प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

सोमवार, 2 मार्च 2026

साहित्यिक सप्तक पत्रिका ,गाजियाबाद

       

लालग्रह का मेहमान 

सुधा भार्गव 

 कुछ माह पहले साहित्यिक सप्तक पत्रिका का अंक 8 ,जुलाई 2025 मिला । जिसके आवरण पर बलिदान की अमर ज्योति : कारगिल युद्ध 1999 आँखों के समक्ष सजीव हो उठी । कारगिल वीर शहीद दाताराम को नमन किया। पृष्ठ पलटते ही कहानी , व्यंग ,आलेख ,कविता ,उपन्यास, यात्रा  वृतांत ,संस्मरण आदि से सामना हुआ। मन खुश हो गया। इसका सम्पादन रत्न मणितिवारी जी ने किया है। ग्राफिक डिजाइनर आर्यनंदिनी जी हैं। उनका व पूरी  टीम का बहुत बहुत धन्यवाद जिनके प्रयास से इतनी सुंदर पत्रिका उपलब्ध हुई। इसके समस्त रचनाकारों को बधाई। 

इसमें मेरी भी एक बालकहानी प्रकाशित हुई है। जिसमें नादान दो बालकों के प्रयास  से मंगल ग्रह पर भी तिरंगा झण्डा लहरा उठा है ।  




बाल कहानी  

    दो दोस्त थे मीनू और मंकी । दोनों ही धरती पर रहते थे। मंकी के पिता स्पेस इंजीनियर थे और साथ में एक पायलट भी।  इसलिए वे  मंगल ग्रह पर बस गए और नए-नए अविष्कार करने लगे। मंगल ग्रह एक तरह से खोजी ग्रह हो गया था। सब लोग उसी की बातें करते और कुछ ना कुछ उसके बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते। मीनू को भी मंगल ग्रह पर जाने की धुनसवार हुई। मंकी ने उसे कई बार समझाया , “तुम्हारी धरती तो हरी -भरी है ,ऑक्सीजन है। खाने -पीने को  तरह- तरह की सब्जियां हैं ।तुम यहां मत आओ।  यहां का जीवन बहुत कठोर है। काम अपने आप करने पड़ते हैं।” लेकिन मीनू ने उसकी एक बात भी नहीं सुनी। 

मीनू के पिता रोबोटिक इंजीनियर थे । वह अक्सर  उनकी वर्कशॉप में जाया करती और बड़े ध्यान से रोबोट  देखा करती।  उसने एक रोबोट से दोस्ती भी कर ली । उस ह्यूमेन रोबोट का नाम लवली था । वैसे भी वह देखने में बहुत सुंदर थी। 

एक दिन मीनू बोली -”लवली मुझे मंगल ग्रह पर ले चलो वहां मेरा दोस्त भी रहता है मंकी।”

“तुमने बहुत अच्छा सोचा । मैं भी धरती पर रहते -रहते उक्ता गई हूं । तुम्हारे साथ मंगल ग्रह की सैर जरूर करूंगी। लेकिन तुमने अपने पापा से पूछ लिया क्या! अच्छे बच्चे बिना मां-बाप को बताए  घर से बाहर नहीं जाते हैं।”

“तुमने भी क्या कह दिया! अगर पापा से कह दिया—वे  तो  तुरंत मना कर देंगे और माँ !उनकी तो कुछ पूछो ही मत। मेरा  तो  घर से बाहर ही  निकलना बंद कर देगी।” 

“अच्छा एक काम करो।  एक चिट्ठी लिखकर अपने पिता की  टेबल पर रख दो जिससे उन्हें तुम्हारे लिए कोई चिंता न हो।” 

मीनू ने लवली की बात मानी और उसे लेकर वह मंगल ग्रह पर पहुंच गई।

उसको आया देखकर मंकी तो चकरा कर रह गया। जैसे ही मीनू अंतरिक्ष यान से निकली  उसको ठंड सताने लगी।     बर्फीला तूफान भी हंसता आ गया। बोला -”लगता है मीनू  तेरे  दिमाग का कोई पुर्जा  ढीला हो गया है।  खाली बैठे यही चली आई।अब चख मजा।” 

“अपनी बकवास बंद करो।  घर आए मेहमान का क्या इस तरह से आदर किया जाता है। मीनू तो तुम्हारी मेहमान है।”लवली बोली। 

“ओ साथ में अपना बॉडीगार्ड भी लेकर आई है।  बड़ी चतुर लगती है। लो बाबा मैं जाता हूं।”

“चलो बला टली।”

“हा -हा-मेरी लवली बहुत बहादुर है। देखा.. तूफान उससे कैसा डरकर भगा। ”  

मंकी , मीनू को अपने घर ले गया।अंदर जाते ही उसे गर्माहट का एहसास हुआ। वह तो चहक पड़ी -”अरे मंकी बाहर से तेरा घर एकदम मधुमक्खी का छत्ता लग रहा था। लेकिन अंदर से तो महल की तरह सजा है।” 

इतने में लवली की आवाज आई– घर का दरवाजा कस के बंद कर लो  वरना ऑक्सीजन निकल जाएगी।”

“यह लवली क्या बोल रही है!” 

“जो भी बोल रही है ठीक ही बोल रही है। मंगल ग्रह पर बहुत कम ऑक्सीजन होती है। लेकिन घर में  नकली ऑक्सीजन बनाने की  मशीन लगी  है जिससे दम ना घुटे। दरवाजा अगर खुला रहेगा तो ऑक्सीजन बाहर निकल जाएगी।” 

“फिर तो घर का बार-बार तुम दरवाजा भी नहीं खोलने होंगे।” 

“ बाहर कैमरा लगा हुआ है । आने वाले की फोटो अंदर दीवार पर लगे स्क्रीन पर आ जाती है।जान पहचान वाले के ही लिए दरवाजा खुलता है। ” 

मीनू बात मंकी से कर रही थी पर निगाहें चारों तरफ दौड़ लगा रही थीं। 

 “अरे यहां की रसोई तो बड़ी साफ-सुथरी है । माइक्रोवेव और फ्रिज भी रखा है । मुझे तो रसोई देखते ही भूख लगने लगी है ।” 

“रसोई से लगा एक किचन गार्डन है।  वहां से मैं सुबह ही  पत्तेदार सब्जियाँ  तोड़कर ले आया था। मैंने सब्जी काटकर भी रख दी थी। जाने से पहले माँ ने फटाफट सब्जी बना दी। वे भी तो अन्तरिक्ष स्टेशन में काम करती हैं।”  

“तुम सब्जी भी काट लेते हो?मुझे तो यह सब कुछ नहीं आता ।” 

“अरे मैं सिखा दूंगा। यह तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है।”

“ठीक है कल से कट्टा -कट्टी का काम मेरा ।अच्छा मंकी तुम खाना भी बना लेते हो क्या?”

“हूँ –खाना तो पूरी तरह से नहीं बनाता पर माइक्रोवेब में आलू उबाल  लेता हूं। चावल का पुलाव तो मेरे हाथ का बना तू चाटती  ही रह जाएगी।” 

“रोटी भी बना लेता है क्या।तेरे सामने तो मैं एकदम बुद्धू हूँ।”

“ रोटी  बनाने की क्या जरूरत  ।मेरा छुटकू ,चपाती रोबोट बना लेता  है न!

मीनू ने रसोई में झांका,डायनिंग टेबल के नीचे देखा ,कुर्सी पर चढ़कर अलमारियों देखीं आख़िर थककर बैठ गई। खीजती बोली ,”मुझे तो  कहीं न दिखाई दे रहा  तेरा छुटकू रोबो!”

“दिखाई कैसे देगा ! वह तो जादुई पिटारे में बंद है।” 

“वाह रे  तेरे जादुई महल में जादुई पिटारा। बता न कहाँ छिपाकर रखा है!”


“ क्या  करना बताकर !जब चपाती खाये तभी  सब पता लग  जाएगा।” 

 “मुझे तो आज ही चपाती खानी है।” 

“यह तो तेरी देखने की चाल है। चल दिखा ही देता हूं।रोटी ही  खा लेंगे सब्जी तो बनी रखी  है।”

मंकी ने जादुई पिटारा खोला।  उसमें से झट से एक जादुई मशीन बाहर आई।   एक बटन दबाते ही छोटा सा रोबो  हंसते हुए निकल पड़ा। एक हाथ से सेल्यूट मारा ।दूसरे हाथ में तीन कंटेनर आगे बढ़ा दिये। थे। मंकी ने एक में आटा ,एक में पानी और तीसरे में थोड़ा सा घी डाला। दूसरा बटन दबाते ही वह उन्हें लेकर अंदर चला गया।” 

तीसरा बटन दबते ही यह रोबोटिक मशीन चालू हो गई।

“मीनू ,जल्दी देख !स्क्रीन से रोबो कैसे तेरे लिए  रोटी बनाता है।”

मीनू तो रोबो के चमत्कार से हैरान!

उत्तेजित होती हुई बोली ,”अरे मंकी,यह तो मेरी दादी की तरह से  आटा गूथ रहा है। ले इसने  तो छोटी-छोटी लोई  भी बना डालीं।  इसका चकला तो बड़ा पतला सा है बेलन भी एकदम पतला है मगर बड़ी फुर्ती से  गोल-गोल रोटी बेल रहा है।  हॉट प्लेट भी निकल आई। एँ –पर डालते ही रोटी तो एकदम गोल-गोल फूल गई। जल्दी  चपाती निकाल  वरना चिपक जाएगी।” वह एक  मिनट में चपाती रोबोट की सारी कथा बाच गई। ।

“जल्दी ना कर, रोटी अपने आप ही निकल आएगी।”

 देखते ही देखते एक प्लेट अंदर से निकली और उसे पर फूली- फूली  चपाती कूदकर आन बैठी।

“पहले चपाती तो मैं खाऊंगी।” मीनू मचलते बोली। 

उसने झटपट  चपाती को अपनी प्लेट में ले लिया और दूसरी चपाती का इंतजार करने लगी जिससे वह मंकी साथ-साथ खाएं। 

“यह रोबोट बड़ा सुस्त लगता है। कितनी देर लगा दी दूसरी रोटी बनाने में।”

“यह गरम-गरम रोटी खिलाना चाहता है।  सोचता है कि पहली रोटी खाने में तो देर लगेगी । अगर दूसरी जल्दी बना दूंगा तो वह  ठंडी हो जाएगी इसलिए काम धीरे करता है।”

“कुछ ज्यादा ही समझदार लगता है। मुझसे इंतज़ार नहीं किया जाता ।चल हम तो बंदर बाँट  की तरह  रोटी आधी- आधी   खाना शुरू कर देते हैं।”

पेट भर चपाती खाकर दोनों किचन गार्डन की और   फल खाने चल दिये। 

“यहां तो रहने के लिए सच में बहुत मेहनत करनी पड़ती है ।मैं तो अपने छोटे भाई को भी लाने की सोच रही थी। अच्छा हुआ उसे नहीं लाई ।वह खाता भी कुछ ज्यादा है ।इस  किचन गार्डन की सब्जियां कम पड़ जाती।” 

“ उसके आने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां तो पहले से ही ग्रीन हाउस बना लिया गया है। जहां खूब सारे ताजा फल- सब्जियां पैदा होती हैं। ज़रूरत होने पर वहाँ से ख़रीद लेते हैं। ”


किचन गार्डन से लौटकर दोनों नन्हे-नन्हे हाथों से बर्तन धोने लगे। 

“अरे मीनू , थोड़ा-थोड़ा पानी खर्च कर।   मंगल ग्रह पर बहुत कम पानी है। इस्तेमाल किए हुए पानी को भी दोबारा साफ करके काम में लेना पड़ता है।”

“अरे यह तो धरती पर हम भी करते हैं।अच्छा अपना पूरा घर तो दिखाओ जिसे देखने इतनी दूर से उड़ कर आई हूं।” 

“इस घर में तीन कमरे हैं ।एक मेरा, एक मम्मी पापा का और एक पापा की प्रयोगशाला।  वहाँ सारा दिन कुछ ना कुछ करते रहते हैं।यह रहा मेरा कमरा।”

“ यहां तो कुर्सी- टेबल ,अलमारी -बिस्तर सब कुछ है।सामने ही  खिड़की भी है।उससे  चमकती बर्फ़ देख बड़ा अच्छा लगता होगा। तेरे तो खूब मजे हैं।” 


बाहर  खड़ी लवली का अकेले मन नहीं लग रहा था इसलिए वह भी घर के अंदर आ गई। 

 “लवली देखो न घर कितना सुंदर है। लगता है  यह घर मंकी और अंकल  ने मिलकर बनाया है।”

 

“अरे नहीं।! यह सब काम मेरे साथी  रोबोट करते हैं।” लवली बोली।

“लेकिन  घर तो बहुत ही मजबूत लग रहा है ।इसमें  मिट्टी और ईंट तो जरूर लगी होगी। यह सब क्या धरती से वे लेकर  आते हैं।”


“कैसी बात करती हो !धरती से  यहां ईंट लायेंगे तो    कितना पैसा खर्च हो जाएगा!फिर इतना सारा सामान अंतरिक्ष यान में कैसे आएगा?

“तब क्या घर जादू से बन गया।” 

घर मंगल ग्रह की कंक्रीट से बनाया गया  है। इसमें यहां की लाल मिट्टी, रेत और पत्थर होता है। लगता है कुछ दिनों में  यहां घर ही घर  दिखाई देंगे। और लोग मंगल ग्रह पर धड़ाधड़ जमीन खरीदेंगे।” 

“मंकी तो कह रहा था .. आने- जाने में बहुत पैसा लगता है।फिर जमीन भी महंगी होगी!” 

“हां ,लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत पैसा है। उन लोगों के लिए यहां 3D प्रिंटिंग मानव बस्ती बसाने की योजना भी चल रही है ।”

“हो !तुम मार्स साइंस सिटी की बात कर रही हो।” मंकी बोला। 

“हां।”

”तब तो बहुत सारे रोबोट की जरूरत पड़ेगी।”इतने रोबोट कहां से आएंगे? मीनू बोली।

“कुछ तो रोबोट धरती से आएंगे । कुछ को  यहां बनाने की सोच रहे हैं।”

आगे लवली ने दोनों बच्चों को बताया  …”रोबोट और कंप्यूटर मिल करके घर बड़ी अच्छी तरह बना लेंगे।यहाँ के घर बहुत ही खास होते हैं! इन घरों की दीवार की दो परत होती हैं।”

“दो परत बनाने की क्या जरूरत! घर के लिए तो एक ही दीवार होती है।”

 “यहां दो परत के आवरण बहुत जरूरी है।एक बाहर की तेज हवाओं से बचाती है और दूसरी परत अंदर रहने की जगह बनाती है! पहला आवरण एक तरह से घर का सुरक्षा कवच है।असल में यह 3D प्रिंटर एक  रोबोटिक जादुई मशीन का कमाल है।"

“3डी प्रिंटर !बड़ा अजीब  सा नाम है!”

“काम भी इसका अजीब ही है।।यह मशीन जो घर बनाती है वह त्रिआयामी घर भी होते हैं।” 

“हमने तो यह शब्द सुने भी नहीं है।  तुम तो नई-नई बातें बताती हो।”

“बताने से ही तो तुमको मालूम होगा। तुम  कैसे घर में रहते हो।  त्रिआयामी घर का मतलब जिसकी   लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई हो । जिसे हम छू सकें ।”

“मुझे तो घर बनाना बड़ा कठिन लग रहा है। यह मशीन अपने आप न जाने कैसे बना लेती है। ?"

"मुझे याद है जब तुमने एक बार घर पर लेगो सैट के छोटे छोटे टुकड़ों से घर बनाया था!3D प्रिंटर मशीन भी कुछ ऐसा ही करती है। जैसे  ही इसमें लाल मिट्टी, रेत और पत्थरों से मिली कंक्रीट डाली ,यह बड़े- बड़े टुकड़े बनाना शुरू कर देती हैं पर मजे की बात !उन दुकड़ों को जोड़ती भी जाती है । जुड़ने के बाद घर एकदम तैयार।”  

“यह तो दिमाग की बड़ी तेज है । कैसे नए -नए डिजाइन वाले घर बना लेती है।”मंकी बोला।

“इतनी चतुर तो नहीं है। हां नकल करने में महाचतुर है। कंप्यूटर जो त्रिआयामी डिजिटल मॉडल  बनाता है उसकी हूबहू  नकल कर के ही दम लेती  है।” 

मीनू ने हैरानी से कहा, बड़ी अद्भुत  है! मैं भी जादुई मशीनें बनाऊंगी  ।"

“ठीक है ,तू जादू की मशीन बनाना ,में उसके लिए कंप्यूटर से डिजिटल मॉडल बना दिया करूंगा।”मंकी जोश उमंग से भरा था।

बच्चों का जोश देखकर लवली मुस्कुरा दी।

कुछ दिनों बाद मीनू बोली,”मुझे तो अपने मम्मी _पापा की  याद आ रही है।” 

“तुम जाने की सोच रही हो… मैं तो कुछ और ही सोच रहा था।” 

“क्या सोच रहे थे मंकी मुझे बताओ ना।” 

“अब तो हमारे देश के कदम भी मंगल ग्रह पर पड़ चुके हैं।”

“हां ,यह तो हमारे लिए बहुत ही गौरव की बात है। ”

 "तब हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जो हमारे देश के वैज्ञानिकों के समर्पण को याद रखा जाए। मैं भी तो भारत की रहने वाली हूँ। " लवली ने कहा। उसकी आंखें चमक रही थीं।

"लेकिन क्या करें?" मीनू ने सोचते हुए कहा।

"हम एक स्मारक बना सकते हैं!" मंकी ने उत्साह से कहा। "एक ऐसा स्मारक जो हमेशा के लिए याद दिलाता रहे कि हमने मंगल को छुआ है।"

मंकी की बात मीनू और लवली दोनों को पसंद आई।उन्होंने मिलकर एक मॉडल तैयार किया। एक रोबोट ने मंगल ग्रह की कंक्रीट से इस स्मारक को बनाया जिस पर हमारे देश का तिरंगा झंडा लहरा उठा। इसके साथ ही, उस पर उन सभी वैज्ञानिकों के नाम लिखे होंगे जिन्होंने इस मिशन में अपना योगदान दिया था।

यह मंगल ग्रह का नया आकर्षण बन गया। बच्चे यहां आकर खेलते थे और बड़े लोग यहां आकर याद करते थे कि कैसे उनके देश ने मंगल को छुआ था।

इस स्मारक ने न केवल देशों को बल्कि पूरे ब्रह्मांड को यह संदेश दिया कि भारतीय, अंतरिक्ष  खोज में कभी पीछे नहीं हटेंगे।

समाप्त 



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