझे तुमसे मोह हो गया है । तुम्हें जुखाम भी हो गया तो मैं तड़प उठूँगी।"

       दादी की बात सुनकर बताशा के दिल में हौले हौले  कुछ होने लगा। उसे लगा वह दादी के काम भाग भाग कर करे।  खिलखिलाती बोली -"ओह दादी मेरी चिंता न करो । मैं मन से और शरीर से बहुत मजबूत हूँ। आप बस खुश रहो तो मैं भी बहुत खुश रहूँगी।ओह! आपने तो बताया ही नहीं क्या खाओगे? मैं खुद ही नाश्ता बना कर लाती हूँ। आप सजधजकर डायनिंग टेबल पर आ जाओ। अच्छे अच्छे कपड़े पहनना । बहुत  सुंदर लगोगी।" 

     "अरे इस उम्र में सजधज कर क्या करूंगी। घर में देखने वाला कौन बैठा है।" 

     "मैं हूँ  न दादी ।" दादी उसे टकटकी लगाए देखने लगी । उसमें उसे अपनी बेटी नजर आने लगी। 

हमेशा अपने मन का करने वाली दादी को न जाने क्या हो गया था ।  वह अब बताशा की अंगुलियों पर नाचने लगी थी। बताशा थी ही इतनी प्यारी। 

      कुछ ही देर में बताशा ट्राली खींचते हुये दादी के पास ले आई। उस समय दादी गूगल होम मिनी पर आरती सुन रही थीं। बताशा को यह देखकर बड़ी खुशी हुई की दादी डिजिटल दुनिया को पसंद करती हैं। सोचने लगी उसकी और दादी की खूब पटेगी। दादी सजी ट्रे देख खिल उठी। और सटसट बताशा की तारीफ करते हुये आमलेट टोस्ट खा  गई। मग में काफी पीते पीते बहुत दूर चली गईं जब वह अपने पति के साथ लंदन गई थी और बड़े शौक से उसने दो मग खरीदे थे। एक अपने लिए और दूसरा अपने पति के लिए। लेकिन इनमें साथ साथ बैठकर काफी पीने का सपना अधूरा ही रह गया। शो केस में लगी एक से एक बढ़कर क्रॉकरी लगी थी पर उसे सबसे विरक्ति सी हो गई थी। आज बताशा ने उसी मग में कॉफी दी थी जो सालों से अनछुआ पड़ा था। 

      नाश्ता करने के बाद दादी  की आँखें अखबार तलाशने लगी। बताशा समझ गई उनके दिमाग में क्या चल रहा है । उसने उन्हें झट से अखबार थमा दिया। व्हाट्स एप पर अपने मैसेज पहले ही देख चुकी थीं। 

     तभी मोबाइल बोल उठा -"माँ कैसी हो?फेस टाइम पर आ जाओ।" फेस टाइम पर बेटे को देख उसके हृदय की कलियाँ खिल उठीं। 

      "माँ आज तो चेहरे पर बड़ी ताजगी है।" 

     "अरे बताशा जो आ गई है। मेरा बड़ा ध्यान रखती है। छुट्टन एक बात सोच रही हूँ!"

"क्या माँ!"

     "बताशा चली गई तो मेरा क्या होगा।" 

     "होगा क्या बताशा गई तो नताशा आ जाएगी।" 

     दादी ने देखा पास खड़ी बताशा के चेहरे का रंग उड़ गया है। वह तुरंत बोल पड़ी -"न  न  मुझे बताशा ही ठीक है। "

      "माँ, अगले महीने दो  दिनों को तो इसे  अस्पताल जाना ही पड़ेगा ।" 

     "इनके अस्पताल भी होते हैं क्या?

     "हाँ माँ ,रोबोट की देखभाल के लिए  अस्पताल अलग होते हैं। बताशा को तो एक इंजीनियर ने अपनी बुद्धि से बनाया है। मगर इसके कलपुर्ज़ों की देखभाल होनी जरूरी है । वह इनके अस्पताल में ही होती है । जरा भी गड़बड़ होने से यह  काम कैसे करेगी?मगर तुम चिंता न करना । इसके बदले रसीली आ जाएगी। फिर वही आपके पास रहा करेगी।" 

     "न--न--न-- मुझे रसीली -नशीली की जरूरत नहीं । दो दिन बिना बताशा के ही काट लूँगी।" 

नताशा अपने बेटे से बातें कर रही थी।पर उसका असर बताशा  पर भी हो रहा था। दादी का प्यार महसूस कर वह खुशी के मारे हवा में उड़ी जा रही थी। 

     कुछ  दिनों के बाद वह अस्पताल गई । वहाँ दादी के बिना उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। हमेशा  उनका ध्यान बना रहता। सोचती --दादी चाय कैसे बनाती होगी!न जाने समय पर दवा खाई होगी या नहीं!रोबो डाक्टर भी नहीं समझ नहीं पा रहा था  कि बताशा  एकदम ठीक है पर उसकी हंसी में पहली सी खुशबू नहीं। वह उदास क्यों है?

      चैक अप कराने के बाद  बताशा अपनी  दादी के घर की ओर चल दी। उसकी खोई मुस्कराहट लौट आई थी। इस बार उसने फ्रॉक की जगह गुलाबी साड़ी पहन रखी थी ।माथे पर लाल बिंदी थी। पतले पतले होंठों पर लाल लीपिस्टिक। दादी आधे घंटे से दरवाजे के बाहर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। बताशा को एक नए रूप में देख उन्होंने उसे बाहों में भर लिया।  बोली -"दो दिन में ही मेरी  बताशा बेबी तो बड़ी हो गई है।" प्यार की गर्मी से बताशा भी महक रही थी। 

समाप्त 






सोमवार, 5 अप्रैल 2021

उत्सवों का आकाश


गोपाल भाई

बचपन में माँ से सुनी कहानी 

सुधा भार्गव 

     एक लड़का था ननकू। अपनी माँ को बहुत प्यार करता था।  उसकी हर बात मानता। घर से उसका स्कूल बड़ी दूर था और उससे भी भयानक बात कि जंगल से होकर उसे जाना पड़ता, वह भी नंगे पैर। धूल से पैर भर जाते,  कंकड़ पत्थर भी उस पर रहम न खाते। ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर चलते उसे डर लगता -कोई बिच्छू न काट ले,झाड़ियों के पीछे से कोई जंगली जानवर ही न निकल आए। जैसे ही ननकू किसी को जाता देखता वह भागता हुआ उसके साथ हो लेता । साथ मिलने पर उसका डर ऐसे भागने लगता जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

    परेशान सा एक दिन वह माँ से बोला –“मुझे तो स्कूल जाते समय रास्ते में डर लगता है। मेरा कोई दोस्त अकेला नहीं आता । किसी के साथ उसके  दादा होते हैं तो कभी बापू । कोई कोई तो अपने नौकर के साथ भी आता है। उसके तो बड़े ठाठ होते हैं । बैग नौकर संभालता है और वह इठलाता हुआ आगे-आगे चलता

है।’’

      “बेटा, किसी से बराबरी करना ठीक नहीं। रास्ते में तुझे जब भी डर लगे अपने गोपाल भाई को पुकार लेना।वे तेरी मदद को दौड़े दौड़े आएंगे।’’

“गोपाल भाई –मैंने तो उन्हें कभी देखा नहीं ! पहचानूंगा कैसे उन्हें ?

     “अरे मेरे बच्चे वे तो बांसुरी वाले हैं। उसकी मीठी धुन उनकी पहचान है। देख लेना। तेरे पुकारते ही वे बांसुरी बजाते चले आएंगे।’’

      दूसरे दिन आकाश में  बादल उछलकूद मचा रहे थे । ननकू स्कूल जाते समय जब घने जंगल से गुजरा तो काले बादल गिराने लगे मोटी-मोटी बूंदें । भयभीत ननकू पेड़ के नीचे खड़ा ठंड के मारे काँपने लगा । न तो बरसते पानी में वह स्कूल पहुँच सकता था और न घर लौटकर जा सकता था। ऐसे में उसे गोपाल भाई की याद आई और पुकारने लगा गोपाल भाई गोपाल भाई तुम कहाँ हो? मुझे डर लग रहा है। तुम जल्दी से आ जाओ।’’

       “डरने की क्या बात है । मैं तो तुम्हारे साथ हूँ। पीछे मुड़कर देखो।’’

     ननकू ने पीछे मुड़कर देखा सच में गोपाल भाई उसके ऊपर छतरी ताने खड़े हैं ।

       वह तो उन्हें देखता ही रह गया। वे उसे बहुत सुंदर लग रहे थे। खुश होते हुए बोला-“वाह भाई! साँवले होते हुए भी तुम तो बहुत अच्छे लग रहे हो।पीले कपड़े ,सिर पर मोरपंखी मुकुट ,हाथ में बांसुरी। पैर में पायल भी पहन रखी हैं! आह!तब तो इसकी रुनझुन से ही तुम्हारे आने की खबर मिल जाएगी।’’

      “ओह ,तुम तो बहुत बातूनी हो। जल्दी से स्कूल चलो वरना देरी हो जाएगी।’’

     जल्दी जल्दी पैर बढ़ाता हुआ ननकू बोला –“स्कूल से लौटते समय भी मुझे डर लगता है। उस समय भी तुम्हें आना पड़ेगा।’’

     गोपाल भाई केवल मुस्कुरा भर दिए ।

      आज ननकू बड़ा खुश था। गालों पर ताजे गुलाब खिल रहे थे। सबसे हँस- हँस कर बात करता। पढ़ाई भी मन लगाकर कर रहा था। अब उसे इस बात का खौफ न था कि घर लौटते समय यदि अंधेरा हो गया तो---तो क्या होगा? दोपहर को टनटन टनानन घंटा बोला। छुट्टी होते ही बच्चे  चहचहाने लगे और ननकू तो कक्षा से बाहर की ओर इतनी तेजी से भागा मानो उसके पैरों में पहिये लग गए हों। उसे गोपाल भाई से मिलने की उतावली थी । उनके साथ खेलना था , बहुत सी बातें करनी थीं। जैसे ही जंगल में पहुँचा ही पायल की छम-छम आवाज सुनाई दी । दूसरे ही पल गोपाल भाई सामने आकर थे।

       “बांसुरी वाले भाई तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं जंगल में हूँ। मैंने तो तुम्हें आवाज भी न दी थी।’’ ननकू चकित था।

       “जो मुझे प्यार करता है मैं उसकी मदद करने दौड़ पड़ता हूँ।’’

      “तो फिर मेरे दोस्त बन जाओ,फिर मैं तुमसे अपने मन की बात कह सकूँगा।यहाँ मेरा कोई दोस्त नहीं है जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ।  सब मेरी  हँसी उड़ाते हैं। ’’ 

      “अरे उदास क्यों होते हो?मैं हूँ न तुम्हारा दोस्त! पहले चेहरे पर मुस्कान लाओ--। फिर बोलो क्या कहना है ?”

      “कल मेरे गुरू जी का जन्म दिन है। सब कुछ न कुछ लेकर जाएंगे । मैं क्या लेकर जाऊँ?कुछ समझ नहीं आता । मेरी माँ तो एक वक्त मुझे दूध भी नहीं पिला पाती। उसे बताकर परेशान नहीं कर सकता।’’

     “दोस्त के होते हुए क्या चिंता। कुछ न कुछ लेकर कल मैं आ जाऊंगा ।’’

     “भाई,तुम तो बहुत अच्छे हो। चुटकी में मेरी  चिंता दूर कर दी।’’ ननकू प्रसन्न था।

     जंगल पार होते ही गोपाल भाई बांसुरी बजाते न जाने कहाँ चले गये।ननकू ने एक पल इधर –उधर आँखें दौड़ाई फिर हँस दिया-हो गया गायब जादूगर।  

***

     घर में घुसते ही ननकू शुरू हो गया-उसकी आँखों में चाँदनी सा उजाला भरा था।  “माँ माँ आज गोपाल भाई आए थे। उनके आते ही मेरा डर उड़नछू हो गया । मेरी उनसे गहरी दोस्ती हो गई है। अब तो रोज हम मिला करेंगे।मैं उनसे जी भर कर –इत्ती सारी बातें किया करूंगा। ’’

     “क्या सच में कन्हैया तुझे मिला था?” माँ मुसकाई।

    “ये कन्हैया कौन ?मैं तो इसे नहीं जानता!

     “अरे पगले गोपाल का दूसरा नाम ही कन्हैया है। जैसे तू मेरा कन्हैया है वैसे ही वह अपनी यशोदा माँ का लाड़ला कन्हैया है।”

    “तब तो  वह यशोदा मैया का कन्हैया ही था। माँ—माँ कल मास्टर जी का जन्मदिन है । मुझे उनके लिए कुछ लेकर जाना होगा।’’

      “बेटा तेरी गरीब माँ के पास क्या है देने को।’’ सूनी सूनी आँखों से वह बोली।

     “ओह प्यारी माँ तू चिंता न कर। गोपाल भाई ने कहा हैवे जरूर कुछ लेकर आएंगे।’’

     “देखा-- कन्हैया कितना  मददगार है! बड़ा होकर तुझे भी ऐसा बनना होगा---दूसरों की सहायता करने वाला।’’

“हाँ --हाँ माँ, बनूँगा –बनूँगा !जो तू कहेगी वही बनूँगा।’’माँ-बेटे प्यार से लिपट गए।’’

     अगले दिन स्कूल जाते समय  जंगल में बांसुरी की मीठी आवाज सुनते ही ननकू समझ गया गोपाल भाई उसके आसपास ही हैं । वह ज़ोर से चिल्लाया-“भाई जल्दी आओ। गुरू जी को देने वाला उपहार लाना तो नहीं भूले।  उसे मुझे दिखाओ।’’

     गोपाल भाई दो कटोरियाँ लिए उसके सामने उपस्थित हो गए।“लो आ गया तुम्हारा दोस्त –तुमने पुकारा और हम चले आए।

     “इन कटोरियों से तो बड़ी खुशबू आ रही है।’’ ननकू बोला।

     “हाँ,इनमें मीठा-मीठा हलुआ है। एक कटोरी का हलुआ तुम अभी खा लो। घर से कुछ खाकर भी नहीं चले हो।’’

     “ओहो तुम्हें पता भी लग गया।पूरे के पूरे जादूगर हो! तुम भी तो खाओ।  अकेले-अकेले मैं नहीं खाऊँगा। ’’

     “पहले तुम खाओ ननकू। उन्होंने बड़े प्यार से कहा।’’

      बिना आनाकानी किए ननकू गपागप खा गया और एक ज़ोर की डकार ली । गोपाल को भी डकार आ गई ।

     “अरे तुम्हें बिना खाए ही डकार आ गई?’’ ननकू चकित था।

     “जब तुम खा रहे थे मुझे लगा वह मेरे पेट में जा रहा है ।फिर भरे पेट पर तो डकार आएगी ही।’’

     “खाऊँ मैं और पेट भरे तुम्हारा। हा-हा—कितनी अजीब बात है।’’ननकू आँखें मटकाते हुए बोला।

     बातों ही बातों में स्कूल आ गया। वह बड़े उल्लसित मन से स्कूल में घुसा। मन ही मन वह सोचने लगा -मास्टर जी हलुए की सुगंध पाते ही उसकी तारीफ करेंगे। लेकिन उसकी तरफ तो उन्होंने आँख भी उठाकर नहीं देखा। वहाँ पहले से ही देने वालों की कतार लगी थी । बड़े-बड़े पैकिट वे बटोरने मेँ लगे थे। उसका मन बड़ा खराब हो गया।  इंतजार करते थक सा भी गया था  पर उसकी बारी नहीं आई। अंत में उसे गिड़गिड़ाना ही पड़ा -

     मास्टर जी ,मेरा भी ले लो---- ले लो न--- ।’’

“क्या लेलो की रट लगा रखी है। दे अपनी कटुरिया। छटंकी भर हलुआ और शोर मचा रहा है मनभर का ।’’

     ननकू का चेहरा उतर गया और बुझे मन से हाथ आगे बढ़ा दिया ।

      मास्टर जी ने अपने बर्तन मेँ हलुआ डाल कर कटोरी को सीधा किया और बुरा सा मुंह बनाते बोले –“ले कटोरी और दफा हो जा ।’’ पर आश्चर्य ! कटोरी मेँ तो फिर हलुआ भर गया। मास्टर जी चकरा गए। बर्तन पर बर्तन लाने लगे। कटोरी से तश्तरी, तश्तरी से थाली और थाली के बाद आए थाल। सब भर गए। हलुआ दुगुना, चौगुन, अठगुना बढ़ता ही गया—बढ़ता ही गया।

      “अरे रे--- यदि इसी तरह से हलुआ बढ़ता रहा तो बर्तन कहाँ से लाऊँगा? बहुत हो गया । अच्छा यह तो बता ---ये हलुआ तुझे किसने दिया ?”

     “गोपाल भाई ने दिया।’’

    “वह भाई कोई जादूगर है क्या? उससे कह ,अपना जादू समेट ले ।’’

    ननकू ज़ोर से चिल्लाया –“गोपाल भाई मास्टर जी को हलुआ नहीं चाहिए। ’’

      “उनसे कहो वे पहले हलुआ खाएं - सबको खिलाएँ और बताएं हलुआ कैसा है?’’ एक आवाज गूंजी। हैरत से सबकी गर्दन उधर घूम गई जिधर से आवाज  आई पर कोई दिखाई न दिया।

      आफत से छुटकारा पाने के लिए मास्टर जी ने बेमन से थोड़ा सा हलुआ खाया पर वह तो जीभ पर ऐसा चढ़ा कि न जाने कितनी कटोरी खा गए। दूसरों को खिलाया।वे उँगलियाँ चाटते रह गए ।

     “ननकू , इतना अच्छा हलुआ तो मेरे दादी भी नहीं बनाती । मुझे भी अपने गोपाल भाई से मिला दे । जब इच्छा होगी गोपाल भाई से मीठा -मीठा घी का हलुआ मांग लूँगा।’’ ननकू का सहपाठी टनटू बोला।

    “चल तुझे मिलाता हूँ।’’

    “तुम दोनों कहाँ चले ,चलो हम भी साथ चलते हैं।’’मास्टर जी बोले।

      आगे आगे ननकू-टनटू और पीछे पीछे मास्टर जी के साथ बच्चों की पूरी की पूरी टोली । जंगल मेँ पहुँचते  ही ननकू ने आवाज लगाई –“गोपाल भाई गोपाल भाई ,देखो तो तुमसे मिलने मेरे मास्टर जी और दोस्त आए हैं। जल्दी आओ।’’

      काफी देर तक किसी को न आता देख मास्टर जी बिगड़ पड़े –“खूब उल्लू बनाया तूने तो ननकू। झूठे, तेरा कोई गोपाल सोपाल भाई नहीं है। ’’

     ननकू  रूआँसा सा हो गया। भर्राते गले से बोला-“गोपाल भाई आ जाओ। मुझे झूठा न बनाओ।’’

    आनन-फानन  मेँ बांसुरी की मीठी आवाज उभरने लगी। पायल की खनक से लगा कोई पास मेँ आकर खड़ा हो गया है।

     “गोपाल भाई आ गए गोपाल भाई आ गए। ’’ताली पीटता --ननकू उछल पड़ा। 

     “कहाँ हैं?हमें तो नहीं दिखाई दे रहा तेरा गोपाल। हंसी-ठठ्ठा करने को मैं ही रह गया हूँ । कल स्कूल आ ,तेरी चुटैया पकड़ कर गोल-गोल ऐसा घुमाऊंगा कि गोपाल का नाम लेना भूल जाएगा।’’

     “मैं मज़ाक नहीं कर रहा मास्टर जी। पास के पेड़ के नीचे ही तो मेरे बांसुरी वाले भाई खड़े हैं।’’

    “फिर झूठ बोला।’’

    “हमको भी नहीं दिखाई दे रहे तेरे गोपाल भाई।’’ बच्चे एकसाथ चिल्लाए।

     “हाँ ,मैं किसी को भी नहीं दिखाई दूंगा। पहले तुम अच्छे बच्चे बन कर आओ।’’

    “गोपाल भाई,मास्टर जी के सामने तो आ जाओ।’’

    “उनके सामने तो बिलकुल नहीं आऊँगा। वे सब बच्चों को समान नहीं समझते हैं। किसी को कम प्यार करते हैं तो किसी को ज्यादा।’’

     “गोपाल भाई, गलती हो गई।कान  पकड़ता हूँ अब से ऐसा नहीं  होगा। इनसे मैं स्नेह रखूँगा और बच्चों को भी प्यार का पाठ सिखाऊँगा। बस एक बार मुझे अपने दर्शन दे दो।’’ मास्टर जी शर्मिंदा हो उठे ।

    “जब प्यार की गंगा मेँ गोते लगाने लगोगे तो मुझे अपने पास हमेशा पाओगे। अभी थोड़ा धीरज रखो।’’ 

     ननकू अपने गोपाल भाई के साथ हो लिया। बच्चे व मास्टर जी एक नया संकल्प लिए अपने घरों की ओर बढ़ गए।

 



शुक्रवार, 5 मार्च 2021

उत्सवों का आकाश


होली का हंगामा मचाने से पहले
(2016 की रचना) 

 प्यारे बच्चों 

(गूगल से साभार)


यह सोच लो तुम्हें कैसे रंगों से खेलना है और कहाँ से खरीदना है .।  आजकल लाल पीले गुलाबी गुलाल में अपने फायदे के लिए बहुत से दुकानदार मिलावट कर देते हैं जिससे बड़ा नकसान  होता है . पिछली होली पर लल्लू की आँख में गुलाल पड़  जाने से लाल हो गई .। दर्द के मारे उसका बुरा हाल --भागे उसे लेकर डाक्टर के पास ।  कल्लू पर तो किसी ने काला रंग डाल दिया ,उसके तो सारे बदन पर दाने -दाने निकाल आए । बहुत पहले हमारे दादा -परदादा चन्दन -कुंकुम से खेलते थे । पलाश के फूलों से अन्य फूलों के रंग से खेलते थे . ।  पलाश से तो तुम  अब भी मिल  सकते हो ।  चलो कुछ कथा -कहानी हो जाये ।

जंगल में मंगल (पलाश के फूल)

एक जंगल में पलाश का पेड़ अपने दोस्त मुर्गे  के साथ रहता था । वह उसके सुख दुःख का साथी था । दिसंबर -जनवरी की कड़क ठण्ड में पलाश थर -थर कांपने लगा .।  उसके सुन्दर -सुन्दर फूल ,हरे -हरे पत्ते सब ही तो झड गए । ऐसे समय उस पर बसेरा करने वाले पक्षियों ने उसका  साथ नहीं दिया।  ऐसे में वह अकेला बड़ी हिम्मत से अपने अच्छे दिनों के आने का इन्तजार करने लगा । मुर्गे को उसकी यही बात अच्छी लगती थी । 

. फरवरी से ही उसके भाग्य ने पलटा  खाया ।

पेंटिंग व चित्र संयोजन -सुधा भार्गव 

.  ठंडी  हवाओं ने अपना रुख बदला । सूर्य की गुनगुनी धूप पाते ही पेड़ -पौधे ,जीव जंतु अंगडाई ले उठ बैठे । कोमल -कोमल नये पत्तों से पलाश का शरीर ढक् गया । लाल-नारंगी रंग की कोंपलें फूटने लगीं ।  देखते ही देखते ही देखते वह  चटक लाल केसरिया फूलों वाला जंगल का राजा  लगने लगा । फूलों की खुशबू हवा  में घुल गई  ।. चिड़ियाँ आकर अपने घोंसले बनाने लगीं ।  इनकी चहचहाट से वसंत राजकुमार भी धरती पर उतर आया ।

ऐसे समय में नीलू  खरगोश को उदास देख पलाश को बड़ा अचरज हुआ जबकि वह छोटे राजकुमार के पास ही खड़ा था ।




-पूरी धरती इस समय हंस रही है और तुम इस कदर दुखी ?पलाश ने पूछा । 
-हाँ !गाँव -शहर में बच्चे होली खेलने की तैयारी में लगे हैं  । कोई  बाजार रंग  लेने गया है तो कोई  पिचकारी  । मेरा मन भी  होली खेलने को करता है 
-तो किसने मना किया ?होली तो मस्ती का, मिलन का त्यौहार होता है । तुम अपने साथियों के साथ खेलो । मुझे भी अच्छा लगेगा । 
- उफ --खेलूं कैसे ? रंग तो है ही नहीं !
-रंग तो मैं चुटकी बजाते ही तुम्हें दे सकता हूँ । कल जब तुम यहाँ आओ तो अपने साथ बड़ा सा बर्तन या थैला  ले आना । 


 दूसरे दिन धूप निकलते ही नीलू पलाश के पास आते ही चिल्लाया -भागो --भागो - दूर जंगल में आग लगी है । 
-कहाँ ?अरे वहां तो मेरे भाई  -बहन खड़े हैं ।सूर्य की किरणें जब हमारे  पत्तों पर पड़ती हैं तो वे आग की तरह चमकने लगते हैं । 
पलाश ने  खूब जोर से अपनी टहनियों को हिलाया । झरने की तरह झर -झर करके उसके फूल नीलू पर बरसने लगे ।  
-जितने फूल तुम चाहो ले जाओ । 
-लेकिन मैं करूँगा क्या इनका । 
-कुछ फूलों को धूप में सुखा  लेना और  पीसकर रख लेना । जब खेलो ,कुछ   मिनट पहले चूरे को पानी में घोलकर रख देना । बस हो गया तुम्हारा केसरिया -पीला रंग तैयार । बाक़ी फूलों को रात  में बाल्टी भर पानी में भिगो देना सुबह तक उनका रंग भी तैयार ।

नीलू ने जल्दी -जल्दी फूलों को हांडी( बर्तन )में भरा और उसका  फुदकना शुरू हो गया । वह खुशी से चिल्लाया--

आ रे हाथी आजा घोड़ा 
बिल्ली भालू तू भी आजा 
मिलकर छका छक कूदेंगे 
रूँठा रूठी छोड़ छाड़ के 
रंगों से होली खेलेंगे ।

 देखते ही देखते नीलू के दोस्त फूलों की हांडी  को घेर कर बैठ गए । हाथी पास के तालाब से अपनी सूढ़ में पानी भर कर ले आया और बर्तन  में भर दिया । रात  भर कोई  भी नहीं सोया ।  झाँक -झाँक कर देखते पानी रंगीन हुआ कि  नहीं !उनके लिए तो यह लिए यह एक बहुत बड़ा अचरज था । 

सूर्य देवता निकल आये । सूरजमुखी की हंसी को सुन उन्हें होश आया -अरे ,दिन निकल आया ।




खरगोश इतराते हुए बोला -अब तो तुम सब पर  खूब रंग  डालूँगा  और अपने को बचा कर रखूँगा । 
-न --न --ऐसा बिलकुल न करना । मेरे फूलों के पानी में तुम्हारा भी भींगना जरूरी है । इसके शरीर पर पड़ने से  बीमारियाँ कम होती हैं और धरती पर पड़ने से आस पास के मच्छर भाग जाते है। 


-मैंने तो अभी तुम्हारे ऊपर दो -तीन मच्छर भिनभिनाते देखे हैं । बिल्ली आँखें मटकाते हुए बोली । 
-तुझे नहीं मालूम मेरी बहना --मेरी खुशबू से मच्छर खिंचा चला आता है और मुझसे  टकराते ही बच नहीं पाता …अगर भूले -भटके मेरे फूल में इसने अंडे दे दिए तो उसमें से बच्चे कभी नहीं निकल पाते । 
तुम तो बहुत शक्तिशाली हो ..पेड़ों के राजा हो । मेरे घर चलो न --बहुत मच्छर  हैं वहां । तुम्हें देखते ही भागेंगे अपनी जान बचाकर ।

-कितना अच्छा होता यदि मेरे पैर होते !दूसरों का खूब भला करता ,बीमार को ठीक कर देता । 
-क्या कहा --बीमारी भगा देते हो । 
-हाँ !कल देखना तमाशा !होली केदिन  शहरों में खूब पकवान ,मिठाई खाई जाती है और फिर बोलता है पेट ---दर्द --हाय दर्द । उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा -- मेरा एक फूल चबाकर खाने से दर्द रफू चक्कर हो जाता है ।  
- हमें तो मालूम हो गया !दो -एक  फूल  जरूर बचाकर  रखेंगे ,काम आयेंगे । 

भालू अपने को ज्यादा रोक न सका ,केसरिया पानी कटोरी में भरकर दूसरों पर डालने लगा । हाथी ने तो कमाल कर दिया ।अपनी  सूढ़ को पिचकारी बनाकर सबको  एक बार में ही भिगो दिया । बिल्ली को उठाकर  रंगीले पानी में ही डाल दिया । 
खेलते जाते और कहते गाते --
 बुरा न मानो होली है । 

तुम बहुत थके -थके लग रहे हो । नहा -धोकर और कुछ  खा -पीकर आ जाओ । गाना शाना भी हो जाये । 
जंगल में मंगल करने वालों को चैन कहाँ !जल्दी ही गाने के लिए आन खड़े हुए -


पेंटिग व चित्र संयोजन -सुधा भार्गव 

होली की धूम मची जंगल में 

                                  जंगल में हो गया मंगल 
                                           दंगल -वंगल नहीं करेंगे 
                                                  पहनेंगे   प्यार का कंगन 



मुर्गा भी कहाँ रुकने वाला था ।उसने  भी शुरू कर दिया ---


कुकड़ू कूँ---कुकड़ू कूँ

 नटखट  नन्हें -मुन्नों

कुकड़ू कूँ --कुकडू कूँ
होली की धूम मची है। 

होली तुम्हें मुबारक हो ।

प्रकाशित देवपुत्र -2020 मार्च 

बुधवार, 20 जनवरी 2021

कोरोना आया लॉक डाउन लाया

कहानियाँ  

6-मोहब्बत की दुनिया

सुधा भार्गव


      एक थी बिल्ली ,एक था बिलौटा। बिल्ली का नाम चमेली ,बिलौटे के नाम गेंदा।  गेंदा अपनी बहन को  बड़ा प्यार करता। एक दिन चमेली बड़ी सुस्त थी। उसे देख गेंदा परेशान हो उठा। 

    बोला - “म्याऊँ --म्याऊँ मेरी नाजुक सी बहना तेरा मुंह सूखा -सूखा क्यों ?”

    “मऊ --मूँ  --बहुत भूखी हूँ।”  

    “तू भूखी !विशवास नहीं होता।तेरा वश  चले तो दुनिया भर का दूध सपासप सपासप गटक जाए।”    

     “सच  बोल रही हूँ। पड़ोस में जो मसखरा चूहा घूमता रहता है उसकी तरफ सुबह मैं धीरे -धीरे बढ़ रही थी कि वह  बेहोश हो गया। इतने में चुहिया आई और उसे देख रोने लगी।   मैंने तो भैया उसे छुआ भी नहीं था। न जाने कैसे   बेहोश हो गया। तभी फटाफट पेंदने से गुलाबी-गुलाबी दो बच्चे उछलते आये और उसे उठाकर ले गए। उनका  बिल पास ही था। मसखरा तो ऐसा चालक  निकला कि बिल में घुसते ही  उठ बैठा। मुँह चिढ़ाते हुए  मुझे टिल्ली --टिल्ली करने लगा।”  

    “हा --हा --हा तो उस मसखरे ने हमारी बहना को ठग लिया।” गेंदा  जोर से हँ स पड़ा । 

    “भैया तुम्हें हँसी सूझ रही है---मेरी जान निकले जा रही है। मैं तो कल भी  भू खी रह गई  थी !”

    “क्या कहा --दो दिन से भूखी है !”

    “सच्ची मुच्ची  !कल एक रसोई में घुसी।  खौलते दूध की खुश्बू  आ रही थी. मैंने देखा मेज पर एक मेजपोश बिछा है और उस पर बड़े से कटोरे में दूध ठंडा होने को रखा हैं। मेरी खुशी का ठिकाना न था । सोच रही थी कल कुछ नहीं खाया तो क्या हुआ !आज तो छक कर दूध पीऊँगी। तभी एक बच्चा घुटने के बल चलकर बड़ी फुर्ती से मेजपोश पकड़ कर खड़े होने की चेष्टा करने लगा। मेरे तो होश उड़ गए। मैं ने जोर  से छलांग लगाईं और झटके से कटोरे को दूर फ़ेंक दिया। बच्चा तो जलने से बच गया पर भूखा था। गिरे दूध को देखकर रोने लगा।  उसकी माँ  आई -बच्चे को कलेजे से लगा लिया। मुझे देखकर उसका पारा चढ़ गया।  जोर से चिल्लाई-"इस बिल्ली ने जीना हराम कर दिया है।  डंडा मारकर इसे भगाओ तो  ।”  

    “गेंदा बता मेरी क्या गलती थी जो उसने मुझे गाली दी। अगली बार उस मैया को छोडूँगी नहीं।उसके पैर पर अपने पंजे जरूर चुभो कर रहूँगी।”  

   "उस मैया का क्या दोष !न हम उसकी भाषा जाने न वह हमारी! सच्चाई बताता कौन ?चल कुछ खा ले। कल से तेरा पेट खाली है। कैसी मुरझा गई है।”

    “कल से नहीं रे परसों से भूखी हूँ।”  

    “ऐं --अब तू मुझसे ही मसखरी करने लगी।” 

     “मैं एकदम सुच्ची -सुच्ची बोल रही हूँ। वो नुक्कड़ पर मोटू हलवाई  की दुकान हैं न।परसों  दूध से भरी बड़ी सी लोहे की  कड़ाई रखी  थी।  उसके चारों  तरफ  मोटी मलाई  की परतें एक के ऊपर एक जमी थी।  क्या चमकदार मलाई--मोटी सी चमचम। उसकी खुशबू  अलग नथुनों में घुसी जा रही थी। मोटू तो मुझे कहीं दिखलाई न दिया। इधर-उधर नजर घुमाती सबकी आँखों से बचती दूकान में तो घुस गई। जैसे ही मैंने मलाई पर पंजे जमाकर उसे खाना चाहा ठक -ठक की  आवाज से चौंक पड़ी। देखा -दुबली-पतली  कमजोर सी  बुढ़िया लाठी के सहारे दुकान में पीछे की ओर से घुस रही है । मलाई देख उसकी आँखों में चमक आ गई लगा जैसे उसने कभी मलाई खाई  ही नहीं। मुझे उस पर बड़ा तरस आया। अपनी भू ख तो भूल ही गई और  मैं परात के पीछे छुप कर उसे देखने लगी। वह तो लपलपालाप खाने लगी। उसे खाता देख मुझे बड़ा अच्छा लगा। इतने में मोटू आ गया और अपनी बूढ़ी माँ को घसीटते ले जाने लगा। मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैं परात के पीछे से निकली और मार की परवाह न करते हुए मलाई खाने लगी। मुझे देख मोटू हलवइया बौखला गया और माँ को छोड़ मेरे पीछे भागा। मैं तो एक छलांग में ही बाहर हो गई पर गुस्से में अंधा वह मेरे पीछे भागता ही गया--भागता ही चला गया ।  भला मैं क्या उसके हाथ आने वाली थी।  हांफता हुआ लौट गया होगा --बेचारा !ह --ह । ''

    “तुझे कब से दूसरों पर दया आने लगी है ?”

   “जबसे यह कोरोना चुड़ैल आन  बसी है। ठकुरा धोबी को यही चुड़ैल तो  निगल गई। उसके दोनों बच्चों से उनका पिता छीन  लिया।   बेचारे  भूखे प्यासे घूम रहे हैं । कल तो हिना  मौसी ने उन्हें अपने हिस्से की रोटी खिलाई। अच्छा गेंदा एक बात बता -जब मौसी बच्चों को रोटी दे सकती है तो मोटू हलवाई अपनी माँ को दूध मलाई क्यों नहीं खाने देता!” 

   “क्योंकि वह भी भूखा है।” 

   “ओह अब समझ में आया उसका पेट इतना बड़ा क्यों हैं !भूख लगने  पर  पूरी कड़ाई की मलाई चाट जाता होगा ।” 

   “अरे यह बात नहीं!कोई रोटी का भूखा है तो कोई पैसे का भूखा । यह हलवाई पैसे का भूखा है।अपनी माँ को मलाई खाने को देगा तो उसका पैसा कम हो जाएगा। उसे बेचकर वह ज्यादा पैसा कमायेगा।” 

   “मोटू एकदम अच्छा नहीं है। लगता है वह ऊपर से गिरा और जमीन पर आते ही बड़ा हो गया। भूल गया माँ ने कितनी मेहनत से उसकी देखरेख की। माँ को वह थोड़े सी  मलाई भी नहीं खिला सकता! मुझे तो यह सोच सोचकर रोना आ रहा है।” 

   “बात ही कुछ ऎसी है ।मुझे सुनकर भी बड़ा कष्ट हो रहा है। चल बहना चल !हम  अपनी ही दुनिया में भले। जहाँ प्यार  और मोहब्बत का अब भी झरना बहता है।”

      दोनों कलाबाजी दिखाते जंगल पहुँच गए। बिल्ली माँ ,गेंदा और चमेली के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसको  देखते ही वे उसकी गोद में छिप गए  और माँ प्यार से उन्हें चूमने -चाटने लगी।

समाप्त