प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

बुधवार, 20 जनवरी 2021

कोरोना आया लॉक डाउन लाया

कहानियाँ  

6-मोहब्बत की दुनिया

सुधा भार्गव


      एक थी बिल्ली ,एक था बिलौटा। बिल्ली का नाम चमेली ,बिलौटे के नाम गेंदा।  गेंदा अपनी बहन को  बड़ा प्यार करता। एक दिन चमेली बड़ी सुस्त थी। उसे देख गेंदा परेशान हो उठा। 

    बोला - “म्याऊँ --म्याऊँ मेरी नाजुक सी बहना तेरा मुंह सूखा -सूखा क्यों ?”

    “मऊ --मूँ  --बहुत भूखी हूँ।”  

    “तू भूखी !विशवास नहीं होता।तेरा वश  चले तो दुनिया भर का दूध सपासप सपासप गटक जाए।”    

     “सच  बोल रही हूँ। पड़ोस में जो मसखरा चूहा घूमता रहता है उसकी तरफ सुबह मैं धीरे -धीरे बढ़ रही थी कि वह  बेहोश हो गया। इतने में चुहिया आई और उसे देख रोने लगी।   मैंने तो भैया उसे छुआ भी नहीं था। न जाने कैसे   बेहोश हो गया। तभी फटाफट पेंदने से गुलाबी-गुलाबी दो बच्चे उछलते आये और उसे उठाकर ले गए। उनका  बिल पास ही था। मसखरा तो ऐसा चालक  निकला कि बिल में घुसते ही  उठ बैठा। मुँह चिढ़ाते हुए  मुझे टिल्ली --टिल्ली करने लगा।”  

    “हा --हा --हा तो उस मसखरे ने हमारी बहना को ठग लिया।” गेंदा  जोर से हँ स पड़ा । 

    “भैया तुम्हें हँसी सूझ रही है---मेरी जान निकले जा रही है। मैं तो कल भी  भू खी रह गई  थी !”

    “क्या कहा --दो दिन से भूखी है !”

    “सच्ची मुच्ची  !कल एक रसोई में घुसी।  खौलते दूध की खुश्बू  आ रही थी. मैंने देखा मेज पर एक मेजपोश बिछा है और उस पर बड़े से कटोरे में दूध ठंडा होने को रखा हैं। मेरी खुशी का ठिकाना न था । सोच रही थी कल कुछ नहीं खाया तो क्या हुआ !आज तो छक कर दूध पीऊँगी। तभी एक बच्चा घुटने के बल चलकर बड़ी फुर्ती से मेजपोश पकड़ कर खड़े होने की चेष्टा करने लगा। मेरे तो होश उड़ गए। मैं ने जोर  से छलांग लगाईं और झटके से कटोरे को दूर फ़ेंक दिया। बच्चा तो जलने से बच गया पर भूखा था। गिरे दूध को देखकर रोने लगा।  उसकी माँ  आई -बच्चे को कलेजे से लगा लिया। मुझे देखकर उसका पारा चढ़ गया।  जोर से चिल्लाई-"इस बिल्ली ने जीना हराम कर दिया है।  डंडा मारकर इसे भगाओ तो  ।”  

    “गेंदा बता मेरी क्या गलती थी जो उसने मुझे गाली दी। अगली बार उस मैया को छोडूँगी नहीं।उसके पैर पर अपने पंजे जरूर चुभो कर रहूँगी।”  

   "उस मैया का क्या दोष !न हम उसकी भाषा जाने न वह हमारी! सच्चाई बताता कौन ?चल कुछ खा ले। कल से तेरा पेट खाली है। कैसी मुरझा गई है।”

    “कल से नहीं रे परसों से भूखी हूँ।”  

    “ऐं --अब तू मुझसे ही मसखरी करने लगी।” 

     “मैं एकदम सुच्ची -सुच्ची बोल रही हूँ। वो नुक्कड़ पर मोटू हलवाई  की दुकान हैं न।परसों  दूध से भरी बड़ी सी लोहे की  कड़ाई रखी  थी।  उसके चारों  तरफ  मोटी मलाई  की परतें एक के ऊपर एक जमी थी।  क्या चमकदार मलाई--मोटी सी चमचम। उसकी खुशबू  अलग नथुनों में घुसी जा रही थी। मोटू तो मुझे कहीं दिखलाई न दिया। इधर-उधर नजर घुमाती सबकी आँखों से बचती दूकान में तो घुस गई। जैसे ही मैंने मलाई पर पंजे जमाकर उसे खाना चाहा ठक -ठक की  आवाज से चौंक पड़ी। देखा -दुबली-पतली  कमजोर सी  बुढ़िया लाठी के सहारे दुकान में पीछे की ओर से घुस रही है । मलाई देख उसकी आँखों में चमक आ गई लगा जैसे उसने कभी मलाई खाई  ही नहीं। मुझे उस पर बड़ा तरस आया। अपनी भू ख तो भूल ही गई और  मैं परात के पीछे छुप कर उसे देखने लगी। वह तो लपलपालाप खाने लगी। उसे खाता देख मुझे बड़ा अच्छा लगा। इतने में मोटू आ गया और अपनी बूढ़ी माँ को घसीटते ले जाने लगा। मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैं परात के पीछे से निकली और मार की परवाह न करते हुए मलाई खाने लगी। मुझे देख मोटू हलवइया बौखला गया और माँ को छोड़ मेरे पीछे भागा। मैं तो एक छलांग में ही बाहर हो गई पर गुस्से में अंधा वह मेरे पीछे भागता ही गया--भागता ही चला गया ।  भला मैं क्या उसके हाथ आने वाली थी।  हांफता हुआ लौट गया होगा --बेचारा !ह --ह । ''

    “तुझे कब से दूसरों पर दया आने लगी है ?”

   “जबसे यह कोरोना चुड़ैल आन  बसी है। ठकुरा धोबी को यही चुड़ैल तो  निगल गई। उसके दोनों बच्चों से उनका पिता छीन  लिया।   बेचारे  भूखे प्यासे घूम रहे हैं । कल तो हिना  मौसी ने उन्हें अपने हिस्से की रोटी खिलाई। अच्छा गेंदा एक बात बता -जब मौसी बच्चों को रोटी दे सकती है तो मोटू हलवाई अपनी माँ को दूध मलाई क्यों नहीं खाने देता!” 

   “क्योंकि वह भी भूखा है।” 

   “ओह अब समझ में आया उसका पेट इतना बड़ा क्यों हैं !भूख लगने  पर  पूरी कड़ाई की मलाई चाट जाता होगा ।” 

   “अरे यह बात नहीं!कोई रोटी का भूखा है तो कोई पैसे का भूखा । यह हलवाई पैसे का भूखा है।अपनी माँ को मलाई खाने को देगा तो उसका पैसा कम हो जाएगा। उसे बेचकर वह ज्यादा पैसा कमायेगा।” 

   “मोटू एकदम अच्छा नहीं है। लगता है वह ऊपर से गिरा और जमीन पर आते ही बड़ा हो गया। भूल गया माँ ने कितनी मेहनत से उसकी देखरेख की। माँ को वह थोड़े सी  मलाई भी नहीं खिला सकता! मुझे तो यह सोच सोचकर रोना आ रहा है।” 

   “बात ही कुछ ऎसी है ।मुझे सुनकर भी बड़ा कष्ट हो रहा है। चल बहना चल !हम  अपनी ही दुनिया में भले। जहाँ प्यार  और मोहब्बत का अब भी झरना बहता है।”

      दोनों कलाबाजी दिखाते जंगल पहुँच गए। बिल्ली माँ ,गेंदा और चमेली के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसको  देखते ही वे उसकी गोद में छिप गए  और माँ प्यार से उन्हें चूमने -चाटने लगी।

समाप्त  


कोरोना आया लॉकडाउन लाया


बालकहानियाँ 

 5-धन्यवाद कोरोना

सुधा भार्गव 

       नादान अनारू समझ  नहीं पा रहा है माँ को क्या हो  गया है। हर  काम  में देरी करती  हैं।उस दिन  भरी  दुपहरिया में  बिजली चली गई । एक तो गरमी से परेशान दूसरे पेट में जोर जोर से चूहे  कूद रहे थे ।मेज खाली देख उबाल खा गया।

“ माँ --माँ ! कुछ खाने को तो देदो ।”

‘लाई बेटा--बस पांच मिनट रुक जा--।इतने  में तू साबुन से हाथ धोकर आ जा  ।”

अनारू भुनभुनाता चल दिया -'हूँ --हाथ धोकर आ !घडी -घड़ी हाथ धोने को बोलती हैं. पर मेरे हर काम में देरी लगा देती है।पांच मिनट --तो कहने के लिए हैं। पच्चीस मिनट से कम नहीं लगेंगे । पहले तो मेज पर कभी आम का पन्ना होता था जिसे पीते ही मैं सारी गरमी भूल जाता था । वो मीठा रसभरा  आम  तो मुझे अब  भी याद है जिसे मैं चूसता ही रह  गया ।गजब  का मीठा  आम था ।अब तो मेरा ध्यान रखने वाला ही कोई नहीं ।’

अनारू का मूड एकदम ख़राब था । जीअच्छा करने के लिए अपने दोस्त से फ़ोन पर बातें करने लगा -”हेलो कमल,  तूने खाना खा  लिया ?”

“हाँ --अभी -अभी मैंने खिचड़ी खाई है।”

‘तू बीमार है  क्या !खिचड़ी  तो बीमारों का खाना है ।”

“अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं! कोरोना बीमारी फैलने के कारण  कनिका बाई नहीं आ रही हैं न ।सो मेरी माँ को बहुत काम करना पड़ता है ।वे थकी -थकी लग रही थीं ।इसलिए मैंने और पापा ने निश्चय किया कि आज तो खिचड़ी चलेगी ।”

"अब समझ में आया मेरी माँ को आजकल हर काम में देरी क्यों लगती है!”

“देरी तो लगेगी !सच मुझे तो माँ पर बहुत तरस  आता है ।कभी नहीं कहेगी मैं थक गई !आज तो जबरदस्ती पापा ने उनको सुला दिया है । अच्छा अब चलूँ पापा और मैं मिलकर कपड़े सुखाएँगे ,अपने खाये बर्तन भी धो डालेंगे ।”

“यह सब काम तू ---तू करता है ?मैं तो माँ की कुछ भी मदद नहीं करता ।”

“फिर तो तू बड़ी गलती करता है ।”

“हूँ! कहता  तो ठीक है ।अच्छा मैं भी चला।”

झट से अनारू रिसीवर रख रसोईघर में पहुँच गया ।देखा-माँ उसके लिए गरम गरम आलू के परांठे बना रही हैं। बीच-बीच में पल्लू से माथे का पसीना भी पूछती जाती। उसे अपने व्यवहार पर बहुत शर्म आई।थाली लेकर माँ के सामने खड़ा हो गया। “अरे तू यहाँ क्यों आ गया बच्चे ? रसोई गरमी से भभक रही है ।तू जाकर ठंडक में बैठ --मैं बाहर ही आकर तुझे दे जाऊँगी।”

अनारू की आँखें भर आईं।बोला-"माँ मुझे माफ कर दो।आप कितना काम करती हो और मैं बैठा- बैठा हुकुम चलाता हूँ।आज से मैं आपके काम किया करूँगा। बोलो माँ--क्या करूँ मैं?”

माँ एक नए अनारू को अपने सामने खड़ा देख रही थी जो दूसरी ही भाषा बोल रहा था।उसने मन  ही मन कोरोना का धन्यवाद किया जिसने थोड़े से समय में ही उसके बेटे को सहृदयी  व समझदार बना कर वह चमत्कार कर दिखाया जिसे वह शायद जिंदगी भर न कर पाती।

अप्रैल २०२० 


 




शनिवार, 2 जनवरी 2021

बालकहानी

 बच्चों का देश  पत्रिका , अंक अगस्त २०२० में प्रकाशित

बरसात की रिमझिम

सुधा भार्गव 

  

      मुझे हमेशा से ही बादलों ने रिझाया। छुटपन में बादलों को देखते ही छत पर चली जाती। नीले आकाश में बादलों की आँख-मिचौनी देखा करती। । बादलों के झुंड मुझे रेशम से चमकीले, रुई से मुलायम लगते। उन्हें देखते-देखते कल्पना की निराली  दुनिया में खो जाती। कभी मुझे नन्हें खरगोश से बादल आकाश में फुदकते नजर आते तो कभी हाथी का बच्चा अपनी सूढ़ हिलाता लगता।

      बरसात की रिमझिम बारिश  देख इंतजार करती कब बादलों से बड़ी -बड़ी बूंदें टपकें। टपकती बूंदों को देख मैं अपनी हथेली फैला देती। मोती सी चमकती बूंदों को मैं लपकना चाहती थी  । पत्तों पर ठहरी बूंदों को देख तो मेरे चलते चलते कदम भी रुक जाते। एकटक उनकी सुंदरता अपनी आँखों में भरने  लगती। देखते ही देखते बादल गरजते चीखने लगते। पटापट बरसने की आवाज से मुझे लगता लगते वे गुस्से से पागल हो गए हैं। । इतना सब होते हुए भी मेरा मन मचल उठता –“चल चल घर से बाहर जाकर नहाते हैं। ऐसी  मस्ती के समय घर में दुबककर क्या बैठना!” जैसे ही घर से पैर रखती, माँ न जाने कहाँ से आ जाती और अंदर खीचती बोलती-“ बीमार होने का इरादा है?” कभी कभी तो मुझे लगता –माँ की दो नहीं दस आँखें हैं। इसी कारण उसे हम भाई-बहनों की पल -पल की खबर होती है।

       बरसाती मौसम मेँ घर मेँ अकसर सरसों के तेल मेँ पकौड़ियाँ तली जातीं । पकोड़ियाँ कभी मूंग की दाल की होतीं तो कभी बेसन आलू की । चटनी के साथ खूब छककर खाते-----अरे छककर क्यो?—कहना होगा ठूंस ठूंस कर खाते। हम भाई-बहन मेँ कंपटीशन होता –देखें कौन ज्यादा खाता हे! सबसे खास बात तो उस दिन दूध से छुटकारा मिल जाता था। वरना रोज दूध भरा गिलास हमारे सिर पर सवार हो कहता—“पीयों—पीयो---मुझे पीयो।’’

       एक बार सारी रात पानी बरसता रहा। सुबह आँख खुली । काले बादलों की  घडघड़ाहट और दूर -दूर  तक घुप्प अंधेरा! दिल बल्लियों उछल पड़ा। आह आज तो स्कूल की टनटनानन  छुट्टी---! ज़ोर से चिल्ला उठी-बरसो राम धड़ाके से,बुढ़िया गिरे पटाके से।  फिर मुंह ढककर सो गई। सुबह की मीठी नींद पलकों पर आकर बैठी ही थी, माँ ने इतनी ज़ोर से झझोड़ा कि सीधे उठते ही बना। कान के पर्दों को चीरती एक ही आवाज –स्कूल नहीं जाना क्या?उठ जल्दी।” ।

        ऊपर नजर घुमाई –बादल तितर- बितर हो चुके थे। साथ मेँ अंधेरा भी ले गए। बहुत गुस्सा आया –स्कूल की छुट्टी होते होते रह गई। बादलों ने तो धोखा दे दिया।

     ठंडी हवा में थिरकती मैं स्कूल चल दी । रास्ते में सूरज की रोशनी मेँ पत्तों पर बूंदें मोती की तरह चमकती दिखाई दीं। मैं उनकी तरफ खींची चली गई । मैंने धीरे से छुआ ही था कि वे तो पानी की तरह बह गई । बड़ा दुख हुआ। बाद मेँ मैंने फिर कभी उन्हें छूने की कोशिश नहीं की।

      स्कूल से लौटते समय उस दिन  देर हो गई । रास्ते भर रेंगते- रेंगते जो जा रही थी । जहां थोड़ा सा पानी भरा देखती छ्पाक- छपाक करती वही से निकलती।चप्पलें कीचड़ से भर गई। फ्रॉक पर काले छींटे पड़ गए। पर मैं इस सबसे लापरवाह थी।   ज्यादा पानी देखती तो कागज की नाव बनाकर उसमें छोड़ देखती रहती ---देखती रहती--। मन करता मैं भी छोटी  सी नाव बन इसका पीछा करूँ। उफ घर मेँ तो इतने बंधन –मानो मैं मिट्टी की डली होऊं और पानी मेँ गल जाऊँगी।

     अचानक बादल का एक टुकड़ा मुझसे टकराया और उसका मोटा पेट फट पड़ा।

     “मैं गरज पड़ी-ए मोटू यह तूने क्या किया!मेरे सारे कपड़े भिगो दिये । अभी तक तो ऊपर से पानी डालता था अब हमारी धरती पर भी कब्जा जमाने की सोच रहा है।’’

     “अरे नहीं मुन्नो !मैं तो ऊपर ही खुश हूँ।  हवा को न जाने क्या शैतानी सूझी कि सरपट इतराती दौड़ने लगी ।  उसके झोंकों में झूलते-झूलते खट से नीचे आन गिरा।  तुमसे टकराते ही मैं फट पड़ा और अंदर का पानी तुम पर लुढ़क पड़ा।  अब बताओ मेरा क्या कसूर!”

     “तेरी नहीं तो क्या मेरी गलती है। घर पहुँचने में वैसे ही देरी हो गई है। कोई बहाना भी नहीं बना सकती । माँ की आँखें तो वैसे  ही दिन रात जागकर  मेरी  जासूसी करती रहती है।  भीगे कपड़े देख मेरी  चोरी पकड़ी जाएगी।एकदम समझ जाएंगी पानी में आप जानकर भीगी हूँ ।’’  

     “हा—हा-हा-हा---मुनिया चोरी तो वैसे भी पकड़ी जाती।’’ फ्रॉक पर पड़े काले छींटे को अपना मज़ाक उड़ाते देख मन किया इसका मुंह ही नोच लूँ पर ऐसा करने पर तो मेरा फ्रॉक ही फट जाता । क्या करती ---बस दाँत पीसकर रह गई।

     “अरे भोली मुन्नो –इस कल्ले छींटू की बात का बुरा न मान । यह है ही ऐसा । तेरी चोरी पकड़ी गई तो क्या हुआ !ज्यादा से ज्यादा डांट ही तो पड़ेगी। सह लेना। माँ तो तेरा हमेशा भला चाहती है। इसीलिए तो डांटती है और उसकी डांट भी तो प्यार से लबालब होती है।’’

डरते डरते मैंने घर में कदम रखा । सामने माँ को खड़ा देख सकपका गई।

     “आ गई ---लाडो---कीचड़ में नहाकर ! बहुत आजादी मिल गई है। कान खोलकर सुन ले ,इस बार बीमार पड़ गई तो तेरे पास फटकूंगी भी नहीं।’’

     मैं एकदम खामोश थी। मोटू बादल की बात कानों में गूंज रही थी और मुझे सच में माँ की डांट में प्यार नजर आ रहा था। अब तो ऐसी डांट के लिए तरस कर रह गई हूँ।

शनिवार, 28 नवंबर 2020

प्रकाशित -देवपुत्र मासिक पत्रिका ,अंक नवंबर 2002


छमछम आई दीवाली 

सुधा भार्गव

      दीवाली का दिन और लक्ष्मी पूजन का समय पर बच्चे तो ठहरे बच्चे।  वे फुलझड़ियाँ ,अनार छोड़ने में मस्त -- । तभी दादाजी की रौबदार आवाज ने हिला दिया --देव,दीक्षा ,शिक्षा जल्दी आओ --मैं तुम सबको एक कहानी सुनाऊंगा ।

     कहानी के नाम भागे बच्चे झटपट घर की ओर । हाथ मुंह धोकर पूजाघर में घुसे और कालीन पर बिछी सफेद चादर पर बैठ गये । सामने चौकी पर लक्ष्मीजी कमल पर बैठी बड़ी मनमोह लग रहीं थीं। पास में गणेश जी हाथ में लड्डू लिए मुस्करा रहे थे। 
     बातूनी देव  कुछ देर उन मूर्तियों को बड़े ध्यान से देखता रहा । उसका जिज्ञासु मन बहुत सी बातों को जानने के लिए मचल उठा।  बस लगा दी प्रश्नों की झड़ी।  “दादाजी, लक्ष्मी जी कमल पर क्यों बैठी हैं ?’’
       
कमल अच्छे भाग्य का प्रतीक है और लक्ष्मी धन की देवी है। जिस घर में वह जाती है उसके अच्छे दिन शुरू हो जाते हैं। खूब अच्छा  खाते हैं ।रोज नए कपड़े पहनते हैं। बच्चे अच्छे स्कूल में खूब पढ़ते हैं।’’

       हमारे घर में लक्ष्मी जी कब आएंगी दादा जी?उन्हें जल्दी बुला लाओ और कहो –हमारे घर में खूब सारा  रुपया –पैसा भर दें।आह फिर तो क्या  मजा! मैं तो खूब चॉकलेट खाऊँगा—खूब बम-पटाखा करूंगा।’’
          दीक्षा को अपने भाई की बुद्धि पर बड़ा तरस आया और बोली -“अरे बुद्धू !इतना भी नहीं जानता –लक्ष्मीजी  को बुलाने के लिए ही तो हम उनकी पूजा करेंगे।’’
     
देखो दीदी मुझे चिढ़ाओ मत । अच्छा तुम्ही बता दो –लक्ष्मी जी कमल के साथ कब से रहती हैं ?’’दीक्षा  सकपका कर अपने दादाजी का मुँह ताकने लगी
    बेटे,इसके पीछे भी एक कहानी है ।तुमने अपनी माँ को देखा है न !मलाई को जब वह मथती है तो मक्खन निकल आता  है। उसी तरह जब राक्षस और देवताओं ने समुद्र का मंथन किया तो सबसे पहले कमल बाहर निकला। उससे फिर लक्ष्मीजी  का जन्म हुआ। तभी से वे उसके साथ रहती हैं और उसे बहुत प्यार करती हैं।कमल का फूल होता भी तो बहुत सुंदर है।मुझे भी बहुत अच्छा लगता है।’’ दादा जी बोले। 

     ‘’आपने  तो हमारे बगीचे में ऐसा सुंदर फूल उगाया ही नहीं। ’’देव बोला। 
   बच्चे ,यह बगीचे में नहीं ,तालाब की कीचड़ में पैदा होता है।’’
   कीचड़ –वो काली काली –बदबूदार ! फिर तो कमल को मैं छुऊंगी भी नहीं।`` दीक्षा ने नाक चढ़ाई।
     पूरी बात तो सुनो !कीचड़ में रहते हुआ भी फूल ऊपर उठा मोती की तरह चमकदार रहता है।उस  पर गंदगी का तो एक दाग भी नहीं । लक्ष्मी जी तभी तो इसे पसंद करती है।''
    कमाल हो गया --गंदगी में पैदा होते हुए भी गन्दा नहीं।यह कैसे हो सकता है।``
   यही तो इसका सबसे बड़ा गुण है।तुम्हें भी गंदगी में रहते हुए गन्दा नहीं होना है।’’
     दादा जी हम तो कीचड़ में रहते नहीं ,माँ धूल में भी नहीं खेलने देती --- फिर गन्दे होने का प्रश्न ही नहीं।’’ दीक्षा बोली ।  

     “शाला  में तो तुम्हें दूसरे  बच्चे भी  मिल सकते हैं जो गंदे हों।’’

   “हमारे शाला  में कोई गंदे कपड़े पहन कर  नहीं आता। मेरी  सहेलियाँ तो रोज नहा कर आती हैं।’’ 

    “दूसरे तरीके की भी गंदगी होती है,दीक्षा बिटिया । जो झूठ बोलते हैं,,नाक- मुँह में उंगली देते हैं,दूसरों की चीजें चुपचाप उठा लेते हैं ,वे भी तो गंदे बच्चे हुए।’’

     “हाँ,याद आया परसों मोनू ने खेल के मैदान में बागची को धक्का दे दिया था और नाम मेरा ले दिया। उसके कारण शिक्षक ने मुझे बहुत डांटा। तब से मैंने उससे एकदम बोलना बंद कर दिया।’’ देव चंचल हो उठा।  

    “ठीक किया।तुमको बुरे बच्चों के साथ रहते हुए भी उनकी बुरी आदतें नहीं सीखनी है।’’  
   समझ गया समझ गया  दादा जी, हमें कमल की तरह बनना है तभी तो लक्ष्मी जी से भर -भर मुट्ठी पैसे मिलेंगे और जेब में खन-खन बजेंगे। हा –हा –खनखन –खनखन। खाली जेब में हाथ डालकर झूमने लगा।
    अब बातें एकदम बंद --। मुंह पर उंगली रखो। आँखें मीचकर लक्ष्मीजी की पूजा में ध्यान लगाओ।अरे शिक्षा तुम्हारी आँखें खुली क्यों हैं?``

     “दादा जी –मैं तो पहले गणेश जी वाला बड़ा सा पीला लड्डू खाऊँगी तब आँख मीचूंगी। मैंने आँखें बंद कर ली तो नटखट देवू खा जाएगा।’’ 

     “अरे पगली मेरे पास बहुत सारे लड्डू हैं। पूजा के बाद प्रसाद में तुझे एक नहीं दो दे दूंगा। खुश ! ’’

   “सच दादा जी ---मेरे अच्छे दादा जी।’’ उसने झट से खूब ज़ोर लगाकर आँखें मींच लीं।
    कुछ पल ही गुजरे होंगे कि बच्चे  झपझपाने लगे अपनी पलकें। बड़ों की बंद आँखें देख कुछ इशारा किया और भाग खड़े हुए तीनों, तीन दिशाओं की ओर ,पर ---पकड़े गये ।
    कहाँ भागे --पहले दरवाजे पर मिट्टी के दिये जलाओ। फिर बड़ों को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लो।’’ दादाजी ने प्यार से समझाया ।
     बच्चे दीयों की तरफ मुड़ गए। टिपटिपाते दीयों की रोशनी उन्हें बहुत भाई। उमंगभरे बच्चे दीप जलाते –जलाते गाने लगे ---
दीप जलाकर हम खुशी मनाते
छ्म छ्म आई आह दिवाली
रात  है काली काल कलूटी
फिर भी छिटका जियाला
घर लगता हमको ऐसा जैसे
पहनी हो दीपों की माला।

    गान खतम करते ही उन्होंने बड़ों के पैर छुए। इसके बाद तो हिरण सी चौकड़ी भरते बाहर भागे जहां उनके दोस्त इंतजार कर रहे थे।

    “ओए देवू --देख मेरी फुलझड़ी,ये रहा मेरा बम---- धमाके वाला-- आह अनार छोडूंगा तो फुस से जाएगा आकाश में। तू देखता ही रह जाएगा।‘’

     आई दिवाली आई –छोड़ो पटाखे भाई—मित्र मंडली चहचहा उठी।बच्चों के कलरव को सुनकर दादा जी उनकी खुशी में शामिल हुए बिना न रहे।लड्डुओं का थाल लिए बाहर ही आ गए। लड्डुओं को देख बच्चों के चेहरे चमक उठे।सबने अपनी हथेलियाँ लड्डुओं के लिए उनके सामने पसार दीं।

     “हे भगवान ! तुम्हारी हथेलियाँ इतनी गंदी—। किसी के हाथ में लड्डू नहीं रखा जाएगा। आज मैं अपने हाथों से तुम्हें लड्डू खिलाऊंगा।’’

     दादा जी देव,शिक्षा,दीक्षा के अलावा उनके मित्रों को भी बड़े प्यार से लड्डू खिलाने लगे।ऐसा लग रहा था उनके चारों तरफ आनंद और उल्लास की छ्मछ्म बरसात हो रही है । लक्ष्मी जी भी उन्हें देख पुलकित हो उठीं और पूरे वर्ष हंसने-मुस्कुराने का वरदान देकर चली गईं।

समाप्त   

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

कोरोना आया लॉक डाउन लाया

 

 4-बहनों का मिलन

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      अमीरी गरीबी दो बहनें हैं। उनमें हमेशा झगड़ा होता रहता है।  दोनों साथ-साथ  तो रह ही नहीं सकतीं। जहाँ गरीबी होती है वहां अमीरी  रहना पसंद नहीं करती  और जहाँ अमीरी होती है वहां गरीबी को घुसने की आज्ञा नहीं होती। पर कुछ दिनों से लगता है  दोनों में मेलजोल हो गया है। 

      इस बारह हजारी वकील को ही ले लीजिये  । बारह कमरे वाले शानदार घर में रहते हैं। पेशे से वकील हैं इसीलिए पूरा शहर उन्हें बारह हजारी वकील कहता  है। घर में केवल तीन प्राणी।वे, लाडला बेटा सुरखिया और मेमसाहब।मेमसाहब तो पूरी तीस हजारी हैं।तीस-तीस हजार के जेवरों से लदी -फदी रहती हैं।

      घर की देखभाल के लिए रामकटोरी हैं। बड़ी सुघड़ -!घर का सारा काम बड़ी होशियारी से निबटाती हैं। उसके बिना तो घर में पत्ता भी नहीं हिलता। मेमसाहिबा  तो उसके कारण  इतनी बेफिक्र हो गई हैं कि अपने बेटे को उसके भरोसे ही छोड़ रखा हैं। रामकटोरी अपने बेटे मुरखिया की तरह ही उसे प्यार करती हैं। दोनों के बेटे एक ही उम्र के होंगे --होंगे करीब 9 -10 साल के ।    

     मेमसाहब ने अपनी सुविधा के लिए घर के पिछवाड़े बना एक कमरा रामकटोरी को दे रखा है। ताकि सुबह ६बजे ही वह उनकी बेड टी लेकर हाजिर हो  सके। जाता तो मुरखिया भी स्कूल है पर वह बिलकुल टाट वाला--- ईंटों से बना---खपरैल से ढका मरियल  सा है। भला सुरखिया से  बराबरी कैसी !कहाँ पब्लिक स्कूल में
जाने वाला अमीरजादा और कहाँ अमीर के टुकड़ों पर पलने वाला गरीबजादा। 
    आँखें लेकिन धोखा नहीं खा सकतीं--कुछ तो बदल रहा है।वे दोनों बहनें --क्या कहते हैं अमीरी गरीबी !आमने सामने दिखाई देने लगी हैं।शायद कोई उन्हें बराबर करने -समझने वाला पैदा हो गया है।  
    गली-गली  एक ही चर्चा है--भागो--भागो कोरोना आया।उससे दूर रहो। उसके रास्ते में जो भी आता बिना भेदभाव किये वह उसे निगलने की कोशिश करता । यह जानते हुए भी मेमसाहब एक पार्टी में सजधज कर चली गईं।सोचा - “मेरे  आगे अच्छे- अच्छे सर झुकाते हैं-मजाल कि कोरोना मेरे पास फटक भी जाए।

      गई तो अकेली थी पर लौटी  दुकेली--कोरोना के साथ ।फिर तो वकील साहब ने कोरोना वायरस से छुटकारा दिलाने में हजारों खर्च कर दिए पर उनकी अमीरी के आगे कोरोना ने झुकना पसंद न किया।वह मेमसाहब के  प्राण लेकर ही रहा। अस्पताल से बाहर खड़े वे आंसू बहा रहे थे।उन्हीं के पास खड़े कुछ औरों  के चेहरे भी गमगीन थे। उन्होंने भी अपने किसी प्रिय को खोया था। वे वकील साहब की  तरह  संपन्न तो न थे पर व्यथा एक थी,आसुंओं का रंग एक था।वकील साहब बिखर से गए ।सबसे बड़ी बात जो उन्हें चुभ रही थी कि करोड़ों की संपत्ति  कुछ काम न आई।

      रामकटोरी ने अब पूरी तरह सुरखिया को संभाल लिया था ।उसके प्यार और सेवा भाव को  देख उन्हें अपने ऊपर ग्लानि होने लगी । बार बार उनके दिमाग मेन आने लगा , “जब वह उनके बेटे  की देखभाल अपने बेटे की तरह करती है तो मैं क्यों नहीं उसके बेटे को सुरखिया की तरह पब्लिक स्कूल में पढ़ा सकता हूँ।

     कुछ महीनों के बाद स्कूल खुलने पर मुरखिया को भी पब्लिक स्कूल में दाखिला दिला दिया गया । मूरखिया तो था ही बुद्दि का कुबेर और सदव्यवहारी । कक्षा में दूसरों की सहायता करने को हमेशा कमर कसे रहता।जल्दी ही उसके बहुत से दोस्त बन गए।जो उसे बहुत प्यार करते थे।  

       एक दिन हजारी वकील बोले-"मुरखिया मन करता है तुम्हारा नाम बदल दूँ। यह नाम न जाने तुम्हारा क्यों रख दिया। तुम तो बड़े चतुर हो । तुम्हारा नाम तो चतुरिया होना चाहिए। आज से हम तुम्हें चतुरिया कहेंगे।

      "यह  नाम मेरी माँ का दिया हुआ ही है। गलती होने पर मुझे डांटती  -"अरे मूरख तुझसे कूछ नहीं होगा।  एकदम मुरखिया है। लेकिन उसकी डांट भमुझे बहुत अच्छी लगती है।

        "तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली। मुझे भी अपनी माँ की डांट में मिठास लगती थी। अब मेरे दो बेटे हो गए। एक सुरखिया और दूसरे तुम चतुरिया। आओ दोनों मेरे गले मिलो।"    चतुरिया की आँखेँ खुशी से छलक पड़ीं। अपने बापू के मरने के बाद वह बड़ा दुखी रहने लगा था। पिता की तरह इतना प्यार और अपनापन उसे कई साल बाद मिला था।       

     यह मिलन का नजारा देख अमीरी और गरीबी दोनों ही कुछ देर को तो हैरान रह गईं। जो कभी न हुआ वह अपनी आँखों के समक्ष होता देख रही थीं। तभी उन्हें  कोरोना की याद आ गई। जिसके सामने उन्होंने भी घुटने टेक दिये हैं । 

     कोरोना ने गरीबी -अमीरी को मिला दिया है । जब देखो एक दूसरे की सहायता करने को तैयार रहती हैं और मृदु हास्य बिखेरती हाथ में हाथ डाले  घूमती दिखाई पड़ जाती हैं।अच्छा हो ये हमेशा प्यार -प्यार से रहें।

सुधा भार्गव