प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

बुधवार, 20 जनवरी 2021

कोरोना आया लॉक डाउन लाया

कहानियाँ  

6-मोहब्बत की दुनिया

सुधा भार्गव


      एक थी बिल्ली ,एक था बिलौटा। बिल्ली का नाम चमेली ,बिलौटे के नाम गेंदा।  गेंदा अपनी बहन को  बड़ा प्यार करता। एक दिन चमेली बड़ी सुस्त थी। उसे देख गेंदा परेशान हो उठा। 

    बोला - “म्याऊँ --म्याऊँ मेरी नाजुक सी बहना तेरा मुंह सूखा -सूखा क्यों ?”

    “मऊ --मूँ  --बहुत भूखी हूँ।”  

    “तू भूखी !विशवास नहीं होता।तेरा वश  चले तो दुनिया भर का दूध सपासप सपासप गटक जाए।”    

     “सच  बोल रही हूँ। पड़ोस में जो मसखरा चूहा घूमता रहता है उसकी तरफ सुबह मैं धीरे -धीरे बढ़ रही थी कि वह  बेहोश हो गया। इतने में चुहिया आई और उसे देख रोने लगी।   मैंने तो भैया उसे छुआ भी नहीं था। न जाने कैसे   बेहोश हो गया। तभी फटाफट पेंदने से गुलाबी-गुलाबी दो बच्चे उछलते आये और उसे उठाकर ले गए। उनका  बिल पास ही था। मसखरा तो ऐसा चालक  निकला कि बिल में घुसते ही  उठ बैठा। मुँह चिढ़ाते हुए  मुझे टिल्ली --टिल्ली करने लगा।”  

    “हा --हा --हा तो उस मसखरे ने हमारी बहना को ठग लिया।” गेंदा  जोर से हँ स पड़ा । 

    “भैया तुम्हें हँसी सूझ रही है---मेरी जान निकले जा रही है। मैं तो कल भी  भू खी रह गई  थी !”

    “क्या कहा --दो दिन से भूखी है !”

    “सच्ची मुच्ची  !कल एक रसोई में घुसी।  खौलते दूध की खुश्बू  आ रही थी. मैंने देखा मेज पर एक मेजपोश बिछा है और उस पर बड़े से कटोरे में दूध ठंडा होने को रखा हैं। मेरी खुशी का ठिकाना न था । सोच रही थी कल कुछ नहीं खाया तो क्या हुआ !आज तो छक कर दूध पीऊँगी। तभी एक बच्चा घुटने के बल चलकर बड़ी फुर्ती से मेजपोश पकड़ कर खड़े होने की चेष्टा करने लगा। मेरे तो होश उड़ गए। मैं ने जोर  से छलांग लगाईं और झटके से कटोरे को दूर फ़ेंक दिया। बच्चा तो जलने से बच गया पर भूखा था। गिरे दूध को देखकर रोने लगा।  उसकी माँ  आई -बच्चे को कलेजे से लगा लिया। मुझे देखकर उसका पारा चढ़ गया।  जोर से चिल्लाई-"इस बिल्ली ने जीना हराम कर दिया है।  डंडा मारकर इसे भगाओ तो  ।”  

    “गेंदा बता मेरी क्या गलती थी जो उसने मुझे गाली दी। अगली बार उस मैया को छोडूँगी नहीं।उसके पैर पर अपने पंजे जरूर चुभो कर रहूँगी।”  

   "उस मैया का क्या दोष !न हम उसकी भाषा जाने न वह हमारी! सच्चाई बताता कौन ?चल कुछ खा ले। कल से तेरा पेट खाली है। कैसी मुरझा गई है।”

    “कल से नहीं रे परसों से भूखी हूँ।”  

    “ऐं --अब तू मुझसे ही मसखरी करने लगी।” 

     “मैं एकदम सुच्ची -सुच्ची बोल रही हूँ। वो नुक्कड़ पर मोटू हलवाई  की दुकान हैं न।परसों  दूध से भरी बड़ी सी लोहे की  कड़ाई रखी  थी।  उसके चारों  तरफ  मोटी मलाई  की परतें एक के ऊपर एक जमी थी।  क्या चमकदार मलाई--मोटी सी चमचम। उसकी खुशबू  अलग नथुनों में घुसी जा रही थी। मोटू तो मुझे कहीं दिखलाई न दिया। इधर-उधर नजर घुमाती सबकी आँखों से बचती दूकान में तो घुस गई। जैसे ही मैंने मलाई पर पंजे जमाकर उसे खाना चाहा ठक -ठक की  आवाज से चौंक पड़ी। देखा -दुबली-पतली  कमजोर सी  बुढ़िया लाठी के सहारे दुकान में पीछे की ओर से घुस रही है । मलाई देख उसकी आँखों में चमक आ गई लगा जैसे उसने कभी मलाई खाई  ही नहीं। मुझे उस पर बड़ा तरस आया। अपनी भू ख तो भूल ही गई और  मैं परात के पीछे छुप कर उसे देखने लगी। वह तो लपलपालाप खाने लगी। उसे खाता देख मुझे बड़ा अच्छा लगा। इतने में मोटू आ गया और अपनी बूढ़ी माँ को घसीटते ले जाने लगा। मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैं परात के पीछे से निकली और मार की परवाह न करते हुए मलाई खाने लगी। मुझे देख मोटू हलवइया बौखला गया और माँ को छोड़ मेरे पीछे भागा। मैं तो एक छलांग में ही बाहर हो गई पर गुस्से में अंधा वह मेरे पीछे भागता ही गया--भागता ही चला गया ।  भला मैं क्या उसके हाथ आने वाली थी।  हांफता हुआ लौट गया होगा --बेचारा !ह --ह । ''

    “तुझे कब से दूसरों पर दया आने लगी है ?”

   “जबसे यह कोरोना चुड़ैल आन  बसी है। ठकुरा धोबी को यही चुड़ैल तो  निगल गई। उसके दोनों बच्चों से उनका पिता छीन  लिया।   बेचारे  भूखे प्यासे घूम रहे हैं । कल तो हिना  मौसी ने उन्हें अपने हिस्से की रोटी खिलाई। अच्छा गेंदा एक बात बता -जब मौसी बच्चों को रोटी दे सकती है तो मोटू हलवाई अपनी माँ को दूध मलाई क्यों नहीं खाने देता!” 

   “क्योंकि वह भी भूखा है।” 

   “ओह अब समझ में आया उसका पेट इतना बड़ा क्यों हैं !भूख लगने  पर  पूरी कड़ाई की मलाई चाट जाता होगा ।” 

   “अरे यह बात नहीं!कोई रोटी का भूखा है तो कोई पैसे का भूखा । यह हलवाई पैसे का भूखा है।अपनी माँ को मलाई खाने को देगा तो उसका पैसा कम हो जाएगा। उसे बेचकर वह ज्यादा पैसा कमायेगा।” 

   “मोटू एकदम अच्छा नहीं है। लगता है वह ऊपर से गिरा और जमीन पर आते ही बड़ा हो गया। भूल गया माँ ने कितनी मेहनत से उसकी देखरेख की। माँ को वह थोड़े सी  मलाई भी नहीं खिला सकता! मुझे तो यह सोच सोचकर रोना आ रहा है।” 

   “बात ही कुछ ऎसी है ।मुझे सुनकर भी बड़ा कष्ट हो रहा है। चल बहना चल !हम  अपनी ही दुनिया में भले। जहाँ प्यार  और मोहब्बत का अब भी झरना बहता है।”

      दोनों कलाबाजी दिखाते जंगल पहुँच गए। बिल्ली माँ ,गेंदा और चमेली के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसको  देखते ही वे उसकी गोद में छिप गए  और माँ प्यार से उन्हें चूमने -चाटने लगी।

समाप्त  


कोरोना आया लॉकडाउन लाया


बालकहानियाँ 

 5-धन्यवाद कोरोना

सुधा भार्गव 

       नादान अनारू समझ  नहीं पा रहा है माँ को क्या हो  गया है। हर  काम  में देरी करती  हैं।उस दिन  भरी  दुपहरिया में  बिजली चली गई । एक तो गरमी से परेशान दूसरे पेट में जोर जोर से चूहे  कूद रहे थे ।मेज खाली देख उबाल खा गया।

“ माँ --माँ ! कुछ खाने को तो देदो ।”

‘लाई बेटा--बस पांच मिनट रुक जा--।इतने  में तू साबुन से हाथ धोकर आ जा  ।”

अनारू भुनभुनाता चल दिया -'हूँ --हाथ धोकर आ !घडी -घड़ी हाथ धोने को बोलती हैं. पर मेरे हर काम में देरी लगा देती है।पांच मिनट --तो कहने के लिए हैं। पच्चीस मिनट से कम नहीं लगेंगे । पहले तो मेज पर कभी आम का पन्ना होता था जिसे पीते ही मैं सारी गरमी भूल जाता था । वो मीठा रसभरा  आम  तो मुझे अब  भी याद है जिसे मैं चूसता ही रह  गया ।गजब  का मीठा  आम था ।अब तो मेरा ध्यान रखने वाला ही कोई नहीं ।’

अनारू का मूड एकदम ख़राब था । जीअच्छा करने के लिए अपने दोस्त से फ़ोन पर बातें करने लगा -”हेलो कमल,  तूने खाना खा  लिया ?”

“हाँ --अभी -अभी मैंने खिचड़ी खाई है।”

‘तू बीमार है  क्या !खिचड़ी  तो बीमारों का खाना है ।”

“अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं! कोरोना बीमारी फैलने के कारण  कनिका बाई नहीं आ रही हैं न ।सो मेरी माँ को बहुत काम करना पड़ता है ।वे थकी -थकी लग रही थीं ।इसलिए मैंने और पापा ने निश्चय किया कि आज तो खिचड़ी चलेगी ।”

"अब समझ में आया मेरी माँ को आजकल हर काम में देरी क्यों लगती है!”

“देरी तो लगेगी !सच मुझे तो माँ पर बहुत तरस  आता है ।कभी नहीं कहेगी मैं थक गई !आज तो जबरदस्ती पापा ने उनको सुला दिया है । अच्छा अब चलूँ पापा और मैं मिलकर कपड़े सुखाएँगे ,अपने खाये बर्तन भी धो डालेंगे ।”

“यह सब काम तू ---तू करता है ?मैं तो माँ की कुछ भी मदद नहीं करता ।”

“फिर तो तू बड़ी गलती करता है ।”

“हूँ! कहता  तो ठीक है ।अच्छा मैं भी चला।”

झट से अनारू रिसीवर रख रसोईघर में पहुँच गया ।देखा-माँ उसके लिए गरम गरम आलू के परांठे बना रही हैं। बीच-बीच में पल्लू से माथे का पसीना भी पूछती जाती। उसे अपने व्यवहार पर बहुत शर्म आई।थाली लेकर माँ के सामने खड़ा हो गया। “अरे तू यहाँ क्यों आ गया बच्चे ? रसोई गरमी से भभक रही है ।तू जाकर ठंडक में बैठ --मैं बाहर ही आकर तुझे दे जाऊँगी।”

अनारू की आँखें भर आईं।बोला-"माँ मुझे माफ कर दो।आप कितना काम करती हो और मैं बैठा- बैठा हुकुम चलाता हूँ।आज से मैं आपके काम किया करूँगा। बोलो माँ--क्या करूँ मैं?”

माँ एक नए अनारू को अपने सामने खड़ा देख रही थी जो दूसरी ही भाषा बोल रहा था।उसने मन  ही मन कोरोना का धन्यवाद किया जिसने थोड़े से समय में ही उसके बेटे को सहृदयी  व समझदार बना कर वह चमत्कार कर दिखाया जिसे वह शायद जिंदगी भर न कर पाती।

अप्रैल २०२० 


 




शनिवार, 2 जनवरी 2021

बालकहानी

 बच्चों का देश  पत्रिका , अंक अगस्त २०२० में प्रकाशित

बरसात की रिमझिम

सुधा भार्गव 

  

      मुझे हमेशा से ही बादलों ने रिझाया। छुटपन में बादलों को देखते ही छत पर चली जाती। नीले आकाश में बादलों की आँख-मिचौनी देखा करती। । बादलों के झुंड मुझे रेशम से चमकीले, रुई से मुलायम लगते। उन्हें देखते-देखते कल्पना की निराली  दुनिया में खो जाती। कभी मुझे नन्हें खरगोश से बादल आकाश में फुदकते नजर आते तो कभी हाथी का बच्चा अपनी सूढ़ हिलाता लगता।

      बरसात की रिमझिम बारिश  देख इंतजार करती कब बादलों से बड़ी -बड़ी बूंदें टपकें। टपकती बूंदों को देख मैं अपनी हथेली फैला देती। मोती सी चमकती बूंदों को मैं लपकना चाहती थी  । पत्तों पर ठहरी बूंदों को देख तो मेरे चलते चलते कदम भी रुक जाते। एकटक उनकी सुंदरता अपनी आँखों में भरने  लगती। देखते ही देखते बादल गरजते चीखने लगते। पटापट बरसने की आवाज से मुझे लगता लगते वे गुस्से से पागल हो गए हैं। । इतना सब होते हुए भी मेरा मन मचल उठता –“चल चल घर से बाहर जाकर नहाते हैं। ऐसी  मस्ती के समय घर में दुबककर क्या बैठना!” जैसे ही घर से पैर रखती, माँ न जाने कहाँ से आ जाती और अंदर खीचती बोलती-“ बीमार होने का इरादा है?” कभी कभी तो मुझे लगता –माँ की दो नहीं दस आँखें हैं। इसी कारण उसे हम भाई-बहनों की पल -पल की खबर होती है।

       बरसाती मौसम मेँ घर मेँ अकसर सरसों के तेल मेँ पकौड़ियाँ तली जातीं । पकोड़ियाँ कभी मूंग की दाल की होतीं तो कभी बेसन आलू की । चटनी के साथ खूब छककर खाते-----अरे छककर क्यो?—कहना होगा ठूंस ठूंस कर खाते। हम भाई-बहन मेँ कंपटीशन होता –देखें कौन ज्यादा खाता हे! सबसे खास बात तो उस दिन दूध से छुटकारा मिल जाता था। वरना रोज दूध भरा गिलास हमारे सिर पर सवार हो कहता—“पीयों—पीयो---मुझे पीयो।’’

       एक बार सारी रात पानी बरसता रहा। सुबह आँख खुली । काले बादलों की  घडघड़ाहट और दूर -दूर  तक घुप्प अंधेरा! दिल बल्लियों उछल पड़ा। आह आज तो स्कूल की टनटनानन  छुट्टी---! ज़ोर से चिल्ला उठी-बरसो राम धड़ाके से,बुढ़िया गिरे पटाके से।  फिर मुंह ढककर सो गई। सुबह की मीठी नींद पलकों पर आकर बैठी ही थी, माँ ने इतनी ज़ोर से झझोड़ा कि सीधे उठते ही बना। कान के पर्दों को चीरती एक ही आवाज –स्कूल नहीं जाना क्या?उठ जल्दी।” ।

        ऊपर नजर घुमाई –बादल तितर- बितर हो चुके थे। साथ मेँ अंधेरा भी ले गए। बहुत गुस्सा आया –स्कूल की छुट्टी होते होते रह गई। बादलों ने तो धोखा दे दिया।

     ठंडी हवा में थिरकती मैं स्कूल चल दी । रास्ते में सूरज की रोशनी मेँ पत्तों पर बूंदें मोती की तरह चमकती दिखाई दीं। मैं उनकी तरफ खींची चली गई । मैंने धीरे से छुआ ही था कि वे तो पानी की तरह बह गई । बड़ा दुख हुआ। बाद मेँ मैंने फिर कभी उन्हें छूने की कोशिश नहीं की।

      स्कूल से लौटते समय उस दिन  देर हो गई । रास्ते भर रेंगते- रेंगते जो जा रही थी । जहां थोड़ा सा पानी भरा देखती छ्पाक- छपाक करती वही से निकलती।चप्पलें कीचड़ से भर गई। फ्रॉक पर काले छींटे पड़ गए। पर मैं इस सबसे लापरवाह थी।   ज्यादा पानी देखती तो कागज की नाव बनाकर उसमें छोड़ देखती रहती ---देखती रहती--। मन करता मैं भी छोटी  सी नाव बन इसका पीछा करूँ। उफ घर मेँ तो इतने बंधन –मानो मैं मिट्टी की डली होऊं और पानी मेँ गल जाऊँगी।

     अचानक बादल का एक टुकड़ा मुझसे टकराया और उसका मोटा पेट फट पड़ा।

     “मैं गरज पड़ी-ए मोटू यह तूने क्या किया!मेरे सारे कपड़े भिगो दिये । अभी तक तो ऊपर से पानी डालता था अब हमारी धरती पर भी कब्जा जमाने की सोच रहा है।’’

     “अरे नहीं मुन्नो !मैं तो ऊपर ही खुश हूँ।  हवा को न जाने क्या शैतानी सूझी कि सरपट इतराती दौड़ने लगी ।  उसके झोंकों में झूलते-झूलते खट से नीचे आन गिरा।  तुमसे टकराते ही मैं फट पड़ा और अंदर का पानी तुम पर लुढ़क पड़ा।  अब बताओ मेरा क्या कसूर!”

     “तेरी नहीं तो क्या मेरी गलती है। घर पहुँचने में वैसे ही देरी हो गई है। कोई बहाना भी नहीं बना सकती । माँ की आँखें तो वैसे  ही दिन रात जागकर  मेरी  जासूसी करती रहती है।  भीगे कपड़े देख मेरी  चोरी पकड़ी जाएगी।एकदम समझ जाएंगी पानी में आप जानकर भीगी हूँ ।’’  

     “हा—हा-हा-हा---मुनिया चोरी तो वैसे भी पकड़ी जाती।’’ फ्रॉक पर पड़े काले छींटे को अपना मज़ाक उड़ाते देख मन किया इसका मुंह ही नोच लूँ पर ऐसा करने पर तो मेरा फ्रॉक ही फट जाता । क्या करती ---बस दाँत पीसकर रह गई।

     “अरे भोली मुन्नो –इस कल्ले छींटू की बात का बुरा न मान । यह है ही ऐसा । तेरी चोरी पकड़ी गई तो क्या हुआ !ज्यादा से ज्यादा डांट ही तो पड़ेगी। सह लेना। माँ तो तेरा हमेशा भला चाहती है। इसीलिए तो डांटती है और उसकी डांट भी तो प्यार से लबालब होती है।’’

डरते डरते मैंने घर में कदम रखा । सामने माँ को खड़ा देख सकपका गई।

     “आ गई ---लाडो---कीचड़ में नहाकर ! बहुत आजादी मिल गई है। कान खोलकर सुन ले ,इस बार बीमार पड़ गई तो तेरे पास फटकूंगी भी नहीं।’’

     मैं एकदम खामोश थी। मोटू बादल की बात कानों में गूंज रही थी और मुझे सच में माँ की डांट में प्यार नजर आ रहा था। अब तो ऐसी डांट के लिए तरस कर रह गई हूँ।