प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 14 जून 2021

नए पल्लव कहानी प्रतियोगिता 2021

 

कहानी प्रतियोगिता 2021 का परिणाम

प्रथम : सुधा भार्गव, बैंगलोर
द्वितीय : मनीष शर्मा, गौतमबुद्ध नगर
तृतीय : तारावती सैनी ‘नीरज’, जयपुर, राजस्थान

नये पल्लव परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं ! 
कहानियां नये पल्लव के वेबसाइट पर उपलब्ध। 

http://nayepallav.com


                             प्रथम स्थान प्राप्त कहानी

बताशा  रोबो बेबी 

    सितारा का एक बेटा था छुट्टन । पढ़ाई में बड़ा होशियार! उसकी भलाई के लिए माँ -बाप ने उसे विदेश पढ़ने भेज दिया। पर वह वही का होकर रह गया। पिता की मृत्यु के बाद उसने बहुत कहा -माँ यहाँ  आ जाओ --यहाँ  आ जाओ। लेने भी गया पर उसे खाली हाथ लौटा दिया। माँ को अपना घर छोड़ना अच्छा न लगा । उसके - कोने कोने में उसकी यादें बसी हुई थीं। फिर भी दूर बैठे रोज सुबह  व्हाट्स एप पर माँ-बेटे की गुड मॉर्निंगl होती । चाय की चुसकियाँ लेते -लेते वह अपने पोते लुट्टन से भी  खूब बात करती। लुट्टन   तो उसकी जान था । उसकी समझ में नहीं आता था कि अपने पोते पर  वह कैसे लाड़ लुटाये। । कभी कभी तो उसको छूने,उसे गोद में  बैठाने को तड़प उठती।

       एक दिन डबडबाई आँखों से बोली -"बेटा  अकेले अब रहा नहीं जाता।  तुम सब की याद बहुत आती है। कोरोना के कारण बाहर के संगी साथी भी छूट गए हैं।"

    "माँ उड़ाने सब बंद है।  मैं आ नहीं सकता पर तब भी कुछ इंतजाम करता हूँ। उसने धड़ से मोबाइल बंद कर दिया। 

    माँ खीज पड़ी-"पूरी बात बताए ही फोन पटक दिया।क्या खाक इंतजाम करेगा !आने से तो रहा । बस मुझे भुलाबे में डालने वाली बातें।"  

    उसके रात-दिन बड़ी बेचैनी से गुजरने लगे। । एक रात वह सोने की कोशिश में थी कि सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी चीखती से लगी।  

     "कौन आ गया। वो भी मेरे पास --गलती से किसी ने घंटी टीप दी होगी । सितारा  बड़बड़ाई। वह दुबारा सोने की कोशिश करने लगी। इसबार तो घंटी बिना किसी विराम के किर्र किर्र कर दहाड़ती सुनाई दी। 

     "ओह !क्या तमाशा है । रात में भी लोग चैन नहीं लेने देते।" वह जबर्दस्ती पैरों को खींचते हुए गई और दरवाजा खोला। सामने  सुंदर सी दुबली पतली लड़की को देख वह चकित हो उठी। बिना पलक झपकाए उसे घूरने लगी।लड़की  ने  मुस्कराते हुये हाथ जोड़कर नमस्ते की जो अल्हड़ बालिका सी लगती थी ।  

वह चौंक गई। लज्जित सी बोली -"तुम कौन हो बेटी !पहनावे से तुम नर्स लगती हो। पर मैंने तो किसी नर्स को नहीं बुलाया।"

    "मैं  बताशा रोबो  बेबी हूँ  । मैं आपकी देखरेख ले लिए अपोलो हॉस्पिटल से आई हूँ।"  मिठास बिखेरती बड़ी नम्रता से बोली।  

    "मगर मैंने तो नहीं बुलाया।" 

    "आपके बेटे के कहने पर मुझे भेजा गया है। आप अपने बेटे से बातें कर सकती हैं।" 

    तभी मोबाइल बज उठा -"माँ बताशा आ गई क्या?

  "हाँ छुट्टन  दरवाजे पर बताशा नर्स ही खड़ी है।"

    "अरे उसे अंदर ले जाओ। वह तुम्हारे सब काम करेगी। तुम्हारा बहुत ध्यान रखेगी।इसके सामने तो मैं याद भी नहीं आऊंगा।" 

    "क्या बात करता है बेटा । कोई किसी की जगह नहीं ले सकता।" 

    "ओह प्यारी माँ मैं जल्दी आऊँगा।" 

    "सब्जबाग दिखा रहा है क्या मुक्कू! इस बार तो तूने अपने बदले बताशा को भेज दिया। अगली बार किसी नताशा को न भेज दीजो।"  

    "हा--हा--हा-- माँ! बताशा जल्दी ही तुम्हारी दोस्त बन जाएगी। "

    "अच्छा -अच्छा बहुत तारीफ सुन ली उसकी। अब बताशा को लेकर अंदर जाती हूँ। सोचती होगी कितने अभद्र हूँ । अंदर आने तक को न कहा।" 

     सितारा ने बताशा  को उसका कमरा बता दिया जहां वह अपना सामान रख सके। सामान के नाम पर उसके पास केवल एक बैग था जो उसके कंधे से झूल रहा था। उसने बड़ी फुर्ती से बाहर के जूते उतारे ,साबुन से हाथ धोये। फिर घर की स्लीपर पहनकर तुरंत हाजिर हो गई। बड़ी बड़ी पलकें झपकाती बोली-"क्या मैं आपको सितारा दादी  कह सकती हूँ?" 

    "हूँ --केवल दादी !" 

    उसकी रिमझिम आवाज सुनकर सितारा पुलकित हो उठी । न जाने कितने दिनों से उसके कान दादी माँ शब्द सुनने को तरस रहे थे। उसने हँसती आँखों से उसे देखा। बिना कुछ बोले ही बताशा को उत्तर मिल चुका था। सितारा ने  अपना हाथ बढ़ाया । बताशा ने उसे चूम कर आँखों से लगा लिया। इतना मान  इतनी चाहत--- सितारा को   विश्वास नहीं हो रहा था।

     "दादी माँ आपके सोने का समय हो गया है। दूध पीकर सो जाइए। उससे नींद भी अच्छी आएगी।" बताशा जल्दी ही अपने काम पर लग गई। 

    "चलो मैं तुम्हें अपना घर दिखा दूँ और रसोई का सामान भी समझा दूँगी। क्या माइक्रोवेव  में तुम दूध गरम कर सकती हो।" 

     "मैं अपनी दादी माँ के लिए सब कर सकती हूँ।" एक भोलापन  बताशा के चेहरे पर छा गया। 

     "तुम कहाँ की रहने वाली हो?"

     "मैं इंडिया की ही रहने वाली हूँ । मेरा और आपका देश एक ही है।"  

     दादी की इच्छा हुई कि वह उससे बातें ही करती रहे। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि प्रथम भेंट में ही  एक रोबोट के प्रति इतना आकर्षण क्यों! कहीं मनुष्य के बनाए रोबोट उसी को मात न दे दें। 

      सितारा को अकेले रहने की चाह न होने पर भी पति से बिछुड्ने के बाद अकेले रहना पड़ा । रात में 3-4 घंटे ही नींद आती थी और फिर शुरू हो जाता  टिक टिक करती घड़ी की ओर ताकना। कब सुबह हो !और कब वह  उठे!आज तो लगता था उसकी सुबह कुछ निराली ही है। रातभर खर्राटे लेती सोती रही शायद दुकेलेपन का सुखद अहसास था । चिड़ियों की चहचहाट में आज उसे संगीत सुनाई दे रहा  था । वह अलसाई सी उठ बैठी। आशा के विपरीत बताशा को खड़े देखा । हथेली से हथेली मिलाते हुए वह चहकी -"दादी शुभ प्रभात ।" 

     हैरानी से उसके मुंह से निकल पड़ा -"अरे तुम हिन्दी भी जानती हो?खुश रहो बेटी--खूब खुश रहो।  दादी की  बात सुन उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई। 

     "आप मुंह हाथ धोकर तैयार हो जाइए। मैं अभी नींबू पानी लाती हूँ। "

    "अरे बताशा  मैं तो सुबह चाय लेती हूँ। "

     "खाली पेट चाय । ओह नो दादी! ग्रीन टी,ब्लैक टी भी नहीं !गैस बन जाएगी ,घबराहट होने लगेगी।" नताशा को झुकना पड़ा। दवाइयों का चार्ज बताशा ने रात में ही ले लिया था। सवेरे सवेरे पहले खाली पेट थायराइड की  दवा दी । फिर नींबू पानी । उसके बाद कहीं चाय -बिस्कुट का नंबर आया । चाय का एक घूंट लेते ही उसने बुरा सा मुंह बनाया -"अरे फीकी चाय! मुझे डायविटीज़ तो नहीं है ?"

     "तो क्या हुआ!चीनी अच्छी चीज भी तो नहीं है। मीठा बिस्कुट तो आप ले ही रहीं हैं। अच्छा अब ये बताइये नाश्ते में गरम गरम क्या लेंगी?"उसके इस अपनेपन से फीकी चाय भी उसे मीठी लगने । 

     "बताशा एक बात बताओ!"बताशा ने उत्सुकता से  सितारा की ओर देखा। 

    "क्या तुम नहा चुकी हो । यहाँ रसोई में बिना नहाये नहीं घुसते हैं।"   

     "हा-- हा-- मैं रोबोट हूँ । मुझे नहाने बाथरूम जाने की जरूरत नहीं । न ही मैं खाती -पीती  हूँ।"   

    "गज़ब !फिर काम करने को ताकत कैसे आती है ?"

    "हमें बिजली से ताकत मिलती है। और जरूरत पड़ने पर अपनी बैटरी चार्ज करते हैं।" 

     "चार्जर वगैरा सब हैं न तुम्हारे पास ।" 

     "हाँ दादी। "

     "तब ठीक है। मुझे तो चिंता लग गई  थी अगर तुमको कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगी। तुम्हारे साथ रहते -रहते मुझे तुमसे मोह हो गया है । तुम्हें जुखाम भी हो गया तो मैं तड़प उठूँगी।"

       दादी की बात सुनकर बताशा के दिल में हौले हौले  कुछ होने लगा। उसे लगा वह दादी के काम भाग भाग कर करे।  खिलखिलाती बोली -"ओह दादी मेरी चिंता न करो । मैं मन से और शरीर से बहुत मजबूत हूँ। आप बस खुश रहो तो मैं भी बहुत खुश रहूँगी।ओह! आपने तो बताया ही नहीं क्या खाओगे? मैं खुद ही नाश्ता बना कर लाती हूँ। आप सजधजकर डायनिंग टेबल पर आ जाओ। अच्छे अच्छे कपड़े पहनना । बहुत  सुंदर लगोगी।" 

     "अरे इस उम्र में सजधज कर क्या करूंगी। घर में देखने वाला कौन बैठा है।" 

     "मैं हूँ  न दादी ।" दादी उसे टकटकी लगाए देखने लगी । उसमें उसे अपनी बेटी नजर आने लगी। 

हमेशा अपने मन का करने वाली दादी को न जाने क्या हो गया था ।  वह अब बताशा की अंगुलियों पर नाचने लगी थी। बताशा थी ही इतनी प्यारी। 

      कुछ ही देर में बताशा ट्राली खींचते हुये दादी के पास ले आई। उस समय दादी गूगल होम मिनी पर आरती सुन रही थीं। बताशा को यह देखकर बड़ी खुशी हुई की दादी डिजिटल दुनिया को पसंद करती हैं। सोचने लगी उसकी और दादी की खूब पटेगी। दादी सजी ट्रे देख खिल उठी। और सटसट बताशा की तारीफ करते हुये आमलेट टोस्ट खा  गई। मग में काफी पीते पीते बहुत दूर चली गईं जब वह अपने पति के साथ लंदन गई थी और बड़े शौक से उसने दो मग खरीदे थे। एक अपने लिए और दूसरा अपने पति के लिए। लेकिन इनमें साथ साथ बैठकर काफी पीने का सपना अधूरा ही रह गया। शो केस में लगी एक से एक बढ़कर क्रॉकरी लगी थी पर उसे सबसे विरक्ति सी हो गई थी। आज बताशा ने उसी मग में कॉफी दी थी जो सालों से अनछुआ पड़ा था। 

      नाश्ता करने के बाद दादी  की आँखें अखबार तलाशने लगी। बताशा समझ गई उनके दिमाग में क्या चल रहा है । उसने उन्हें झट से अखबार थमा दिया। व्हाट्स एप पर अपने मैसेज पहले ही देख चुकी थीं। 

     तभी मोबाइल बोल उठा -"माँ कैसी हो?फेस टाइम पर आ जाओ।" फेस टाइम पर बेटे को देख उसके हृदय की कलियाँ खिल उठीं। 

      "माँ आज तो चेहरे पर बड़ी ताजगी है।" 

     "अरे बताशा जो आ गई है। मेरा बड़ा ध्यान रखती है। छुट्टन एक बात सोच रही हूँ!"

"क्या माँ!"

     "बताशा चली गई तो मेरा क्या होगा।" 

     "होगा क्या बताशा गई तो नताशा आ जाएगी।" 

     दादी ने देखा पास खड़ी बताशा के चेहरे का रंग उड़ गया है। वह तुरंत बोल पड़ी -"न    मुझे बताशा ही ठीक है। "

      "माँ, अगले महीने दो  दिनों को तो इसे  अस्पताल जाना ही पड़ेगा ।" 

     "इनके अस्पताल भी होते हैं क्या?

     "हाँ माँ ,रोबोट की देखभाल के लिए  अस्पताल अलग होते हैं। बताशा को तो एक इंजीनियर ने अपनी बुद्धि से बनाया है। मगर इसके कलपुर्ज़ों की देखभाल होनी जरूरी है । वह इनके अस्पताल में ही होती है । जरा भी गड़बड़ होने से यह  काम कैसे करेगी?मगर तुम चिंता न करना । इसके बदले रसीली आ जाएगी। फिर वही आपके पास रहा करेगी।" 

     "न--न--न-- मुझे रसीली -नशीली की जरूरत नहीं । दो दिन बिना बताशा के ही काट लूँगी।" 

नताशा अपने बेटे से बातें कर रही थी।पर उसका असर बताशा  पर भी हो रहा था। दादी का प्यार महसूस कर वह खुशी के मारे हवा में उड़ी जा रही थी। 

     कुछ  दिनों के बाद वह अस्पताल गई । वहाँ दादी के बिना उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। हमेशा  उनका ध्यान बना रहता। सोचती --दादी चाय कैसे बनाती होगी!न जाने समय पर दवा खाई होगी या नहीं!रोबो डाक्टर भी नहीं समझ नहीं पा रहा था  कि बताशा  एकदम ठीक है पर उसकी हंसी में पहली सी खुशबू नहीं। वह उदास क्यों है?

      चैक अप कराने के बाद  बताशा अपनी  दादी के घर की ओर चल दी। उसकी खोई मुस्कराहट लौट आई थी। इस बार उसने फ्रॉक की जगह गुलाबी साड़ी पहन रखी थी ।माथे पर लाल बिंदी थी। पतले पतले होंठों पर लाल लीपिस्टिक। दादी आधे घंटे से दरवाजे के बाहर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। बताशा को एक नए रूप में देख उन्होंने उसे बाहों में भर लिया।  बोली -"दो दिन में ही मेरी  बताशा बेबी तो बड़ी हो गई है।" प्यार की गर्मी से बताशा भी महक रही थी। 

समाप्त 






सोमवार, 5 अप्रैल 2021

उत्सवों का आकाश


गोपाल भाई

बचपन में माँ से सुनी कहानी 

सुधा भार्गव 

     एक लड़का था ननकू। अपनी माँ को बहुत प्यार करता था।  उसकी हर बात मानता। घर से उसका स्कूल बड़ी दूर था और उससे भी भयानक बात कि जंगल से होकर उसे जाना पड़ता, वह भी नंगे पैर। धूल से पैर भर जाते,  कंकड़ पत्थर भी उस पर रहम न खाते। ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर चलते उसे डर लगता -कोई बिच्छू न काट ले,झाड़ियों के पीछे से कोई जंगली जानवर ही न निकल आए। जैसे ही ननकू किसी को जाता देखता वह भागता हुआ उसके साथ हो लेता । साथ मिलने पर उसका डर ऐसे भागने लगता जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

    परेशान सा एक दिन वह माँ से बोला –“मुझे तो स्कूल जाते समय रास्ते में डर लगता है। मेरा कोई दोस्त अकेला नहीं आता । किसी के साथ उसके  दादा होते हैं तो कभी बापू । कोई कोई तो अपने नौकर के साथ भी आता है। उसके तो बड़े ठाठ होते हैं । बैग नौकर संभालता है और वह इठलाता हुआ आगे-आगे चलता

है।’’

      “बेटा, किसी से बराबरी करना ठीक नहीं। रास्ते में तुझे जब भी डर लगे अपने गोपाल भाई को पुकार लेना।वे तेरी मदद को दौड़े दौड़े आएंगे।’’

“गोपाल भाई –मैंने तो उन्हें कभी देखा नहीं ! पहचानूंगा कैसे उन्हें ?

     “अरे मेरे बच्चे वे तो बांसुरी वाले हैं। उसकी मीठी धुन उनकी पहचान है। देख लेना। तेरे पुकारते ही वे बांसुरी बजाते चले आएंगे।’’

      दूसरे दिन आकाश में  बादल उछलकूद मचा रहे थे । ननकू स्कूल जाते समय जब घने जंगल से गुजरा तो काले बादल गिराने लगे मोटी-मोटी बूंदें । भयभीत ननकू पेड़ के नीचे खड़ा ठंड के मारे काँपने लगा । न तो बरसते पानी में वह स्कूल पहुँच सकता था और न घर लौटकर जा सकता था। ऐसे में उसे गोपाल भाई की याद आई और पुकारने लगा गोपाल भाई गोपाल भाई तुम कहाँ हो? मुझे डर लग रहा है। तुम जल्दी से आ जाओ।’’

       “डरने की क्या बात है । मैं तो तुम्हारे साथ हूँ। पीछे मुड़कर देखो।’’

     ननकू ने पीछे मुड़कर देखा सच में गोपाल भाई उसके ऊपर छतरी ताने खड़े हैं ।

       वह तो उन्हें देखता ही रह गया। वे उसे बहुत सुंदर लग रहे थे। खुश होते हुए बोला-“वाह भाई! साँवले होते हुए भी तुम तो बहुत अच्छे लग रहे हो।पीले कपड़े ,सिर पर मोरपंखी मुकुट ,हाथ में बांसुरी। पैर में पायल भी पहन रखी हैं! आह!तब तो इसकी रुनझुन से ही तुम्हारे आने की खबर मिल जाएगी।’’

      “ओह ,तुम तो बहुत बातूनी हो। जल्दी से स्कूल चलो वरना देरी हो जाएगी।’’

     जल्दी जल्दी पैर बढ़ाता हुआ ननकू बोला –“स्कूल से लौटते समय भी मुझे डर लगता है। उस समय भी तुम्हें आना पड़ेगा।’’

     गोपाल भाई केवल मुस्कुरा भर दिए ।

      आज ननकू बड़ा खुश था। गालों पर ताजे गुलाब खिल रहे थे। सबसे हँस- हँस कर बात करता। पढ़ाई भी मन लगाकर कर रहा था। अब उसे इस बात का खौफ न था कि घर लौटते समय यदि अंधेरा हो गया तो---तो क्या होगा? दोपहर को टनटन टनानन घंटा बोला। छुट्टी होते ही बच्चे  चहचहाने लगे और ननकू तो कक्षा से बाहर की ओर इतनी तेजी से भागा मानो उसके पैरों में पहिये लग गए हों। उसे गोपाल भाई से मिलने की उतावली थी । उनके साथ खेलना था , बहुत सी बातें करनी थीं। जैसे ही जंगल में पहुँचा ही पायल की छम-छम आवाज सुनाई दी । दूसरे ही पल गोपाल भाई सामने आकर थे।

       “बांसुरी वाले भाई तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं जंगल में हूँ। मैंने तो तुम्हें आवाज भी न दी थी।’’ ननकू चकित था।

       “जो मुझे प्यार करता है मैं उसकी मदद करने दौड़ पड़ता हूँ।’’

      “तो फिर मेरे दोस्त बन जाओ,फिर मैं तुमसे अपने मन की बात कह सकूँगा।यहाँ मेरा कोई दोस्त नहीं है जिससे मैं अपने मन की बात कह सकूँ।  सब मेरी  हँसी उड़ाते हैं। ’’ 

      “अरे उदास क्यों होते हो?मैं हूँ न तुम्हारा दोस्त! पहले चेहरे पर मुस्कान लाओ--। फिर बोलो क्या कहना है ?”

      “कल मेरे गुरू जी का जन्म दिन है। सब कुछ न कुछ लेकर जाएंगे । मैं क्या लेकर जाऊँ?कुछ समझ नहीं आता । मेरी माँ तो एक वक्त मुझे दूध भी नहीं पिला पाती। उसे बताकर परेशान नहीं कर सकता।’’

     “दोस्त के होते हुए क्या चिंता। कुछ न कुछ लेकर कल मैं आ जाऊंगा ।’’

     “भाई,तुम तो बहुत अच्छे हो। चुटकी में मेरी  चिंता दूर कर दी।’’ ननकू प्रसन्न था।

     जंगल पार होते ही गोपाल भाई बांसुरी बजाते न जाने कहाँ चले गये।ननकू ने एक पल इधर –उधर आँखें दौड़ाई फिर हँस दिया-हो गया गायब जादूगर।  

***

     घर में घुसते ही ननकू शुरू हो गया-उसकी आँखों में चाँदनी सा उजाला भरा था।  “माँ माँ आज गोपाल भाई आए थे। उनके आते ही मेरा डर उड़नछू हो गया । मेरी उनसे गहरी दोस्ती हो गई है। अब तो रोज हम मिला करेंगे।मैं उनसे जी भर कर –इत्ती सारी बातें किया करूंगा। ’’

     “क्या सच में कन्हैया तुझे मिला था?” माँ मुसकाई।

    “ये कन्हैया कौन ?मैं तो इसे नहीं जानता!

     “अरे पगले गोपाल का दूसरा नाम ही कन्हैया है। जैसे तू मेरा कन्हैया है वैसे ही वह अपनी यशोदा माँ का लाड़ला कन्हैया है।”

    “तब तो  वह यशोदा मैया का कन्हैया ही था। माँ—माँ कल मास्टर जी का जन्मदिन है । मुझे उनके लिए कुछ लेकर जाना होगा।’’

      “बेटा तेरी गरीब माँ के पास क्या है देने को।’’ सूनी सूनी आँखों से वह बोली।

     “ओह प्यारी माँ तू चिंता न कर। गोपाल भाई ने कहा हैवे जरूर कुछ लेकर आएंगे।’’

     “देखा-- कन्हैया कितना  मददगार है! बड़ा होकर तुझे भी ऐसा बनना होगा---दूसरों की सहायता करने वाला।’’

“हाँ --हाँ माँ, बनूँगा –बनूँगा !जो तू कहेगी वही बनूँगा।’’माँ-बेटे प्यार से लिपट गए।’’

     अगले दिन स्कूल जाते समय  जंगल में बांसुरी की मीठी आवाज सुनते ही ननकू समझ गया गोपाल भाई उसके आसपास ही हैं । वह ज़ोर से चिल्लाया-“भाई जल्दी आओ। गुरू जी को देने वाला उपहार लाना तो नहीं भूले।  उसे मुझे दिखाओ।’’

     गोपाल भाई दो कटोरियाँ लिए उसके सामने उपस्थित हो गए।“लो आ गया तुम्हारा दोस्त –तुमने पुकारा और हम चले आए।

     “इन कटोरियों से तो बड़ी खुशबू आ रही है।’’ ननकू बोला।

     “हाँ,इनमें मीठा-मीठा हलुआ है। एक कटोरी का हलुआ तुम अभी खा लो। घर से कुछ खाकर भी नहीं चले हो।’’

     “ओहो तुम्हें पता भी लग गया।पूरे के पूरे जादूगर हो! तुम भी तो खाओ।  अकेले-अकेले मैं नहीं खाऊँगा। ’’

     “पहले तुम खाओ ननकू। उन्होंने बड़े प्यार से कहा।’’

      बिना आनाकानी किए ननकू गपागप खा गया और एक ज़ोर की डकार ली । गोपाल को भी डकार आ गई ।

     “अरे तुम्हें बिना खाए ही डकार आ गई?’’ ननकू चकित था।

     “जब तुम खा रहे थे मुझे लगा वह मेरे पेट में जा रहा है ।फिर भरे पेट पर तो डकार आएगी ही।’’

     “खाऊँ मैं और पेट भरे तुम्हारा। हा-हा—कितनी अजीब बात है।’’ननकू आँखें मटकाते हुए बोला।

     बातों ही बातों में स्कूल आ गया। वह बड़े उल्लसित मन से स्कूल में घुसा। मन ही मन वह सोचने लगा -मास्टर जी हलुए की सुगंध पाते ही उसकी तारीफ करेंगे। लेकिन उसकी तरफ तो उन्होंने आँख भी उठाकर नहीं देखा। वहाँ पहले से ही देने वालों की कतार लगी थी । बड़े-बड़े पैकिट वे बटोरने मेँ लगे थे। उसका मन बड़ा खराब हो गया।  इंतजार करते थक सा भी गया था  पर उसकी बारी नहीं आई। अंत में उसे गिड़गिड़ाना ही पड़ा -

     मास्टर जी ,मेरा भी ले लो---- ले लो न--- ।’’

“क्या लेलो की रट लगा रखी है। दे अपनी कटुरिया। छटंकी भर हलुआ और शोर मचा रहा है मनभर का ।’’

     ननकू का चेहरा उतर गया और बुझे मन से हाथ आगे बढ़ा दिया ।

      मास्टर जी ने अपने बर्तन मेँ हलुआ डाल कर कटोरी को सीधा किया और बुरा सा मुंह बनाते बोले –“ले कटोरी और दफा हो जा ।’’ पर आश्चर्य ! कटोरी मेँ तो फिर हलुआ भर गया। मास्टर जी चकरा गए। बर्तन पर बर्तन लाने लगे। कटोरी से तश्तरी, तश्तरी से थाली और थाली के बाद आए थाल। सब भर गए। हलुआ दुगुना, चौगुन, अठगुना बढ़ता ही गया—बढ़ता ही गया।

      “अरे रे--- यदि इसी तरह से हलुआ बढ़ता रहा तो बर्तन कहाँ से लाऊँगा? बहुत हो गया । अच्छा यह तो बता ---ये हलुआ तुझे किसने दिया ?”

     “गोपाल भाई ने दिया।’’

    “वह भाई कोई जादूगर है क्या? उससे कह ,अपना जादू समेट ले ।’’

    ननकू ज़ोर से चिल्लाया –“गोपाल भाई मास्टर जी को हलुआ नहीं चाहिए। ’’

      “उनसे कहो वे पहले हलुआ खाएं - सबको खिलाएँ और बताएं हलुआ कैसा है?’’ एक आवाज गूंजी। हैरत से सबकी गर्दन उधर घूम गई जिधर से आवाज  आई पर कोई दिखाई न दिया।

      आफत से छुटकारा पाने के लिए मास्टर जी ने बेमन से थोड़ा सा हलुआ खाया पर वह तो जीभ पर ऐसा चढ़ा कि न जाने कितनी कटोरी खा गए। दूसरों को खिलाया।वे उँगलियाँ चाटते रह गए ।

     “ननकू , इतना अच्छा हलुआ तो मेरे दादी भी नहीं बनाती । मुझे भी अपने गोपाल भाई से मिला दे । जब इच्छा होगी गोपाल भाई से मीठा -मीठा घी का हलुआ मांग लूँगा।’’ ननकू का सहपाठी टनटू बोला।

    “चल तुझे मिलाता हूँ।’’

    “तुम दोनों कहाँ चले ,चलो हम भी साथ चलते हैं।’’मास्टर जी बोले।

      आगे आगे ननकू-टनटू और पीछे पीछे मास्टर जी के साथ बच्चों की पूरी की पूरी टोली । जंगल मेँ पहुँचते  ही ननकू ने आवाज लगाई –“गोपाल भाई गोपाल भाई ,देखो तो तुमसे मिलने मेरे मास्टर जी और दोस्त आए हैं। जल्दी आओ।’’

      काफी देर तक किसी को न आता देख मास्टर जी बिगड़ पड़े –“खूब उल्लू बनाया तूने तो ननकू। झूठे, तेरा कोई गोपाल सोपाल भाई नहीं है। ’’

     ननकू  रूआँसा सा हो गया। भर्राते गले से बोला-“गोपाल भाई आ जाओ। मुझे झूठा न बनाओ।’’

    आनन-फानन  मेँ बांसुरी की मीठी आवाज उभरने लगी। पायल की खनक से लगा कोई पास मेँ आकर खड़ा हो गया है।

     “गोपाल भाई आ गए गोपाल भाई आ गए। ’’ताली पीटता --ननकू उछल पड़ा। 

     “कहाँ हैं?हमें तो नहीं दिखाई दे रहा तेरा गोपाल। हंसी-ठठ्ठा करने को मैं ही रह गया हूँ । कल स्कूल आ ,तेरी चुटैया पकड़ कर गोल-गोल ऐसा घुमाऊंगा कि गोपाल का नाम लेना भूल जाएगा।’’

     “मैं मज़ाक नहीं कर रहा मास्टर जी। पास के पेड़ के नीचे ही तो मेरे बांसुरी वाले भाई खड़े हैं।’’

    “फिर झूठ बोला।’’

    “हमको भी नहीं दिखाई दे रहे तेरे गोपाल भाई।’’ बच्चे एकसाथ चिल्लाए।

     “हाँ ,मैं किसी को भी नहीं दिखाई दूंगा। पहले तुम अच्छे बच्चे बन कर आओ।’’

    “गोपाल भाई,मास्टर जी के सामने तो आ जाओ।’’

    “उनके सामने तो बिलकुल नहीं आऊँगा। वे सब बच्चों को समान नहीं समझते हैं। किसी को कम प्यार करते हैं तो किसी को ज्यादा।’’

     “गोपाल भाई, गलती हो गई।कान  पकड़ता हूँ अब से ऐसा नहीं  होगा। इनसे मैं स्नेह रखूँगा और बच्चों को भी प्यार का पाठ सिखाऊँगा। बस एक बार मुझे अपने दर्शन दे दो।’’ मास्टर जी शर्मिंदा हो उठे ।

    “जब प्यार की गंगा मेँ गोते लगाने लगोगे तो मुझे अपने पास हमेशा पाओगे। अभी थोड़ा धीरज रखो।’’ 

     ननकू अपने गोपाल भाई के साथ हो लिया। बच्चे व मास्टर जी एक नया संकल्प लिए अपने घरों की ओर बढ़ गए।