प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 18 अप्रैल 2022

पायस पत्रिका अप्रैल मास 2022 में प्रकाशित


बालकहानी 

गौरी की नूरी 

सुधा भार्गव 



 
 

  


धनराज को हमेशा चिंता रहती कि बच्चों की सेहत कैसे बने?उन्हें अपने पोते सारंगी की सेहत की चिंता तो खाये जा रही थी। एक दिन उनके दोस्त पुखराज ने सुझाव दिया -"धनराज तू एक गाय खरीद ले। "

   यह सुनकर सारंगी खुश होकर बोला , " बाबा उसका नाम रखेंगे गौरी।   लेकिन वह रहेगी कहाँ? "

    "तेरे कमरे में रहेगी। तेरे लिए ही तो गाय खरीद रहा हूँ। जिससे उसका दूध पीकर हट्टा कट्टा हो  जाये।" बाबा धनराज  मज़ाक करते ठी--ठी हंस पड़े। 

     "न --न मेरे कमरे में हरगिज नहीं रहेगी। उफ गोबर से एकदम बदबू फैला देगी।" उसने नाक बंद करते कहा। 

     "अरे क्यों खिजा रहा है छोटे से बच्चे को धनराज । बेटा चिंता न कर । उसका घर हम अहाते के एक कोने में बनवा देंगे।" पुखराज बोले । 

     अगले दिन अहाते में छप्पर डालकर गाय का छोटा सा हवादार घर बनवा दिया । दोनों मित्र बड़ी मोटी -ताजी लाल गाय खरीदकर ले आए। अब तो पौ फटते ही पुखराज सारंगी के घर आन धमकते। वे और उसके बाबा हंसी ठट्ठा करते गाय को ,चारा खिलाते ,दूध दोहते और फिर सारंगी के माँ के हाथ की गरम गरम चाय पीकर घूमने निकल जाते। 

     सारंगी  स्कूल से आकर गौरी गाय से मिलने जाता पर दूर दूर ही रहता । गौरी उसे बड़ी अजीब लगती। वह उसे प्यार भरी निगाहों से देखती, चाहती सारंगी  उसके पास आए ,उससे दोस्ती करे । पर वह  एक कोने में खड़ा उसे टुकुर टुकुर देखता रहता। 

      एक दिन सारंगी  ने ही अपनी चुप्पी तोड़ी।  बोला-"गौरी तुम हो तो बहुत सुंदर,आँखें तो  चमकती ही रहती हैं।   पर खाती कैसे हो?एकदम जंगलियों की तरह।नाद में जैसे ही चारा  देखती हो उस पर नदीदों की तरह टूट पड़ती हो । जैसे पहले कभी देखा ही न हो। जल्दी जल्दी उसे गपागप मुंह में भरकर  सटक लेती हो। चबाती भी नहीं हो ठीक से। बाबा कहते हैं छोटे- छोटे गस्से खूब चबा चबा कर खाने चाहिए।" 

    गाय हँस दी।

     "चलो तुम बोले तो । कब से तुम्हारे दो बोल सुनने को तरस रही थी। पर बिना कारण जाने तुमने मुझे न जाने क्या क्या कह दिया। पहले गायें घरों में नहीं पलती थीं। वे जंगलों में रहती थीं। तुम तो जानते ही हो वहाँ शेर चीता हमारे हजार दुश्मन!उनके डर के मारे घास-पत्ते जल्दी जल्दी मुंह में ठूँस कर भाग जाते ।बस वह हमारी आदत बन गई है।''  

     "लेकिन गौरी जल्दी जल्दी सटकने से तो पेट में दर्द हो जाता है। "

    "हमारे पेट में दर्द नहीं होता यही तो मजा है।'' 

    "क्यों! क्या तुम्हारा पेट सबसे अलग है।'' 

    "यही समझ लो। मेरे चार पेट हैं।'' 

    "क्या ?एक नहीं दो नहीं चार - चार !चार उँगलियाँ दिखाते हुए वह   आश्चर्य से उछल पड़ा। 

     "हाँ चार पेटों में बारी बारी से चारा जाकर हजम होता है। 

    "तुम तो बड़ी दिलचस्प हो।" 

    "और एक बात बताऊं?सुनकर हैरान रह जाओगे।'' 

    ''हाँ --हाँ बताओ न ।'' 

    "मैं पहले तो अपना भोजन जल्दी -जल्दी निगल लेती हूँ । फिर उसे दुबारा मुंह में ले आती हूँ।" 

    "मुझे तो सुनकर ही घिन्न आ रही है । इससे तुम्हें उल्टी नहीं होती?"

    "एकदम नहीं। फिर आराम से उसे धीरे धीरे चबाती हूँ। एक तरह से जुगाली करती हूँ।'' 

    "न जाने तुम कैसे चबाती हो?चप चप की आवाज होती रहती  है । मुझे यह एकदम अच्छा नहीं लगता। खाते समय कोई आवाज करता है क्या?मुंह बंद करके खाना चाहिए।''

     "मैं मुंह बंद करके नहीं खा सकती। मेरे केवल नीचे के जबड़े में दांत है ऊपर नहीं।चारे को मुंह में घुमाते हुए चबाना पड़ता है ।"  

    "यह कैसे हो सकता है!मुंह खोलो जरा देखूँ तो।" 

    उसने नीचे झुककर उसके खुले मुंह में झाँका तो आँखें चौड़ गईं। । 

     "बाप रे  तुम्हारे तो ऊपर के दांत हैं ही नहीं।  पर ऊपर का जबड़ा बहुत पैना लग रहा है। लगता है दांत 

निकलते निकलते अंदर ही रह गए। अच्छा अब तुम जुगाली करो पर देखो गौरी ,कल की तरह लार जरा भी न टपकाना।" 

    "लार तो मैं जरूर टपकाऊंगी ।" 

    "तब तो मैं चला।"

    " ओह सारंगी रूठो मत। मेरे चारे में नमक मिला रहता है उससे लार ज्यादा बनती है। अब बताओ मैं क्या कर सकती हूँ।'' 

    "मैं बाबा से कह दूंगा कल से वे नमक न डालें।'' 

     "न -- न  ऐसा कभी न करना। लार पैदा होने से खाना मेरा जल्दी हजम हो जाता है। पेट हल्का होने से मैं खुश रहती हूँ। मैं जितना खुश रहूँगी उतना ही ज्यादा मीठा -मीठा दूध दे पाऊँगी।" 

    "और जितना मीठा दूध मैं पीऊँगा उतना ही मैं खुश रहूँगा। वह भी उछलता बोला। सारंगी ने पहली बार गौरी के सिर को प्यार से सहलाया।" 

      दोनों में अच्छी ख़ासी दोस्ती हो गई। शाम होते ही गौरी  सारंगी  को याद करती और  रंभाने लगती। सारंगी भी अपना खेल छोड़ गौरी  के पास भागा चला आता। 

        कुछ दिनों के बाद सारंगी  ने देखा गौरी  के पास उससे मिलता जुलता छोटा सा एक बच्चा खड़ा है और वह उसे चाट  रही है। देखने में बड़ा सुन्दर ,कोमल सा दूध सा सफेद । उसका मन चाहा वह भी उसे छूए , गोद में लेकर  प्यार करे। 

     "गौरी  यह तुम्हारा बच्चा है!मुझे  बहुत अच्छा लग रहा है ।" 

      "बच्चा नहीं बच्ची है। हाँ ,मैं इसकी माँ हूँ । इस प्यारी सी नूरी को मैं जरा दूध पिला लूँ तब तुमसे बात करूंगी। यह भूखा रही  तो मुझे चैन नहीं मिलेगा। "

     "नूरी --गौरी की नूरी। वाह बहुत अच्छा नाम सोचा। हाँ पहले नूरी का पेट भर दो । मेरे भूखे रहने पर मेरी माँ भी ऐसा कहती है। "

     माँ शब्द सुनकर गौरी की आँखें चमकने लगी । उसे माँ बनकर बहुत अच्छा लग रहा था। 

घर में सब गौरी और नूरी का बहुत ध्यान रखते । एक हफ्ते में तो नूरी और भी सलोनी लगने लगी।सारंगी  को नूरी के साथ खेलना बड़ा अच्छा लगता। 

      एक शाम जब सारंगी गौरी से मिलने गया तो वह उसे बड़ी सुस्त लगी। नूरी उस समय अपनी माँ का दूध पी रही थी। उसके नजदीक आया तो वह चौंक पड़ा -"अरे गौरी तू  रो रही है ?"अब तो   उसके आँसू और तेजी से बह चले। सारंगी बड़ा दुखी हो उठा। उसने उसे पुचकारा -"बता न गौरी क्या हुआ।'' 

     "सारंगी  कल मैंने दूध कम दिया था ।दद्दा ने सोचा  नूरी कुछ ज्यादा ही दूध पी गई है।इसलिए आज उन्होंने  पहले नूरी को मेरे से दूर खूँटे से बांध दिया । फिर सारा दूध निकाल लिया । मैं खड़ी खड़ी लाचार अपने भूखे बच्चे को तड़पता देखती रही। उसके हिस्से का दूध तुम सबके लिए देती रही। यह कैसी मजबूरी है। मेरा बच्चा मेरे दूध के लिए तड़पे और उसके हिस्से का दूध दूसरों की भूख मिटाये।" 

    "तू रो मत गौरी । कल से यह नहीं होगा।'' 

     "कल भी होगा। क्योंकि दूध मैंने आज भी कम दिया है ।" 

    "आज कम क्यों दिया?" 

    "आज मैं बहुत दुखी थी। ऐसे में दूध नहीं दे पाती। भूल गए मैंने एक बार कहा था -ज्यादा खुश होने पर ही ज्यादा दूध दूँगी।" 

     "तू ठीक कह रही है गौरी । मैं बिलकुल तेरी तरह हूँ। मैं भी खुश होने पर खूब पढ़ता हूँ। पाठ फटाफट याद हो जाता है। दुखी होकर पढ़ने बैठता हूँ तो धिल्ला भर दिमाग में नहीं घुसता। अच्छा मुझे सोचने दे । देखूँ तेरे लिए क्या कर सकता हूँ।"   

      रास्ते भर कुछ न कुछ तरकीब भिड़ाता सारंगी घर पहुंचा।मेज पर दूध का गिलास रखा था। उसने उसे छुआ तक नहीं, पीने की बात तो बहुत दूर की रही। बार बार उसकी आँखों के सामने गौरी का आँसू भरा उदास चेहरा आ रहा था। 

     माँ ने टोका -"अरे तूने दूध अभी तक नहीं पीया।" 

    "माँ मैं नूरी के हिस्से का दूध गले से नीचे नहीं उतार सकता। आज वह भूखी है। मैं भी भूखा रहूँगा।"  सारंगी ने गुस्से में भरकर कहा। 

    "यह नूरी कौन है?"

     "गौरी की बच्ची । "

     "ओह बछिया की बात कर रहा है। तुझे कैसे मालूम वह भूखी है?"

     "मैं खुद देखकर आ रहा हूँ। दूध निकालने से पहले बाबा ने उसे माँ से अलग कर दिया और सारा दूध निकालकर आ गए। अब नूरी क्या पीये  बोलो।उसके हिस्से का दूध तो मैं चख भी नहीं सकता। माँ मेरे भूखे रहने से आप कितनी दुखी हो। गौरी गैया भी इतनी ही दुखी होगी। मालूम है वह क्या कह रही थी !वह कह रही थी --जितना मैं खुश होती हूँ उतना ज्यादा दूध देती हूँ। दुखी होने पर दूध कम देती हूँ।" कहते कहते उसकी  आँखें भर आईं। 

 

     सारंगी  की माँ उसका मुंह देखती रह गई। जो बात घर के बड़े न समझ सके भोला -भाला बच्चा उसे पल में भाँप गया। उसने  उसे अपने कलेजे से लगा लिया। बोली -"बेटा कल से न नूरी भूखी रहेगी और न ही उसकी माँ उदास। अब अपनी भूख हड़ताल तो बंद कर दे। "

    " न माँ मुझसे कुछ खाने को न कहो। मैं सुबह ही दूध पीऊँगा जब नूरी भर पेट दूध पी लेगी। " 

अपनी बात का पक्का सारंगी  भूखे पेट ही सो गया। 

     उसके बाबा को जब पता चला  तो वे परेशान हो उठे। सारी रात करवटें बदलते रहे।  सुबह आप जानकर  वे दूध दुहने देर से पहुँचें ,तब तक नूरी अपनी माँ का  दूध भरपेट पी चुकी थी। उस दिन वाकई में गौरी ने खूब दूध दिया --इतना ज्यादा दूध कि बर्तन से बाहर छलक छलक  पड़ता। 

    सारंगी  ने  भूख हड़ताल खतम करके  गौरी का मीठा दूध छककर पीया । फिर तुरंत वह नूरी और गौरी से मिलने चल दिया। उस समय नूरी उछलती कूदती अपनी माँ के चक्कर लगा रही थीऔर गौरी  --वह तो ममता की चादर में लिपटी अपनी नूरी को बस  निहारने में लगी  थी।उनको खिला खिला देख सारंगी  भी खिल उठा। सारंगी की आहट पा गौरी ने गर्दन घुमाई । मोती सी चमकती दो आंखें अपने दोस्त का धन्यवाद करने लगीं। 


मंगलवार, 1 मार्च 2022

बालकहानी



बच्चों का देश राष्ट्रीय बाल मासिक पत्रिका ,मार्च 2022 में प्रकाशित मेरी  कहानी 
माँ की छांव
सुधा भार्गव 





गुरुवार, 27 जनवरी 2022

इंद्रप्रस्थ भारती मासिक पत्रिका





इन्द्र प्रस्थ भारती बालसाहित्य विशेषांक 
नवंबर -दिसंबर 
2021








इस पत्रिका में मेरी तीन कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। गुट्टू की बगिया दादी,धन्यवाद कोरोना,सुनहरी कढ़ी।यहाँ केवल एक पोस्ट की है।  

गुट्टू  की बगिया 

भूरी-भूरी  आँखों वाला एक बालक था जिसका नाम था गुट्टू। शरारत तो उसके अंग अंग में समाई हुई थी । बातूनी इतना मानो  उसके पेट में कोई गपोड़िया गहरा कुआं  हो  जो खाली होने का नाम ही नहीं लेता था । 

     वह अपनी दादी को बहुत प्यार करता था। कुछ दिनों से उनका बाहर जाना बंद था पर गुट्टू से उनकी खूब चटर पटर होती रहती। गुट्टू खुश कि उसकी कोई बात तो सुनने वाला है --दादी खुश कि चलो समय कट रहा

है ।

     कभी कभी उसकी दादी बहुत उदास हो जाती ।उसे  वे दिन याद आते जब अपनी सहेली रामकली और हरप्यारी  के साथ  मंदिर जाती।  कभी आइसक्रीम का स्वाद लेने पोते के साथ बाजार चल पड़ती । अब तो आह भर कर ही रह जाती --न जाने वो दिन लौटकर आएंगे भी या नहीं। 

      एक दिन दादी बड़बड़ा उठीं- 

      “ क्या तमाशा लगा रखा है !कभी लॉक डाउन ख़तम हो जाता तो कभी फिर से लोकडाउन शुरू कर देते ।पर क्या फर्क पड़ता ---हम राम तो घर में पहले की तरह ही लॉक  हैं।   जिंदगी में कभी इतने दिन लगकर घर में न रही।न जाने क्या पाप किया था जो ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं।"

 फिर  ऊंची आवाज में बोली,"ओ लक्खी बेटा -मुझे आज जरा कार में बैठाकर सैर करा  ला।सुना है कुछ बाजार खुल गए हैं । और हाँ मेरे साथ मेरा गुट्टू भी चलेगा। बेचारा चारदीवारी में कैद होकर रह गया है।” 

     “माँ ले तो चलूँगा पर किसी  दुकान पर नहीं उतरोगी ।” 

     “तो फिर जाकर क्या करूँगी ।  आधा घंटा तैयार होने में लगाऊँ ,नई साड़ी  की तह  ख़राब करूँ और कार में ही बैठी रहूं । रहने दे --मैं घर में ही भली।  घर में बैठी रहूँ  या कार में बात तो  एक  ही हुई ।” बूढ़ी मॉ झल्ला उठी । 

         माँ की व्याकुलता देख बेटा उदास हो गया । उसका मन बहलाने को बोला-“अच्छा माँ तुझे कुछ खरीदना हो तो बता, मैं एमोजॉन से मंगा  देता हूँ ।” 

     "ये अम्माजान तेरी कौन सी आ गई!सामान बेचे है क्या ?"

    "ओह मेरी माँ यह एमोजॉन बहुत बड़ी दुकान है । घर बैठे ही सामान  पहुंचा देगी ।" 

      “अरे मुझे कुछ न खरीदना । दूकान पर जाकर कोई जरूरी है कि खरीदो ही खरीदो । नई सुन्दर चीज देख आँखें भी तो मुस्कुराती हैं । मन खुशी से हवा में उड़ने लगता । तभी तो बाजार जाने को मन मचल उठा। ।” 

         इतने में गरमी से तपती गौरी बहू घर में घुसी । उसका खाली थैला देख गुट्टू के पापा  और उसकी बूढ़ी माँ दोनों ही चकित हो गए ।

      “एक घंटे में तुम्हें कोई सब्जी नहीं मिली!गुट्टू के लिए चार आम ही ले आतीं ।”गुट्टू के पापा बोले ।  

    “आपको आमों की पड़ी है बाहर जाकर देखिये कितनी लम्बी लाइन है । ज्यादातर लोगों ने मास्क ही नहीं लगा रखे ।दुकानों पर भुक्कड़ों की तरह टूटे पड़  रहे हैं। २ गज की बात छोड़ो दो इंच की भी दूरी नहीं बना रखी है । लगता है कोरोना उनका दोस्त है----किसी भी हालत में उनके पास नहीं फटकेगा ।  उफ !मैंने तो दूर खड़े बहुत इन्तजार किया---- अब बारी आये --अब बारी आये ।मेरी तो बाबा हिम्मत जबाब दे गई  भीड़ में घुसने की ।” 

     “पहले की तरह होम डिलीवरी क्यों न  करवा ली बहू । दुकानें तो खुल गई हैं।”दादी बोली ।  

    “माँ, मालिकों ने दुकाने तो खोल दी हैं पर उनकी मदद को कोई कर्मचारी न आया होगा ।”बेटे ने समझाया ।  

    “ओह समझी । अब तो घर में बैठे मुझे भी कुछ करना  पड़ेगा। हो  गया  बहुत आराम !मेरा पोता  कहाँ है?--अरे गुट्टू --ू ओ गुट्टू   कहाँ हैं बच्चे ?”

      खरगोश की तरह फुदकता गुट्टू आन  खड़ा हुआ -प्यारी दादी तुम्हारा गुट्टू आ गया!” 

    “तेरी मुठ्ठी में क्या है रे ?”

वह मुट्ठी खोलता बोला-”पांच गुट्टे!कल तुमने पांच गुट्टे का खेल सिखाया था न!उसी को बार- बार खेल रहा था। आज तो तुम्हें हरा कर रहूँगा।” 

    “ओह,पचगुट्टा--हो--हो --हो।” दादी जोर- जोर से हंसने लगी।  हँसी थमी तो बोली-”गुट्टू आज मैं तुझे दूसरा खेल सिखाऊंगी ।”

    “माँ मुझे भी सिखा दो।”गुट्टू का लक्खी पापा बोला। 

    “अरे तू बड़ा हो गया है--तुझे क्या सिखाऊँ !”

    “माँ मैं भी तो तेरा बच्चा हूँ ।कभी कभी मन करता है पहले की तरह तू मेरे बालों में अपनी अंगुलियां घुमाये --मेरे नखरे उठाये ।मुझे तो लगे तू मुझसे ज्यादा अपने पोते को प्यार करने लगी है। "

    "क्या कह रहा है !जो मन में आता बोल देता। रे--रे तेरी कोई जगह ले सकता है क्या!”बेटे के दिल में अपने लिए इतनी चाहत देख माँ का दिल बाग़  -बाग़ हो गया । 

    “अच्छा चल पिछवाड़े ---वो हमारी फुलबाड़ी है न ,उसी के पास सागबाड़ी बनाते हैं। ।सब्जियों की किल्लत कुछ तो कम होगी ।”

   “ओह दादी किचिन गार्डन !पर बिना माली के कौन जमीन खोदेगा ,कौन उनकी देखभाल करेगा। 

     "अरे मैं सब जानूँ हूँ। मेरा चाचा किसान था । सारे दिन खेतों में तितली की तरह उड़ती रहती। 

      "पर माँ कुछ भी बोने के  लिए तो बीजों की जरूरत होगी ।तुम  बताओ  क्या -क्या चाहिए मैं एमोजोन  से मँगा दूँगा।” 

     “तूने तो एजी  --ओजी  की रट  लगा रखी है  ।बीज तो रसोई में ही मिल जायेंगे।”फिर अपनी बहू को दमदार आवाज लगाई -”ओ  गौरी ज़रा सुन तो--थोड़ा सा साबुत कुचला  धनिया ,मेथी दाना  ,सौंफ ,पुदीना  ,और  सूखी मिर्चे तो दे दे।  आज इन्ही से अपनी साग-भाजी की बगिया शुरू करती हूँ।” 

     “अरे वाह दादी  वाह !फिर तो मेथी दानों से मिथिला रानी ,धनिये से धन्नो रानी छनकने लगेंगी । अब खाने को मिलेंगे मेथी के पराँठे और धनिये की चटपटी सब्जी। "

     "मन के गुब्बारे ज्यादा न फोड़ । चलकर कुछ कामकर । देख तेरे पापा ने क्यारियाँ बना दी हैं। तू इनमें से पत्थर और घास बीनकर निकाल। "

    दादी ने एक मिनट की भी देर किए बिना  अपने अनुभवी हाथों से एक में कुचला धनिया दूसरी में मेथी दाना और तीसरी में सौंफ छिड़क दी।  पुदीना उठाकर बड़ी चतुरता से उसकी जड़ें काटी और मिट्टी में घुसेड़ दीं।

    “,दादी  मिर्ची  तो सूखी बीमार सी लग रही हैं।  इसे फ़ेंक दो । मैं फ्रिज से अभी मोटी ताजी निकालकर लाता हूँ ।” गुट्टू बोला ।

      “अरे ठहर तो --कुछ ही दिनों में ये  सूखी मिर्ची ही हरी -हरी मोटी  मिर्चों को जन्म दे देंगी।” 

      गुट्टू और उसके पापा अचरज से दादी माँ को देखने लगे । दादी ने भी कमाल कर दिया। मिर्ची को तोड़ा और झट से उसके बीज अलग एक क्यारी में फैला दिए । उसकी  आँखों में खुशी झिलमिलाने लगी।रोज दिन में दो बार तो वह अपनी बगिया के चक्कर लगा ही लेती पर अकेली नहीं अपने दुलारे पोते के साथ । उसके बिना तो दादी की दाल गलती ही न थी। इंतजार करती कब छोटी -छोटी सुकुमार कोंपलें निकले! कब हवा में सौंफ और  मेथी की खुशबू घुल जाए! दादी की देखभाल और प्यार का यह असर हुआ कि जल्दी ही नन्हें पौधे हँसते -खिलखिलाते निकल आये । दादी को देख उसकी  और झुक झुक जाते और कहते - दादी माँ तुम बहुत बहुत प्यारी हो  । कच्ची सौंफ की पत्तियां बहुत बारीक थीं ।उनके सुंदर गुच्छे तो हवा में लहराते दादी के पैरों को चूमने  लगे ।  धीरे से फुसफुसाते -तुम हमारी भी दादी हो । हमें भूलना नहीं ।

     धीरे -धीरे दादी की बगिया महकती हुई बढ़ती  गई । गुट्टू को इस बगिया में बड़ा आनंद आता। उसमें छोटे -छोटे लाल टमाटर अपनी गोल गोल आँखें घुमाते उसकी ओर देखते तो लगता वे उसी का इंतजार कर रहे हों । अदरक -मूली को किसी की चिंता न थी । वे तो  बड़े मजे जमीन में पैर पसारती सोती रहतीं।  पर लौकी बड़ी सावधानी से मचान पर चढ़ कर पहरा देती । गुट्टू को तोरई बड़ी अच्छी लगती क्योंकि वह उसी की तरह  शैतान थी । उसकी बेल ने बांस से बनी छत पर बड़ी तेजी से कब्जा जमा लिया। उससे लटकती तोरई खूब इतराती और  हवा में मस्ती से कलाबाजियाँ करती।  लौकी  को छेड़ने के लिए आप जानकर उसके सिर से बार -बार टकराती --टक--टक --।  गुट्टू यह देखकर खूब उछलता और तालियाँ बजाता। बेचारी लौकी अपना सिर थाम कर रह जाती। पर गुस्सा जरा भी  न करती । तोरई को  छोटी बहन समझकर माफ कर देती । पोधीना, धनियाँ ,मेथी   की  कोमल पत्तियाँ हवा में  झूमतीं   तो  लगता जैसे हरा लहंगा पहने नन्ही-नन्ही  परियाँ गुट्टू  से मिलने आई हैं। उसका मन करता उन्हें गले लगा ले। 

     दादी -पोते के प्यार को पाकर सब्जियाँ बहुत खुश हुईं।और तेजी से बढ्ने लगीं। ज्यादा उगने पर दादी ने उन्हें पास-पड़ोस में भेजना शुरू कर दिया । पड़ोसी तो अवाक रह गए।  --दादी का यह कैसा करिश्मा !घर बैठे ही  ताजी सब्जी। गुट्टू की तो बस पूछो ही मत। जब भी मौका मिलता फोन पर डट जाता और शुरू हो जाते  चतुर दादी के किस्से  । थोड़े दिनों में ही गुट्टू की दादी मोहल्ले भर की बगिया दादी बन गई।

समाप्त  













 

शनिवार, 6 नवंबर 2021

बालकहानी- पायस ऑनलाइन डिजिटल मासिक बालपत्रिका


अनोखे दीपक 

सुधा भार्गव 


    "अरे सिट्टू कल दीवाली है।  सबके चेहरे गुलाब की तरह खिले हैं  और तू -तू इतना उदास ?तेरी माँ ने डांट पिला दी है क्या ? कर रहा होगा कोई शैतानी।वह भी क्या करे ! है भी तो तू एक नंबर का उधमबाज ।" 

     "ओह दादू !न जाने क्या बोलते जा रहे हो । मेरी  तो सुनो।" 

     "मेरा सिट्टू तो आज बड़ा सीरिअस है। चल बता तेरे दिमाग में क्या तूफान उठ रहा है?"

     "दादू इस बार दीवाली कैसे मनाऊँगा । माँ ने चीनी लाईट खरीदने को मना कर दिया है और पापा --उन्होंने तो वह झालर भी  कूड़ेदान में फेंक दी जो पिछले साल खुद ही बड़े शौक से खरीदकर लाये थे। न जाने उनको अचानक क्या हो गया है।"  

     "बेटा ,दीवाली पर दूसरे देश की बनी लाइट ,झालर,पटाखे  हम खूब खरीदते हैं। इससे हमारा पैसा विदेशों  में चला जाता है । इसे तो रोकना होगा। 

     "पर बिना उनके दीवाली की रौनक तो गई। " 

      "कैसे चली गई। फुलझड़ी ,झालर हमारे देश में भी तो बनती हैं। उनको खरीदकर घर का पैसा घर में ही रहेगा।अपने देश के बने मिट्टी के दिये जलाकर अंधेरे को भागा देंगे ।एकदम स्वदेशी दीवाली मनेगी स्वदेशी दीवाली। टन टनाटन टन दीयों की बारात सजी होगी । उसमें शामिल होने को लक्ष्मी जी भी भागी चली आएगी।" दादू भी सिट्टू के साथ दूसरे सिट्टू लगने लगे। 

     "हमारे घर में भी ---। तब तो हम मालमाल हो जाएँगे। पर बिजली की लाइट तो बहुत रोशनी देती है। उतनी रोशनी करने के लिए तो हजारों दिये चाहिए । इतने दीये आएंगे कहाँ से दादू। '' 

   "हूँ --बात तो तुम्हारी ठीक है।  इस वर्ष तो हजारों  दीपक की माँग होगी। अरे वो देखो मनमौजी कुम्हार  आ रहा है । चलो इसी से  पूछते हैं।"  

     दादू और सिट्टू को देखते ही मनमौजी  गदगद हो उठा । बोला---"भैया हमारे तो दिन फिर गए। लो मुंह  मीठा करो। शुद्ध घी के हैं।  घरवाली  ने बनाए हैं। इस बार तो हजारों दीये बनाने पड़ेंगे । दो जगह से  हजार -हजार के दो ऑर्डर भी मिल गए । चमत्कार हो गया। लक्ष्मी की किरपा समझ लो।"

     "हाँ मनमौजी  अब तो हर दीवाली पर तुम खुशकिस्मती का दिया जलाओगे। तुम्हारे कारण ही हम भी स्वदेशी दीवाली धूमधाम से माना पाएंगे । मेरे पोते को तो विश्वास ही नहीं हो पा रहा है कि बिना विदेशी पटाखों और दीयों के दिवाली भी मन सकती है।"      

     "मनमौजी काका  लाखों दीये कैसे बनाओगे? दो दिन बाद ही तो दीवाली है।मुझे तो बड़ी चिंता हो रही है। दीये नहीं मिले तो हमारी दीवाली भी गोल ही समझो। "परेशान सा सिट्टू बोला। 

     "अरे बिटुआ  हमने तो दो माह पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है । देखते जाओ  हम  मिट्टी के ऐसे सुंदर- सुंदर दीये बनाएँगे कि मन ललच ललच जाएगा। मैं तो सोच रहा हूँ इस बार  मिट्टी के साथ गोबर मिलाकर दीये बनाऊँ।" 

    "छीं छीं --गोबर की बदबू ही बदबू फैल जाएगी। कौन खरीदने आयेगा ?मेरा तो सुनते ही जी मिचला रहा है।"सिट्टू ने नाक कसकर बंद कर ली।  

     "वह तो मैंने तुम्हें बता दिया वरना  बनने के बाद तो पता ही नहीं चलता कि गोबर के बने हैं। इससे मिट्टी की बचत भी हो जाएगी और दीवाली के बाद ये खाद बनाने के काम आ जाएँगे। इनको गमलों में या किचिन गार्डन में डाल सकते हैं।" 

     "अरे वाह ये तो जादू के दीये हो गए। तब तो मैं अपने कमरे से बाहर रखे गुलाब -चमेली के गमले में दीये रख दूंगा। उनके जादू से गुलाब बड़े बड़े हो जाएँगे। "सिट्टू एकाएक चहक उठा। 

     "यह तो मनमौजी तुमने पते की बात कही। न किसी तरह की गंदगी न प्रदूषण । गोबर के दीये तो एक तरह से इकोफ्रेंडली हुये। पर तुम इन्हें बनाओगे कैसे। तुम्हारा बेटा तो काम में हाथ बँटाना ही नहीं चाहता।"  

      "अरे बाबू हम बोले न !हमारे तो भाग जग गए।  अब तो मेरा सारा परिवार इसमें लग गया है। सबके दिमाग में नई नई बातें उमड़ घुमड़ रही हैं। सुरगू की तो क्या कहूँ !कहाँ उसे मिट्टी छूने से चिढ़ थी और अब शहर न जाने की कसम खा ली है । एक दिन बोला- -बापू तेरे साथ रहकर अपने दादा-परदादा के धंधे को आगे बढ़ाऊंगा। 

    "हमारे लिए तो गोबर के दीये नई बात है। हमने तो कभी सुना नहीं!"दादू बोले। 

     "जरूरत पड़ने पर तरकीब अपने आप ही जन्म ले लेवे हैं। हमारे पास गोबर का पहाड़ है पर उसकी कीमत कभी समझी ही नहीं। "

     "काका गोबर से दीपक बनाते कैसे हो?जल्दी बताओ। फिर मैं अपने दोस्तों को बताकर उन्हें हैरान कर दूंगा।"सिट्टू बहुत कुछ जानने को उतावला था।  

    "अरे बड़ा सरल है बनाना बच्चे । सूखे गोबर को पहले महीन पीस लेवे हैं। फिर उसमें मिट्टी  मिलाकर गूँथना पड़े  हैं। मेरी  दोनों बिटियाँ तो छोटे छोटे हाथों से बड़े अच्छे दिये बनावे हैं। बनाती चली जाएंगी --बनाती चली जाएंगी। थकती भी नहीं। ऐसा जुनून छाया हुआ है सब पर दीपक बनाने का।  2-3 दिनों तक धूप में सूखने के बाद तुम्हारी काकी बहुत से रंगों से उनपर चित्रकारी कर देती है।


मैं तो गोबर में कपूर भी थोड़ी सी डाल दूँ हूँ  जिससे हवा खुशबू से भर जाये।"  

    "पहले के दीयों से  गोबर के दीये   तो  एकदम अलग है।हीरो है हीरो ।क्यों दादू ठीक कह रहा हूँ न !"

    "इसकी एक बड़ी खासियत है । यह  तेल नहीं सोखता दूसरे जलते समय इसमें घी और कपूर की खुशबू भी आती है। "मनमौजी बोला। 

    "अरे वाह !यह नया दीया तो  कमाल का है! जब मैं छोटा था दीवाली पर बहुत सारे मिट्टी के दिये खरीदे जाते थे। पहले पानी में कई घंटों के लिए डूबा देते थे। फिर  हम भाई बहन  उन्हें निकाल एक पेपर पर फैला देते या धूप में रख देते। माँ कहा करती ऐसा करने से दीये ज्यादा तेल नहीं पीते। गोबर के दीये से तो तेल भी बच गया और पानी में भिगोने का झंझट भी खतम । ऐसे नए नए विचार तुम्हें कब से सूझने लगे !"दद्दू उत्साहित से बोले। 

    'पहले कभी दिमाग में आया ही नहीं बाबू कि लोग बदल रहे हैं समय बदल रहा है ।लोगों की पसंद बदल रही है । उसके अनुसार अपने काम करने के तरीके में में बदलाब लाना चाहिए।  उठने की तो कोशिश की नहीं ,अपना काम छोटा है हम छोटे हैं यह सोचकर अपने को अपनी ही आँखों में गिरने लगे। आत्मनिर्भर भारत की पुकार से हम  जाग गए । नतीजा आपके सामने है।" 

     "मनमौजी ,दीपक रोशनी ही नहीं करता बल्कि हमारे अंदर के अंधकार को भी मिटाता है। सच्चे अर्थों में तो इस दीवाली पर तुमने ही दीपक जलाया है।" मनमौजी अपनी तारीफ सुनकर फूला न समाया । 

    "काका अब तो मेरा दोस्त कक्कू भी दीवाली मना लेगा ।  मैं अभी उसे जाकर बताता हूँ  कि गोबर के दीये कम तेल पीते हैं।  बड़ा खुश होगा। उसकी माँ के पास बहुत कम पैसे रहते हैं न । वह ज्यादा तेल  नहीं खरीद पाती।" 

     "अरे बेटा दीवाली के समय खाली हाथ न जा। ये ले दस गोबर के दीये । उसे मेरी  तरफ से दे दीजो।"

     मनमौजी तुमने गोबर से दीये बनाकर  जैसे बड़ा काम किया है वैसे ही तुम्हारा दिल भी बड़ा है। मेरे लिए भी 100 दीये रख देना ।  लो ये रुपए एडवांस में।" 

"अरे बाबू इतनी जल्दी क्यों?। बाद में ले लूँगा।" 

"न मनमौजी !आई लक्ष्मी वापस नहीं करते ।मुस्कुरा कर उसने रुपए ले लिए।"

    मनमौजी का अंग अंग खुशी से  गुनगुना रहा था। उसका सारा परिवार बड़े उत्साह से अनोखे दीये बनाने में जुट गया।

समाप्त 

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

उत्सवों का आकाश

  भाई दूजोत्सव

न्यारी प्यारी दुनिया

सुधा भार्गव

भोर ही चिड़ियों की चहचहाट सुन घूघर का मन नाच उठा । कहने को तो वह दो बच्चों की माँ हो गई थी। लेकिन आज भाईदूज के दिन  बचपन की उस चौखट पर जाकर खड़ी हो गई जहां भाई का हाथ पकड़ जिद किया करती थी मुझे क्लिप चाहिए,मुझे तो चूड़ियाँ चाहिए पर आज तो उसे कुछ और ही चाहिए था भाई से नहीं भगवान से। यही कि हे भगवान मेरे भाई की लंबी उम्र करो। वह खूब खुश रहे।

जल्दी से घर के कामों को निबटाने लगी साथ ही कुछ गुनगुनाती भी जाती। अपने बेटे गुलाल को देखते ही बोली-"अरे जल्दी नहा धोले। अपनी बहन को भी जगादे ।

" अरे परसों ही तो जल्दी जल्दी नहाया था। दीवाली फिर आ गई क्या!"

“तू ठीक कह रहा है । आज मेरे मन की दीवाली है। मेरा मन तो तेरे मामा में ही अटका रहता है। बड़ा प्यारा भाई है। दोपहर को तेरा मामा मुझसे टीका करवाने आने वाला है। खाना भी उसका यही हैं।"

"अच्छा! मामा के आप टीका करोगी!"

"अरे इसमें हैरत की क्या बात है। जैसे तेरी बहन तुझे टीका लगाएगी वैसे ही मैं अपने भाई के लगाऊँगी।जब मैं छोटी थी तब से टीका करती आई हूँ।" 

"ओह आपके समय भी भाई दूज होती थी!" भोले भण्डारी गुलाल ने पूछा। 

बेटे की मासूमियत पर घूघर ज़ोर से खिलखिला उठी । प्यार से उसे बाहों में लेती  बोली - "बेटा इस त्यौहार का सम्बंध तो भाई बहन से है । सुनते हैं बहुत पहले दो भाई -बहन थे। बहन का नाम यमुना और भाई का नाम यम। दोनों में बड़ा प्यार । यमुना बहुत सरल स्वभाव की थी । सब उससे मिलना चाहते। पर यम को तो देखते ही लोग इधर उधर दुबकने लगते। वह उनके प्राण लेने आया करता था। यमुना यह देख बड़ी परेशान हो जाती। 

"यमुना कैसी बहन थी !उसने अपने भाई को इतना गंदा काम करने को मना भी  नहीं किया !"

"अरे वह तो बड़ी चतुर थी। दूसरों के भाइयों को बचाने की तरकीब निकाल ही ली उसने।" 

"क्या तरकीब निकाली माँ?" वह जानने को उतावला हो उठा। 

"एक बार उसने यम भाई को दीवाली के दो दिन बाद दूज के दिन  घर बुलाया । उसके लिए बड़ा स्वादिष्ट भोजन बनाया और अपने हाथों से भाई को खिलाया। यम बड़ा खुश हुआ और बोला- "बहन तुझे क्या चाहिए?"

"भैया मुझे न रुपया पैसा चाहिए और न हीरे मोती । बस तुम इसी तरह हर साल आज के दिन मेरे पास आते रहना। लेकिन एक इच्छा है।" 

"जल्दी बता तेरी क्या इच्छा है। मैं चुटकी बजाते ही उसे पूरा कर दूंगा।"

"भैया, अगर मेरी तरह कोई बहन आज के दिन अपने भाई को घर बुलाकर टीका करे और उसे खाना खिलाए तो उसे तुम्हारा कोई डर न रहे।इस बात का मुझसे वायदा करो। 

यमराज ने यमुना की बात मान ली। तभी से दूज के दिन बहन भाई की रक्षा के लिए टीका करती चली आ रही है। नाम भी इसका भाईदूज पड़ गया।" 

"माँ भाईदूज की कोई कहानी सुनाओ न ।" गुलाब बोला। 

"अरे अभी समय कहाँ?पहले नहा- धोकर तुम दोनों भाई - बहन तैयार हो जाओ। जब तेरी बहन टीका करेगी तब सुना दूँगी।" 

दोनों भाई बहन कहानी सुनने के लालच में नए- नए कपड़े पहनकर जल्दी ही हाज़िर हो गए। अब तो माँ को कहानी सुनानी ही पड़ी।उसने शुरू की कहानी -


चटपटी चाट



सुनो गुलाल और मेरी गुलबानो

 भाई दौज का त्योहार आने वाला था । भाइयों की मंडली बातों में मगन थी।कोई कहता—मैं तो अपनी बहन को घड़ी दूंगा ---अरे मैं तो उसे बातूनी गुड़िया दूंगा –ऊह--मेरी बहन के पास तो गुड़ियाँ बहुत हैं उसे पैन देना ठीक रहेगा,पढ़ाई में काम आएगा। । गूगल खड़ा सोच रहा था –"मैं अपनी बहन चंपी को क्या दूँ? मैं तो इनकी तरह पैन -घड़ी दे भी नहीं सकता लेकिन उसे बहुत प्यार करता हूँ और कुछ न कुछ  जरूर दूंगा।" 

घर जाकर अपनी गुल्लक उलट- पुलट की । बड़ी बेचैनी  से सिक्के गिनने शुरू किए –एक –दो ---तीन । अरे ये तो 20 रुपए ही हुए।सब तो खर्च नहीं कर सकता । दादा जी हमेशा कहते हैं गुल्लक को कभी खाली नहीं छोड़ना चाहिए इसलिए 10 रुपए मैं इसी में रख देता हूँ। गुल्लक बंद करके दिमागी घोड़े दौड़ाने लगा –कान  के कुंडल तो दस रुपए में आ ही जाएंगे पर उसके तो कान ही नहीं छिदे हैं।  पहनेगी कैसे?गले की माला कैसी रहेगी? न बाबा उसे नहीं ख़रीदूँगा। कोई चोर गले से खींचकर ले गया तो --। दस रुपयों की तो बहुत सी टॉफियाँ आ जाएंगी पर उन्हें तो वह मिनटों में चबा जाएगी । अच्छा किताब खरीद लेता हूँ । पहले मैं पढ़ लूँगा फिर वह पढ़ लेगी । हम दोनों के ही काम आ जाएगी। 

किताब कैसी दी जाए ?वह फिर उलझ गया । कहानी की किताब तो उसे देना बेकार है पहले से ही उसके पास किताबों का ढेर लगा है । तब क्या दूँ?चुटकुलों की किताब ठीक रहेगी । पढ़ते –पढ़ते खुद भी  हँसेगी और दूसरों को सुनाएगी तो उन्हें भी गुदगुदी होने लगेगी । अपने दिमाग की खेती पर वह मंद-मंद मुस्कराने लगा जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। दस रुपए उसने जेब के हवाले किए और इठलाता हुआ बाजार चल दिया । तभी चंपा  दरवाजा रोककर खड़ी हो गई –"क्यों भैया, इस बार भी क्या रुपए देकर टरका दोगे। वैसे तुम बहुत सयाने हो।पिछली बार पाँच रुपए का नोट दिया था । अगले दिन वापस भी ले लिया। बड़े प्यार से बोले थे-ला छोटी बहना पाँच का नोट,तुझसे खो जाएगा। इस बार तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाली।" 

"मेरी चंपा  ,इस बार रुपये तो नहीं दूंगा पर जो भी दूंगा उसमें मेरा भी थोड़ा हिस्सा रहेगा।" 

"जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती। मीनू-छीनू के भाई बहुत अच्छे हैं। वे उन्हें गुड़ियाँ देते हैं,बिंदी-चूड़ी देते हैं और तुम –तुम ही एक ऐसे भाई हो जो देकर ले लेते हो या उसमें हिस्सा-बाँट करने की  सोचते हो। 

"तूने भी तो घर में आकर  मेरे हिस्से का प्यार बाँट लिया। अकेला होता तो मम्मी-पापा का सारा प्यार मैं लूटता। न जाने क्या सोचकर माँ ने तुझे कल्लो भंगिन से पाँच किलो नमक के बदले ले लिया।" 

चंपा खिसियाकर रो पड़ी। "माँ—माँ—देखो ग़ुगलू मुझे तंग कर रहा है।" 

माँ के आने से पहले ही वह वहाँ से खिसक गया। जानता था,हर बार की तरह माँ उसे ही डांटेगी। 

गूगल  बड़ी शान से किताबों की दुकान पर जा पहुंचा कि बन जाएगा उसका काम चंद मिन्टों में। वहाँ जाकर तो उसका दिमाग घूम गया जब उसने देखा किताबों का पहाड़!कहीं लिखा था इतिहास ,कहीं भूगोल,कहीं संगीत तो कहीं चित्रकला। मन ललचाने लगा-यह भी ले लूँ—वह भी ले लूँ पर जेब में थे केवल 10 रुपए। अचानक उसकी निगाहें एक किताब से जा टकराईं जिसका नाम था ‘चटपटी चाट’। उसकी जीभ चटकारे लेने लगी। उसने तुरंत उसे खरीद लिया और रंगबिरंगे कागजों से सजाकर बीच में भोले मुखड़ेवाली चम्पा की फोटो चिपकाई । नीचे लिखा था –

दो चुटइया वाली चम्पी को /भइया की चटपटी चाट 

भाईदूज के दिन चम्पा ने बड़े उत्साह से अपने भैया को टीका किया । बेचैनी से इधर उधर तांक-झांक भी कर रही थी–देखें क्या देता है गुगलू  उसे। 

गूगल  ने चम्पा के  हाथों  में किताब थमा दी पर यह क्या---वह तो चम्पा की जगह चंपी लिखा देख तुनक पड़ी—"नहीं लेती तुम्हारी किताब –लो वापस लो –अभी लो। मेरा नाम ही बदल दिया !क्यों बदला बोलो –बोलो।" 

"अरी बहन इसे खोल तो। इसमें चाट -पापड़ी ,गोलगप्पे,समोसे भरे हुए हैं।'' 

"यह जादू की किताब है क्या जो खोलते ही पानी से भरे गोलगप्पे प्लेट में सजे धजे हाजिर हो जाएंगे और कहेंगे-हुजूर हमें खाइये।" उसने झुककर ऐसी अदा से कहा की गुल्लू  को हंसी आ गई। 

"हाँ—हाँ –आ जाएंगे पर इन्हें बनाने में कुछ मेहनत तो करनी पड़ेगी।" 

"कौन बनाएगा?"

"मेरी बहना और कौन?" गुटक्कू ने उसे खिजाने की कोशिश की। 

"मुझे तो खाना आता है बनाना नहीं।" मासूम चम्पा बोली। 

"कोई बात नहीं। बड़ी होने पर बना देना। मैं इंतजार कर लूँगा।" 

"मैं बड़ी कब होऊँगी?"

"यह तो मुझे भी नहीं मालूम। चलो माँ से पूछते हैं।" 

तभी गुल्लू  के दोस्तों ने खेलने के लिए आवाज लगा दी। वह तो वो गया वो गया। रह गई चम्पा। माँ को खोजती आँगन में आई। 

''माँ-माँ मैं कब बड़ी होऊँगी?"

माँ ऐसे प्रश्न के लिए तैयार न थी। एक पल बेटी का मुख ताकती रही फिर दुलारती बोली-"मेरे बेटी को बड़ी होने की क्या जरूरत आन पड़ी। तू छोटी ही ठीक है।'' 

"भैया चटपटी चाट की किताब लाया है । समझ नहीं आता उसके लिए कैसे बनाऊँ?वह कह रहा था बड़ी होने पर मुझे सब आ जाएगा।" 

"मैं किसी दिन चाट बना दूँगी। खिला देना अपने चटटू भैया को । अपने मतलब के लिए यह किताब खरीद लाया है।" 

"ऐसे न बोलो । मेरा भैया बहुत अच्छा है। माँ आज ही उसके लिए कुछ बना दो।" चम्पा गिड़गिड़ाते हुए बोली। 

माँ उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी इसलिए चाट पापड़ी बनाने को तैयार हो गई। एक तरह से वह इन भाई-बहन के स्नेह को देख खुश भी थी। आखिर गुल्लू अपनी बचत के पैसों से बहन के लिए उपहार लेकर आया था। इस त्याग का मूल्य किताब से कहीं—कहीं ज्यादा था। 

खेलने के बाद गुल्लू की भूख चौगुनी हो जाया करती थी। हाथ-पैर-मुंह धोकर चटपट रसोई की तरफ जाने लगा । भुने जीरे की खुशबू से उसकी नाक कुछ ज्यादा ही मटकने लगी। उसी समय चम्पा प्लेट लेकर आई-"गूगल चाट- पापड़ी खाएगा? 

"भला चाट कैसे छोड़ सकता हूँ?मगर इतनी जल्दी बन कैसे गई!" 

"माँ ने कहा कि मेरे बड़े होने से पहले भी चाट बन सकती है। मैं माँ को देख कुछ कुछ सीख रही हूँ। माँ ने तो जादू से कुछ मिनटों में ही चाट बना दी।" 

"जुग जुग जीओ मेरी छोटी बहना!अब तू जल्दी जल्दी सीखती जा और मैं जल्दी जल्दी खाता जाऊं। हे भगवान  हर जनम में चंपा को ही मेरी बहन बनाना।"   

'चम्पा को तंग न कर। अभी उसके खाना बनाने के दिन नहीं। खेलने-खाने के दिन हैं।" 

"ओह माँ,मगर मेरे तो खाने के दिन हैं। फिर मैंने उसे खेलने को मना तो नहीं किया। मैं तो बस यह चाहता हूँ कि रोज कुछ चटर-पटर चटपटा मिल जाए। आज आलू की चाट तो कल आलू की टिक्की—आह तो परसों पानी से भरे मटके की तरह फूले गोलगप्पे ।" 

"बस बस बंद कर पेट का राग अलापना। मैं सब जानती हूँ स्कूल से आकर तुझे दूध पीना तो पसंद नहीं इसी कारण यह किताब उठा लाया।" 

"ओह माँ, भैया को डांटो मत। यह किताब तो सबके काम आने वाली  है। हाँ याद आया -- मुझे भी तो गुगलू  को कुछ देना होगा। 

'मुझे तो उपहार मिल गया—दुनिया का सबसे अच्छा --।"गूगल हवा में हाथ हिलाते बोला।  

"किसने दिया?"चम्पा हैरान थी। 

"माँ ने।" 

"मुझे भी तो दिखाओ।" 

"चल दिखाता हूँ।"  

गुगल  ने उसे शीशे के सामने ला खड़ा किया। 

"दिखाई दिया?/" 

"क्या दिखाई दिया--! इसमें तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा । बस मैं ही मैं दीख रही हूँ ।" 

"यही तो हैं मेरा प्यारा सा उपहार जो मुझे माँ ने दिया है।" 

चम्पा खुशी की लहरों में डूब सी गई जिसमें उसे गुगल  का चेहरा ही नजर आ रहा था,वह तो उसके लिए दुनिया का सबसे अच्छा भाई था।

***

लो बच्चों कहानी खतम हुई। कैसी लगी?"माँ बोली । 

"इतनी अच्छी !"गुलबानो ने अपने दोनों हाथ फैलाते हुए कहा। 

"मां मैं भी गूगल की तरह अपनी बहन को इतना इतना प्यार करूंगा।" गुलाल ने  भी पूरी शक्ति लगाकर दोनों हाथ दो दिशाओं की ओर तान दिये।

"अच्छा अब चलूँ ,मेरा भाई भी आने वाला है।"घूघर ने अपने बच्चों से कहा। 

गुलाल अपनी माँ को जाता देख सोच रहा था -'यमुना अपने भाई को प्यार करती थी ,गूगल अपनी बहन को प्यार करता था ,मैं अपनी बहन को प्यार करता हूँ ,माँ भी अपने भाई को बहुत प्यार  करती है! 

यह भाई बहन की दुनिया सच में बड़ी न्यारी है और प्यारी भी है!'