प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 2 मार्च 2026

बालकहानी -प्रकाशित -बच्चों की प्यारी बगिया


भूरी माँ

सुधा भार्गव 

साथियों ,अभी हाल में ही बच्चों की प्यारी बगिया पत्रिका ,जनवरी -मार्च विशेषांक 'माँ' मिला। इस अंक की अतिथि संपादक सुश्री सुशीला साहू है। आवरण बहुत ही मनमोहक है और रंग सज्जा सुंदर है। बाल साहित्य से संबंधित लघुकथा ,बाल कहानी यादें बचपन की ,बाल गीत ,बाल सर्जन आदि सभी कोणों को छूने का सफल प्रयास किया है। सबसे बड़ी बात इसमें नई कलम को प्रोत्साहन मिला है। रचनाओं के चयन में सुशीला साहू जी ने बहुत श्रम किया है। उनको बहुत-बहुत बधाई और संपादक राम लखन प्रजापति तथा उनकी पूरी टीम का धन्यवाद। इस
में मेरी भी एक बाल कहानी प्रकाशित हुई है जिसका नाम है 'भूरी मां'। जमाने से निराली माँ! चलिए उससे मुलाकात की जाय...!



बालकहानी

       नैपाली बड़ा भोला -भाला बच्चा! कक्षा चार में पढ़ता था।  ऐसा खुश मिजाज कि हंसते-हंसते स्कूल में अपने दोस्त  बना लेता। उनकी संगत में हमेशा उसका चेहरा गुलाब की तरह से महकता ।

लेकिन घर में आते ही उसकी खुशी छूमंतर हो जाती।माँ दांतों की डॉक्टर और बाप दिल का डॉक्टर ! दूसरों के लिए समय था आप मगर अपने बच्चे  के लिए नहीं!स्कूल से आकर वह नौकरानी रामकली के पास रहता। उसे यह एकदम अच्छा नहीं लगता। रविवार को भी उसकी माँ और पापा घर में नहीं होते थे। फिर तो छुट्टी का दिन उसे पहाड़ लगने लगता।  रामकली को भी हजार काम! बेचारी करते-करते थक जाती। कुछ समय मिलता तो अपनी कमर सीधी करने लगती।उसको इतना समय कहां कि वह नेपाली के साथ बतियाती। 

अकेलेपन से उसका जी घबराता और बुरे विचार उसे बेचैन किए रहते –

‘यदि मैं गिर गया तो कौन उठाएगा! मुझे बुखार चढ़ गया तो दवा-दारू कौन करेगा!’

दोस्तों को फ़ोन करता तो वे एक मिनट बातें करते, फिर धम से रिसीवर नीचे रख देते। दोस्त अपने भाई–बहनों मे मस्त। माँ की उसे याद सताती पर डायल करते–करते उँगलियाँ थम-सी जाती–उन्होंने कह रखा था, “कम से कम फ़ोन करना क्योंकि मरीज़ों को देखते समय उनका दिमाग़ बँटता है।’’ 

सारे दिन फ़्रिज में रखे टॉफ़ी–चाकलेट खाने से उसके दाँत गड़बड़ा गए। घर में कोई समझाने वाला तो था नहीं जो मन में आता करता। यहाँ तक कि घर की चारदीवारी में इंसान की आवाज़ सुनने को उस बालक के कान तरस जाते। मन को समझाने के लिए दूरदर्शन के चैनल बदलता रहताकब नींद ने उसे थपकी देकर सुला दिया पता नहीं! पर टी. वी. चलता रहता। ठंड से उसके पैर पेट से जा लगते मगर चादर ओढ़ाने वाली मां ने  पहले से ही व्यस्तता का बहाना बना कर अपना पीछा छुड़ा लिया था।

      शाम के पाँच बजते ही वह पास के पार्क में घूमने निकल जाता। दोस्त तो संध्या घिरते ही अपने–अपने घरों का रास्ता नापते पर वह लावारिस-सा घूमता रहता। थक कर पेड़ के नीचे बैठा माँ का इंतज़ार करता। ज्यों-ज्यों अंधेरा होता, उसके अंदर का अंधेरा बढ़ता जाता।

       एक दिन माँ के आने पर चुपचाप वह उसके पीछे घर में दाख़िल हुआ। उसने सोचा -”मां अचानक उसे देखकर गले लगा लेगी!’ पर यह क्या !खुश होने की बजाय वह तो भड़क उठी..

नैपी,तुम अकेले इतनी देर तक बाहर क्यों थे? रामकली तुमने इसे क्यों नहीं बुलाया?’’

मेमसाहब। बाबा रोने लगते हैं। उन्हें देखकर हमारा कलेजा फटने लगता है। बाहर रहते हैं तो पेड़–पौधों को ही देखकर मन बहलाते रहते हैं।’’ 

न जाने क्यों यह भूत की तरह हमेशा मुंह लटकाए रहता है। इसे मैंने क्या नहीं दिया। अभी नया मोबाइल दिया। खूब गाने सुनो, पिक्चर खींचो–कौन रोकता है! कल ही नए जूते–टी शर्ट लेकर आई हूँ।’’ 

रोहिणी नाराज होने की बात नहीं। वह तुम्हारा साथ चाहता है।’’ शांत भाव से घर में प्रवेश करते हुए नैपाली के पापा बोले। 

तब क्या मैं अस्पताल जाना बंद कर दूँ। आप क्यों नहीं अपनी प्रेक्टिस बंद करके उसकी देख-रेख करते।’’ 

मैं तब भी माँ की कमी पूरी नहीं कर पाऊँगा। माँ, माँ ही होती है।’’ 

मैं अपना कैरियर बर्बाद नहीं कर सकती।’’ 

मैं तो केवल यह चाहता हूँ कि उसे थोड़ा समय दो और बेटा होने के नाते उसका यह अधिकार  बनता है। बच्चे को जन्म देने से पहले तुम्हें सोच लेना चाहिए था कि उसके प्रति तुम्हारा कर्तव्य भी है, उसे निभा पाओगी या नहीं।’’ 

     पति की तर्कसंगत बात से रोहिणी चुप हो गई। माँ–बाप के बीच गरमागर्मी होने पर नैपाली अख़बार लेकर बैठ गया। 

     हठात बोला –माँ देखो न, इसमें लिखा है–बिल्ली ने एक छोटे बच्चे की जान बचाई। मुझे भी एक बिल्ली का बच्चा ला दो। आप लोगों के पीछे से यदि मुझे कुछ हो गया तो वह बचा लेगी।” 

     उसके मन का भय उसकी ज़बान पर आ गया। उसमें पनपती असुरक्षा की भावना को महसूस कर रोहिणी भी हिल गई। 

     दूसरे दिन वह क्लीनिक से लौटते समय सफ़ेद बालों वाला बिल्ली का प्यारा-सा बच्चा उठा लाई। भूरी–भूरी आँखें, रेशम से बाल, नैपाली तो उसकी झलक पाते ही उछल पड़ा। अपने हाथों से बड़ी सावधानी से ऐसे उठाया जैसे माँ नवजात शिशु को उठाती है। उसका चुंबन ले सीने से लगा लिया। वह सोचने लगा–मेरी तरह यह भी अपनी माँ को याद करेगा पर मैं इसे इतना प्यार दूंगा कि माँ की कमी खलेगी ही नहीं। 

     नैपी बिल्ली के बच्चे को भूरी ही कहता। वह उससे इस तरह हिल-मिल गई थी मानो उसकी दुनिया नैपी ही हो। 

     स्कूल जाते समय वह बड़े रौब से कहता–रामकली! घर का काम हो न हो पर भूरी का पूरा ध्यान रखना। वह भी उसकी बात न टालती। उसे नैपी से पूरी सहानुभूति थी। उसे लगता –नैपी के माँ–बाप नोट छापने की मशीन बन कर रह गए हैं। 

      एक छोटे से जीव ने नैपी की दिनचर्या ही बदल दी। अंधेरे गए बाहर तक घूमने पर तो उसने ताला लगा दिया। शाम को भूरी को घुमाता, मैदान में दौड़ाता और उसमें अच्छी आदतें डालने की कोशिश में रहता। भूरी दूध–रोटी खाती तो वह भी खाने बैठ जाता। भूरी के रूप में उसे एक साथी मिल गया जिसकी उसे परवाह थी और भूरी को नैपी की। एक मिनट को वह उसकी आँखों से ओझल हो जाता तो म्याऊँ –म्याऊँ करती पूरे घर में ढूंढ आती। 

      एक बार रामकली कुछ दिनों को अपने गाँव गई। पीछे से नैपी को बुखार हो गया। अस्पताल जाने से पहले उसकी माँ ने दवाइयों का लिफ़ाफ़ा बेटे के सिरहाने रख दिया और कहा –ठीक से दवा लेते रहना। कोई बात हो तो मुझे फ़ोन कर देना। पड़ोसी आंटी को घर की चाबी दिये जा रही हूँ। वे आकर तुम्हारा हाल–चाल पूछ जाएंगी।’’ 

     माँ से रुकने के लिए कहना बेकार था। वह अनमना-सा उनके आदेश सुनता रहा। दोपहर होते–होते उसका बुख़ार बढ़ने लगा। ज्वर के ताप से वह बड़बड़ाने लगा–भूरी—भूरी मुझे बचा लो।’’ 

     भूरी अपना नाम सुनकर चौंक गई। अपने साथी के सिरहाने बैठकर उसने धीरे से पंजा उठाया और उसका सिर सहलाने लगी। बुख़ार की गर्मी का शायद उसको अनुमान लग गया था। वह रसोई के वाशबेसिन पर चढ़ गई। पंजे से नल की टोंटी घुमाई और बहते पानी के नीचे अपना सिर रख दिया। जब उसके बाल अच्छी तरह भीग गए, एक छलांग में अपने छोटे मालिक के पास आन बैठी। उसके माथे पर झुककर उसने अपना सिर हिलाया। झरझरा कर उसके बालों से ठंडे पानी की बूंदे नैपी के चेहरे पर गिरने लगीं। उसको ठंडक महसूस हुई और आँखें खोल दी लेकिन फिर से उस पर बेहोशी छाने लगी। भूरी घबरा कर इधर–उधर चक्कर काटने लगी। कुछ  मिनटों की कसरत के बाद वह दूसरी मंजिल की खिड़की से पाइप के सहारे नीचे कूद गई। पड़ोसिन आंटी का दरवाज़ा भड़भड़ करने लगी। वह यहाँ कई बार नैपी के साथ आ चुकी थी। आंटी भूरी को देखकर चौंक गईं। भूरी उनके कदमों में लोटकर बाहर जाने की ओर इशारा करने लगी। आंटी अनहोनी की आशंका से काँप उठी। उन्होंने नैपी के घर की चाबी उठाई और भूरी के पीछे चल दीं। 

     दरवाजा खोलते ही आंटी से पहले भूरी घर में घुस गई। नैपाली के सिरहाने दो पैरों से खड़े होकर वह अजीब-सी आवाज़ निकालने लगी। आँखों की चमक से लगता था वह बहुत खुश है और उसे पूरा भरोसा है कि उसके साथी को कष्ट से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा। 

     आंटी ने नैपाली के माथे पर हाथ रखा। वह तवे की तरह जल रहा था। उन्होंने उसे दवा देकर रोहिणी को फ़ोन किया–तुम तुरंत चली आओ। बेटे की तबियत ठीक नहीं। भूरी के कारण आता संकट टल गया। 

     आंटी ने ठंडे पानी की पट्टियाँ नैपी के माथे पर रखनी शुरू कर दी और भूरी! उसको किसी तरह चैन नहीं मिल रहा था। वह बार–बार दरवाज़े तक जाती, एक–दो बार उचककर बाहर झाँकती फिर निराश-सीम्याऊँ—म्याऊँ’  कहकर लौट आती। उसे शायद रोहिणी के आने का इंतज़ार था। 

    रोहिणी को आने में आधा घंटा लग गया। आई तो बदहवास-सी बेटे के पास आकर खड़ी हो गई। वह अपने बेटे की ओर एकटक देखे जा रही थी और अपने को अपराधिन महसूस कर रही थी। 

 नैपी की आँखें खुलीं, उसने कमज़ोर-सी आवाज़ में पुकारा-भूरी–भूरी।भूरी फुदककर अपने साथी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने पंजे में लेकर चाटने लगी । जो कर्तव्य माँ का था वह भूरी-माँ बनी निभा रही थी। 

भूरी के अगाध स्नेह के आगे रोहिणी को अपने कैरियर की जीत में  मातृत्व का खोखलापन नजर आने लगा । उसके मुख से केवल इतना निकला–“बेटा, मुझे माफ़ कर दे ।“




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें