प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

शिक्षक दिवस भी और कहानी बालगुरू भी



बच्चो 

५सितम्बर को तुम्हारे स्कूल में बड़ी धूम धाम से शिक्षक दिवस मनाया जाएगा और मनाया भी क्यों न जाए  --उसदिन तो जन -जन के प्रिय डा॰राधा कृष्णन का जन्म दिन भी है . इस दिवस के आने से पहले इनके बारे में कुछ बातें जानना जरूरी है .। ये हमारे देश का गौरव हैं।  

















डा॰राधा कृष्णन का बचपन -
साधारण बच्चों की तरह न था ।  बचपन से ही उनकी बुद्धि बड़ी तीव्र थी . इनके दिमाग में ऐसी बातें आती थीं कि  सुनने वाला आश्चर्य में पड़  जाए।     
इनके बाल्यवस्था की एक घटना तुम्हें बताती हूँ  ---
 यह घटना उन दिनों की है जब वे मद्रास के एक मिशनरी स्कूल में पढ़ते थे ।उनके  ईसाई अध्यापक बहुत ही संकीर्ण विचारों  के थे । एक दिन वे पढ़ते -पढ़ाते बोले -हिन्दू धर्म अंधविश्वास और रुढ़िवादी विचारों पर टिका है ।
 बालक राधा कृष्णन  निधड़क होकर बोले -सर क्या ईसाई धर्म दूसरे धर्मों की बुराई करने में विशवास करता है । अध्यापक कब हार मानने वाले थे । वे तपाक से बोले -हिन्दू धर्म भी तो दूसरे धर्म का सम्मान नहीं करता !
-सर यह  एकदम गलत है । गीत़ा  में भगवान् कृष्ण ने कहा है कि  पूजा के अनेक मार्ग हैं । हर मार्ग का एक ही लक्ष्य है -समानता ,एकता व प्रेम । क्या इस भावना में सब धर्मों को स्थान नहीं मिलता !एक सच्चा धार्मिक ब्यक्ति वही है जो सभी धर्मों का आदर करे और उनकी अच्छी बातों  को अपनाए।
 अध्यापक एक बालक के मुंह  से इतनी गंभीर बातें  सुनकर हैरान थे .।    

 अपने देश अपनी संस्कृति को प्यार करनेवाला यही  बालक  बड़ा होकर ---

 सर्व पल्ली डा. राधा कृष्णनन कहलाये और सन 1952 मेँ भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति चुने गए और देश की सेवा करते हुए विश्व में अपने यश का झंडा गाड़  दिया । 


भारत के प्रथम प्रधान मंत्री प . जवाहर लाल नेहरू
भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति डा राधा कृष्णन


वे स्वतंत्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी मनोनीत किये गए  (1962-1967)।भारतीय इतने योग्य व शिक्षित राष्ट्रीय  कर्णधार को पाकर धन्य हो उठे ।  

डा राधाकृष्णन  अपने अंगरक्षकों व विशिष्ट नेताओं के साथ 

वे जब राष्ट्रपति बने तो उनके कुछ छात्रों और मित्रों ने प्रार्थना  कि उनके जन्मदिन 5 सितंबर को मनाने की इजाजत दी जाए ।
-मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय 5सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप मेँ मनाया जायतो मुझे ज्यादा अच्छा लगेगा ।वे बोले । 
बस तभी से ------
शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा । वे एक आदर्श शिक्षक थे . उनका विशवास था कि नई पीढी देश को सभांलेगी और उसका  मार्ग दर्शन करना शिक्षकों के हाथ में है। दोनों का एक दूसरे को समझना बहुत आवश्यक है .।  




शिक्षक दिवस के दिन --

 शिक्षकों के महत्त्व को स्वीकारते हुए योग्य अध्यापको को  सम्मानित किया जाता है


भारतरत्न राधा कृष्णन को लंदन स्थित आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी मेँ भाषण देने बुलाया जाता था ।वे भाषण देने की कला मेँ प्रवीण थे ।

आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी  

आक्सफोर्ड की ओर से उनके सम्मान मेँ भारतीय  छात्रों को राधा कृष्णन छात्रवृति प्रदान की जाती है ।

वे आज हमारे बीच नहीं हैं तो क्या हुआ पर उनके आदर्श ----हमारे साथ हैं  जो शिक्षकों व छात्रों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं । 

स्मृति में श्रद्धा के दो फूल 


ठीक  ही कहा गया है ---
एक अकेला दीपक सैकड़ों और दीपों को प्रकाश दे सकता है ।ठीक उसी प्रकार एक ज्ञानी बहुतों को ज्ञान दे अकता है ।बहुत से दीप जलाने के बाद भी उस दीप के प्रकाश का तेज कम नहीं होता ।शिक्षक एक ऐसा ही दीपक है ।




अब एक कहानी हो जाए--- तो सुनो एक कहानी जिसका नाम है 

बाल गुरू 

गर्मी के दिन थे सूरज अपने ताप पर था ।ऐसे समय मेँ एक लड़का पेड़ की छाया  मेँ बैठा ठंडी –ठंडी हवा खाकर मस्त था।घुटनों से ऊंचा -ऊंचा केवल  एक नेकर पहने हुए  था ।  धूप से बचाव  के लिए सिर को तौलिये से भी नहीं क रखा था ।





राजा कुछ देर तो उसे टकटकी लगाए देखता रहा फिर उससे चुप न रहा गया और बोला -- 
-बालक तुम तो बड़े अजीब हो, चने खाने में इतना समय लगा रहे हो ।इससे तो अच्छा है मुट्ठी भर चने निकालो और दो –तीन बार मेँ गप्प से खा जाओ ।

लड़के ने ऊपर से नीचे राजा को घूर कर देखा और बोला –
श्रीमान आप मेरी बात समझ नहीं पाएंगे क्योंकि आपने भूख नहीं देखी है ।तब भी मैं आपको  समझाने की कोशिश करता हूँ ।
मैं सुबह से भूखा हूँ ।एक –एक करके चने निकालने –खाने मेँ समय तो लगता है पर उतनी देर मुझे भूख नहीं लगती यदि तीन –चार बार मेँ ही चने खा लूँ तो  वे जल्दी खत्म हो जाएंगे ,मुझे भूख भी जल्दी लगने  लगेगी ।इसलिए सोचा –--------
थोड़ा –थोड़ा करके खाया जाय ।

-तुम तो बहुत चतुर हो।तुमसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा ।बोलो,मेरे साथ चलोगे!
-हा –हा –मैं खुली हवा मेँ रहने वाला आजाद पंछी  ,महल तो मेरे लिए पिंजरा है पिंजरा ।चिड़िया की तरह मैं उसमें कैद हो जाऊंगा ।
-जब इच्छा हो तब यहाँ चले आना ,इसमें क्या मुश्किल है !
-चलता हूँ ,देखता हूँ आपके साथ मेरा क्या भविष्य है ?

लड़का ठहरा बातूनी !एक बार इंजन चालू हुआ तो चालू !
बोल ही उठा –तो ,आप मुझसे कुछ सीखना चाहते हैं ।
-बिलकुल ठीक कहा !
-इसका मतलब मैं आपका गुरू हुआ ।
-गुरू ----गुरू नहीं महागुरू ।राजा ने हाथ जोड़ दिये ।
महल मेँ पहुँचते ही राजा को  लड़के के साथ दरबार मेँ जाना पड़ा ।

आदत के अनुसार वह सिंहासन पर बैठ गया ।


लड़का 2मिनट तो खड़ा रहा फिर तपाक से बोला –वाह महाराज !यहाँ आते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लिया।अपने गुरू को ही भूल गए ।

राजा बहुत शर्मिंदा हुआ ।तुरंत अपने सिंहासन से उतर पड़ा ।सेवक को  अपने से भी ऊंचा सिंहासन लाने की आज्ञा दी ।

-बैठिए बालगुरू ।राजा ने बड़ी शालीनता से कहा ।
-बस महाराज !मैं चलता हूँ फिर आऊँगा ।आज का पाठ पूरा हुआ ।आपको मालूम हो गया कि गुरू का स्थान क्या होता है ।
बालगुरू चल दिया ।

राजा सोच रहा था – जिससे भी हमें कुछ सीखने को मिले अवश्य सीखना चाहिए चाहे वह बड़ा हो या छोटा और वह सम्मान के योग्य भी है । 
राजा का स्वत: सर झुक गया --बाल गुरू  प्रणाम ! 
* * * * *


सोमवार, 17 सितंबर 2012

कहानी


गणेश चतुर्थी के अवसर पर 




आओ हम कर  लें    
 कुछ काम  की बातें 
कुछ ध्यान की बातें 
कुछ रसभरी बातें 
कथा कहानी की --
(पूत के पाँव पालने  में )





 बच्चों ,गणेश जी का आगमन होने वाला है |वैसे तो वे  होशियार  बच्चों के  मध्य हमेशा रहते हैं | देवलोक में अपनी बुद्धि और चतुरता के कारण देवताओं के देवता कहलाते हैं और  उनके भक्त  शुभ काम करने से पहले सबसे पहले उनकी पूजा करते हैं |


कहते हैं पूत के पाँव पालने में ही दिख  जाते हैं |मतलब छुटपन में ही मालूम हो जाता है कि बच्चा कैसा है |यह कहावत गणेश जी के लिए तो पूरी तरह से खरी उतरती है | बचपन में ही उनकी बुद्धिमानी का अंदाजा लगने लगा था |उनकी बुद्धि के चर्चे करती हुई  अनेक कहानियाँ  हैं ।
मैं भी  तुम को ऐसी ही  एक कहानी  सुनाती हूँ  जिसमें कल्पना की चाशनी  भी बिखेर दी है ताकि कहानी की मिठास बढ़ जाये ।

कहानी

पूत के पाँव पालने  में 

दो भाई थे -गणेश और कार्तिकेय |गणेश बड़ा था और कार्तिकेय छोटा ।उनके माता -पिता शिव -पार्वती कैलाश पर्वत पर रहते थे ।






दोनों झगड़ते भी थे और उनमें प्यार भी बहुत था |कार्तिकेय जब  बहुत छोटा था तभी  अपनी सवारी मोर पर गणेश को बैठा लेता और फिर वे चहकते हुए दूर -दूर की उड़ान भरते ।




धीरे -धीरे छोटे भाई के  दिमाग में यह बात बैठ गई कि गणेश  किसी  भी तरह दौड़  में तो मुझसे जीत नहीं सकता क्योंकि उसकी सवारी चूहा है |

एक दिन दोनों भाइयों   में झगड़ा हो गया |

बालक गणेश बोला -मैं बड़ा हूँ क्योंकि मैं तुझसे पहले दुनिया में आया |
कार्तिकेय बोला -मैं बड़ा हूँ क्योंकि तुम मुझसे तेज नहीं जा सकते |हर हालत में मैं तुमसे पहले निकल जाऊंगा |जो जीता वही बड़ा |

उसी समय  ब्रह्मा जी के पुत्र नारद मुनि आ पहुँचे |वे विष्णु भगवान् का कोई संदेशा  लेकर शिवजी के पास कैलाश  पर्वत पर जा रहे थे |धरती पर शोरगुल मचता देख रुक गये |

बोले  --नारायण ---नारायण |अच्छे बच्चे झगड़ा नहीं करते |

-अंकल .आप ही बताइए --हम दोनों में से कौन बड़ा है ?

-रुको --रुको --मुझे जरा सोचने दो -- अच्छा बताओ ,तुम दोनों किसको सबसे ज्यादा प्यार करते हो ?

-माँ को ।दोनों एक साथ बोले ।

तो सुनो

 , -- जो  पूज्य माँ के तीन चक्कर  लगाकर सबसे पहले मेरे पास आएगा वही बड़ा होगा ।

कार्तिकेय बहुत खुश हुआ--आह !क्या कहने --|मैं तो मोर पर बैठकर कुछ मिनटों में ही कैलाश पर्वत  पर पहुँच जाऊंगा और माँ पार्वती  के तीन चक्कर लगाकर लौट भी आऊँगा पर बेचारा गणेश --हा --हा |चूहे पर  बैठ तो जायेगा पर जैसे ही तेजी से फुदक -फुदककर चलेगा ---गिरेगा धडाम से ।

|कार्तिकेय  धरती छोड़ उड़ चला आकाश की ओर पर गणेश जहाँ खड़ा था वहाँ से हिला तक नहीं ।

|सोचने लगा -माँ ने जन्म दिया ,उसका दूध पीकर  बड़ा हुआ पर अब तो मैं दाल- चाव् ल , लड्डू सब खाता हूँ | लड्डू में पड़ती है चीनी ,चीनी बनती  है गन्ने से |गन्ना पैदा होता है धरती में |
मुझे नुक्ती के लड्डू तो बहुत पसंद हैं |नुक्ती बेसन  से तैयार  होती है .बेसन बनाया जाता है चने की दाल से और दाल भी मिलती है धरती से |जब धरती का अन्न खाकर बड़ा हुआ ,फिर तो वह भी मेरी माँ हुई |अब किस किस के चक्कर लगाऊँ --क्या करूँ  क्या न करूँ ।

गणेश बालक सोच में पड़ गया |

-देरी हो रही है-----|जल्दी करो ----मुझ पर बैठो |मैं तुरंत पार्वती माँ के पास ले चलता हूँ | चूहा घबराया |
-मूसक  महाराज, जन्म देने वाली माँ का चक्कर लगाऊँ  या  पालने वाली धरती माँ का लगाऊँ |
-दोनों के लगा डालो |

गणेश की आँखें चमक उठीं --|

उसने तुरंत एक कागज और पेन्सिल ली |पहले धरती बनाई |तुरंत उस पर हरियाली छा गई |उसके बीच पार्वती माँ का चित्र बना दिया। 
आँखें मूंदकर माँ का ध्यान किया ,आँखें खोलीं तो लगा वे सामने सिंहासन पर बैठी उसी की और देख  रही हैं और अपनी  शुभ कामनाएं दे रही हैं। उसने  झुककर प्रणाम किया और कागज पर लिख दिया -धरती माँ -- प्यारी  माँ ! 



धरती माँ --माँ 


धरती पर  खुश होकर फूल खिलखिलाने लगे  और कागज --

उसकी तो पूछो ही मत ----

एक मिनट पहले जो  कोरा सफेद था ,किसी की उसकी तरफ    नजर ही नहीं जाती थी, अब वह रंग- बिरंगा होकर  बड़ा सुन्दर लग रहा था ।   पार्वती माँ का साथ होने  से उसने अपने को भाग्यशाली  समझा ।




चूहे पर  जल्दी से  गणेश जी बैठे और जोश में बोले

चल मेरे साथी जल्दी चल 
धरती माँ पर बैठीं मेरी  माँ 
खट से लगा उनका  चक्कर

धरती माँ का चक्कर लगाने के बाद वे नारद जी की बगल में  खड़े हो गये | कुछ देर में कार्तिकेय भी आ गया |

-अरे गणेश ,तुम गये नहीं !छोटा भाई बोला |
-इसने तो  माँ का ही नहीं  पूरी धरती  का चक्कर लगा किया |नारद जी ने कहा ।
-कैसे ?वह भी इतनी जल्दी |

-देखो उधर गणेश की लीला |

चित्र को देखकर कार्तिकेय अपने भाई के बुद्धिबल को समझ गया ।
रसगुल्ले की   सी आवाज में बोला -भाई तुम  मुझसे वाकई में बड़े हो |तुम जैसे  भाई को पाकर मेरे  मन  का मोर नाच रहा है   |

 कहानी तो ख़तम हो गई पर गणेश चतुर्थी के दिन तुम सब  जरूर कहना ---


गणेश पूजा 



विनती सुन लो हे गणनायक
हम है छोटे  प्यारे बालक
हम को खूब बनाना लायक  
खूब पढ़ाना ,खूब लिखाना 
अच्छे अच्छे काम सिखाना 
बड़े -बड़े हम यश पाएंगे 
तुम्हें  कभी नहीं बिसरायेंगे 

विनती  सुन लो हे गणनायक 
हम हैं छोटे  प्यारे  बालक |


सोचो -समझो 

बुद्धि ----

बुद्धि का कटोरा 


महान दिमाग 

महान दिमाग विचारों पर चर्चा करते हैं
औसतन दिमाग घटनाओं पर चर्चा करते हैं
छोटे दिमाग लोगों पर चर्चा करते हैं
एलिएनार रूजवेल्ट ऐसा कहते हैं 















शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

बालकथा निशाने बाज


बच्चों
मुझे कुछ कहना है ----
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो चखी जाती हैं ,कुछ सटक ली जाती हैं मगर कुछ खूब अच्छी तरह चबाई जाती है तब भी हजम नहीं होतीं | लगता है उनके बारे में दूसरों से बातें करो ,दूसरों को उन्हें सुनाओ |ऐसी ही एक कहानी मैं इस ब्लॉग पर पोस्ट करने जा रही हूँ |यदि कोई शब्द समझ में न आये तो अपनी मम्मी से पूँछ लेना इससे तुम्हारा  शब्द भंडार बढ़ेगा ,यदि कोई वाक्य समझ में न आये तो पापा से समझ लेना |इससे तुम समझदार बनोगे |
हाँ तो अब पढ़ना शुरू करो --अरे याद आया !पढ़ो तो जोर -जोर से |यदि तुम कुछ गलत पढ़ोगे तो सुननेवाला उसे ठीक कर देगा ,फिर तो कक्षा में पढ़ाई की परीक्षा  (reading test )के समय सबसे ज्यादा अंक आयेंगे |
 तो शुरू करते हैं कहानी ----
निशाने बाज /सुधा भार्गव
एक गाँव में गेंदाराम रहता था |
वह निशाना लगाने में बहुत चतुर था |सुबह उठते ही बहुत से पत्थर बटोर लेता और कुँए की तरफ गुलेल लेकर निकल जाता | 
उस समय लड़कियां और औरतें कुएं से पानी खींचकर घड़े भरतीं ,फिर उन्हें सिर पर उठाकर घर की ओर धीरे -धीरे

कदम बढ़ातीं|गेंदाराम दूर से भरे घड़े पर निशाना लगाकर उन्हें फोड़ देता  और खिलखिलाता----

हो गया छेद 
फूट गया मटका 

पानी गिरा टप से 

उसे लगा झटका |
गाँव वाले बड़े परेशान !सब उसे छेदाराम-छेदाराम कहकर चिढ़ाने  लगे |चिढ़कर तो वह और भी तेजी से घड़े फोड़ता
|बच्चे -बड़े पानी के लिए तरसने लगे |

एक बार उस गाँव में दाढ़ी वाले  साधुबाबा आये |
परेशान गांववाले  उनके पैरों पर गिर गये और चिल्लाये ---
--महाराज,बचाओ ---बचाओ --इस छेदीराम ने घड़ों में छेद कर- करके  हमारा जीना हराम कर दिया है |
--क्यों छेदीराम !क्यों सताते हो इन लोगों  को  ?
--मेरा नाम छेदीराम नहीं गेंदाराम है |इन्होंने मेरा नाम बिगाड़ दिया है |मैं भी गुस्से में आकर इनके घड़ों की शक्लें बिगाड़ देता हूँ|
--तुम्हें जितना गुस्सा करना है करो ,जितने घड़े फोड़ने हैं  फोड़ो ,पर एक शर्त है ---
--साधुबाबा ,आप  तो बहुत अच्छे हैं |घड़े फोड़ने को मना भी नहीं किया !आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ |
--सुनो ,जितने घड़े तुम फोड़ोगे,उतने तुम्हें  बाजार से खरीदने होंगे |फिर उन्हें भरकर घर -घर पहुँचाओगे|
--यह तो मेरा चुटकियों का काम है दीये तो मुझे बनाने आते ही हैं घड़े भी बना लूंगा  फिर पानी भरने में क्या देर !

अब तो वह पेड़ की ऊंची सी डाली पर बैठकर खूब निशाना लगाता|रात घड़े बनाने में गुजर जाती और दिन में उन्हें भरकर घर -घर पहुँचाता रहता | 
गाँव वाले खुश --पुराने घड़ों की जगह उन्हें नये घड़े मिलने लगे |औरतें खुश -बिना मेहनत के पानी भरे घड़े उनके घर पहुँच रहे थे |गेंदराम खुश -निशानेबाजी के शौक को जी भरकर पूरा कर रहा था |पर उसका यह शौक कुछ दिनों तक ही पूरा  हो सका |
रात -दिन के जागने से और पानी की ठंडक ने गेंदराम को बुखार ने आन दबोचा |घड़े बनाने से जो आमदनी होती थी वह कम होने लगी क्योंकि बने घड़े तो बाजार की जगह गांववालों के घरों में पहुँच जाते | 
धीरे -धीरे घड़ों पर निशाना लगाना उसका कम हो गया |एक दिन ऐसा आया जब न ही उसने किसी के घड़े पर निशाना लगाया और न छेदीलाल कहने से चिढ़ा |
औरतें परेशान हो उठीं ---
-अरे इसे क्या हो गया है --न घड़े फोड़ता है और न चिढ़ता है |हमें सारा पानी भरना पड़ रहा है |इस ढोया-ढाईसे तो हमारे कंधे दुखने लगे |
--अब वह समझ दार हो गया है --एक लड़की बोली |
-गेंदा राम हँसकर बोला --सच में मैं समझदार हो गया हूँ |
अब न मैं अपने लिए गड्ढा खोदूंगा और न ही उसमें जाकर पडूँगा |

कुछ सोचना है कुछ समझना है --
-कहानियों में बच्चों का भविष्य समाया हुआ होता है |
-अच्छी कहानी उनका मार्गदर्शक ,शिक्षक और अनुरागी मित्र होती है |
-बिना कहानियों के बचपन अधूरा है |
* * * * * *

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

कहानी -गुल्लक की करामात

राखी का त्यौहार
सबको
मुबारक हो

आज राखी का त्यौहार है ।इस अवसर पर मैं एक  नई कहानी पोस्ट कर रही हूँ जिसका नाम है --

गुल्लक की करामात

तुम जरूर कहोगे राखी  पर राखी  की कहानी होनी चाहिए यह  गुल्लक कहाँ से आ गई !थोड़ा धैर्य रखो --समझ जाओगे --मैंने यही क्यों लिखी  है ।

 टीटू और छुटकी कोयलिया की माँ को अपने भाई के घर राखी बाँधने जाना था  |जाने से पहले मेज पर उनके   लिए लड्डू रख दिये पर जल्दी -जल्दी में वह कुछ कहना भूल गई |
लड्डुओं को देखते ही टीटू की आँखें चमक उठीं और शुरू कर दिया भोग लगाना ।खाते -खाते उसका मुंह भी लड्डू की तरह गोल हो गया ।कोयलिया  तिरछी नजर से देखने  लगी कि वह अब रुके ,अब रुके  --- ।जब दो ही लड्डू रह गये तो चिल्लाई 
-सब खा जायेगा या मेरे लिए भी छोड़ेगा ?
टीटू सोते से जागा--हैं --माँ तो ऐसा कुछ कह कर नहीं गई --!
--तो यह भी तो कहकर नहीं गई कि तुम सब खा लेना |मुझे भी तो भूख -- लगी है |उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे |
--ठीक है --ठीक है , टपकन बाजी  छोड़ |ये दो लड्डू बचे हैं इसी से पेट भर ले |
कुछ देर में ही उनकी माँ आगई |साथ में बहुत से उपहार भी लाई जो उनके मामा ने दिये थे |
टीटू ,अब तुम भी राखी बंधवा लो और इन्हीं में से जो उपहार कोयलिया को अच्छा लगे दे दो |
राखी तो उसने खुशी -खुशी बाँध दी मगर उपहारों के नाम अड़ गई ---


मुझे नहीं लेना इसमें से ,ये तो आपके भाई ने दिये हैं |मैं तब लूंगी जब मेरा भाई लायेगा |
--ठीक है --टीटू ये ले ५० रूपये और ले आ बाजार से |
--नहीं ! इन रुपयों का भी नहीं लूंगी
-तो मैं कहाँ से लाऊँ  रूपये --?
--मैं नहीं जानती !
कोयलिया पैर पटकती हुई कमरे से बाहर हो गई |
--माँ की भी त्यौरियां चढ़ गईं -ओह !क्या जिद लगा रखी है |आज का दिन क्या मुँह फूलाने  का है |मुझे तो हजार काम !मैं तो चली ---|
टीटू समझ नहीं पा रहा था -कोयलिया  क्या चाहती है उसका अपना तो कुछ है ही नहीं, सब  माँ -बाप का है।

अचनक दिमाग में कौंधा ---अरे है-- मेरा है --मेरी गुल्लक! वह खुशी से उछाल पड़ा |जो गुल्लक उसे जान से भी प्यारी  थी उसे टीटू ने  एक झटके में  तोड़ दिया |सारे पैसों को जेब के हवाले कर बुदबुदाया -- ऐसा सुन्दर उपहार खरीदूंगा जैसा किसी भाई ने अपनी बहन को न दिया होगा |
बाजार में बड़े -बड़े फूलों वाली फ्रोक उसे बहुत पसंद आई |जेब के सारे पैसे पलटते हुए दूकानदार से  बोला -इनके बदले वह फ्रोक दे दो |
पहले इन्हें गिनने तो दो --एक --दो --तीन ----।अरे, ये तो केवल  पाँच रूपये हैं |फ्रोक तो पचास रुपयों की है |
--पचास रूपये !टीटू उदास हो गया |पैसों को बटोर कर आगे चल दिया |
चप्पल की दुकान पर रूककर उसने उसके भी दाम पूछे | उसके बीस रूपये सुनकर  पूरी तरह निराश तो  नहीं हुआ |हां ,उसे अपने पर गुस्सा जरूर आया -यदि मैं कल दो रूपये की टाफी न खाता ,परसों पेन्सिल  न खरीदता तो और पैसा बचा सकता था और वह पैसा आज काम आता |
बाजार की खाक छानते -छानते उसने देखा -छोटे से  डिब्बे  में दो  हेयर पिन (hair pin )पड़े हैं मानो कह रहे हों  --हमें  इस कोठरी से निकालो --हम किसी के बालों की शोभा बनना चाहते हैं ।
-कोयलिया के बाल तो काले और चमकीले हैं यदि ये  पिन उसके बालों में लगा दिए जाएँ  तो बाल और भी सुन्दर  लगने लगेंगे -यह सोचकर उसने दुकानदार से कहा -मेरे पास पाँच रूपये हैं ,उनके बदले  दोनों गुलाबी  हेयर  पिन(hair pin) दे दो |
-इनकी  कीमत तो छ ;रूपये है |
-

-मेरे पास और नहीं हैं |पाँच रुपयों में ही दे दो वरना मैं अपनी बहन को राखी का उपहार नहीं दे पाऊँगा |
--तुमने तो बहुत अच्छे कपड़े पहन रखे हैं लगता नहीं कि तुम्हारे पास केवल पाँच रूपये हैं |
-मैं अपनी गुल्लक के पैसों से बहन को कुछ देना चाहता हूँ |
--यह तो तुम्हारी बचत की कमाई है |सब बहन पर खर्च कर दोगे !
--हां !उसे मैं बहुत प्यार करता हूँ |
--तब तो ये  पिन तुमको देने  ही पड़ेंगे और हां --अपनी बहन को मेरी ओर से भी राखी की मुबारकबाद देना |
-जरूर --जरूर--- कहता हुआ टीटू पिन लेकर घर की ओर उड़ चला ||

उस ने सोती हुई कोयलिया के बालों में धीरे से क्लिप लगा दिये  |कागज पर कुछ लिखा और उसे भी मोड़कर उसके सिरहाने रख दिया |दूर बैठकर वह उसके उठने का इंतजार करने लगा |
अंगडाई लेते ही कोयलिया का हाथ कागज पर पड़ा |वह फड़ -फड़ करने लगा | दोनों हेयर पिन की उस पर नजर गई |वे मटक -मटक कर गाने लगे  -

-मेरी बहन फुलझड़ी
रोये तो बिजली गिरी
हंसे तो जुगनू की लड़ी
लड़े तो झांसी की रानी
प्यार करे  तो महक उठे
बेला ,चमेली चंपा  सी
मेरे दिल की क्यारी |
कोयलिया की नींद भाग गई |लगा सिर पर कोई रेंग रहा है |उसने दोनों  हाथ ऊपर मारे  ,खट से हेयर पिन उसके हाथ में आ गए  |
-तुम कहाँ से आये ?वह हैरान थी |

हम आये हैं बाजार से
टीटू भैया लाया है
जगह -जगह वह भटका है
राखी का तोफा लाया है
जाकर उसको प्यार करो
झगड़ा उससे बंद करो ।

कोयलिया, भैया -भैया कहती टीटू की ओर दौड़ी |एक दूसरे के गले लगकर दोनों भाई -बहन स्नेह के धागों में न जाने कितने देर तक गुंथे रहे |

* *    *       *      * *
प्यारे बच्चों



तुम्हारे हाथ उसी तरह जुड़े होने  चाहिए जैसे ऊपर के चित्र में हैं ।तुम्हें एक रहस्य की बात बताएं --जिन भाई -बहन के हाथ मिले रहते हैं उनके दो हाथ दो पैर नहीं --चार हाथ -चार पैर होते हैं ।अगर यह बात समझ में न आये तो अपने मम्मी -पापा से पूछना और सबको बताना ।

शनिवार, 12 मई 2012

बच्चो

आजकल तो तुम्हारे दिन मोती जैसे और रातें  चांदी सी हैं छुट्टियाँ जो चल रही हैं ।स्कूल की किताबें
 छूने को तो मन ही नहीं करता होगा ।तुम्हारी तरह मंटू चूहा भी बहुत खुश है ।मालूम है क्यों ?

चलो उसी की कहानी  सुनाते  है ।

 हमने इस बार कहानी  को कविता में ढाल दिया है। तुम हाव-  भाव  के साथ कविता पाठ करोगे तो बहुत अच्छा
 लगेगा ।


जीत गया भई जीत गया  /सुधा भार्गव 




एक भूरी बिल्ली थी।
भूरी के ऊपर काली बिल्ली थी
उस बिल्ली के ऊपर भी
एक  गोरी बिल्ली थी ।

भूरी की आँखें नीली
काली की कजरारी
गोरी की भूरी-भूरी
दिन रात चमकती तारों सी ।


तीनों चल दीं छुनक –छुनक
पैरों मेँ बाँधे हों मानो घुँघरू
एक मोटा चूहा जंगल मेँ टकराया 
मुँह मेँ पानी सबके भर आया ।


भूरी बिल्ली ने मटकाई आँखें
बोली –
चूहे की सेहत अच्छी
छूने मेँ है गुदगुदा
खून भी होगा उसका
मीठा –मीठा स्वाद भरा ।
काली बिल्ली ने पूँछ को झटका –
बोली--
बहुत कर ली बकबास
अब सुन मेरी  बात
तू नहीं ,मैं खाऊँगी इसको
लगता मक्खन सा मुझको ।
गोरी बिल्ली ने दिखाया पंजा –
बोली –
खबरदार !बढ़े जो आगे
पंजों से नोच गिराऊंगी
नरम –नरम मांस है इसका
मैं अकेली ही खाऊँगी ।

तीनों मेँ हुई गुत्थम गुत्था
बहसा –बहसी मेँ बीता घंटा  
भले –बुरे से अंजान रहीं
चूहे को खाना भूल गईं ।

चूहे ने अच्छा मौका पाया
बिल मेँ वह सरपट भागा
बिल्ली भागीं उसके पीछे
चूहा भागा  बिल्ली भागीं   


भागमभाग –भागमभाग ---
आया न चूहा किसी के हाथ
शक्तिवान रह गया पछताता
निर्बल ने विजय का ढोल बजाया ।



चित्र गूगल से साभार 

(अनुराग पत्रिका में प्रकाशित )



गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

शुभ कामनाओं सहित कहानी


प्यारे बच्चों


मुझे मालूम है तुम्हें आजकल परीक्षा का भूत बहुत सता रहा है । कुछ दिनों की ही तो बात है, फिर तो वह  भाग  जाएगा। तुम तो इस समय सारा मन किताबों में लगा लो। सफलता तुम्हारे कदम अवश्य चूमेगी । मेरी हार्दिक शुभकामनायें !   और हाँ --समय मिलने पर  नई कहानी जरूर पढ़ लेना ।मन भी बहल जाएगा और कुछ सीख भी मिलेगी ।


पहले काम फिर नाम


एक प्यारा सा बच्चा था चीकू । उसके घर में जानवरों से सबको प्यार था । उसके पापा ने तो एक बड़ा सा डोगी 
पाल रखा था । जिसका छोटा सा नटखट बच्चा था डिग्गू ।
एक दिन वे अपने मित्रके यहाँ से बिल्ली का बच्चा उठा लाये ।चीकू तो उसे देख उछल पड़ा -आह कितना सुंदर है !भूरी -भूरी आँखें, रुई सा सफेद ,मक्खन सा चिक -चिक चिकना !
-पापा ,इसे तो मैं स्कूल ले जाऊंगा ।
स्कूल ! कैसे ?
-किताबें निकाल दूंगा ,भूरी को अंदर घुसा दूंगा ।किसी को पता भी नहीं लगेगा ।
-जब म्याऊँ -म्याऊँ करेगी बच्चू तो मैडम की वो डांट पड़ेगी --वो डांट पड़ेगी कि दिन में ही तारे नजर आने लगेंगे ।
-ओह तब मैं क्या करूं--!
-तुम स्कूल जाओ । भूरी तुम्हारे पीछे से डिग्गू के साथ खेलेगी । डिग्गू को भी तो एक साथी की जरूरत है । कुछ दिनों मेँ ही दोनों मेँ अच्छी पटने लगी।
उस  दिन चीकू बोला --तुम सारे दिन उछलकूद कर समय ख़राब करती रहती हो ।   स्कूल से आकर आज तुम्हें पढ़ा ऊंगा ।
-लेकिन खेलने -कूदने से तो मैं मोटी -ताजी होगई हूँ। दौड़ -दौड़ कर चूहे पकड़ सकती हूँ । भूरी बोली ।
-ऐसे मोटे -ताजे होने से क्या फायदा कि दिमाग में मच्छर ही मच्छर भर जाएँ और तुम्हें काटने लगें ।
-अरे बापरे --।वे तो मेरा सारा खून पी जाएंगे --- फिर मैं क्या करूँ !
-यही कि जो मैं पढ़ाऊँ उसे दिमाग में भर लो फिर मच्छर आएंगे ही नहीं ।
भूरी को मच्छरों से बहुत डर लगता था । उनसे बचने के लिए उसने पढ़ना शुरू कर दिया। वह बिल्लू की बातें बड़े ध्यान से सुनती ।
खेलने वाले साथी को किताबों में उलझा देख डिग्गू को बड़ा गुस्सा आया ।
-भूरी !यह क्या शुरू कर दिया। भूरी साहिबा बनना है क्या !बिल्ली है --बिल्ली ही बनी रह ,चोला न बदल ।

--डिग्गू ,कल से तुमको भी पढ़ना पड़ेगा । चीकू बोला ।
-मैं नहीं पढ़ूँगा । माँ कहती है -खेलोगे -कूदोगे बनोगे नबाब ।
-तेरा दिमाग तो बुद्धू का बक्सा है । सारा दिन खेलने से नबाब नहीं गँवार बनते हैं । पढ़ने से तुम जैसे बुद्धू को बुद्धि आयेगी वरना सब तुम्हें उल्लू बनाएँगे ।
-उल्लू ---मतलब मुझे दिन में दिखाई देना बंद हो जाएगा !---आधा अंधा हो जाऊंगा ---तब तो जरूर पढ़ूँगा ।
अब उसकी भी पढ़ाई शुरू हो गई । कुछ दिनों बाद उन्हें स्कूल में भर्ती कर दिया गया । परीक्षा के दिन आ गए । चीकू को चिंता सताने लगी । लगता था भूरी -डिग्गू की नहीं उसकी परीक्षा है ।
एक शाम चीकू उन दोनों को बाग में घूमाने ले गया । वहाँ एक पेड़ पर चिड़ा -चिड़ी बैठे थे ।
चिड़ी बोली -भूरी तो चतुर लगती है ,परीक्षा में जरूर पास हो जाएगी ।
-ठीक कहा तुमने मगर ,डिग्गू  शैतान है ,  पढ़ने मेँ मन ही नहीं लगता। । इसके पास होने मेँ शक है ।
भूरी तो अपनी प्रशंसा सुन हवा मेँ उड़ने लगी ।
सोचने लगी -बस हो गई बहुत पढ़ाई ,अब थोड़ा आराम करूंगी ।
डिग्गू का  मुंह लटक गया । वह खिलंदड़ी जरूर था पर फेल भी नहीं होना चाहता था । उसने कसम खाई --अगले पंद्रह दिनों मेँ वो मेहनत करूंगा --वो मेहनत करूंगा कि भूरी को पछाड़ न दिया तो मैं डिग्गू नहीं --।
इन पंद्रह दिनों मेँ क्या हुआ ,डिग्गू को कुछ पता नहीं । बस वह भला और उसकी किताब भली लेकिन भूरी --तौबा रे तौबा --कभी गुलाब से बतियाने लगती तो कभी धूप मेँ सो जाती ।
दोनों की परीक्षा खत्म हुई । रिजल्ट का इंतजार होने लगा ।
जिस दिन रिजल्ट निकला। सूरज भैया खूब चमचमाने लगे । लगता था बच्चों के पास होने की खुशी में वे भी खुश हो रहे हैं । भूरी --वह तो दिन चढ़े सोती रही और डिग्गू --उसका दिल करने लगा धुक ---धुक --। आवाज आने लगी पास होऊँगा या फेल ---पास होऊँगा या फेल । अकेले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था और स्कूल जाने को उतावला भी था ।
-भूरी ,उठ -उठ ---स्कूल रिजल्ट देखने चल ।
-मुझे सोने दे --मैं नहीं जाती ।
-न चल ,मैं तो जा रहा हूँ ।
-तू जाकर क्या करेगा !तेरा तो नाम ही नहीं होगा पास होने वालों की लिस्ट में ।
-तेरा तो होगा ।
-मेरा क्यों नहीं होगा !भूरी ताव में आ गई ।
-ठीक है तो तेरा ही देख आता हूँ ।
-हा ---हा ,जा जा देख आ ,मूर्ख कहीं का !
भूरी बकझक करके फिर सो गई ।
डिग्गू कूदता फाँदता ठीक ब्लैक बोर्ड के सामने जा डटा । पहली नजर में ही उसने अपना नाम देख लिया और उछल -उछल कर गाने लगा ---
मैं तो पास हो गया
पास हो गया
बुद्धू की लिस्ट से
नाम कट गया ।
डिग्गू , राजा बन गया
राजा बन गया ।
एकाएक उसे भूरी का ध्यान आया ----
--अरे पढ़ाकू बिल्ली का रिजल्ट तो देखा ही नहीं ।
पर यह क्या !एक बार ,दो बार नहीं पाँच -पाँच बार अपनी छोटी सी ,नाजुक सी गर्दन घुमाकर- उचकाकर लिस्ट देखी लेकिन भूरी का नाम दिखाई नहीं दिया तो नहीं ही दिखाई दिया ।
भूरी के फेल होने का उसे बहुत दुख हुआ ।उसकी खुशी आधी हो गई । मुरझाया चेहरा लिए घर में घुसा ।
-लौट आया रोता सा मुँह लिए ! कहती थी , न जा --न जा । मालूम था फेल हो जाएगा तो गया क्यों !भूरी घुर्राई ।
डिग्गू धीरे से बोला --भू--री --तेरा तो ब्लैकबोर्ड पर नाम ही नहीं है ।
-पागल हो गया है क्या !ऐसा हो ही नहीं सकता ।
शक का कीड़ा लेकिन उसके दिमाग में घुस गया था । भागी स्कूल की ओर । डिग्गू और चीकू भी उसके पीछे गए
तीन जनों की छ्ह आँखें कम से कम तीन बार ब्लैकबोर्ड पर घूमीं -फिसलीं पर भूरी के नाम से नहीं टकराईं । अब तो भूरी रोने लगी ।
चतुर चीकू ने इस पहेली को जल्दी ही सुलझा दिया ।
 -लगता है भूरी , चिड़ा-चिड़ी की बात सुनकर तुमने अपनी किताब 'अंगूठा चूस' के पढ़ने   पर ध्यान देना कम कर दिया था ।जब देखो --बड्डे  डोगी की पीठ पर आराम फरमाती हो  या   धूप सेकती रहती हो ।  पढ़ने वालों का पहला काम है किताब से प्यार करना । बिना पढ़े परीक्षा में कोई पास होता है क्या ! पहले काम फिर नाम ।
भूरी को अपनी गलती मालूम हो गई और यह भी समझ गई कि बुद्धू भी बुद्धिमान हो सकता है  ।




(छाया चित्रकार -सुधा भार्गव )

* * * * * *

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

नया साल -- नई कहानी

नए वर्ष की चहल -पहल




                                                                                 





नए साल में  बच्चों की दुनिया में बच्चों का और बड़ों का स्वागत हैI हम इसमें पूरे एक  वर्ष रहेंगे I न कोई डर होगा न कोई चिंता I बस हँसेंगे -हंसाएंगे प्रीत   के फूल खिलाएंगे I.अपने हिस्से की रोटी दूसरों को खिलाएंगे I जिसका कोई न होगा उसके हम सब कुछ बन जायेंगेI 

 यदि आप हमारा साथ देना चाहते हैं तो आ जाइये I
 आपके आने से नये वर्ष की धूप में हमारा  पल पल चमक उठेगा I

नव वर्ष सबको शुभ हो I



धरती के इस शोर गुल को सुनकर मटकू बादल चंचल हो उठा और लगा झाँकने नीचे I वैसे तो आकाश की गोद में दुबका पड़ा था I जनवरी आने वाली थी-- .कड़ाके की ठण्ड --भला  उसे कहाँ बर्दाश्त !पर अब अपने पर काबू रखना उसके लिए मुश्किल ही हो गयाI  मटकता हुआ मुस्कराता हुआ  चल दिया नीचे ------

उस दिन बच्चे अपनी  ही धुन में थे किसी को उसकी तरफ देखने की फुरसत ही नहीं थी  I
                                                      







-यह काटा -काटी क्या कर रहे हो ? उकता कर मटकू ने पूछा I
- तुम्हें यह भी नहीं मालूम --!क्रिसमस गया और एक जनवरी को  नया साल आने वाला हैI हमें नए -नए कपड़े  पहनने होंगे , घर सजाना है ,चाकलेट लानी  है  .गुब्बारे भी फुलाने   हैं I बहुत सारे काम करने हैं  Iउपहार भी  सजाने हैं I बाद में तो मजा ही मजा है ---खायेंगे -पीयेंगे ,उछलेंगे -कूदेंगे और नाचेंगे Iबब्लू बोला I
-मैं  तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ !
--हाँ --हाँ क्यों नहीं !उपहारों के पैकिट पर लाल पीले रिबिन बाँधदो I

-'सारी धरती खुशी से नाच रही है । ऐसे समय सलोनी   को क्या हो गया है !इसे  
   भी बुला लूँ I
'सलोनी --सलोनी --
-यह क्या!तुम रो रही हो!
-  'हाँ मटकू I     
-मगर   क्यों ?

'मनु मेरा छोटा भाई है । उसने मेरी गुड़िया तोड़ मरोड़ दी है ।  अब  मैं किसके साथ खेलूंगी । '
'क्या तुमने अपनी मम्मी से शिकायत की ?'

'हाँ ,जब मैंने उन्हें अपनी घायल गुड़िया को दिखाया तो मनु को डांटा भी नहीं । कहने लगीं --पागलों की तरह क्यों रोंती हो !दूसरी गुड़िया ला देंगे । मैं उस गुड़िया के सा
थ बहुत दिनों से रहती हूँ । उसके बिना मैं बहुत दुखी हो जाऊँगी मुझे उदास देखकर माँ भी मुझपर हंसती हैं और भाई अंगूठा दिखा -दिखाकर मुझे चिढ़ाता है । '

  मटकू सलोनी   का आंसुओं से भरा चेहरा अपने रुई से मुलायम हाथों में लेकर बोला  -

' सलोनी   बहन ,अपने लिए इतना मत रोओं वरना दूसरे तो हँसेंगे ही । '
'तुम भी तो रोते हो । कभी धीरे -धीरे ,कभी जोर से । लेकिन तुम पर कोई नहीं हँसता । सलोनी ने कहा  I            'यह तुमने कैसे जाना ?।

'जब रिमझिम बरसात होती है तो मैं समझ जाती हूँ तुम धीरे से रो रहे हो । जब
मूसलाधार पानी बरसता है तो तुम जोर से रो देते हो । परन्तु तुम्हारे आंसुओं की धार में नहाकर कोई खुश होता है तो कोई तुम्हारी तारीफ करता है । सलोनी   ने अपने दिल की बात कह दी ।
'तुम्हारा कह
ना एकदम ठीक है । परन्तु तुम्हारे और मेरे रोने में एक अन्तर है। तुम अपने लिये रोती हो मैं दूसरों के लिये रोता हूँ । तुम अपनी भलाई की बात सोचती हो मैं दूसरों के हित को ध्यान में रखता हूँ।

'तुम किस तरह से दूसरों का भला करते हो ?'

'
मेरे पानी बरसाने से सूखे पेड़ -पौधे हरे- भरे हो जाते हैं । । नदी ,तालाब में जल भरने से पशु पक्षी उसे पीकर

अपनी प्यास बुझाते हैं ।                                                     
मोर मुझे देखकर  नाचना शुरू करता है तो  नाचता ही  रहता है । मैं इन सबको प्रसन्न करने के लिये ही तो आंसू बहाता हूँ। '

'इससे तुम्हें क्या मिलाता है?'
'दूसरों को खुश होता देख मैं भी बहुत खुश होता हूँ । '

' मटकू  तुम तो दूसरों का बहुत ध्यान रखते हो । मैं तो अपने खिलौने किसी को नहीं छूने देती । कभी -कभी तो भइया की गेंद भी छीन लेती हूँ । '
'यह तो अच्छे बच्चों की पहचान नहीं है । '
-नए साल में मेरा तुमसे वायदा रहा --  मैं भी ऐसे काम करूंगी जिससे दूसरों को सुख मिले और एक अच्छी बच्ची बनूँगी I

सलोनी   की बातें सुनकर बादल  मुस्करा दिया I 

-चलो मेरे साथ, जरा उपहार रिबिन से सजा दो |
--उपहार के पैकिट तो बहुत छोटे हैं !
- कोई उपहार छोटा या बड़ा  नहीं होता यह तो प्यार की निशानी है I जिसे उपहार दिया जाता है इसका मतलब
 तुम उसे प्यार करते हो I

 

--तब तो मुझे भी तुमको उपहार देना चाहिए I
-मेरे लिए  सबसे बड़ा उपहार यही है  की तुम  हमेशा खिलखिलाते रहो और मिलजुलकर रहो I अच्छा साथियों, अब मैं  चला ----
बच्चे  एक  साथ चिल्लाये --

नया साल