प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

मंगलवार, 3 मई 2016

शिक्षण काल का मेरा एक अनुभव


अजीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी द्वारा निकलने वाली हिन्दी त्रैमासिक
 पत्रिका खोजें और जानें  में प्रकाशित  /सुधा भार्गव

सिरदर्द


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वह कक्षा २ का छात्र था | गोरा -गोरा ,दुबला -दुबला ,झेंपा सा |देर से बोलना सीखा इसलिए कविता बोलते -बोलते रुक गया तो रुक गयाI दुबारा शब्द  का उच्चारण करने  में लगता जैसे पत्थर  घसीटना पड़ रहा हो उसके इस हाल पर साथी हँस पड़तेI मैडम गुस्से से चिल्लाती --बैठ जाओ --बोलना नहीं आता तो इस स्कूल में बाप  ने क्यों भेज दिया ? भेजते किसी विकलांग स्कूल में या लंगड़े -लूले ,गूंगे -हकले बच्चों  के स्कूल में I बैठ जाती जुगलबन्दी---!  सौरभ की हीन ग्रंथि सक्रीय हो उठतीI  

     एक दिन माँ घरमें गृहकार्य कराने बैठी कुछ पल बाद ही बोली ---मैं अभी बाजार से आ रही हूँ। इतनी देर में इन प्रश्नों के उत्तर लिख लेना माँ गई तो गई ---Iसाड़ियों की सेल का अंतिम दिन था Iउसे तो जाना ही ----- था I-सौरभ खामोशी की गहरी खाई में भटकता माँ की प्रतीक्षा करने लगा I बीच -बीच में एक दो शब्द भी लिख लेताIसंध्या तक माँ आई उसकी कॉपी में झाँका ---अरे ,तू जल्दी क्यों नहीं लिखता----- बोल तो बंद हो ही जाता है हाथ -पैर चलने भी बंद हो जाते हैं क्या ! एक घंटे में आठ लाइनें ही लिखीं हैं --कैसे होगा इतना  होमवर्क !सिरदर्द है --। |
          अगले दिन अधूरा गृहकार्य देखकरअगले दिन अधूरा गृहकार्य देखकर मैडम का चेहरा तमतमा उठा ---पूरा करो स्कूल का काम तभी टिफिन खाने को मिलेगाI--अरे टिफिन टाइम तो ख़त्म !भूख  लग रही है --जल्दी -जल्दी खा लूँ ---सौरभ  ने सोचा I-देखो तो खाने के नाम कितनी जल्दी हाथ चल रहे हैं----- लिखने के नाम हाथ टूट जाते हैं I शिक्षिका ने चिल्लाते हुए उसकी उँगलियों  पर स्केल से प्रहार किया I आँखों में डब डब करते आंसुओं से दिखाई देना बंद हो गया---I-खड़े  रहें अधूरे काम वाले --एक कर्कश आवाज गूंजी Iबच्चे खड़े रहे ,पैर दुखते रहे --बैठने की कोशिश की तो बादलों की सी गर्जना होती रही  ---खबरदार --जो बैठे तो -- ।                                           प्रिंसिपल  को स्कूल का निरीक्षण करते देखा  मैडम की जीभ पर तो  कोयल आन बैठी ------बच्चो ,सब बैठ जाओ, कल का कम पूरा करके घर से लाना Iमैडम को अचानक यह क्या हुआ-- बच्चे समझ न पाए न ही उनके समझने की उम्र थी--- छल -प्रपंच  से दूर मासूमों की दुनिया ---| सौरभ छुट्टी होने पर धीरे -धीरे क्लास से चल दिया -----लो अब तो यह चल भी नहीं सकता व्यंग बाण उसके कलेजे को छेक गया Iघर कब आया पता ही नहीं चला I वह तो ऊपर तक दलदल में फंसा था I-मैं लिख नहीं सकता --क्या बोल भी नहीं सकता !नहीं --नहीं --बोल सकता हूँ |बोलने के लिए ओंठ फडफडा उठे Iचलने में मुश्किल तो हो रही है ---शायद लंगड़ा भी हो गया हूँ--Iमैडम ठीक ही कह रही थी ---मैं लंगड़ा -लूला हूँ --गूंगा भी हूँ I नहीं --नहीं---
--- गूँजते शब्दों की चीख से दूर जाने के लिए उसने दोनों कानों पर कसकर हथेलियाँ जड़ दीँ Iपरीक्षा में तीन प्रश्न छोड़ दिये लेकिन तब भी पास होकर अगली कक्षा ३,सेक्शन सी में  चला गया I सुनने वाला हर कोई चकित ! उस दिन सब की जबान पर एक ही बात ------सुनने में आया है क्लास ३ का सेक्शन सी जिसे भी मिलेगा वह आठ -आठ आँसू  रो उठेगा I

कक्षा ३ के सेक्शन सी का प्रथम दिन , सब अपना नाम नई मैडम को बताने लगेवह लड़का भी --सौरभ ---ब----ब -----
-हाँ !हाँ बोलो !ठीक बोल रहे हो I मैडम बोली I  
उसका हौसला बढ़ा।  जोर देकर बोला ---बैनर्जी I
-शाबास सौरभ !  
प्रथम बार मुस्कान ने उसके चेहरे को गुलाबी चादर में लपेट लिया  Iनई मैडम कक्षा में घूम -घूम कर श्रुति लेख शव्द  बोल रही थीं I पांचवां शब्द  बोलते -बोलते सौरभ के पास आकर रुक गईं घबराया सा केवल तीन शब्द लिख पाया Iचौथा शब्द याद करने की कोशिश कर रहा था कि पांचवां शब्द बोल दिया गया I मैडम को पास खड़ा देख वह पसीने से नहा गया मैडम ने गौर से देखा, एक -एक शब्द कागज के पन्ने पर मोती की तरह जड़ा था I जो भी लिखा था सब ठीक था सांत्वना भरा हाथ उन्होंने सौरभ के कन्धों पर टिका दिया
- -मैं शब्द दुबारा बोलती हूँ ,बेटे लिखने की कोशिश करो Iसाथ ही उन्होंने घोषणा की -जो बच्चे धीरे -धीरे लिखते हैं उनको काम पूरा करने के लिए हमेशा दस मिनट ज्यादा दिये  जायेंगे I
सौरभ  जैसे  बच्चों  की निगाहें मैडम पर टिक गईं ----नई मैडम की बातें  तो एकदम नई -नई हैं I हमको अच्छी भी लगती हैं। 
  
आत्मीयता की फुलझड़ी से बालमन भयरहित हो उमंग से भर उठे I
-सौरभ ,टिफिन जल्दी से खाकर मेरे पास आना I मैं तुम्हारा कार्य पूरा करने में मदद करूंगी 
-इतनी अच्छी मैडम !जरूर आऊंगा |वह  मन ही मन बुदबुदाया
  हलके क़दमों से मैडम के सामने वाली कुर्सी पर वह  बैठ गया I लिखना शुरू किया ----ओह ये उँगलियाँ जल्दी क्यों नहीं चलतीं--। 

 पहली बार सौरभ को अपने पर गुस्सा आया I उसने उँगलियों में कलम  फंसाकर उसे खींचने की कोशिश की I हाथ कुछ ज्यादा गतिमान हुए I नई  मैडम इस परिवर्तन को भांप गईं I उन्हें विशवास हो गया कि सामान्य बच्चों की तरह  सौरभ भी एक दिन लिख सकेगा I उधर सौरभ मन की सलाई पर दूसरी तरह के फंदे डाल रहा था --मैं घर जाकर भी लिखूँगा देखता हूँ ये उँगलियाँ कैसे नहीं चलतीं I घर में बैठा वह एक घंटे से कलम चला रहा था I यह कैसी अनहोनी ---खुद लिख रहा है ---काम भी पूरा I माँ सकते में आ गई
सौरभ अपने में ही लीन रहने  लगा या नई मैडम के ख्यालों में I एक वही तो थीं जिन्होंने उसको समझा, बाकी तो उसकी कोमल भावनाओं और सुकुमार शरीर पर आघात करके आगे बढ़ गये  Iएक बार पीछे मुड़कर न देखा-- उस पर क्या बीत रही है !वार्षिक परीक्षा में हिन्दी में सबसे ज्यादा अंक पाकर उसने जीत हासिल की I आश्चर्य की लहर फिर एक बार आई और सुनने वालों को समूचा भिगोकर चली गई I

यह नई मैडम और कोई नहीं मैं ही हूँ I हर कक्षा में सौरभ  जैसे  बच्चे होते हैं I यदि  धैर्य रखते हुए उनकी  ओर प्रेम का हाथ बढ़ाकर हौंसला बढ़ाया जाय तो उन्हें  सफलता अवश्य मिलेगी

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

4-उत्सवों का आकाश

कुछ कहना है कुछ सुनना है

बच्चों होली का उत्सव बीत गया पर उसकी यादें तुम्हें अब भी गुदगुदा रही होंगी। गुदगुदाएं भी क्यों न।तुमने मस्ती करने में कोई कसर तो छोड़ी नहीं।गुलाल की बेतहाशा आंधी उड़ाई ,रंगों की जी भर बरसात की और तुम्हारे चेहरे! उफ उनका तो भूगोल ही बदल गया। कोई भालू नजर आ रहा था तो कोई लाल मुंह का बंदर। कोई लंगूरा तो कोई जेवरा। इन रंगों का छुटाना भी मुश्किल हो गया होगा। न जाने कितने लीटर पानी काम में लेना पड़ा। पर बच्चों क्या कभी तुमने सोचा कि तुम्हारे इस उत्सवोआनंद के पीछे न जाने कितनों की दुखभरी कहानी छिपी है। मेरे ख्याल से इसका तुम्हें रत्तीभर आभास न होगा क्योंकि किसी ने बताया ही नहीं।चलो मैं बताती हूँ। अरे मुझे भी बताने की जरूरत नहीं। नई कहानी पढ़ने से तुम खुद ही समझ जाओगे कि उत्सव के आकाश के नीचे कभी-कभी कितना अनर्थ होता है और फिर अच्छे बच्चों की तरह समझदारी से कदम उठाओगे।

प्यासे की मुस्कान(बाल कहानी)


होली के हुड़दंग के बाद बच्चे स्कूल गए। अब भी उनके चेहरों से रंग नहीं छूटे थे। उनकी आवाजें भी होली के रंगों में डूबी थीं। टिफिन का समय होते ही वे मुखर हो उठीं।
-मैंने तो धम्मू के इतना चटक लाल रंग लगाया—इतना चटक कि साबुन मलते-मलते उसके हाथ दुखने लगें होंगे और रंग भी न छूटा होगा। कमलू बड़ी शान से बोला।
-मैंने तो अपनी बहना चमेलिया के चेहरे पर तो लाल के साथ –काला रंग भी पोत दिया। एक दम भूतनी लग रही थी भूतनी। गेंदू भला कैसे चुप रहता।
-अरे वह डब्बू  है न डब्बू जो हमेशा अपनी शेख़ी ही बघारता रहता है, उसको तो मैंने अपने तीन साथियों के साथ घेर कर ही दम लिया और  पिचकारी से रंगों की वो बरसात की-- वो बरसात की कि भागा चूहे की तरह अपनी जान बचाकर।मुंह क्या उसका तो सारा बदन चितकबरा हो गया होगा। बदन रगड़ते रगड़ते बच्चू की खाल भी छिल गई होगी।हा –हा –हा।  बजरंगी ने अपना बजरंगपना दिखाया।  
-अरे गुलाब, तूने अपने होंठ क्या गोंद से चिपका लिए हैं! तेरी होली कैसी रही?
-मैं कमती कमती—केवल सूखे गुलाल से खेला।
-क्यों ?तबीयत तो ठीक है।
-अब तो ठीक हूँ पर होली के एक दिन पहले से मैं बहुत परेशान हो गया था।
-किसने तुझे परेशान किया जरा बता तो अभी उसकी अकल ठिकाने लगाता हूँ। 
-अरे बजरंग चुप से बैठ। उसकी क्या अकल ठिकाने लगाएगा। वह तो वैसे ही बहुत दुख में है।
चहकते बच्चे चुप हो गए और उस दुखी बच्चे के बारे में जानने को आतुर हो उठे।
-हमें भी तो कुछ बता या खुद ही उसके बारे में सोच -सोचकर आधा होता रहेगा। दोस्त है तो दिल की बात कहने में हिचक कैसी। बजरंग बोला।
-होली से पहले मैं छुट्टी के बाद घर जा रहा था कि रास्ते में मैले-कुचैले कपड़े पहने एक लड़का मिला। वह भागता हुआ मेरे पास आया और रोते-रोते बोला-
–भैया सुबह से पानी की एक बूंद गले से नहीं उतरी है।सड़क के किनारे लगे नल से एक  बूंद पानी नहीं टपका। गंदे नाले का पानी पीने की कोशिश की पर बदबू के कारण उल्टी हो गई। भूखा तो मैं रह लूँ पर प्यासा कैसे रहूँ।गला सूखा जा रहा है। मुझे थोड़ा सा पानी पिला दो। उसने मेरी पानी की बोतल की ओर इशारा किया।

रास्ते के लिए मैं हमेशा थोड़ा सा पानी बचाकर रखता हूँ। वह बचा पानी मैंने उसे पिला दिया।
मेरे थोड़े से पानी से उसमें इतनी ताकत आ गई यह देख मुझे बड़ा ही सुख मिला । मेरे दिमाग में आया यदि मैं रोज थोड़ा थोड़ा पानी बचा कर इस जैसे प्यासों को पानी पिलाऊँ तो न जाने कितनों के सूखे गले तर हो जाएंगे। बस तभी से मैं कम पानी में काम चलाने की आदत डाल रहा हूँ।
-बात तो तू ठीक कह रहा है। होली खेलने के बाद रंग छुटाते- छूटते न जाने कितना पीने वाला साफ पानी बहा होगा।रोजाना से चौगुना पानी--। कमलू बोला।
-पानी बचाने के लिए ही मैं केवल गुलाल से खेला। मेरा गुलाल तो एक लोटे पानी से ही धुल गया और बाल्टी भर पानी से नहा लिया।
-बाल्टी से!अरे आजकल बाल्टी से कौन नहाता है। फब्बारे के नीचे खड़े होकर इतना मजा आता है कि कुछ पूछो मत। मन करता है गर्मी में घंटों नहाते रहो। चंचल गेंदू ने गरदन मटकाई।
-अरे वाह अपने आनंद के लिए दूसरों के हिस्से का पानी खराब करते रहो और उसे पीने को भी न मिले।यह कहाँ का न्याय है। मैंने तो सोच लिया है जरूरत से ही पानी खर्च करूंगा। और हाँ ,कल से पानी की बोतल भी बड़ी लाऊँगा।क्या मालूम फिर कोई प्यासा मिल जाए।
- दोस्त,मैं भी तेरी तरह पानी बचाऊंगा और अपने हिस्से का बचा पानी काम वाली को दे दिया करूंगा । उस बेचारी को पीने का साफ पानी लाने के लिए घर से काफी दूर जाना पड़ता है। काम पर आने को जरा भी देरी हुई तो माँ उसकी तरफ बंदूक तानकर खड़ी हो जाती हैं। सच ऐसे लोगों पर बड़ी दया आती है।
-बेचारे –ये तो लगता है डांट से ही पेट भरते हैं। गुलाब ने गहरी सांस ली।
-गुलाब तूने हमसे अपने मन की बात कही तो पानी बचाने की तरकीब मालूम हुई ।हमारे  मोटे दिमाग को तो यह सूझा ही नहीं। यह बात तो दूसरे दोस्तों को भी बतानी पड़ेगी। केवल दया दिखाने से तो काम चलेगा नहीं, प्यासों के लिए कुछ करना ही पड़ेगा।
-दोस्तों को ही नहीं मम्मी -पापा को भी कहना पड़ेगा-पानी सोच समझ कर खर्च करें।बजरंग ने अपनी आवाज बुलंद की।
-बाप रे पापा! बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे।
-मैं तो अपने पापा से जरूर कहूँगा। तुम्हें यह जानकर हैरानी होगी कि बाथरूम में वे एक –एक घंटा लगा देते हैं।
-एक घंटा!कमलू चौंका।
हाँ!कभी –कभी तो एक घंटे से भी ज्यादा। 
-बजरंग,मुझे तो लगता है,यह कोई बीमारी है। किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
-तू ठीक कह रहा है । उन्हें बीमारी ही है, इलाज की भी कोशिश की पर सुनें तब न।
- कौन सी बीमारी है?सबके एक साथ स्वर उभरे।
-गाना सुनने की बीमारी।
-एँ---।
-गाना सुनते समय यदि उनको कोई डिस्टर्ब कर दे तो खूंखार शेर की तरह गुर्राने लगते हैं। बाथरूम में तो उन्होंने  छोटा सा स्पीकर लगा लिया  है। ऑफिस से आते ही बस घुस गए बाथरूम में और चालू हो गया स्पीकर। चलते शावर के नीचे गाने सुनते -गुनगुनाते एक घंटा यूं ही निकल जाता है और उनको पता भी नहीं लगता।
-मतलब ,एक घंटे नल चलता रहता है। यह तो कुछ ज्यादा ही है।
-ज्यादा नहीं –बहुत ज्यादा।
-क्यों रे बजरंग ,पानी कम खर्च करने की बात  तू अपने पापा से कह सकेगा? तुझे डर नहीं लगेगा?
-डर काहे का—अगर वे शेर है तो मैं बजरंगवली हूँ । उसने अपनी मजबूत कलाई हवा में घूमा दी।
इस निराले अंदाज को देख उसके दोस्तों की हँसी फूट पड़ी।

टिफिन टाइम खतम होते ही गुलाब,कमलू ,गेंदू और बजरंगबली ने  एक दूसरे का हाथ थामा और  कक्षा की ओर कदम बढ़ा दिए। इन सबके दिलों में कुछ करने की चाह थी और वह चाह थी प्यासे चेहरों पर मुस्कान लाना।

बुधवार, 23 मार्च 2016

3-उत्सवों का आकाश

विश्व कविता दिवस  

 इस अवसर पर मेरे प्रिय कवि हास्य सम्राट काका हाथरसी की कुछ यादें जिन्होंने मुझे सिखाया -खूब हंसो,हँसते रहो और हँसते -हँसते हर मुसीबत का सामना करो।

उनको हार्दिक नमन



बच्चों 
21 मार्च को कविता दिवस था।जिसका मतलब ही है खूब कविता पढ़ो,लिखने की कोशिश करो और कविता दूसरों को सुनाओ।
कभी न सोचो तुम्हारी कविता ठीक नहीं। उसमें तो तुम्हारे मन की मिठास घुली है। तुम जैसी सरल और निर्मल है। फिर तो ठीक ही ठीक होगी।

इस दिन मुझे अपने प्रिय कवि बहुत याद आए।शुरू से ही काका हाथरसी की कविताएं बहुत पसंद थीं।हमेशा सोचा करती,कैसे वे ऐसी गुदगुदाने वाली कविताएं लिख लेते हैं। उनका कविता पाठ बड़े शौक से सुना करती थी। उनकी दो किताबें जो मैंने बहुत पहले खरीदी थीं अभी तक अलमारी में सावधानी से रख छोड़ी हैं।


काका हाथरसी हास्य रचनावली-नोक झोंक –प्रथम संस्कारण 1982,मूल्य केवल  60रुपए।  
श्रेष्ठ हास्य व्यंग  कविताएं 9काका हाथरसी ,गिरिराज शरण )संस्कारण 1981,मूल्य 35 रुपए ।
इनकी कीमत देखकर तो तुम जरूर चौंक गए होगे।आश्चर्य से जरूर मुंह से निकला होगा –इतनी सस्ती।  

इनको पढ़ -पढ़ कर खूब हँसती थी और सहेलियों को सुनाती थी।साथ ही सपने देखा करती कि मैं हास्य कवि बनूँ। इस तरंग में अल्हड़ बीकानेरी ,जैमिनी हरियाणवी ,बरसाने लाल चतुर्वेदी ,शैल चतुर्वेदी ,सरोजिनी प्रीतम और हुल्लड़ मुरादाबादी की कविताएं खूब पढ़ीं और सुनी। कभी रेडियो पर तो कभी दूरदर्शन में। होली के अवसर पर तो हास्य कवियों का खूब धूमधड़ाका रहता ही है।सो हास्यकवि सम्मेलन में जाकर घंटों के लिए जम जाती थी। 

बहुत दिनों से मैं काका हाथरसी को पत्र लिखने की कोशिश कर रही थी। जब भी लिखने बैठती दिल बैठने लगता इतने महान कवि मेरा पत्र पाकर न जाने क्या सोचेंगे,जबाब देंगे भी या नहीं!पर एक दिन 1990 में हिम्मत जुटाकर मैंने उन्हें काँपते हाथों से पत्र लिख ही डाला। क्या लिखा वह तो याद नहीं पर ताज्जुब!उनका जबाव अगले ही हफ्ते आ गया। 



पत्र पाकर मैं तो उछल पड़ी। एक बार नहीं उसे सौ बार पढ़ा होगा। ऐसे महान थे काका हाथरसी जो अति व्यस्त होते हुए भी मुझ जैसे लोगों की भावनाओं की कदर करते थे। इस पत्र का एक -एक शब्द मेरे लिए अमूल्य और ऊर्जावान है।   

 मैंने उसका जबाब भी दिया। पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-



  मैंने जब  बच्चों को कलकता बिरला हाई स्कूल में पढ़ाना शुरू किया तो काका हाथरसी की कविताओं का मंच पर  छात्रों से  कविता पाठ कराती थी।एक बार तो मैंने उनके प्रहसन को आधार बनाकर एकांकी नाटक भी लिखा और वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बच्चों ने मंच पर खेला। खतम होने पर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अपने प्रोग्राम की सफलता  देख मेरे तो पैर जमीन पर पड़ते ही न थे।
लेकिन इस सबका श्रेय किसको जाता हैं ?मेरे प्रिय कवि काका हाथरसी को।

तो प्यारे बच्चो ,यदि तुम्हें कविता में दिलचस्पी है,उसका आनंद लेना है,कविता लिखनी है तो मनपसंद कवियों को खूब पढ़ो। देखना, पढ़ते- पढ़ते तुम्हारी कलम भी चलने लगेगी। कवि काका हाथरसी को भी पढ़ो तो अच्छा है।हँसते -हँसते पेट फूल जाएगा। 
हाँ याद आया -काका हाथरसी ने अपनी किताब में एक हास्य कवि सम्मेलन लिखा है। उसमें कुछ कवियों की कविताएं बहुत मजेदार है। 

कवि पिलपिला जी की कविता सुनो-
पिल्ला बैठा कार में,हम सब ढोते बोझ
भेद न इसका मिल सका ,बहुत लगाई खोज 
बहुत लगाई खोज ,रोज पिल्ला साबुन से नहाता 
देवी जी के हाथ से दूध रोटी खाता 
कहे पिलपिला वर मांगत मैं चिल्ला-चिल्ला  
अगले जन्म में भगवन ,हमको बनाना पिल्ला। 

खिल गए न गालों पर हजार गुलाब। अब कवयित्री शवनम का कीर्तन सुनो। अच्छा लगे तो तुम दादी माँ के साथ इस कीर्तन को कर सकते हो। 

जै रघुनंदन जै सियाराम,जानकी बल्लभ सीताराम 
हलुवा में हरि बसत हैं,घेवर में घनश्याम 
मक्खन में मोहन बसें,रबड़ी में श्री राम 
रसगुल्ला में शालिग्राम ,जै रघुनंदन जै सियाराम    
रसगुल्ला में शालिग्राम ,जै रघुनंदन जै सियाराम
बोलो सियावर राम चंद्र की जै।   
अरे ,चारों तरफ हंसी के गुब्बारे ही उड़ते नजर आ रहे हैं। हँसना तो वैसे भी सेहत के लिए अच्छा है। 
विश्व कविता दिवस 
बच्चों-बड़ों सबको बहुत- बहुत मुबारक हो।   


गुरुवार, 10 मार्च 2016

2-उत्सवों का आकाश

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जंगल की होली /सुधा भार्गव

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बच्चो -हम तुम तो होली खेलते ही हैं मगर क्या तुमने कभी पक्षियों और पशुओं को भी होली खेलते -जलाते सुना है? अगर नहीं ,तब तो तुम्हें यह कहानी पढ़नी ही पड़ेगी।  जरा देखो तो--- 
होली खेलते- खेलते रंगबिरंगी सुंदर चिड़ियाँ तो खुशी के मारे चीं-चीं--चीं कर  इठला रही हैं  और पशुओं के अंदर बहता प्यार का झरना तो पहले से भी ज्यादा तेजी से कलकल बहने लगा है। अरे यह भालू --यह तो हमारी तरफ ही आ रहा है।  सबसे पहले इसी से मिलते हैं।   

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   एक गोलमटोल भालू  था। जिसका नाम था मटल्लू वह डंडे से टिक-टिक की आवाज करता गुल्लू किसान के खेत की रखवाली किया  करता । किसान होली खेलने का बड़ा शौकीन था इसीलिए हर वर्ष इस अवसर पर अपने गाँव चला जाता। इस साल भी जाने लगा तो भालू दुखी सा हो गया। 

    गिड़गिड़ाते बोला-- गुल्लू भैया ,इस बार गाँव न जाओ।हमारे  साथ होली मनाना। 
-तू  तो बड़ा भोला है-- अरे दो लोग में क्या होली मनती है । 
-दो!दो कहाँ ?हम दोस्त तो दस हैं --देखते ही  देखते सारा जंगल होली खेलने आ जाएगा। 
-खेलने की होली तो कल है। पहले तो आज शाम को  होलिका जलाई  जायेगी और उसके लिए लकडियाँ इकट्टी करनी पड़ेंगी।समय तो बहुत कम है। तू अपने दोस्तों के साथ इतनी जल्दी लकड़ियाँ जुटा पाएगा?
-हाँ –हाँ क्यों नहीं।  ,
-तब ठीक है । मैं अभी आता हूँ,मुझे कुछ काम याद आ गया है।

भालू जोर से चिल्लाया -
गोरी कबूतरी,काली कोयलिया 
रिंकू हाथी ,चिंकू घोड़ी 
जल्दी जल्दी आ जा ,
सूखी लकड़ी जुटा जाओ  
होलिका आज  जलानी है  
खुशियाँ खूब मनानी हैं।

सब लस्टम-पस्टम दौड़े आये। हैरानी से बोले -
ओए मटल्लू , होलिका क्यों जलानी है ?
- यह तो मुझे भी नहीं मालूम । वह तो गुल्लू भैया ही बताएँगे। 

-हाँ—हाँ,इसे क्या मालूम!शरीर से तो यह मोटा है ही ,बुद्धि भी इसकी मोटी  है।
-ओह कोयलिया क्यों सताती है तू इसे बार बार। देखो—देखो, भैया आ गए-भैया  आ गए। कबूतरी गुटर-गूं,गुटर-गूं कर उठी।
*

सबने किसान को घेर लिया,भैया बताओ न !होली क्यों जलाते हैं ?
-क्योंकि आज के दिन होलिका जल गई थी।
-वह क्यों जल गई ?चिंकू घोड़ी दुखी हो उठी।
-क्योंकि उसने अपने बुरे भाई राजा हिरण्याकश्यप का साथ दिया।
-होलिका का भाई बुरा क्यों था?
-ओह !एक के बाद एक प्रश्न ---अरे इसकी बड़ी लंबी कहानी है।
-तो सुना दो न भैया ,कहानी तो हमें बहुत अच्छी लगती है।
-अच्छा सुनो-  राजा अपने को भगवान से भी बड़ा समझता था और अपने बेटे प्रह्लाद से कहता –बस मेरी  पूजा करो। जब बेटे ने उसकी बात न सुनी तो उसे कई बार जान से मारने की कोशिश की पर उसके तो एक खरोंच भी नहीं आई। इससे राजा परेशान हो उठा।
 उसकी एक बहन होलिका भी थी। उससे अपने भाई का कष्ट देखा न गया। बोली –भैया, मैं आग से नहीं जल सकती। कहो तो प्रह्लाद को गोदी में लेकर आग में बैठ जाऊं।  
भाई बड़ा खुश -अरे बहन यह तूने अच्छा बताया । प्रह्लाद जल कर खाक हो जाएगा हा—हा—हा। देखता हूँ इस बार वह कैसे बचता है?

होलिका प्रह्लाद को लेकर आग की ऊंची- ऊंची लपटों के बीच बैठ तो गई पर कुछ ही देर में उसके बिलखने-चिल्लाने की आवाज आने लगी –अरे मुझे बचाओ—मुझे बचाओ।
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 जब तक आग की लपटें शांत हुईं होलिका बुरी तरह जल चुकी थी।
-क्या प्रह्लाद भी जल गया?घोड़ी ने बेचैनी से पूछा। 
-नहीं।वह तो बच गया क्योंकि वह अच्छे काम ही करता था। जलती तो होलिका भी नहीं क्योंकि उसे आग में न जलने का भगवान से  वरदान मिला था पर वह यह भूल गई कि किसी को नुकसान पहुँचाने से भगवान गुस्सा हो जावेंगे और वरदान का असर न होगा।  
-अच्छा हुआ होलिका जल गई --होलिका जल गई –अच्छे का बोलबाला,गंदे का मुँह काला।  कोयल कूक उठी । 
अच्छा शाम होने वाली है  सबको मिलकर होलिकादहन की तैयारी भी करनी है। अपने अपने काम में लग जाओ।
*
कोयलिया –और कबूतरी  उड़ चले । चोंच में तिनके भर कर लाये और खुले  मैदान में रख दिए । हाथी सूखी  टहनियों का गट्ठर अपनी सू  में लपेट लाया और तिनकों पर रख दिया ।भालू के दोनों हाथ भूसे से भरे थे । उसने भी भूसा गट्ठर पर धीरे से रख दिया 
किसान भी समय पर आ गया । कुछ बड़ी -बड़ी लकड़ियाँ उसने भी  घास -फूस और टहनियों के ढेर पर डाल दीं और  बोला – बहुत पहले  होलिका लकड़ियों के ढेर पर ही बैठकर जली थी। हर वर्ष इसी तरह हम उसे जलाकर खाक कर देते हैं ताकि सबको याद रहे कि उसकी तरह गलत रास्ते पर चलने वालों की किसी को भी जरूरत नहीं होती। 

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इस ढेर में आग लगाने से पहले मुझे  होलिका  से प्रार्थना करनी है  कि जिस तरह से उसने बालक प्रहलाद को कष्ट देने की कोशिश की वैसा वह किसी के बच्चे के बारे में न सोचे।
 होलिका के  जलते ही चारों और रोशनी फैल गई । आग की जब लपटें ऊपर उठने लगीं,किसान टहनी में लगीं गेहूँ की बालियाँ भूनने लगा । गेहूँ के छिलके उतारे और  आस -पास खड़े पशु-पक्षियों को देते हुए बोला  -होली के दिनों में हम किसान मस्ती से झूम उठते हैं क्योंकि नई फसल कटती है। जितनी ज्यादा फसल उतनी ज्यादा खुशी की लहरें । लो  नया  अनाज चखो  फिर प्यार से एक दूसरे के गले मिलो।   
सबने बढ़कर दाने लिए और अपनी भाषा में चिल्लपौं करने लगे।  
कोयलिया और कबूतरी चोंच से चोंच भिड़ाकर प्रेम के गीत गाने लगीं। हाथी अपनी सू से सबको छूता और फिर उसे अपने  मस्तक से लगा लेता मानो स्नेह की बौछारों में भीगना -भिगाना चाहता हो  रिंकू घोड़ी किसान के पास हिनहिनाकर उसके आगे -पीछे घूमने लगी ।
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होलिका तो जल गई पर कल होली कैसे खेलेंगे ?रंग तो हैं ही नहीं। चिंकू घोड़ी बोली। 
 -मेरे होते हुए चिंता न करो । मेरे दादा कहते थे टेसू के फूलों से भी तो होली खेली जाती है।चलो तुम्हें उससे मिलवाता हूँ। किसान  बोला।
-कहाँ जा रहे हो?तुम्हारे पास ही तो खड़ा है -तुम्हारा टेसू ।
-तुम टेसू हो?ऊँह किसने रख दिया तुम्हारा नाम टेसू। ढेर सारे लाल-लाल फूल तुम पर आलती पालती मारे बैठे है। तुम्हारा नाम तो लाल लंगूर होना चाहिए।

-कोयलिया तू तो मेरी बड़ी हंसी उड़ाती है। पर तू इतना मीठा बोलती है कि अपनी छोटी बहन की बात पर गुस्सा भी नहीं आता। लाल लंगूर तो नहीं पर कुछ लोग मुझे आग का गोला जरूर कहते हैं।
-आग का गोला !आग लगाने वाला । जरूर तूने चिड़ियों के घोंसले जला डाले होंगे।
-क्या पागलपने की बात कर रही है। क्या मैं ऐसा दुष्ट लगता हूँ?मैं जब अपने परिवार के साथ खड़ा होता हूँ तो आकाश के नीचे लाल -लाल फूलों की चादर सी तन जाती है। दूर से उसे देखने पर लगता है मानो जंगल में आग लग गई हो।   अब कहने को तो मुझे सुग्गा पेड़ भी कहते हैं । 
-सुग्गा --मजाक कर रहे हो क्या ?तुम क्या टें—टें टीटाराम—सीताराम करते हो?मटल्लू बोला।
-मेरा फूल देखो --इसकी लाल -पीली पंखुड़ी तोते की चोंच की तरह मुड़ी है । 


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-चोंच मुड़ी  तो है--मान गए सुग्गा भाई। 
-अच्छा टेसूराम , हमें होली खेलनी है अपने कुछ फूल दे दो।किसान बोला ।  
-क्यों नहीं –क्यों नहीं। टेसू इतनी जोर से हिला कि खूब सारे फूल जमीन पर टपक पड़े।  
किसान ने सारे फूल बटोर लिए और बोला –इन्हें में पानी में भिगो दूंगा। सुबह तक होली का रंग तैयार ।
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अगले दिन भालू की दोस्त मंडली देर तक सोती रही पर वह खरगोश की घबराहट भरी आवाज सुन  जल्दी जाग गया था। आवाज की ओर ठुमक-ठुमक दौड़ा -दौड़ा गया तो देखा- खरगोश टेसू के पानी से  भरी बालटी  में डुबकियाँ लेता बोलने की कोशिश कर रहा हैं-
-रिंकू-चिंकू मैं डूबा रे –मटल्लू बचाले। मटल्लू भालू ने उसे तुरंत ऊपर खींचा और झुंझलाया -यह क्या तमाशा है !
-मैं सुबह उठकर पानी में झांका। उसमें मैं बहुत सुन्दर लग रहा था।  अपने को  पकड़ने को झुका तो गिर गया धड़ाम से ।
उसके भोलेपन पर भालू को हँसी आ गई । इतने में रिंकू हाथी और चिंकू घोडी भी आन पहुंचे । कोयलिया और कठफोड़वी चोंच में पानी भरकर एक  दूसरे पर डालने लगीं। किसान को देखते ही उसे भी पल भर में सबने ऊपर से नीचे तक भिगो दिया । 

इन पशु -पक्षियों की निराली होली देखकर गुल्लू किसान  अवाक् था ।सोच रहा था -इस बार गाँव न जा कर उसने अच्छा ही किया। यहाँ   न छल -कपट न ईर्ष्या की भावना, बस इनके बीच प्यार की एक धारा बह रही है  जिसे इंसान ने सुखा दिया है।

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