प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - - ।

बुधवार, 30 सितंबर 2015

बालकहानी

अनहद कृति अंतर्जाल पत्रिका अंक 11 में प्रकाशित
http://www.anhadkriti.com/sudha-bhargava-story-dev-daanav
देव दानव /सुधा भार्गव 
यह कहानी उन बच्चों की कहानी है जो घर से भाग जाते हैं या चुरा लिए जाते हैं। कुछ अभागों को उनके माँ- बाप ही बेच देते हैं और फिर खुल जाता है एक नया अध्याय उनके नारकीय जीवन का। - लेखिका

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एक प्यारा-सा बच्चा था। उसका नाम डमरू था । वह अपने साथियों के साथ शाम को पार्क में घूमने–खेलने जाया करता। माँ का कहना था अंधरे से पहले ही घर आ जाना जिस दिन ज़रा-सीभी देरी हो जाती उसे मुर्गा बनना पड़ता। छोटी बहन किननी हँसकर बोलती –मुर्गे भाई ,बोलो कुकड़ू कूं। डमरू सब कूछ भूल-भालकर बहन को मारने दौड़ता। फिर शुरू होता चूहा भाग–बिल्ली आई का खेल। डाइनिंग टेबिल के चारों ओर आगे–आगे किननी पीछे-पीछे डमरू उसका पीछा करता हुआ दौड़ लगाता। पकड़कर ही वह दम लेता और कोमल-सी पीठ पर ज़ोर से दो धौल लगा देता। पाँच वर्ष की किननी रो-रोकर घर सिर पर उठा लेती। माँ के आते ही वह उसे पुचकारने लगता। मोटे–मोटे आंसुओं को गिरते देख उसे पछतावा भी होने लगता –उसने बहन को क्यों मारा।" इस शैतानी पर उसे डांट भी ख़ूब पड़ती पर उसे बुरा न लगता , बुरा तो तब लगता जब माँ उसे ज़्यादा बाहर न खेलने देती। वह तो चाहता था आज़ाद पंछी की तरह आकाश में उड़े। एक शाम घूमते -घूमते वह अपने साथियो से दूर चला गया। उसे पता ही न चला कि साथी कब लौट गए?
एकांत  देख एक आदमी उसके पास आया और बोला –बेटा तुम भूखे लगते हो। घर जाकर तुम्हें दूध पीना अच्छा नहीं लगता इसलिए बड़ी-सी चाकलेट खाकर जाओ।
चॉकलेट का तो वह शौकीन, मुंह में पानी भर आया।
-अंकल क्या आपके पास बहुत-सी चाकलेटें हैं।"
-चाकलेट बनाने का  मेरा कारख़ाना है।"
-तब तो एक दिन मैं उसे देखने चलूँगा।"
-आज ही क्यों नहीं चलते!"
-माँ कनपकड़ी करेगी।"
-तुम चलो तो ,तुम्हारी माँ को मैं समझा दूंगा। वे गुस्सा नहीं होंगी।"

डमरू चाकलेट पाने की इच्छा से उस अजनबी के साथ हो लिया। कुछ दूर ही जा पाया था कि उसका माथा चकराने लगा और बेहोश होकर गिर पड़ा। घंटों इस अवस्था में रहा। जब उसे होश आया तो अपने को एक तंग कोठरी में लेटे पाया। ज़मीन पर गंदी-सी फटीपुरानी दरी बिछी थी। उसके पास ही तीन चार लड़के और सोये थे। तन को ढकने के नाम पर उनके शरीर पर कमीज़ मात्र थी। चार छेदों वाली वे नेकर पहने हुए थे।

प्यास से डमरू का कंठ सूखा जा रहा था। बड़ी कठिनाई से बोला –अंकल –अंकल मैं कहाँ हूँ ?" तभी एक अजनबी कोठरी में घुसा, कड़कते हुए बोला –खा-खाकर चमड़ी मोटी हो गई है । सुबह के 6बजने को आए पर किसी कमबख्त ने उठने का नाम नहीं लिया। उठते हो या लगाऊँ दो थप्पड़।" धड़-धड़ करके लड़के खड़े हो गए। डमरू का सिर भारी था। उससे उठा ही नहीं गया ।
-ओ छोरे तुझे क्या हुआ ?" अजनबी घुर्राया
-मुझे पानी चाहिए।"
-पानी! यहाँ क्या तेरी माँ बैठी है जो पानी लाएगी। उठ और बाहर जाकर पानी पी आ। खेत पर चलना है।"
अजनबी का असभ्य व्यवहार देखकर डमरू सकते में आ गया। कल और आज वाले अंकल में ज़मीन–आसमान का अंतर।उसका वश चलता तो वह उसे कच्चा चबा जाता। 


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फरवरी की ठंड। नक्कू, कक्कू, छक्कू बुरी तरह काँप रहे थे। सब के सब गाय–भैंस की तरह खेतों की ओर लताड़ दिए गए। नंगे पैर भागते–भागते कम से कम दो किलोमीटर का फासला तय किया। यदि किसी बच्चे की चाल धीमी हो जाती या सुस्ताने पत्थर पर बैठ जाता तो सड़ाक से छड़ी उसके पैरों पर पड़ती। मार से बचने के लिए वह तेज़ी से भागने लगता।
खेतों पर पहुँचते ही अजनबी ने आदेश दिया–खेत को साफ़ करके रखना। मैं अभी नहा–धोकर, खा पीकर आता हूँ।"

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उसके जाते ही डमरू बोला –मेरी माँ सुबह उठते ही दूध पिलाती थी। अंकल तो खाने चले गए, हम क्या भूखे ही रहेंगे?
-बच्चू अभी नया–नया आया है। कुछ दिनों में जीभ के साथ–साथ पेट भी चुप हो जाएगा। तू तो पढ़ा लिखा लगता है। यहाँ कैसे आ गया?" कक्कू ने पूछा।
-मुझे चॉकलेट का लालच आ गया। अंकल ने बहुत-सी चाकलेट देने का वायदा किया था और माँ ज़्यादा खाने नहीं देती थी सो फंस गया। इनकी दी चाकलेट खाकर न जाने क्या हुआ। जब नींद खुली तो यहाँ पाया। अब मैं क्या करूं। पिता जी को कैसे बताऊँ? अच्छा तू कुछ अपने बारे में बता।"

-मैं जब तीन साल का था तभी एक दुष्ट दाढ़ी वाले बाबा ने मुझे घर के आँगन से चुरा लिया। आठ साल का होने पर उसने मुझे बाजार में बेच दिया। मुझे तो अपने माँ –बाप के बारे में कुछ पता ही नहीं। चुराने वाला भी मुझे भूखा रखता था और तेरा राक्षस अंकल भी भूखा रखता है। दस दिन पहले ही तो इसने मुझे 100 रुपए में खरीदा है। इससे मिल, यह है नक्कू।"
-मेरे बाप ने तो मुझे 50 रुपए में ही बेच दिया। उसे शराब पीने को पैसा चाहिए था। बाप होते हुए भी न के बराबर है। माँ तो उसे पहले ही छोड़ कर भाग गई। बस उसे मारता रहता था। कौन रहता उस के पास।"
-अरे बात ही करते रहोगे या काम भी करोगे। जल्दी से सूखे पत्ते और कंकड़ बीन लो वरना शैतान ने देख लिया तो हमारी एक रोटी भी बंद हो जाएगी।" छक्कू बोला।
बच्चे भयभीत हो उठे। डमरू नन्हें हाथों से पौधों में पानी देने लगा।

नक्कू  ने कंकड़ पत्थर से भरा टोकरा अपने सिर पर रखा और लड़खड़ाते हुए सड़क के किनारे फेंकने लगा। तभी उसके पैर में काँटा चुभ गया। छककू ने उसे जल्दी से खींच लिया। खून की धार बह निकली।
-रे रे कितना खून बह रहा है? यदि मैं इसे चूस लू तो मेरा खून बढ़ जाएगा। देख न मैं कितना पतला हो गया हूँ।" डमरू की इस बात पर मुरझाए चेहरों पर भी हंसी रेंग गई।
धीमी और कमजोर आवाज़ में नक्कू बोला –डमरू, मालिक किसी भी समय पहुँच सकता है और काम अभी तक  पूरा नहीं हुआ है।"
 
-क्या काम है मुझे बता।"
-ज़मीन खोदनी है।"
डमरू की नाजुक उँगलियों ने खुरपी थाम ली। ज़मीन खोदते हुए हथेलियाँ लाल हो गई।  खून सा झलक आया। जलन मिटाने के लिए ठंडे पानी की धार के नीचे हथेली रख दी। उसी हथेली से चुल्लू भर पानी पीकर पेट की ज्वाला मिटाई।

करीब दो घंटे बीत गए, पल–पल बच्चों को लग रहा था –आया राक्षस आया।" मन  ही मन डर की गुफ़ा में भटक रहे थे। तभी दिल दहलाने वाली एक कर्कश आवाज़ सुनाई दी –
-क्या सांठ--गांठ चल रही है। अगर किसी ने भागने की कोशिश की तो गाजर-मूली की तरह काट दिए जाओगे। फिर बोरे में भरकर नदी मेँ बहा दूंगा। बोटी-बोटी मगरमच्छ खा जाएंगे।" 

उस ज़ालिम ने बच्चों के दिल मेँ दहशत की ऐसी दीवार चुनवा देनी चाही कि वे कठपुतली बने उसके इशारों पर नाचते रहें।

मालिक ने खेत का पूरा मुआयना किया। सूखे पत्ते कोने मेँ घुसे गुए थे। उन पर आँख पड़ते ही वह भुनभुना उठा–ओबे नक्कू के बच्चे, तेरी आँख फूट गई है क्या? ये पत्ते दिखाई नहीं दिये। चल उठा इन्हें।" नक्कू लंगड़ाता हुआ आया। इससे देरी हो गई। मालिक को भला यह कैसे सहन होता। लगाई उसमें दो–तीन लातें। बेचारा उछलकर दूर जा पड़ा। बड़ी मुश्किल से तलुए से बहता रक्त बंद हुआ था पर बेचारे के उसी जख्म मेँ फिर से नुकीला पत्थर चुभ गया। दर्द की छटपटाहट से वह वहीं अपना पैर पकड़ कर बैठ गया।
-तेरी नाटकबाज़ी तो अभी बंद करता हूँ। इतना कहकर उसने नक्कू के बाल पकड़कर ऊपर उठाया
 और झटके से छोड़ दिया। इससे नक्कू का शरीर जगह–जगह से छिल गया पर सताने वाले पर इसका कोई असर न था।

उसने पोटली खोलकर 2-2 रोटियाँ हर एक के सामने डाल दीं जिनपर नमक छिड़का हुआ था। ख़ुद स्टूल पर बैठ बीड़ी सुलगाने लगा। यहाँ तो बीड़ी सुलग रही थी पर डमरू का अंग–अंग उसके दुर्व्यवहार से झुलस रहा था। उसका वश चलता तो वह अत्याचारी का गला घोंट देता पर अकेला चना क्या भाँड़ झोंकता! हाँ, वह मौके की तलाश में रहने लगा इस नारकीय जीवन से छुटकारा पाने को और अपने साथियों को मुक्ति दिलाने के लिए।
डमरू सहसा कुछ ज़्यादा ही चुप रहने लगा। चार बार उससे कोई बात ज़ोर से पूछी जाती तब वह मुश्किल से जबाब देता। दूसरों ने सोचा उसे बोलने में कठिनाई होती है। एक बार नाराज़गी में मालिक ने उसकी कनपटी पर थप्पड़ मारा तो उसका माथा भनभना गया। तब से उसने बोलना बिलकुल ही बंद कर दिया। अब तो वह बहरा-गूंगा समझा जाने लगा। उसने अभिनय भी कमाल का किया और धीरे–धीरे उसे मालूम हुआ कि उसका मालिक ऐसे गिरोह से संबंध रखता है जिसका काम ही बच्चों का अपहरण व चुराकर उनका क्रय–विक्रय करना था।

एक दिन दोपहर मेँ वह दरवाज़ा खोल दबे पाँव भाग निकला और खोजते–खोजते पुलिस चौकी जा पहुंचा। वहाँ उसने गिरोह के मालिक के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज कर दी। पहले तो थानेदार को बच्चे की बात का विश्वास नहीं हुआ पर अपना कर्त्तव्य समझ वह अपने सहकर्मियों सहित उसके पीछे चल दिया। अपराधियों का पता लगते ही उन्हें सींखचों के हवाले कर दिया और मासूम बच्चों को उनके चंगुल  से छुड़ाया।
पुलिस ने बच्चों के माता–पिता का पता लगाने का प्रयत्न किया। वह केवल डमरू के माता–पिता को पा सकी। वह उनसे लिपटकर ख़ूब रोया। उसे देखकर नक्कू और छककू और कक्कू की आँखों मेँ बादल घिर आए।
-तुम रोओ नहीं, मैं तुमसे बीच-बीच मेँ मिलने आऊँगा।"
-आओगे कहाँ? न जाने मैं कहाँ जाऊँ? माँ का भी पता नहीं। पिता का पता मुझे मालूम है पर मैं उसके पास नहीं जाऊंगा। क्या पता वह फिर मुझे बेच दे।" कक्कू बोला ।

इन बेसहारा बच्चों की बात सुनकर डमरू के पिता का दिल व्यथा से हिल उठा और बोले –तुम कहीं मत जाओ मेरे साथ चलो। हम सब साथ–साथ  रहेंगे।"
तीनों बच्चे डमरू के पिता के पैरों पर गिर पड़े और बोले आप जो कहेंगे, हम करेंगे, बस हमें घर से न निकालना अंकल वरना कहाँ रहेंगे?
-ठीक है ,पर मेरी एक शर्त है।"
-क्या ?बच्चे बेचैनी से बोले।"
-जो मैं माँगूँगा वह देना पड़ेगा, लेकिन चिंता न करो। जो तुम्हारे पास होगा, उसी में से लूँगा। बोलो दोगे।"
-हाँ अंकल देंगे, पर आपको चाहिए क्या?"
-बता देंगे–बता देंगे! मांगने का अभी समय नहीं आया है।" डमरू के पिता ने कहा ।
उन तीनों बच्चों के पालन-पोषण में भी बड़ी मेहनत की और वे उनके बड़े होने का इंतज़ार करने लगे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। पढ़-लिखकर वे अपने पैरों पर खड़े हो गए।
मौका पाकर वे एक दिन बोले–मेरी  शर्त पूरी करने का समय आ गया है बच्चों।
कक्कू ने आदर का भाव दिखते हुए कहा–आपने हमें नई ज़िंदगी दी है
। हम पर आपका पूरा अधिकार है।
-बेटे,जिस तरह से मैंने तुम्हें सहारा दिया उसी तरह अपनी ज़िंदगी में यदि तुम किसी अनाथ या असहाय बच्चे के काम आ सको तो बहुत फलो –फूलोगे।
-अच्छे अंकल, हम आपकी राह ही अपनाएँगे।
अंकल की आंखों से अगाध स्नेह और हर्ष की फुलझड़ियाँ 
छूटने लगी। उनके बोए बीज से मीठे-मीठे फल झर रहे थे ।
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

बालकहानी

मन की रानी/सुधा भार्गव 




    ठंडी –ठंडी मस्त हवा के झोंके मन को लुभाने लगे । सूझे पत्ते फड़फड़ाकर हँसते ,फुदकते ,दौड़ लगाते । झाड़ी में बैठी एक स्ट्रोबरी चंचल हो उठी । झटके से झुकी ,डाल नीचे हो गई । उसका  मन किया धरती पर लोटती –पोटती सूखे पत्तों का पीछा करे । तभी पीछे से माँ ने उसे अपनी ओर खींच लिया –ज्यादा न झुक ,गिर जाएगी । स्ट्राबरी डर गई । डाल में लगे पत्तों की अंधेरी गुफा में अपने को उसने तुरंत छिपा लिया। 


   स्ट्रोबरी रात में टुकुर –टुकुर तारे देखती । पत्तों के बीच में से आती झीनी रोशनी से अपना मन बहलाती । एक बार वह उकताकर आलसी की तरह उबासी लेने लगी । तभी कनखियों से उसने बादल देखा । उससे बात करने को पत्तों से अपना सर निकाला । बादल को वह बहुत अच्छी लगी । उसने प्यार से पानी की एक बूंद उस पर टपका दी । स्ट्रोबरी उसमें नहाकर ताजी हो गई । पहले से ज्यादा चमकने लगी । पीछे से किसी ने उसे अपनी ओर खींच लिया –क्या कर रही है ,ठंड लग जाएगी । उसकी छोटी-छोटी आँखों में आँसू भर आए।

Image result for drop of water clipart-हिम्मत रखो !ऐसे आँसू न बहाओ। यदि तुम धरती पर आना चाहती हो तो आ जाओ ।  मेरा घर बादल है । उसे छोडकर धरती पर आई हूँ । धरती पर आकर तुम्हें बहुत प्रसन्नता होगी । यह बहुत सुंदर है । इसका लहंगा हरा ,ब्लाउज पीला है । वह चांदी का मुकुट पहने है । बूंद ने दिलासा दी।  
-आऊँ कैसे ?
-जैसे मैं आई हूँ । घर से तुम्हें बाहर निकलना ही होगा ,तभी तो  दूसरी निराली दुनिया की सैर कर सकोगी  । बूंद ने कहा ।
-स्ट्रोबरी में हिम्मत आई और आँखें मटकाकर इधर –उधर देखने लगी –कहीं कोई देख तो नहीं रहा । माँ तो जरूर कहती  –खेलने –कूदने की जरूरत नहीं ,चोट लग जाएगी । बिना हिले डुले डाली से चिपकी रह ।

उसने बिना शब्द किए झाड़ी से अपना पूरा शरीर निकाला । दम लगाकर उछली । डाली से टूटकर धम्म से मिट्टी मेँ जा पड़ी । प्यारा सा मुखड़ा धूल से भर गया । फिर भी ताजी हवा मेँ  सांस लेने से उसके अंग मुस्कराने लगे । हवा भी खुश , स्ट्रोवरी की खुशबू से जो भर गई थी।

बूंद आगे बढ़ी । उसने स्ट्राबरी को उठाया । झपझप करके धूल झाड़ी । बोली -चलो मेरे साथ।
-कैसे चलूँ ?घर में मुझे न देखकर माँ रोएगी । बहनें तो सो भी न पाएँगी । स्ट्राबरी उनकी याद में उदास हो गई।
- कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है । बूंद ने स्ट्रोबरी को समझाया।

स्द्रोबरी आगे बढ्ने लगी । पीछे मुड़कर भी देखती जाती ।उसे माँ का प्यार पुकारता सा लगा । तभी मुर्गे ने बांग दी । झाड़ी में सब जाग गए । स्ट्रोबरी को न देखकर कोहराम मच गया । 

माँ ने छाती पीट ली –हाय मेरी स्ट्रोबरी जान से गई । किसी ने साबुत का साबुत निगल लिया होगा।
बहन बोली –भालू स्ट्रोबरी को खा गया है । अपनी लपलपाती जीभ होठों पर फेर रहा होगा –वाह !क्या रसीली गूदेदार हैं । बड़ी निडर बनती थी।

बहन ने पत्तियों को हटाकर बाहर नजर घुमाई । उसे स्ट्रोबरी की एक झलक मिल गई। वह चिल्लाई –लौट आओ –लौट आओ । जान को खतरा है । स्ट्रोबरी ने अपनी चाल और तेज कर दी । उसे झाड़ी मेँ कैद होना मंजूर न था । खुली हवा मेँ सांस लेने का सुख वह जान चुकी थी।

नाजुक स्ट्रोबरी बूंद के साथ –साथ चलते थक गई । वह धीमें स्वर में बोली –मुझे धरती से जल्दी मिलाओ न । 
-तुम धरती पर ही तो खड़ी हो । बूंद ने कहा।
-यह तो बहुत लंबी -चौड़ी है । मेरे घर से बहुत बड़ी है। आश्चर्य से स्ट्रोबरी ने आँखें झपकाईं ।
-अब पूरी धरती ही तुम्हारा घर है । चलो ,तुम्हें भाई से मिलाती हूँ।  
-बूंद एक पेड़ के नीचे ठहर गई । स्ट्रोबरी उसकी ऊंचाई देखती ही रह गई ।
-पेड़ भाई ,तुम्हारा घर कहाँ  है ?उसने पूछा ।
-यह धरती मेरा भी घर है । इसी की मिट्टी में मेरा जन्म हुआ है ।
-तब तो हम सबका घर एक ही हैं । हमें हिल मिलकर रहना होगा।
  -तूम तो बड़ी समझदारी की बात करती हो । मुझसे  छोटी हो पर बुद्धिमानी में बड़ों –बडों को हरा दोगी । पेड़ बोला । 
Image result for strawberry plant clipartस्ट्रोबरी अपनी तारीफ सुनकर इतराने लगी । पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए वह उत्साहित हो उठी ।
बोली –मुझे जल्दी से धरती का मुकुट दिखाओ।  
-अभी दिखाती हूँ –कहकर बूंद बर्फ ढकी चोटी पर बैठ गई । वहीं से ज़ोर से बोली –बर्फ से ढकी चोटियाँ ही धरती का शानदार मुकुट हैं । तुम भी यहाँ आ जाओ ।

स्ट्रोबरी तो उमंग के पंखों पर सवार थी । उसने बर्फ पर चढ़ना शुरू किया । जरा सा चढ़ती ,फिसल जाती । फिर चढ़ती –फिर फिसल जाती । वह बार –बार ऐसा करती रही । ठंड से बदन अकड़ गया लेकिन बूंद के पास जाने की इच्छा नहीं छोड़ी।


सूरज को उस पर दया आ गई ।वह ज़ोर से चमका । किरणों की गर्मी से बर्फ जगह –जगह से पिघल गई।स्ट्रोबरी सरलता से चोटी पर चढ़ी और ऊंचाई से धरती की सुंदरता देखी ।उसके रूप पर वह मुग्ध हो गई । बर्फ पर सुनहरी किरणों के पड़ने से नीली ,पीली रोशनी निकल रही थी जिसमें धरती नहाकर खिल उठी।  

-मुझे अब हरा और पीला ब्लाउज भी दिखा दो । बच्चे की तरह स्ट्रोबरी मचल उठी ।
-चोटी से नीचे झाँको!पृथ्वी हरी –हरी घास का मखमली लहंगा पहने हुए है और सरसों के लहलहाते पीले खेत उसका  ब्लाउज हैं । सभी तो दिखाई दे रहा है । सुरभि का सितार बजाते रंग बिरंगे बाग –बगीचे हमें बुला रहे हैं । सूरजमूखी  का फूल मस्त होकर नाचना चाहता है । उस पर मंडराती तितलियाँ कुछ गाती सी लग रही हैं।
--मेरा  मन भी करता है नाचने को –गाने को । भोली सी स्ट्राबरी बोली ।
-किसने रोका है तुम्हें !खूब नाचो –खूब गाओ ।
-मुझे कोई नहीं रोकेगा !क्या तुम्हें पूरा –पूरा विश्वास है ?झाड़ी वाले घर में तो मैं अपने मन से कुछ कर ही नहीं सकती थी । हर समय टोकाटाकी होती  –यह मत करो ,वह मत करो ।
- हाँ –हाँ !मैं अच्छी तरह जानती हूँ । इस धरती पर तुम अपने मन की रानी हो । बूंद ने उसे यकीन दिलाना चाहा ।
-सच में !
आह तब तो मैं--------



खाऊँगी –खेलूँगी
नाचूँगी –गाऊँगी ,
ताल में उछलूँगी
झरने में नहाऊँगी ,
पीछे पड़ी यदि गिलहरी
चोटी पर चढ़ जाऊँगी।

स्ट्राबरी अपने में ही खोई थी । उसे पता ही न चला कि कब –कब में बूंद दूसरी दिशा में हवा के साथ उड़ गई । उसे अब दूसरों का भला करना था ।


समाप्त  Related image
(प्रकाशित)


सोमवार, 21 सितंबर 2015

बाल कथा

अंतर्जाल पत्रिका अनहदकृति में प्रकाशित 

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भूरी माँ

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जानवर के अगाध स्नेह के आगे आज का सभ्य मानव मूक 
नैपाली कक्षा चार में पढ़ता था। माँ दांतों की डॉक्टर और बाप दिल का पर न उसके दाँत ठीक थे और न दिल ही खुश था। स्कूल से आकर वह नौकरानी के पास रहता। रविवार को भी उसकी माँ और पापा घर में नहीं होते थे। फिर तो छुट्टी का दिन उसे पहाड़ लगने लगता। आया घर का काम निपटा कर सोने की ताक में रहती। अकेलेपन से उसका जी घबराता और बुरे विचार उसे बेचैन किए रहते –यदि मैं गिर गया तो कौन उठाएगा, मुझे बुखार चढ़ गया तो दवा-दारू कौन करेगा। दोस्तों को फ़ोन करता तो वे एक मिनट बातें करते, फिर धम से रिसीवर नीचे रख देते। वे अपने भाई–बहनों मे मस्त। माँ की उसे याद सताती पर डायल करते–करते उँगलियाँ थम-सी जाती–उन्होंने कह रखा था कम से कम फ़ोन करना क्योंकि मरीज़ों को देखते समय उनका दिमाग़ बँटता है। सारे दिन फ़्रिज में रखे टॉफ़ी–चाकलेट खाने से उसके दाँत गड़बड़ा गए। घर में कोई समझाने वाला तो था नहीं जो मन में आता करता। यहाँ तक कि घर की चारदीवारी में इंसान कीआवाज़ सुनने को उस बालक के कान तरस जाते। मन को समझाने के लिए दूरदर्शन के चैनल बदलता रहता, कब नींद ने उसे थपकी देकर सुला दिया पता नहीं, पर टी वी चलता रहता। ठंड से उसके पैर पेट से जा लगते मगर चादर ओढ़ाने वाली नौकरानी पहले से ही व्यस्तता का बहाना बना कर अपना पीछा छुड़ा लेती।

शाम के पाँच बजते ही वह पास के पार्क में घूमने निकल जाता। दोस्त तो संध्या घिरते ही अपने–अपने घरों का रास्ता नापते पर वह लावारिस-सा घूमता रहता। थक कर पेड़ के नीचे बैठा माँ का इंतज़ार करता। ज्यों-ज्यों अंधेरा होता, उसके अंदर का अंधेरा बढ़ता जाता।
एक दिन माँ के आने पर चुपचाप वह उसके पीछे घर में दाख़िल हुआ ।

- नैपी,तुम अकेले इतनी देर तक बाहर क्यों थे? रामकली तुमने इसे क्यों नहीं बुलाया?
- मेमसाहब। बाबा रोने लगते हैं। उन्हें देखकर हमारा कलेजा फटने लगता है। बाहर रहते हैं तो पेड़–पौधों को ही देखकर मन बहलाते रहते हैं।
- न जाने क्यों यह भूत की तरह मुंह लटकाए रहता है। इसे मैंने क्या नहीं दिया। अभी नया मोबाइल दिया। खूब गाने सुनो, पिक्चर खींचो–कौन रोकता है! कल ही नए जूते–टी शर्ट लेकर आई हूँ।
- रोहिणी नाराज होने की बात नहीं। वह तुम्हारा साथ चाहता है। शांत भाव से घर में प्रवेश करते हुए नैपाली के पापा बोले।
- तब क्या मैं अस्पताल जाना बंद कर दूँ। आप क्यों नहीं अपनी प्रेक्टिस बंद करके उसकी देख-रेख करते।
- मैं तब भी माँ की कमी पूरी नहीं कर पाऊँगा। माँ, माँ ही होती है।
- मैं अपना कैरियर बर्बाद नहीं कर सकती।
- मैं तो केवल यह चाहता हूँ कि उसे थोड़ा समय दो और बेटा होने के नाते उसका अधिकार  बनता है। बच्चे को जन्म देने से पहले तुम्हें सोच लेना चाहिए था कि उसके प्रति तुम्हारा कर्तव्य भी है, उसे निभा पाओगी या नहीं।
पति की तर्कसंगत बात से रोहिणी चुप हो गई। माँ–बाप के बीच गरमागर्मी होने पर नैपाली अख़बार लेकर बैठ गया।
हठात बोला –माँ देखो न, इसमें लिखा है–बिल्ली ने एक छोटे बच्चे की जान बचाई। मुझे भी एक बिल्ली का बच्चा ला दो। आप लोगों के पीछे से यदि मुझे कुछ हो गया तो वह बचा लेगी।
उसके मन का भय उसकी ज़बान पर आ गया। उसमें पनपती असुरक्षा की भावना को महसूस कर रोहिणी भी हिल गई।
दूसरे दिन वह क्लीनिक से लौटते समय सफ़ेद बालों वाला बिल्ली का प्यारा-सा बच्चा उठा लाई। भूरी–भूरी आँखें, रेशम से बाल, नैपाली तो उसकी झलक पाते ही उछल पड़ा। अपने हाथों से बड़ी सावधानी से ऐसे उठाया जैसे माँ नवजात शिशु को उठाती है। उसका चुंबन ले सीने से लगा लिया। वह सोचने लगा–मेरी तरह यह भी अपनी माँ को याद करेगा पर मैं इसे इतना प्यार दूंगा कि माँ की कमी खलेगी ही नहीं।
नैपी बिल्ली के बच्चे को भूरी ही कहता। वह उससे इस तरह हिल-मिल गई थी मानो उसकी दुनिया नैपी ही हो।

स्कूल जाते समय वह बड़े रौब से कहता–रामकली! घर का काम हो न हो पर भूरी का पूरा ध्यान रखना। वह भी उसकी बात न टालती। उसे नैपी से पूरी सहानुभूति थी। उसे लगता –नैपी के माँ–बाप नोट छापने की मशीन बन कर रह गए हैं।
एक छोटे से जीव ने नैपी की दिनचर्या ही बदल दी। अंधेरे गए बाहर तक घूमने पर तो उसने ताला लगा दिया। शाम को भूरी को घुमाता, मैदान में दौड़ाता और उसमें अच्छी आदतें डालने की कोशिश में रहता। भूरी दूध–रोटी खाती तो वह भी खाने बैठ जाता। भूरी के रूप में उसे एक साथी मिल गया जिसकी उसे परवाह थी और भूरी को नैपी की। एक मिनट को वह उसकी आँखों से ओझल हो जाता तो म्याऊँ –म्याऊँ करती पूरे घर में ढूंढ आती।

एक बार रामकली कुछ दिनों को अपने गाँव गई। पीछे से नैपी को वायरस फ़ीवर हो गया। अस्पताल जाने से पहले उसकी माँ ने दवाइयों का लिफ़ाफ़ा बेटे के सिरहाने रख दिया और कहा –ठीक से दवा लेते रहना। कोई बात हो तो मुझे फ़ोन कर देना। पड़ोसी आंटी को घर की चाबी दिये जा रही हूँ। वे आकर तुम्हारा हाल–चाल पूछ जाएंगी।
माँ से रुकने के लिए कहना बेकार था। वह अनमना-सा उनके आदेश सुनता रहा। दोपहर होते–होते उसका बुख़ार बढ़ने लगा। ज्वर के ताप से वह बड़बड़ाने लगा–भूरी मुझे बचा लो --भूरी अपना नाम सुनकर चौंक गई। अपने साथी के सिरहाने बैठकर उसने धीरे से पंजा उठाया और उसका सिर सहलाने लगी। बुख़ार की गर्मी का शायद उसको अनुमान लग गया था। वह रसोई के वाशबेसिन पर चढ़ गई। पंजे से नल की टोंटी घुमाई और बहते पानी के नीचे अपना सिर रख दिया। जब उसके बाल अच्छी तरह भीग गए, एक छलांग में अपने छोटे मालिक के पास आन बैठी। उसके माथे पर झुककर उसने अपना सिर हिलाया। झरझरा कर उसके बालों से ठंडे पानी की बूंदे नैपी के चेहरे पर गिरने लगीं। उसको ठंडक महसूस हुई और आँखें खोल दी लेकिन फिर से उस पर बेहोशी छाने लगी। भूरी घबरा कर इधर–उधर चक्कर काटने लगी। कुछ  मिनटों की कसरत के बाद वह दूसरी मंजिल की खिड़की से पाइप के सहारे नीचे कूद गई। पड़ोसिन आंटी का दरवाज़ा भड़भड़ करने लगी। वह यहाँ कई बार नैपी के साथ आ चुकी थी। आंटी भूरी को देखकर चौंक गईं। भूरी उनके कदमों में लोटकर बाहर जाने की ओर इशारा करने लगी। आंटी अनहोनी की आशंका से काँप उठी। उन्होंने नैपी के घर की चाबी उठाई और भूरी के पीछे चल दीं।

दरवाजा खोलते ही आंटी से पहले भूरी घर में घुस गई। नैपाली के सिरहाने दो पैरों से खड़े होकर वह अजीब-सी आवाज़ निकालने लगी। आँखों की चमक से लगता था वह बहुत खुश है और उसे पूरा भरोसा है कि उसके साथी को कष्ट से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा।

आंटी ने नैपाली के माथे पर हाथ रखा। वह तवे की तरह जल रहा था। उन्होंने उसे दवा देकर रोहिणी को फ़ोन किया–तुम तुरंत चली आओ। बेटे की तबियत ठीक नहीं। भूरी के कारण आता संकट टल गया।

आंटी ने ठंडे पानी की पट्टियाँ नैपी के माथे पर रखनी शुरू कर दी और भूरी! उसको किसी तरह चैन नहीं मिल रहा था। वह बार–बार दरवाज़े तक जाती, एक–दो बार उचककर बाहर झाँकती फिर निराश-सी म्याऊँ कहकर लौट आती। उसे शायद रोहिणी के आने का इंतज़ार था।

रोहिणी को आने में आधा घंटा लग गया। बदहवास-सी बेटे के पास आकर खड़ी हो गई। वह अपने बेटे की ओर एकटक देखे जा रही थी और अपने को अपराधी महसूस कर रही थी। तभी नैपी की आँखें खुलीं, उसने कमज़ोर-सी आवाज़ में पुकारा---भूरी–भूरी। भूरी फुदककर अपने साथी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने पंजे में लेकर चाटने लगी । जो कर्तव्य माँ का था वह भूरी-माँ बनी निभा रही थी।

जानवर के अगाध स्नेह के आगे आज का सभ्य मानव मूक था।
 रोहिणी के मुख से केवल इतना निकला–बेटा, मुझे माफ़ कर दे ।
सुधा भार्गव 
बैंगलोर



शनिवार, 15 अगस्त 2015

बालकहानी


मेरे तुम्हारे सपने /सुधा भार्गव



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      पराग  के पैदा होते ही उसके माँ –बाप की आँखों में सपने तैरने लगे । उनकी जो इच्छाएँ पूरी नहीं हुई थीं उनको वे अपने बेटे द्वारा पूरा करना चाहते थे ।
बच्चा तीसरी कक्षा में ही आया था कि कमल और उसकी पत्नी अपने बेटे का भविष्य बुनने लगे ।
-मेरा बेटा तो इंजीनियर बनेगा। 
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-न-- न ,मेरा बेटा तो - - - -डॉक्टर  बनेगा ।


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बस हर बात में आप मनमानी करना चाहते हैं।
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अच्छा बाबा ,जो तुम कहोगी वही बनेगा ।
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ऐसी बात नहीं।  मेरी इच्छा पूरी न कर पाया तो आपकी इच्छा पूरी करेगा  बेटा तो हम दोनों का है ।

    कमल तो सपनों का बीज बोकर दफ्तर चला जाता पर उसकी पत्नी दिलोजान से उसमें खाद देने में लग जाती । बेटे पर पूरी तरह नजर रखती कि कहीं खेलने –कूदने में ही तो सारा समय खराब नहीं कर रहा ।
     एक दिन बेटा भागता हुआ आया –माँ ,सुबह की पढ़ाई खतम कर दी है । अब मैं खेलने जाऊंगा 
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पर बेटा    ---आज तो छुट्टी है कुछ तो पढ़ाई पर ज्यादा  ध्यान दो ।
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क्या पढूँ ?
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रिवीजन ही कर लो ।
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रिवीजन- -- मतलब पन्नों को उलट – पुलट करूं। रिवीजन के नाम तो मुझे उबकाई आने लगी है।  एक ही पाठ दस बार पढ़ो----,उफ !लगता है पागल हो जाऊँगा
चलो आपकी बात मान लेता हूँ पर अभी से कह देता हूं शाम को नहीं रुकूंगा ,फुटबॉल खेलने जाऊँगा ।
-ओह बहस न कर ,जा पढ़ । उसकी शर्त सुनकर माँ झुँझला उठी ।
    
पराग ने   सोते –जम्हाइयाँ लेते समय काटा ।  बस नाम को किताब हाथों में ले रखी थी ।   दिन ढलते जूते कसे और निकल गया घर से बाहर पर यह क्या ! वहाँ तो पापा खड़े मिल गये --
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कहाँ चले बेटा --?
आवाज में मिठास थी पर पराग कड़वाहट से भर गया ।
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खेलने जा रहा हूं ।
-जल्दी आना कुछ ख़ास बात करनी है ।
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ठीक है पापा ।
पराग अपने पर काबू न रख सका और बड़बड़ाने लगा --
मेरे खेलने के समय ही बातें आन टपकती हैं । वैसे पापा इतने खोये -खोये रहते हैं कि मेरा पास खड़ा होना भी  पता नहीं चलता । कोई नहीं चाहता कि मैं खेलूं ।
    पराग खुशी- खुशी घर लौटा पर ेखाने की मेज पर पापा को बैठा देख उसका मुंह लटक गया ।
-
आओ बेटा  ,अब तो तुम कक्षा 5 में आ गए हो ।   हमारी इच्छा है तुम पढ़ने में रात –दिन एक कर डालो ताकि और अच्छे स्कूल में दाखिला हो सके । तुम्हारे लिए एक टीचर भी रख देंगे ।उसकी सहायता से ज्यादा अंक पा सकते हो । 
हमने तो कह दिया जो कहना था ,अब तुम बताओ - - -तुम क्या चाहते हो !।
    -
पापा आपकी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ रही --पर हाँ ,मैं बहत कुछ करना चाहता हूं । नीले आसमान के नीचे हंसती धरती पर खिले फूलों को छूना चाहता हूं । गुनगुनी धूप में साथियों का हाथ पकड़ तितलियों का पीछा करना चाहता हूं ,फुटबॉल की तरह उछलना चाहता हूँ लेकिन कैसे करूं! आप लोगों ने मेरा सारा समय छीन लिया है।  क्या करूं—कहाँ जाऊं?मुझे ,मेरा कुछ समय तो लौटा दो पापा !पराग कहते –कहते बिलख पड़ा ।
उसका  फड़फड़ाना  माँ बाप से न देखा गया ।
उन्होंने उसे गले लगाते बड़े कातर स्वर में कहा –बच्चे हम तो तुम्हारे लिए सोने -चांदी सा भविष्य चाहते थे पर यहाँ तो तुम अपने वर्तमान में ही खुश नहीं हो तो आने वाले दिनों का स्वागत कैसे करोगे ?
 -पापा , मैं जानता हूँ पढ़ना बहुत जरूरी है पर इस समय  खुश रहने के लिए और भी तो कुछ चाहिए।
कमल और उसकी पत्नी को पहली बार एहसास हुआ कि वे बच्चे को बहुत जल्दी बड़ा होना देखना चाहते हैं ,उससे उसका बचपन छीनना चाहते हैं ताकि उनके सपने पूरे हों । उन्होंने अपनी भूल सुधार का निश्चय किया।
- आज से हम अपनी किसी इच्छा का बोझ तेरे सिर पर नहीं लादेंगे । सारी टोकाटाकी बंद । तू खेलेगा –कूदेगा –पढ़ेगा और अपने सपनों के झूले में झूलता बड़ा होगा। कमल ने दुलराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा।  
-सच पापा । चांदी के सिक्कों सी उसकी खनकती हंसी से कमल और उसकी पत्नी के चेहरे भी चमक उठे ।  
समाप्त
सुधा भार्गव
बैंगलोर

(यह कहानी देवपुत्र बाल मासिक अगस्त अंक2015  में प्रकाशित हुई है।)