प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

बालकहानी

 

    नटखट नोटबुक 

सुधा भार्गव 

      सुररी अपनी किताबों से खूब काम लेता। कभी पन्ने पलटता हुआ पढ़ता ,कभी उन्हें देख प्रश्नों के उत्तर लिखता। काम खतम होने पर उन्हें इधर-उधर पटक देता। एक बार डिक्शनरी झुँझला उठी- यह लड़का एकदम मतलबी है ! काम निकलते ही हमें बेदर्दी से फेंक देता है । कल मुझे इतने झटके से रखा कि पूरी  कमर की कमर दर्द कर रही है।

  “दीदी ,तुम ठीक कह रही हो। यह दुष्ट मुझे तो घुमाते हुए मेज पर इतनी ज़ोर से पटकियाँ खिलाता है कि मेरी खाल जगह - जगह से छिल गई है । देखो न कैसी लग रही हूँ –एकदम बदसूरत। एक दिन ऐसी गायब हो जाऊँगी कि ढूँढे से न मिलूँ। बच्चू को दिन में ही तारे नजर आने लगेंगे। स्कूल में भी खूब डांट पड़ेगी।’’नोटबुक बोली। 

 तू छोटी सी है पर है बड़ी खोटी।   कोई शरारत करने की जरूरत नहीं।” एटलस ने उसे समझाने की कोशिश की। उस समय तो नोटबुक चुप हो गई पर उसे सबक सिखाने की ताक में रहने लगी।  

   रात में सुररी ने गणित के कुछ सवाल किए और निबंध लिखा। आदतन किताबों को लापरवाही से फेंक पैर पसार कर सो गया। नोट बुक को मौका मिल गया। वह धीरे-धीरे सरकती हुई मोटी डिक्शनरी के पीछे छिप गई।  

   सुबह स्कूल जाते समय सुररी हड़बड़ाकर चिल्लाया-माँ—माँ मेरी नोट बुक नहीं मिल रही।”  

   “देख वहीं कहीं होगी। कितनी बार कहा है अपनी किताबें जगह पर रखा कर पर नहीं--- जहां काम किया वहीं छोड़ दिया।’’ 

   “ओह बहू यह बड़बड़ाने का समय नहीं । सुररी की मदद कर दे वरना बस छूट जाएगी। बस तो तेरे बेटे की छूटेगी पर हो जाएगी कवायद मेरे बेटे की। ऑफिस जाने से पहले उसे स्कूल छोड़ने जाना पड़ेगा।’’ दादी हँसते हुए बोली। 

   माँ को सुररी की मदद करने जाना ही पड़ा । उसके जाने के बाद  उसने एक गहरी सांस ली। 

   “इतनी लंबी सांस लेने की क्या जरूरत पड़ गई।’’ बाथरूम से निकलते हुए सुररी के पिता ने पूछा।   

   “न लूँ तो क्या करूँ। अब चैन जाकर मिला है। आपका बेटा तो कोई काम करता नहीं।’’ 

   “पहले उसे सिखाओ तो—तभी तो करना सीखेगा। उसकी अलमारी देखी है-- धूल से पटी! एकदम कबाड़खाना। एक बार इसमें किताब गई फिर तो खोजते ही रह जाओ। बेचारी किताबें भी अपनी किस्मत को रोती होंगी। आज तुम उसके सामने अलमारी साफ करके किताबें ठीक से लगाना। फिर वह अपनी किताबों की देखरेख खुद करने लगेगा।’’ 

   “करने से रहा। महाआलसी है।’’ 

   “न करे तो कोई बात नही! कुछ दिन तक तुम रोज किताबों की अलमारी की साज-सज्जा करो। देखना--- एक दिन उसपर जरूर असर होगा।पर मुझे एक बात का शक है!” 

   “शक! कैसा शक?”

   “यही कि तुम्हें किताब लगानी आती है या नहीं!

   “क्योंउसमें है ही क्या?”

   “मुझे मालूम है तुम कर सकती हो पर मैंने ऐसे ही पूछ लिया। तुमको न ही कभी उसकी अलमारी झाड़ते देखा और न ही लुढ़कती रबर-पेंसिल को उठाते देखा। जहां बेटा किताब छोड़ जाता है वही बेचारी लावारिस की तरह पड़ी रहती है।’’   

   ‘हूँ--किताबें लगाना बड़े झमेले  का काम है।  उन्हें ठीक करने के नाम से मेरा जी मिचलाने लगता है।’’

   “तब तुम्हारा यह काम कौन करता था!

   “मेरी माँ और कौन!” 

   “ओह अब पता लगा बेटे मेँ किसका असर आया है।’’ 

   “किसका असर आया?”माँ तुनक उठी। 

   “तुम्हारा और किसका !

   “आप तो बस मेरे दोष ही ढूंढते रहते हैं।

   “उफ नाराज हो गई। अच्छा बाबा माफ करो। मैं ही उसकी किताबें ठीक से रख देता हूँ। मैंने तो हमेशा से अपनी कॉपी-किताबें सावधानी से रखीं। तभी तो पुरानी होकर भी नई सी चमकती रहती हैं।’’   

   “अरे कहाँ चली महारानी --। थोड़ा इस काम में दिलचस्पी लो। वरना बेटे को कैसे बताओगी?  

    “मुझसे अच्छी तरह तो आप ही सिखा दोगे। मैं अभी आपके लिए गरम-गरम समोसे बना कर लाती हूँ। और हाँ,आज आपको एक ज्यादा मिलेगा।’’सुररी की मम्मी ने मीठी सी  मुस्कान बिखेरते हुए कहा। 

   “यह मेहरबानी क्यों!” 

   “स्वच्छता अभियान छेड़ कर आपने मुझे खुश कर दिया । अब आपको खुश करने की मेरी बारी है।’’

   “समोसे के नाम से तो मेरे मुंह में पानी आ गया। अब तो  मुझे ही किताबों के साथ कवायद करनी पड़ेगी।’’ सुररी के पिता भी हँस दिये। 

   किताबों की खुशी का तो ठिकाना ही न था। आपस में फुसफुसाने लगीं-“आज से तो हमारे अच्छे दिन आ गए। साफ सुथरे घर में पैर पसारेंगे और आनंद से रहेंगे।कितना अच्छा हो यदि सुररी भी अपने पिता की तरह सफाई पसंद बच्चा बन जाय। यदि वह हमारा ध्यान रखेगा तो हम भी उसका ध्यान रखेंगे।” 

   “उसे यह कौन समझाये कि हम उसके दोस्त हैं,दुश्मनों जैसा व्यवहार करना बंद करे। एक किताब ने गहरी सांस छोड़ी।

   “मैं समझा सकती हूँ।नोटबुक फिर मटकती सामने आई। 

   “तू तो उसे बहुत तंग करती है।

   “इस बार तो ऐसा तंग करूंगी कि सुररी को बदल कर रख दूँगी।बस पवन देवता मेरा साथ दे दें। वे इतनी तेजी से उड़ें कि मुझे भी अपने साथ उड़ा ले चलें।”  

   कहने भर की देर थी कि हवा वेग से बह चली। नोटबुक ने जानबूझकर अलमारी से बाहर छलाँग लगा दी। इस चक्कर में उसका एक पन्ना उससे अलग हो गया। हवा के झोंके उसे अपने साथ ले चले। सुररी ने देखा तो उसके गुम होने के डर से घबरा उठा। उसे पकड़ने पीछे-पीछे भागा। उस पन्ने पर बहुत सी खास बातें लिखी हुई थीं। हाँफते-हाँफते चिल्लाया-नोटबुक के पन्ने रुक जाओ –रुक जाओ। तुम्हारे बिना मैं स्कूल का काम कैसे करूंगा।?”

   “मैं नहीं रुकूँगा। तुम मेरा ध्यान नहीं रखते --फिर मैं तुम्हारी बात क्यों सुनूँ!

   “एक बार रुक जाओ—मैं तुम्हारी हर बात मानूँगा।” 

    “मानोगे?”

    “हाँ –हाँ –मानूँगा।

   “क्या तुम मेरा और मेरे साथियों को अपना मित्र समझकर उसकी देखरेख करोगे?”

   “हाँ—हाँ करूंगा।’’

   हवा तुरंत मुसकुराती धीमी बहने लगी।नोटबुक का पन्ना दीवार से टकराकर रुक गया। सुररी की सांस में सांस आई। उसने बड़े अपनेपन से पन्ने को हाथ में थाम लिया। उस पर लगी मिट्टी को हटाकर तुरंत पन्ने को नोट बुक में गोंद से चिपकाया। नोटबुक अपनी जीत पर बड़ी खुश थी । अलमारी में बैठीं किताबें नटखट नोटबुक का लोहा मान गई। 



समाप्त 

सुधा भार्गव 

बैंगलोर 

 


 

 

 

 

 

बुधवार, 8 सितंबर 2021

बालकहानी -वेब पत्रिका उदन्ती कॉम


2021 सितंबर में प्रकाशित




चोरनी
सुधा भार्गव

 

   सुंदर सी  एक खंजन चिड़िया थी ।बड़ी रंगबिरंगी! काली ,सफेद ,भूरी । उसकी सुंदरता का रहस्य उसकी चंचल आँखें थीं। उसे  नदी- तालाब का किनारा बहुत अच्छा लगता। जब देखो वहाँ बैठी पूंछ हिलाती रहती। उसके चलने का तरीका भी अजीब था। फुदकती नहीं बल्कि दौड़कर चलती।  खेतों में खूब मस्ती से दौड़ लगाती , कीड़े -मकोड़े गपक गपक खाती । उसके डर से कीड़ों में भगदड़ मच जाती पर वह तो उड़ते कीड़ों को भी लपक लेती।  ठंडी हवा में उसकी लहराती उड़ान देखते ही बनती ।इतराती  हुई चिटचिट करती सुरीली आवाज में उसका स्वर गूँजता तो खंजन चिड़ा बड़ा खुश होता और उस पर ढेर सा  प्यार उमड़ पड़ता ।  

    फुर्सत में वह नदी के घाट पर उतर पड़ती जहां धोबिनें कपड़े धोतीं। वह मजे से उनके बीच टहलने लगती और छेड़ देती अपनी मधुर तान । बेचारा चिड़ा उसका इंतजार करता रहता । जब बहुत देर हो जाती तो झुँझलाकर चिल्लाता "अरे धो लिए बहुत कपड़े --अब आजा धोबिन।"  

   चिड़िया तुरंत उड़कर प्यालेनुमा घोसले में पहुँच जाती। जहां चिड़ा उसके इंतजार में आंखें बिछाये रहता।

     खंजन चिड़िया को गर्मी बहुत लगती थी। गरम हवा चलने पर वह बेचैन रहने लगी। 

एक दिन खंजन चिड़ा से बोली - "तू  मुझे बहुत प्यार करता है ?"

"हाँ इसमें पूछने की क्या बात है ?"

"जो मैं कहूँगी मेरे प्यार की खातिर करेगा ?"

"यह तिरवाचा क्यों भरवा रही है ?जो कहना है सीधी तरह बोल दे।" 

"मुझे तो कश्मीर जाना है। सुना है वहाँ फूलों से ढकी घाटियां हैं। खुशबू भरी हवा सब समय बहती है। बीच बीच में पानी के झरने फूट पड़ते हैं। तुझे तो मालूम ही है मुझे पानी का किनारा बहुत अच्छा लगता है। झरने के किनारे बैठकर उसका ठंडा  मीठा पानी पीऊंगी और पानी से भी मीठा गाना गाकर तुझे खुश कर दूँगी।" चिड़ा उसकी बात पर हंस पड़ा । 

    अगले  दिन सुबह ही दोनों कश्मीर की ओर उड़ चले। वहाँ पहुँचते ही खंजन चिड़ा ने सबसे पहले अपनी चिड़िया के लिए हरे भरे पेड़ पर सुंदर सा घोंसला बनाया । वह पेड़ एक झील के  किनारे था। झील की लहरें  जब पेड़ के लंबे मजबूत तने से टकरातीं तो  घोंसले में बैठी खंजन चिड़िया का  पंख फैला कर ठुमकने का मन होता।     

    कुछ दिनों बाद खंजन चिड़िया सलोने से दो बच्चों की माँ बन गई। वे बड़े ही नाजुक थे। उनके पंख भी नहीं निकले थे। दोनों पीले थे। इसलिए एक का नाम निबुआ  और दूसरे का नाम पिलुआ  रख दिया । चिड़िया उनकी देखभाल करती और चिड़ा उनके लिए दाना लेने जाता।चिड़िया अपनी चोंच में दाना लेकर बच्चों की चोंच में डालने की कोशिश करती पर वे तो अपनी चोंच ठीक से खोल ही नहीं पाते थे। इसलिए दाना अंदर न जाकर  बार बार बाहर की ओर लुढ़क पड़ता । लेकिन चिड़िया अपनी कोशिश नहीं छोड़ती  । अपने प्यारे बच्चों को भूखा कैसे देख सकती थी!बच्चों का पेट भर जाता तब कहीं उसकी आँखों में चमक आती। 

   एक दिन खंजन चुग्गे की तलाश में गया । लौटते समय बरसते पानी में भीग गया। घोंसले में आते ही आंकची--आंकछी शुरू हो गई। सुबह देर से उसकी नींद खुली।  बुखार के कारण उसके सिर में  इतना दर्द कि उससे उठा ही नहीं गया। इधर -उधर आँख  घुमाई चिड़िया कहीं नजर न आई । समझ गया वह दाना लेने जा चुकी है।

   खंजन माँ  एक खेत में उतरी कुछ दाने खाकर अपना पेट भरा और कुछ दाने अपनी चोंच में भर लिए। वह उड़ने ही वाली थी कि एक किसान ने दूर से उस पर एक अंगोछा फेंक दिया । वह उसकी लपेट में  आ गई। अंगोछे को  उठाते हुए किसान चिहुँक पड़ा -"पकड़ लिया--पकड़ लिया  चोरनी को । न जाने कब से चोरी चोरी मेरा अनाज खा रही हैऔर ढेर सा चुराकर ले जाती है। आज तुझे नहीं छोडूंगा।" 

  चिड़िया गिड़गिड़ाई -"किसान भाई मेरे बच्चे भूखे होंगे। मुझे दाने ले जाने दे । उन्हें खिलाकर वापस आ जाऊँगी । तब चाहे तुम सजा दे देना । मैं सब भुगतने को तैयार हूँ।" 

   "मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो तुझे छोड़ दूँ। एक बार गई तो क्या लौटकर आने वाली है। चोरनी कहीं की।"उसने आँखें तरेरीं।   

   चिड़िया गुस्से से भर उठी और बोली-"देख किसान गाली तो दे मत।  मैं चोरनी किस बात की!तेरे खेत के कीड़े खा- खा कर फसल को बचाती हूँ । वरना वो कीड़े तेरी फसल को सफाचट कर के रख दें । एक तरह से तेरे खेत के लिए तो काम ही करती हूँ। उस मेहनत के बदले तू मुझे क्या देता है?इस फसल पर मेरा भी तो हक है। चोर तो तू है जो मेरा हक मारे बैठा है। मैंने चार दाने क्या खा लिए मुझे चोरनी कहता है। तू तो न जाने मेरे हिस्से का  कितना  अनाज  हजम कर चुका है । अब बता चोर तू है या मैं।" 

  "ज्यादा बढ़ बढ़कर मत बोल । मैंने कहा था क्या --मेरे खेत के कीड़े -मकोड़े साफ कर दे। कल से आने की जरूरत नहीं।" 

   चिड़िया की चीं-चीं और किसान की टै-टै सुन चिड़ियों के झुंड आकाश से उतर  पड़े और उन्हें घेर लिया। एक बूढ़ी समझदार चिड़िया आगे आकर बोली - "खंजन बिटिया चिंता न कर। हम सब तेरे साथ हैं। कल से कोई चिड़िया किसी खेत की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेगी।और किसान तू भी सुन ले। जब तक तू और तेरे साथी हमें नहीं बुलाएंगे  हममें से कोई इधर झाँकेगा भी नहीं। "

     कुछ दिन किसान बड़े खुश रहे चलो चोरनियों से छुटकारा मिला। लेकिन ज्यादा दिनों तक यह खुशी न रही।  कुछ महीने में ही खेतों में छोटे -छोटे कीड़े रेंगने लगे।पत्तों में सफेद सफेद फुनगी सी जम गई। पत्ते काले से हो गए। वे बीमार नजर आने लगे। यह देख किसान घबरा गए। अब उन्होंने समझा कि चिड़ियाँ कीड़े -मकोड़े खाकर उनका कितना उपकार करती थी। 

    एक सुबह किसान के बच्चों का कोलाहल सुनाईं  दिया।  वे मुट्ठी भर  दाना बिखेरते हुए चिल्ला रहे थे --

आओ री चिड़िया  

चुग्गो री खेत 

खाओ री दाना 

भर -भर पेट 

जल्दी ही आकाश पंखों की सरसराहट से भर उठा ।भोले-भाले  बच्चों के बुलाने  पर चिड़ियाँ  अपने को रोक न सकीं। मन की सारी कड़वाहट घुल गई।  झुंड के झुंड चिड़ियों के धरती पर उतर पड़े। इस बार उन्हें कोई चोरनी कहने वाला न था। सारे किसान और बच्चे उनको चुगता देख बहुत आनंदित हो रहे थे। 

समाप्त 

2020 




 




मंगलवार, 27 जुलाई 2021

बालकिरण पत्रिका में प्रकाशित

बालकहानी 

गंगा सुंदरी  

सुधा भार्गव


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       एक ऊँची चट्टान पर बड़ा सा महल था ।न जाने  कहाँ से आकर एक राक्षस उसमें रहने  लगा ।बड़ा मोटा -ताजा था । सारे  शरीर पर लम्बे लम्बे कांटे ,जीभ पर भी  काँटे।  दस सींगों  वाले राक्षस की नाक बांस सी लम्बी --हाथी  की सूँड सी ।एक -एक बार में ४-४ जानवरों का शिकार करता। सब उसके पेट में समा जाते । जानवरों  का मांस खाते -खाते  जब  वह उकता  गया तो उसने सोचा -क्यों न गाँव चला जाय ! हो सकता है वहां कुछ ज्यादा स्वादिष्ट खाने  को मिल जाय । 

      अगले दिन वह गाँव चला ।  जिस जिसने उसका भयानक चेहरा  देखा , बेहोश हो गया । उनमें से  एक आदमी को वह सर पर रख  चलते बना ।  राक्षस  को  उसका  माँस  बहुत  जायकेदार  लगा । अब तो उसकी जीभ खूब लपलपाने लगी । हिम्मत भी कुछ ज्यादा ही आ गई । गाँव से शहर की तरफ साँप की तरह फुंफकारता हुआ बढ़ने लगा । चारों  तरफ खलबली  मच गई-राक्षस आया --राक्षस आया।  ।लोगों ने घर से निकलना बंद कर दिया इस डर से कि न जाने वह कब किसको निगल ले।          

      शहर में कुछ लोग पढ़े -लिखे थे । वे बुद्धिमान  समझे  जाते थे । कोई भी मुसीबत के समय लोग उन्हीं के पास  जाते । इस बार भी ऐसा ही हुआ । एक ने  बताया कि  राक्षस की आँखों  से ऎसी   रोशनी निकलती हैं जिससे आदमी का दम घुटने लगता है।  सांसें रुक जाती हैं। इसकी कोई दवा खोजनी होगी ।जब तक इसकी खोज  नहीं  होती  तब  तक लोग घर से न निकलें ।शहर में लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। सारे काम रुक गए।  लोगों को जिन्दा रहने के लिए घर में रहना पड़ा ।

       चकोर कक्षा में पढता था ।शुरू -शुरू में चकोर को घर में रहना बड़ा अच्छा  लगा ।सोचता - हा --हा  -खाओ- पीयो -मौज उड़ाओ-अच्छे दिन आ गए रे भैया ।पर जल्दी ही उक्ता  गया ।बात करे तो किससे  करे ।मम्मी-पापा  तो अपने -अपने कामों में लगे रहते ।कहानी की किताबें दो- दो बार पढ़ डालीं। टी. वी.के चैनल बदलते -बदलते सर दर्द होने लगा ।मन बहलाने को बालकनी में खड़ा हो जाता । उसे वे दिन याद आते जब वह नदी किनारे टहलने जाया करता था और मछलियों को देखते ही उनके सामने धीरे से  आटे  की गोल- गोल गोलियाँ  डाल देता  कि  कहीं डरकर भाग न जाएँ ।उसे रंगबिरंगी मछलियां बहुत  अच्छी लगती थीं । 

      एक दिन उसकी नींद जल्दी खुल गई ।मम्मी - पापा सोये हुये थे ।  बिना शब्द लिए उसने बालकनी खोली ।सामने  ही नदी की मचलती -उछलती  लहरों को दौड़ लगाते देख उसका मन भी चंचल हो  उठा।'काश! बालकनी से कूदकर एक ही छलांग  में लहरों पर अपने पैर  टिका दूँ ।अरे यह क्या !लहरों पर तो एक लड़की भी बैठी झूल रही है । अब तो उसके पास बतियाने  जरूर ही जाऊँगा ।'जैसे ही यह बात उसके दिमाग में आई उसे लगा वह उस लड़की की ओर  खिंचा  चला जा रहा है ।कुछ ही पलों में उसके पैर रेत  पर टिक गए।

"ए लड़की ,तुम कौन हो ?मैंने तो पहले तुम्हें  कभी देखा नहीं । पर हो बहुत सुन्दर ।उसने अपनी बड़ी बड़ी आँखें झपझपाते लहरों पर झूलने वाली लड़की से पूछा। 

 "तुम यह सब पूछने वाले कौन होते हो?पहले अपना नाम बताओ। ''लड़की बिगड़ पड़ी। 

"मेरा नाम चकोर हैं।'' 

      “ओह चकोर !नाम तो बड़ा अच्छा है। मेरा नाम गंगा है ।मैं यहाँ बहुत दिनों बाद  आई हूँ । कुछ दिनों पहले यहाँ गंदगी ही गंदगी रहती थी ।मुझे तो साँस लेने में भी तकलीफ होती थी।

       “तब  तो जल्दी निकलो --तुम्हारा दम  घुट जाएगा !

     “अरे नहीं---पहले की बात और थी। अब की बात और है। उस समय तो  मेरे पानी में  जीवनदायिनी ऑक्सीजन  की कमी हो गई थी । आजकल तो मेरे सुनहरे दिन चल रहे हैं।   आह! मेरे चारों तरफ का पानी कितना चमक रहा है ।देखो चकोर ,लहरें चांदी की लग रही हैं ।

    “ गंगा तुम्हारा घर भी है क्या !” 

    “बुद्धू ,घर तो सबका होता  है ।  मेरा  भी घर है ।  वो देखो हिमालय --उसी की गोद  में  पली  हूँ । उसकी बर्फीली चोटियां कैसी चमचम कर रही हैं । मैं तो हिमालय को देखने को तरस  गई थी ।लगता है कार ,बस के न चलने से धूल,धक्कड़ और धुआँ  भी भाग गया है।  हवा एकदम  साफ  हो  गई है--तभी तो हिमालय  दिखाई दे रहा  है 

   “ अरे तुम भी तो गोरी -गोरी लग रही हो। ।

     “हा --हा--तुमने आकर तो  मेरी खुशी और बढ़ा दी चकोर ।  बहुत दिनों  के बाद मुझे  किसी ने गोरी गंगा कहकर  पुकारा  है ।वरना हर कोई यही कहता था मैली गंगा मैला  पानी, ना पीओ इसका काला पानी । अपनी दुर्दशा पर रात-दिन आंसू बहाती  थी ।जबकि मेरा  कोई कसूर  नहीं ।” 

     “तब किसका कसूर है गंगा!

    “इस दुनिया में लालची और मतलबी  लोगों की कमी नहीं हैं चकोर ।उन्होंने  मेरे पानी से खूब फायदा उठाया ,खूब पैसा कमाया।  उसके बदले मुझे क्या मिला ---उनके शरीर की  गंदगी,उनके घर की गंदगी।  ! iइसने मुझे काली कलूटी बना दिया  ”  गंगा रुआंसी सी हो गई। 

     गंगा को दुखी देखकर चकोर भी सुस्त  हो गया ।बोला -गंगा तुम्हारी उदासी अच्छी नहीं लगती  ।तुम मुझे उनके नाम तो बताओ जिन्हों ने तुम्हें कूड़ेदान  बनाया । मैं अभी तुम्हारे पास उनका  कान पकड़कर ले आता हूँ। फिर तुम उन सबको मुर्गा बना देना।’’

     गंगा हँस पड़ी -चकोर तुम तो बहुत प्यारी   बातें करते हो ।अभी तो वे वैसे ही मुर्गा बने घर में  कुकड़ूँ कुकड़ूँ कर रहे हैं लॉक डाउन में हैं न !

      “हाँ--हाँ वो राक्षस  जो आ गया है।लेकिन तुम इतनी खुश क्यों हो । मैं तो बड़ा परेशान हूँ।

      “  जिन्होंने मुझे कष्ट दिया वे क्या सुखी रह सकते हैं!  तुम्हीं बताओ अगर कोई अपने घर का सारा कचरा तुम्हारे घर में फ़ेंक दे तो तुम्हें कैसा लगेगा? सबसे बड़े दुश्मन तो मेरे कल-कारखाने हैं। उनके मालिक लाखों कमाते हैं पर यह नहीं कि  फैक्टरी का कचरा फेंकने के लिए कहीं और जगह ढूँढे--उसमें  उनका पैसा जो लगेगा ।बस अंधों की तरह शीशा-लोहे- लकड़ी के टुकड़े,तेल,न जाने क्या -क्या मुझमें डलवा देंगे। i इनके बंद  होने से ही तो  मैं इतनी चमक रही हूँ एकदम शीशे की तरह ।अच्छा है बंद ही रहें

    चकोर कुछ समझ नहीं पा रहा था ।उसे लॉकडाउन अच्छा नहीं लग रहा था पर गंगा उसे चाहती थी। वह बेचैन हो गया।गला सूखता सा लगा। उसे तर करने के लिए बोला -

गंगा मुझे  तो प्यास  लगी है ।” 

     “मेरा पानी पी लो बिना किसी हिचक के । अब तो यह एक दम शुद्ध है । ।एक समय था जब मेरा पानी अमृत समझा जाता  था।क्या तुम्हारी माँ पूजा करती  हैं ?”

     “हाँ ---हाँ पिछले महीने तो माँ ने सत्यनारायण की कथा कही थी ।

     “क्या चरणामृत भी बनाया  था ?”

     “वही चरणामृत जिसमें दही शहद ,विसलरी  वाटर  --न जाने क्या क्या डाला जाता है ।

    “हाँ ,पर पहले विस्लरी वाटर नहीं मुझ गंगा का पानी डाला जाता था। मैं थी ही इतनी पवित्र !

     “तुम तो मुझे बहुत नई नई बातें बताती हो ।क्या तुम यहाँ बहुत दिनों से बहती हो?”

     “बहुत दिनों से नहीं वर्ष--वर्ष--बहुत वर्षों  से। मैंने अच्छे दिन भी देखे  हैं और बुरे भी।

      “मुझे तो अच्छे दिनों की अच्छी बातें बताओ । तुम्हें भी बताने में खुशी मिलेगी और  मुझे सुनने में ।” 

     “मेरी बातें तो तभी समझोगे जब अपने देश का कुछ इतिहास जानते हो !

     “अरे मैं तो बहुत जानता हूँ।पहले हमारे देश पर मुसलमानों का राज्य था ।फिर अंग्रेजों के गुलाम  हो गए पर हमने उन्हें भगा दिया ।अब तो  देश हमारा है । हम इस देश के वासी है --हिन्दुस्तान हमारा है ।

    “अरे---रे --रे  तुम तो बहुत कुछ जानते हो ।लगते तो तुम बड़े छुटके से बड़े भोले से ।” 

अच्छा तो बताती हूँ ।एक मुसलमान राजा  था ।उसका नाम था अकबर ।वह मेरा पानी ही पीता था।  कहता था-गंगे का पानी मीठा ,शीतल और साफ है । मैं तो अपनी तारीफ  सुन इठलाने लगती । और अंग्रेजों की बात बताऊँ ?”

      “हाँ--हाँ --बताओ --न ।

     “अंग्रेज घोड़े पर सवार होकर  आते और मेरा पानी अपनी बोतलों में  भर कर  ले जाते ।

     “इस पानी से क्या वे नहाते थे?

      “नहाते नहीं --पीते थे।

    “घर में उनके पीने को पानी नहीं था क्या?

     “था क्यों नहीं!पर नल का पानी दो दिन तक ठीक रहता हैं। उससे ज्यादा दिन का बासी पानी पीना ठीक नहीं।उसमें बीमारी के कीटाणु पैदा हो सकते हैं। अंग्रेज जब अपने देश जाते थे तो वहां पहुँचने में कई दिन लग जाते थे ।ऐसे में मेरा पानी बहुत उपयोगी रहता। गंगाजल बहुत दिनों तक शुद्ध रहता है इसलिए उसे पीते रहते।  अंग्रेज  लाख बुरे  थे पर मेरा  तो कभी बुरा न चाहा।भूल से एक तिनका नहीं  डालते थे ।मेरा बहुत ध्यान रखते  थे ।

     “मेरी दादी कह  रही थी -कि एक बार  हैजा हुआ था ।तुम्हारा पानी पीने से बहुत से लोग ठीक हो गए ।क्या तुम्हारे पानी में कोई जादू है ?”

     “जादू ही समझो ।मैं जब हिमालय की गोद  से  नीचे उतरती हूँ तो अपने  साथ कई तरह  की मिट्टी ,जड़ी -बूटियाँ लाती हूँ ।ये सब पानी में मिलकर मेरी तलहटी  में बैठ जाती हैं । दूसरे मैं  ऑक्सीजन  भी बहुत लेती  हूँ ।इन सब कारणों से मैं सारी गंदगी पचा जाती हूँ ।आजकल तो मेरा पानी एकदम शुद्ध और मीठा है।

     “अरे  इतनी सारी मछलियाँ तुम्हारे पानी में !लाल,नीली।,पीली ,--वह तो एकदम सोने जैसी है ।सोन मछली तुम कहाँ थीं?मैंने  तो  इससे पहले यहाँ तुम्हें देखा  भी नहीं !चकित हो चकोर ने पूछा ।

       “उँह मैं क्या करती यहाँ आकर  --पानी इतना जहरीला हो  गया था कि उसे पीने  से उल्टी  आती थी। 

आज तो मैं गंगा से मिलने  आई हूँ ।लो उड़ते -उड़ते हंस भी आ गए। आह गंगा इनके आने से तुम्हारी शोभा दुगुनी हो गई है । किनारे बैठे कमल से उजले हंस  कितने खूबसूरत लग रहे हैं !

        “सच में सोनू मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि दुबारा मेरे पुराने दिन लौटेंगे । हैं!राक्षस  के जाते  ही न जाने मेरा क्या हाल होगा! फिर से खुदगर्ज इंसान की मर्जी  का गुलाम बनना पड़ेगा ।मेरे सीने पर बैठी गंदगी मेरा उपहास करेगी ।मैं  उसका  कुछ नहीं बिगाड़  पाऊँगी ।गंगा खिन्न हो उठी। 

गंगा  ऐसा   न कहो। मैं  अपने दोस्तों की एक  टीम बनाऊंगा । घर घर यह टीम जाएगी और कहेगी -- 

 

गंगा हमारी शान है

गंगा  हमारा मान है  

इसे मैला करने वाला 

हर हाल  में दोषी है 

उसे सजा दिलाएंगे 

अपनी प्यारी गंगा को 

पूरा न्याय दिलाएंगे ।

       गंगा  के   चेहरे पर  मीठी सी हँसी आ गई ।बोली-चकोर तुम जितने अच्छे हो उतनी ही तुम्हारी बातें अच्छी हैं। जो बात आज तक किसी ने न कही वह तुमने कह दी।  तुम बच्चों से मैंने बहुत उम्मीद लगा रखी  है।

      “गंगा चिंता न करो। मैं किसी को नदी में कूड़ा नहीं फेंकने दूँगा । तुम इसी तरह सुन्दर चमचमाती  रहोगी।  मैं रोज तुमसे मिलने आऊँगा।  मछलियों  को  आटे  की  गोली  लाऊंगा । तुम  नई- नई  बातें  बताना ।  अच्छा  मैं चलूँ ।” 

       अचानक  उसे  लगा वह बालकनी  की ओर  खिंचा  चला जा  रहा  है ।  घर पहुंचकर भी उसे बार बार गंगा से किया वायदा याद आने लगा। उसने ठान  लिया है कि  राक्षस के जाते ही वह वायदा पूरा करने में लग जाएगा।

समाप्त 

रचना समय -2021