बालकहानी -बूंद का सफर
सुधा भार्गव
एक छोटी सी बूंद थी जिसका नाम था नीला । वह आकाश में ऊंचे बादलों के बीच रहती थी। अक्सर नीचे देखा करती और सोचती ,”धरती कैसी है !वहाँ कौन रहता होगा !” एक दिन बादल बहुत भारी हो गए, नीला बूंद धरती पर टपक पड़ी ।
आकाश से गिरते ही वह तो घबरा गई ,”अरे! मैं कहाँ आ गई ? यह खेत तो बहुत सूखा और भूरा है।”
खेत में इधर-उधर दौड़ लगाते एक चींटी उसे देखकर बहुत खुश हुई। बोली -”नमस्ते छोटी बूंद! तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
“ मैं आकाश से गिरी हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं कहाँ हूँ !”
“चिंता न करो।तुम हमारे खेत में हो । गेहूं ,चावल और दालों की फसलें यहाँ हरहराती रहती हैं। लेकिन इस साल बारिश कम होने से उन्हें सूखा रोग हो गया है।”
“ ओह! यह तो बहुत बुरा हुआ। क्या मैं इन पौधों की मदद कर सकती हूँ?”
“क्यों नहीं!तुम हमारे साथ काम कर सकती हो।”चींटी सोचते बोली।
“बोलो!क्या करूं?”नीला ने उत्सुकता से पूछा।
“हम खेत में मिट्टी ढीली कर रहे हैं ताकि पानी जमीन में अच्छी तरह से समा सके। तुम जमीन को गीली करके हमारी बहुत मदद कर सकती हो।”
“तुम मिट्टी को ढीला क्यों कर रही हो?”
“मिट्टी को ढीला करने से बीज सरलता से बोया जा सकेगा। खरपतवार भी आसानी से निकल जाती हैं।”
“खरपतवार? यह क्या है?”नीला हैरान थी।
“ खरपतवार वे -पौधे हैं जो पानी और पोषक तत्वों को सोख लेते हैं। इससे खेत में फसलों का बढ़ना रुक जाता है।फसल नहीं बढ़ेगी तो गेंहू -चावल कैसे मिलेंगे। गेंहू- चावल नहीं मिलेंगे तो पेट कैसे भरेंगे ।”चींटी ने समझाया ।
“ ओह! तब तो खरपतिया पौधों का खेत में रहना ठीक नहीं!"
“परेशान होने की जरूरत नहीं नीला! हम उन खरपतवारों को जड़ से उखाड़कर फेंक देते हैं।”
.”मुझे भी ले चलो। मैं जल्दी से उनकी कनपकड़ी कर दूंगी।”
नीला धरती पर घूमती मिट्टी को भिगोती चलती ।खरपतवारों को ढूंढने में चींटियों की सहायता भी करने लगी।
पौधे खुशी से झूम उठे ।
चींटी मुस्कराते बोली “नीला, तुम्हारे पानी देने से पौधों की जान बच गई।अब तुम एक छोटी सी बूंद ही नहीं हो, बल्कि खेतों की जान और खेतों का संगीत हो।
