प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

शनिवार, 15 अगस्त 2015

बालकहानी


मेरे तुम्हारे सपने /सुधा भार्गव



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      पराग  के पैदा होते ही उसके माँ –बाप की आँखों में सपने तैरने लगे । उनकी जो इच्छाएँ पूरी नहीं हुई थीं उनको वे अपने बेटे द्वारा पूरा करना चाहते थे ।
बच्चा तीसरी कक्षा में ही आया था कि कमल और उसकी पत्नी अपने बेटे का भविष्य बुनने लगे ।
-मेरा बेटा तो इंजीनियर बनेगा। 
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--- न ,मेरा बेटा तो - - - -डॉक्टर  बनेगा


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बस हर बात में आप मनमानी करना चाहते हैं।
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अच्छा बाबा ,जो तुम कहोगी वही बनेगा
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ऐसी बात नहीं।  मेरी इच्छा पूरी न कर पाया तो आपकी इच्छा पूरी करेगा  बेटा तो हम दोनों का है

    कमल तो सपनों का बीज बोकर दफ्तर चला जाता पर उसकी पत्नी दिलोजान से उसमें खाद देने में लग जाती । बेटे पर पूरी तरह नजर रखती कि कहीं खेलने –कूदने में ही तो सारा समय खराब नहीं कर रहा ।
     एक दिन बेटा भागता हुआ आया माँ ,सुबह की पढ़ाई खतम कर दी है । अब मैं खेलने जाऊंगा 
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पर बेटा    ---आज तो छुट्टी है कुछ तो पढ़ाई पर ज्यादा  ध्यान दो
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क्या पढूँ ?
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रिवीजन ही कर लो
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रिवीजन- -- मतलब पन्नों को उलट – पुलट करूं। रिवीजन के नाम तो मुझे उबकाई आने लगी है।  एक ही पाठ दस बार पढ़ो----,उफ !लगता है पागल हो जाऊँगा
चलो आपकी बात मान लेता हूँ पर अभी से कह देता हूं शाम को नहीं रुकूंगा ,फुटबॉल खेलने जाऊँगा
-ओह बहस न कर ,जा पढ़ । उसकी शर्त सुनकर माँ झुँझला उठी ।
    
पराग ने   सोते जम्हाइयाँ लेते समय काटा ।  बस नाम को किताब हाथों में ले रखी थी ।   दिन ढलते जूते कसे और निकल गया घर से बाहर पर यह क्या ! वहाँ तो पापा खड़े मिल गये --
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कहाँ चले बेटा --?
आवाज में मिठास थी पर पराग कड़वाहट से भर गया
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खेलने जा रहा हूं
-जल्दी आना कुछ ख़ास बात करनी है
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ठीक है पापा
पराग अपने पर काबू न रख सका और बड़बड़ाने लगा --
मेरे खेलने के समय ही बातें आन टपकती हैं । वैसे पापा इतने खोये -खोये रहते हैं कि मेरा पास खड़ा होना भी  पता नहीं चलता । कोई नहीं चाहता कि मैं खेलूं
    पराग खुशी- खुशी घर लौटा पर खाने की मेज पर पापा को बैठा देख उसका मुंह लटक गया ।
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आओ बेटा  ,अब तो तुम कक्षा 5 में आ गए हो ।   हमारी इच्छा है तुम पढ़ने में रात –दिन एक कर डालो ताकि और अच्छे स्कूल में दाखिला हो सके । तुम्हारे लिए एक टीचर भी रख देंगे ।उसकी सहायता से ज्यादा अंक पा सकते हो । 
हमने तो कह दिया जो कहना था ,अब तुम बताओ - - -तुम क्या चाहते हो !
    -
पापा आपकी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ रही --पर हाँ ,मैं बहत कुछ करना चाहता हूं । नीले आसमान के नीचे हंसती धरती पर खिले फूलों को छूना चाहता हूं गुनगुनी धूप में साथियों का हाथ पकड़ तितलियों का पीछा करना चाहता हूं ,फुटबॉल की तरह उछलना चाहता हूँ लेकिन कैसे करूं! आप लोगों ने मेरा सारा समय छीन लिया है।  क्या करूं—कहाँ जाऊं?मुझे ,मेरा कुछ समय तो लौटा दो पापा !पराग कहते –कहते बिलख पड़ा ।
उसका  फड़फड़ाना  माँ बाप से न देखा गया ।
उन्होंने उसे गले लगाते बड़े कातर स्वर में कहा –बच्चे हम तो तुम्हारे लिए सोने -चांदी सा भविष्य चाहते थे पर यहाँ तो तुम अपने वर्तमान में ही खुश नहीं हो तो आने वाले दिनों का स्वागत कैसे करोगे ?
 -पापा , मैं जानता हूँ पढ़ना बहुत जरूरी है पर इस समय  खुश रहने के लिए और भी तो कुछ चाहिए।
कमल और उसकी पत्नी को पहली बार एहसास हुआ कि वे बच्चे को बहुत जल्दी बड़ा होना देखना चाहते हैं ,उससे उसका बचपन छीनना चाहते हैं ताकि उनके सपने पूरे हों । उन्होंने अपनी भूल सुधार का निश्चय किया।
- आज से हम अपनी किसी इच्छा का बोझ तेरे सिर पर नहीं लादेंगे । सारी टोकाटाकी बंद । तू खेलेगा –कूदेगा –पढ़ेगा और अपने सपनों के झूले में झूलता बड़ा होगा। कमल ने दुलराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा।  
-सच पापा । चांदी के सिक्कों सी उसकी खनकती हंसी से कमल और उसकी पत्नी के चेहरे भी चमक उठे ।  
समाप्त
सुधा भार्गव
बैंगलोर

(यह कहानी देवपुत्र बाल मासिक अगस्त अंक2015  में प्रकाशित हुई है।)


शनिवार, 25 जुलाई 2015

कहानी

 

बाबा की छड़ी/सुधा भार्गव 

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-बाबा –बाबा, खाना खाने चलो।
-चलता हूँ चलता हूँ  –जरा छ्ड़ी तो लेने दे।
-छ्ड़ी लेकर क्या करोगे?मैं हूँ न आपकी छड़ी। लो मेरा हाथ पकड़ लो।
बाबा के चेहरे पर मुस्कान आकर पसर गई। 

रसोई के पास आसन बिछाते हुए छुटकी बोली -जूते उतारकर धीरे से बैठना बाबा।
-माँ –माँ आज मैं बाबा को खाना खिलाऊंगी।
-किसने मना किया है –खिलाओ। उनके सामने पहले मैं थाली रख दूँ कहीं गेरगार न दे। उसके बाद तुम गरम-गरम रोटी खिलाना।
-पर जरा जल्दी रोटी सेक दो। बाबा को भूख लगी होगी। क्यों बाबा ठीक कह रही हूँ न।
-रोटी ले जाना छटंकी। है छुटकी सी लेकिन बातों मे बड़ों -बड़ों के कान काटती है। माँ रसोई से ही बड़बड़ाई।
-ओह बहू डांटो मत।बिटिया तो चिड़िया की तरह चहकती ही अच्छी लगती है।
छटंकी चिड़िया की तरह फुदकती ही रोटी लाई और बोली -
-बाबा जल्दी से थाली के पास से हाथ हटाओ वरना गरम फुलके से हाथ जल जाएगा। 
बाबा ने आधी रोटी के छोटे छोटे टुकड़े कर के चिड़ियों को डाल दिए ,चौथाई रोटी का भगवान का भोग लगा हाथ जोड़ लिए। 
-अब तो एक गस्सा रह गया,बाबा खाओगे क्या!रुको दूसरी लाती हूँ।
एक रोटी खाते ही बाबा का नाजुक पेट भर गया। बोले –बस अब मैं खा चुका।
-एक रोटी से पेट भर गया! न –न एक रोटी और लेनी पड़ेगी।
-बेटा ,अब नहीं खा सकता।
-क्यों? आपने खाया ही क्या है। अरे आज तो मीठा दही भी नहीं है। माँ—माँ—दही जल्दी लाओ । बाबा उठे जा रहे हैं। और हाँ जरा ज्यादा सा लाना। उन्होंने रोटी भी कम खाई है।

छुटकी की माँ ने थाली में दही की कटोरी रख दी।
-अरे बहू ,इतना सारा --। तू भी इस छुटकी के कहने मेँ आ गई।
-ओह!आप खाओ तो ,बचेगा तो मैं खा लूँगी। देखो बाबा आप ठीक से खाते नहीं हो। तभी कमजोर होते चले जा रहे हो। डॉक्टर अंकल से आपकी इस बार शिकायत जरूर करूंगी।
-अरे पटाका –ले –सब दही खतम कर देता हूँ। बस खुश!
-खुश –बहु--त खुश!छुटकी ने दोनों हाथ फैला दिए। आप पानी पीकर अब आराम करने चलो। अरे ,आप तो चल दिए। अपनी छड़ी को तो भूल गए।
बाबा ने हँसकर उसकी उंगली पकड़ ली। 

कमरे मेँ घुसते ही छुटकी का लाउडस्पीकर चालू हो गया-बाबा पलंग पर झटके से न लेटना- कल आपकी कमर मेँ दर्द हो रहा था। याद है न।
-याद न भी हो तो क्या है!मेरी पटाका ने याद तो दिला ही दिया।
-बाबा आप तो बड़े भुलक्कड़ होते जा रहे हो। फिर कुछ भूल रहे हो। छटंकी ने अपना सिर थाम लिया।
बाबा अपनी पोती को चकित से  ताकने लगे और पूछा –क्या--?
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-उफ!पान।

-बच्चे पान खाने की तो मुझे आदत है—कैसे भूल सकता हूँ। मैंने आप जान कर पान की नहीं कहा। तुझे फिर एक चक्कर लगाना पड़ता।
-रुको मैं अभी आई—पान लाई।
-तुझे पान लगाना भी आ गया।
-मैं पान नहीं लगा सकती । देखा न पानदान  कितनी ऊंचाई पर रखा है। मेरे तो हाथ ही नहीं पहुँचते। थोड़ी लंबी हो जाऊं फिर पान  मैं ही लगाऊँगी।
-पान तो घर मेँ सब खाते है। पान लगाते लगाते तेरे नन्हें से हाथ थक जाएंगे।
-छुटकी पल भर को सोच में पड गई। फिर धीरे से बोली –एक बात कहूँ!
-कह –।
-वो कोई मेरे बाबा है। मैं तो केवल अपने बाबा को पान लगाऊँगी। फिर मटकती उछलती कमरे से बाहर हो गई।
पोती के प्यार में बाबा भीग कर रह गए और लगा मानो गुलाब से महकते सुखों से  उनकी जेबें भर गई हों।   


 
फोटोग्राफी -सुधा भार्गव 
  

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

लोककथा

चतुर किसान

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एक किसान ऐसे खेत में काम करता था जहां पहले गाँव बसा हुआ था । उसमें एक धनी आदमी रहता था। उसके पास बहुत सारा सोना चांदी था। उसने एक गहरा गड्ढा खुदवाया और चोरों से बचाने के लिए उसे उसमें भर दिया । यह बात उसने किसी को बताई नहीं। उसके कुछ दिनों बाद वह मर गया । तब से धन वहीं गड़ा हुआ था ।
एक दिन किसान खेत जोत रहा था । उसका हल सोने चांदी जैसी कड़ी चीज से टकराने के कारण वहीं रुक गया । उसने सोचा –जड़ें होंगी ,थोड़ी रेत हटाकर देखता हूँ । रेत हटाने पर उसे चमकता हुआ सोना दिखाई दिया । उसका मन जरा भी चलायमान नहीं हुआ। उसे अपने बहुत से काम  भी खतम करने थे इसलिए उसे पहले की तरह रेत से ढककर  रख दिया  ।
शाम को फुर्सत पाने  के बाद उसने अपने आप से कहा –यह धन तो बहुत है ।एक बार में इसे नहीं ले जा सकता । इसके चार हिस्से करूंगा और चार बार में घर ले जाऊंगा । एक हिस्सा अपने बीबी बच्चों पर पर खर्च करूंगा  ,दूसरे हिस्से से कपड़े की दुकान खोलूंगा। तीसरा हिस्सा गरीबों में बाँट दूंगा। और चौथा हिस्सा बुरे समय के लिए बचाकर रखूँगा।  
उसने जैसा सोचा वैसा ही किया । उसने अपना भला किया और दूसरों का  ध्यान रखने से  सबने उसकी प्रशंसा की।

(शबरी शिक्षा समाचार पत्रिका मार्च अंक 2015 में प्रकाशित)  

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

लोककथा

गुस्सैल सँपेरा /सुधा भार्गव

एक सँपेरा  था। वह साँप का तमाशा दिखाया करता । उसने एक बंदर भी पाल रखा था जो तमाशे के बीच नाचता ,सीटी बजाता और सलाम करके सबसे पैसे लेता ।

एक बार शहर में  पाँच दिनों का बड़ा सा मेला लगने वाला था । सँपेरा साँप की पिटारी लेकर बीन बजाता नगर की ओर चल दिया और बंदर को अपने मित्र के पास छोड़ दिया । मित्र बंदर का बहुत ध्यान रखता । पहले उसको खाने को देता फिर खुद खाता ।
-इतना ध्यान तो मेरा सँपेरा भी नहीं रखता है ,मुझे भी इसके लिए कुछ करना चाहिए।
 यह सोचकर बंदर भी बगीचे से आम तोड़कर उसके लिए लाने लगा।

पांचवें दिन सँपेरा मेले से लौटा । उसने तमाशा दिखाकर काफी धन कमा लिया था पर थका –थका सा था । उसने मित्र का धन्यवाद किया और बंदर को लेकर बाग में थोड़ा आराम करने के लिए चल दिया । बंदर को भूख लगी और उसने सँपेरे से खाने को मांगा । झुंझलाकर सँपेरे ने डंडी से उसकी पिटाई कर दी । दुबारा खाने को मांगा तो रस्सी से उसे बांध दिया और सो गया। बंदर ने किसी तरह मुंह से रस्सी की गांठें खोली और अपने को आजाद किया।  वह उछलकर आम के पेड़ पर जा बैठा और रसीले आम खाने लगा ।



सँपेरे की  आँख खुली तो उसने बंदर को अकेले –अकेले आम खाते देखा । 

वह समझ गया कि बंदर उससे गुस्सा है क्योंकि रोज तो वह एक खाता था तो दूसरा उसके लिए नीचे गिरा देता था।   
उसने बहलाने की गरज से कहा –बंदर बाबू तुम बहुत सुंदर  हो और जब गुस्सा होकर गाल फुलाते हो तो और भी सुंदर लगते हो ।
-बस ज्यादा चापलूसी न कर । कभी किसी ने बंदर को सुंदर कहा है ?मेले में जाकर दो पैसे क्या कमा लिए तुझे तो घमंड होगया और मुझ पर हाथ उठा दिया । तूने मुझ भूखे को मारा ---क्या कभी भूल सकता हूँ । अब न मैं तुझे आम दूंगा और न तुझ जैसे गुस्सैल और मतलबी से  दोस्ती रखूँगा।  मैं तुझे छोडकर हमेशा के लिए जा रहा हूँ। 
सँपेरे ने उसे बहुत रोकने की कोशिश की पर बंदर नहीं रुका। 
शांत न रहने से सँपेरा अपना धीरज खो बैठा और अपनी मदद करने वाले मित्र को भी खो दिया।

(प्रकाशित -शबरी शिक्षा समाचार पत्रिका -जून 2014)    

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

निबंध

भारत की राष्ट्रीय भाषा में दुनिया के बच्चों पर संवाद करता 

अंतरजातीय अखबार 


बच्चों की दुनिया- संपादक रमेश तैलंग 
वर्ष1 ,अंक 3,15 अक्तूबर 2014 में प्रकाशित निबंध जिसे पढ़कर रोएँ खड़े हो जाते हैं। 
विषय-बालहिंसा-- अरब देशों में ऊँटदौड़
इसे अंतर्जाल पर भी पढ़ा जा सकता है।वेबसाइट है http://www.bachchonkiduniya.com/


उनका तो खेल हुआ ,जान यहाँ जाती है
बाल हिंसा का जाल समस्त विश्व को किसी न किसी रूप में अपनी जकड़ में लेता जा रहा है। अभावों की दुनिया में पलने वाले बच्चों को न भरपेट भोजन मिलता है न तन ढकने को कपड़ा और न मुंह छिपाने को एक घर। न वहाँ बच्चे का स्वास्थ्य और सुरक्षा है न प्यार का साया। ऐसे मासूम बच्चों के खरीदार  उनके  माँ बाप की देहली पर दस्तक देने में देर नहीं करते।  उज्जवल भविष्य के सपने दिखाकर वे उन्हें अपनी चालों में फंसा लेते हैं और अशिक्षित और भूख से मजबूर चंद सिक्कों के बदले अपने कलेजे के टुकड़ों को बेचने को तैयार हो जाते हैं। फिर गुलजार होती है बच्चों की तस्करी दुनिया और शुरू होता है उनका दर्दभरा शारीरिक ,मानसिक शोषण। ये बच्चे घर -घर सुबह से रात तक  काम करते है।ड्रग बेचने ,भीख मांगने के व्यवसाय को रोशन करते हैं। अरेबियन देशों में ऊंट जोकी (camel jockeys) के काम आते हैं। 


मिडिल ईस्ट में ऊंट जोकी(camel jockeys in Middle East )बाल हिंसा का जीता जागता उदाहरण है। यहाँ मासूम बच्चों का दिल दहलाने वाला शोषण किया जाता है। यह सत्य है कि कोई  भी जानवर बहुत तेजी से यात्रा के काम आ सकता है वशर्ते उसका सवार हल्का व छोटा हो । छोटे प्रौढ़ को पाना तो बड़ा मुश्किल है इसलिए मिडिल ईस्ट में ऊंट जौकी के लिए भोले भाले बच्चों को चुन लिया जाता है । इन देशों में धन की कमी नहीं ! बड़ी सरलता से सूडान ,पाकिस्तान,भारत ,बंगला देश के गरीब या असहाय बच्चों को खरीद लेते हैं। इनसे निष्ठुरता से कैमेल जौकी का काम लिया जाता है ।
ऊंट जोकी के लिए बच्चों का अपहरण भी कर लिया जाता है।  अरब में लाख गरीब होने पर भी ईश से यही प्रार्थना करते हैं कि उनका बेटा जौकी न बने पाए । बच्चे को घर में कब तक बांधा जा सकता है । दो -तीन वर्ष का होने पर जैसे ही वे बाहर निकलते हैं उनका अपहरण कर लिया जाता है। इसमें पूरा का पूरा एक स्थानीय गिरोह जुटा रहता है जो इन्हें बेचकर पैसा कमाते हैं।  खरीदने वाले उन बच्चों के माँ -बाप बन जाते हैं पर उन पर ममता नहीं लुटाते । वे तो गुलाम के रूप में उनकी ख़रीदारी करने के लिए करांची होते हुये गल्फ पहुँच जाते हैं।

तेल के कारण गल्फ देशों में  बड़ा पैसा आ गया है । उन्हें पता नहीं कि उसका कैसे उपयोग करें ?फिजूलखर्ची के लिए तो शेख प्रसिद्ध हैं ही । संसार की सबसे ज्यादा खर्चीली दौड़ घोड़ों की दुबई मेँ होती है । उनसे कोई आय नहीं होती ,बस राजसी प्रशासकीय धनी परिवारों की महिमा है।   
धन का बहुत बड़ा अंश ऊंटों पर खर्च हो जाता है । दौड़ लगाने वाले ऊंटों के लिए विशेष प्रकार के अस्पताल हैं। लेकिन इंसान का बच्चा कैमेल जौकी रोड़ी –गिट्टी से ज्यादा कुछ नहीं !जैसे ही एक घायल  हुआ या दौड़ के समय मर गया , उसके लिए न कोई दो आँसू बहाता है न किसी के दिमाग में घायल के जख्मों को सहलाने की  बात आती है ! आए भी क्यो?एक गिरा या मरा तो दस हाजिर --जौकी से अच्छा तो वहाँ का ऊँट है।

ऊंट पर बैठे बच्चों की कोई छुट्टी नहीं होती । माँ -बाप से दूर विदेशी भूमि पर कानून भी उनकी रक्षा नहीं करना चाहता। पूरे हफ्ते ऊंट पर चढ़ने और दौड़ का अभ्यास जारी रहता है । करो या मरो वाली बात  उनके साथ लागू होती है । .2 -4 थप्पड़ की मार और कुछ दिनों की भूख के बाद ही वे सीधे हो जाते हैं । यदि वे भागना चाहते हों तो भी भाग नहीं सकते । इसके अलावा उनके दिमाग में यह डालने की कोशिश की जाती है कि उनके माँ -बाप उनसे प्यार नहीं करते ,उन्होंने  ही तो पैसे की खातिर उन्हें बेच दिया । बच्चे भी सोचने लगते हैं -जाये तो जाएँ कहाँ? --इधर कुआं तो उधर खाई। 
ऊंट दौड़ शुरू होने से पहले जौकी को भूखा रखा जाता है ताकि कम वजन का अनुभव होने से ऊंट तेज भाग सके । इसका भी डर रहता है कि पेट में खाना हिलने से कहीं बच्चा उसे उगल न दे । कभी -कभी उनके जख्म करके उनमें नमक -मिर्च डाल देते हैं ताकि वे चिल्लाएँ -तड़पड़ायेँ। इससे दर्शकों का ज्यादा मनोरन्जन होता है । क्रूरता की पराकाष्ठा नहीं । न उनकी पढ़ाई न उन्हें अपने वतन का ज्ञान न साथ में भाई –बहनों की यादें । ऐसे बच्चों  के दुर्भाग्य की सीमा नहीं।

कुछ जगह जोकी बनने के लिए बच्चों की उम्र व वजन निश्चित कर दिया गया है लेकिन शेख के व्यक्तिगत ऊंट को जिताने के लिए ट्रेनर सारे नियम ताक पर रख देता है । इसके लिए उसे इनाम मिलता है पर बच्चे को असमय की मौत !
भाग्य से कुछ बच्चे बच भी गए तो उनको ऊंटों के अन्य कामों में लगा देते हैं । यदि बड़े होकर उन्होने भागने को एक कदम भी उठाया तो अकानूनन आप्रवासी  के अपराध में जेल की हवा खानी पड़ती है जबकि उनका कोई दोष नहीं ।

एक बार बड़े बच्चों  को उनके घर भेजने की कोशिश की भी गई पर ऐसा उनका कोई रिकॉर्ड तो
होता नहीं जिससे उनके गाँव या माँ -बाप का पता चल सके । अंत में उनको किसी नरकीय बस्ती में छुड़वा दिया । यह नक्शा है अरब के रहीसों के ऊंट की परंपरागत दौड़ का । बहुत से लोग मिडिल ईस्ट की  भाषा – कैमेल जौकी का अर्थ ही नहीं समझते और समझते भी हैं तो मुंह पर ताला लगाए रहते हैं । कौन फालतू में दुश्मनी मोल ले !यदि इस क्षेत्र की सरकार कड़ा कदम उठाए तो सैकड़ों बच्चे नारकीय जिंदगी से छुटकारा पा लें ।

सुधा भार्गव
subharga@gmail.com