प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

गुरुवार, 12 जून 2014

लोककथा


गुस्सैल सँपेरा /सुधा भार्गव 

यह कथा शबरी शिक्षा समाचार जून 2014,वर्ष 16,अंक 06 में 
प्रकाशित हो चुकी  है । 


एक सँपेरा  था । वह साँप का तमाशा दिखाया करता । उसने एक बंदर भी पाल रखा था जो तमाशे के बीच नाचता ,सीटी बजाता और सलाम करके सबसे पैसे लेता। 
एक बार शहर में  पाँच दिनों का बड़ा सा मेला लगने वाला था । सँपेरा साँप की पिटारी लेकर बीन बजाता नगर की ओर चल दिया और बंदर को अपने मित्र के पास छोड़ दिया । मित्र बंदर का बहुत ध्यान रखता । पहले उसको खाने को देता फिर खुद खाता।

-इतना ध्यान तो मेरा सँपेरा भी नहीं रखता है ,मुझे भी इसके लिए कुछ करना चाहिए।
 यह सोचकर बंदर भी बगीचे से आम तोड़कर उसके लिए लाने लगा।

पांचवें दिन सँपेरा मेले से लौटा । उसने तमाशा दिखाकर काफी धन कमा लिया था पर थका –थका सा था । उसने मित्र का धन्यवाद किया और बंदर को लेकर बाग में थोड़ा आराम करने के लिए चल दिया । बंदर को भूख लगी और उसने सँपेरे से खाने को मांगा । झुंझलाकर सँपेरे ने डंडी से उसकी पिटाई कर दी । दुबारा खाने को मांगा तो रस्सी से उसे बांध दिया और सो गया। बंदर ने किसी तरह मुंह से रस्सी की गांठें खोली और अपने को आजाद किया।  वह उछलकर आम के पेड़ पर जा बैठा और रसीले आम खाने लगा।

सँपेरे की  आँख खुली तो उसने बंदर को अकेले –अकेले आम खाते देखा । वह समझ गया कि बंदर उससे गुस्सा है क्योंकि रोज तो वह एक खाता था तो दूसरा उसके लिए नीचे गिरा देता था।   
उसने बहलाने की गरज से कहा –बंदर बाबू तुम बहुत सुंदर  हो और जब गुस्सा होकर गाल फुलाते हो तो और भी सुंदर लगते हो।

-बस ज्यादा चापलूसी न कर। कभी किसी ने बंदर को सुंदर कहा है ?मेले में जाकर दो पैसे क्या कमा लिए तुझे तो घमंड होगया और मुझ पर हाथ उठा दिया । तूने मुझ भूखे को मारा ---क्या कभी भूल सकता हूँ । अब न मैं तुझे आम दूंगा और न तुझ जैसे  गुस्सैल और मतलबी से  दोस्ती रखूँगा।

शांत न रहने से सँपेरा अपना धीरज खो बैठा और अपनी मदद करने वाले मित्र को भी खो दिया।  

सोमवार, 19 मई 2014

लोककथा


अनोखी मित्रता 
यह शिक्षाप्रद बालोपयोगी लोककथा शबरी शिक्षा समाचार पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। 



राजा के पास एक हाथी था । जिसका नाम मंगलू था | वह बहुत शक्तिशाली था।  उसे खाने को अच्छी किस्म के चावल दिए जाते।जिस स्थान पर हाथी चावल खाया करता वहाँ कुछ चावल गिर जाया करते। उस समय एक कुत्ता हाथीशाला में  कर उन्हें  खा लेता । उसका यह रोज का नियम था। उसी सॆ वह अपना गुजारा करता।
उसकी हाथी  से अच्छी खासी दोस्ती हो गयी । दोनों ज़रा भी अलग -अलग नहीं रह सकते थे।कुत्ते को देखकर हाथी उसे सूढ़ से बार –बार छूता और कुत्ता भी हाथी की सूढ़ को इधर –उधर कर उससे खेलता। उसे प्यार से चाटता ।  
एक दिन गाँव से एक आदमी आया ।उसे कुत्ता बहुत अच्छा लगा।  वह हाथीवान को अच्छी -खासी कीमत देकर कुत्ते को अपने साथ ले गया
कुत्ते के बिना हाथी इतना दुखी हुआ कि  उसने खाना -पीना ,-नहाना सब छोड़ दिया । लोगों ने राजा को इसकी खबर दी । राजा ने तुरंत अपने मंत्री को बुलाया और कहा – मंत्री जी ,हाथी ने  खाना -पीना छोड़ दिया है इससे तो वह कमजोर हो जाएगा । जरा इसका कारण  तो पता कीजिये ।
मंत्री ने हाथी की अच्छी तरह जांच –पड़ताल की । उन्हें उसके शरीर में कोई बीमारी न दिखाई दी
उन्होंने हाथीवानों से पूछा – हाथी किसी को प्यार करता था क्या ?इससे इसका कोई प्रिय तो नहीं बिछुड़ गया ?कहीं उसी के गम में दुखी हो।
-हाँ मालिक !इसकी एक कुत्ते से बहुत दोस्ती थी ।घंटों खेला करते थे। कुछ दिनों पहले  उसे एक आदमी ले गया है । 
मंत्री ने राजा के पास जाकर कह दिया -महाराज !हाथी अपने दोस्त कुत्ते से बिछुड़ जाने के कारण बहुत दुखी है। इसी से सब कुछ त्याग  बैठा है। राज्य में घोषणा करवा दीजिए कि जिसके घर में हाथी का मित्र कुत्ता पाया जाएगा उसे राजदंड मिलेगा ।
राजा ने ऐसा ही किया । इस समाचार को सुनकर ले जाने वाले आदमी ने कुत्ते को छोड़ दिया।  कुत्ता दौड़ता हुआ आया और हाथी से चिपट गया । हाथी ने उसे सूढ़  से उठाकर माथे पर बिठा लिया।उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। माथे से कुत्ते को उतारकर पहले उसने सूढ़ से दोस्त को खाना खिलाया ,बाद में खुद ने खाया ।

 जिन्होंने भी उनकी इस दोस्ती और प्यार को  देखा  चकित हो गए और मन ही मन निश्चय किया कि वे भी अपनी दोस्ती हमेशा निभाएंगे।  

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

कक्षा -कथा

विद्या भवन सोसायटी उदयपुर और आजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का संयुक्त प्रकाशन हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका खोजें और जानें में 20 जनवरी 2014 अंक 8 में मेरे लेख का एक अंश व्यथा शीर्षक से प्रकाशित हुआ है जिसका संबंध एक विकलांग बच्चे से है। यह कहानी मेरे शिक्षण काल के अनुभवों पर आधारित है। 



बुधवार, 15 जनवरी 2014

बालकहानी


सोने की कढ़ी


एक लोहार था । वह घर जा -जा कर चाकू छुरी और दराँती पर धार रखा करता। जिस चाकू की धार पैनी करता वह बड़ी कुशलता से महीनों सब्जी -फल काटा करता। एक दिन वह भरी दोपहरी में आवाज लगा रहा था धार रखवा लो धार ---तलवार से भी तगड़ी धार।

एक युवती ने उसे पुकारा। छुरी वाला बोला मजदूरी के अलावा जितने छुरी चाकू पर धार रखवाओगी उस हिसाब से उतनी ज्यादा रोटियाँ मुझे खिलानी पड़ेंगी। रोटी छोटी बड़ी हो सकती हैं पर सब्जी कटोरा भरकर होनी चाहिए।

 युवती ने हँसकर अपनी गर्दन हिला दी। उसने चार चाकुओं पर धार रखवाई और उसके अनुसार मजदूरी उसकी हथेली पर रख दी। इसके साथ ही एक थाली में चार रोटियाँ और कटोरे में कढ़ी रखकर उसके आगे खिसकाई।

खाते समय उसने पूछा यह पीली -पीली सब्जी क्या है? बड़ी जायकेदार है।
-इसका नाम कढ़ी है ।




-इसमें गोल गोल गोले कैसे हैं ?
-ये सोने की पकौड़ियाँ हैं।
-तब तो कल आकर भी खाऊँगा । घर के और सारे चाकू छुरियाँ निकाल कर रखना ।
-घर में तो नहीं हैं ।
-तो क्या हुआ! पड़ोस की ले लेना । कुछ सस्ते में धार रख दूंगा ।

दूसरे दिन लोहार ठीक खाने के समय युवती के घर आन धमका। 2-3 छुरियों पर धार रखने के बाद मजदूरी तो मिल गई मगर थाली में केवल रोटियाँ देख बिदक पड़ा कढ़ी तो है ही नहीं ---रोटी कैसे खाऊँ ?
-सोना खतम हो गया ,कढ़ी की पकौड़ियाँ  कैसे बनाती ?
-ओह !सोना बहुत लगता है क्या ?
-लगता तो थोड़ा ही है। युवती ने सिर खुजलाते हुए कहा ।
-अच्छा ,मैं घर में खोजूंगा। शायद कुछ हाथ लग जाये ।

अगले दिन वह बहुत खुश था। उसके हाथ  में सोने की एक बाली थी। जब वह चाकुओं पर धार देने गया तो रास्ते में युवती का घर पड़ा ।
एक मिनट वहाँ रुका और बोला लो यह बाली । इससे जल्दी से कढ़ी बना दो और हाँ !2-3 दिनों तक इससे काम चलाना। बस मैं अभी आया ।

उस रोज युवती ने खूब सारी कढ़ी बनाई। लोहार ने जी भर कर खाई ।
चलते चलते बोला मेरी बीबी को भी दो रोटियों के साथ कढ़ी दे दे। वह भी खाकर खुश हो जायेगी।
कढ़ी खाने वाले भी खुश और कढ़ी बनाने वाली भी । अब तो हर तीसरे चौथे दिन चोरी छुपे लोहार पत्नी का गहना उठाकर युवती को सौंप देता और वह उसे लेकर तिजौरी में रख देती।अब तो उसके कब्जे में दोनों बालियाँ थीं।  

कान की बालियाँ 
एक दिन युवती ने फिर कढ़ी नहीं बनाई और बिगड़ते हुए बोली -सोना तो खतम हो गया फिर कैसे बनाती ?
लोहार इस बार नीला पीला  हो उठा और चिल्लाकर बोला मेरे लाए सोने से तुमने कढ़ी बनाई। तुमने खाई ,तुम्हारे घर वाले और बच्चों ने भी खाई होगी। एक दिन तुम अपने सोने से कढ़ी नहीं बना सकती थी ?

उसकी चिल्लाहट सुनकर पास पड़ोस के लोग वहाँ आकर जमा हो गए और लोहार की बात सुनकर हंस पड़े ।
-तुम लोग खी खी करके दाँत क्यों निकाल रहे हो ?लोहार और भी झल्ला उठा ।

एक देहाती मसखरी करता हुआ बोला अभी तक तूने सोने की कढ़ी खाई है मैं तुझे लोहे की खीर खिलाऊंगा। कढ़ी से भी ज्यादा जायकेदार ।
-लोहे की खीर ! क्यों मुझे उल्लू बनाता है । लोहे से बर्तन औज़ार तो मैंने बनाए हैं पर खीर ! कभी नहीं !अगर तूने खीर बना भी दी तो लोहे को चबाएगा कौन ?
-तूने जब सोने की पकौड़ियाँ चबा ली तो लोहे के दाने भी चबा सकता है ।

लोहार को झटका सा लगा और सिर पकड़कर बैठ गया।
 वह बड़बड़ाया ---मुझ सा मूर्ख भी भला होगा कोई दुनिया में। सोना और लोहा तो मौसेरे भाई हैं । दोनों ही दांतों से नहीं चबाए जा सकते। यह छोटी सी बात मेरी समझ में न आई।  
लेकिन कुछ ही देर में हिम्मत जुटाकर उठ खड़ा हुआ और सीना तान कर बोला -
-अब मेरी  बारी है । देखना लोहे की तरह पीट पीटकर इस चालबाज औरत से अपना सोना न निकलवा लिया तो मैं लोहार नहीं ।

इतने में उसका पति आ गया । भेद खुल जाने के डर से युवती काँपने लगी । उसे देखते ही लोहार बोला साहब आपकी पत्नी ने मुझे लूट लिया और मैं मूर्ख ,जीभ का गुलाम इसकी बातों में आ गया ।इससे कहिए मेरे सोने के जेवर वापस कर दे।


सोने के जेवर
सारी बात जानने के बाद वह अपनी पत्नी की करतूत पर शर्मिंदा हो उठा । युवती समझ गई कि उसका पति ज्वालामुखी की तरह किसी भी समय फट सकता है। उससे अपना बचाब करने के लिए वह भागी हुई कमरे में गई और आकर पति के हाथों में सोने की चैन ,बालियाँ  और अंगूठी थमा दीं ।
पति लोहार को गहने लौटाते हुए बोला -भाई ,आगे से जरा सावधान रहना । इस दुनिया में तो उल्लू बनाने वाले बहुत से मिल जाएँगे ।  


-चित्र गूगल से साभार

यह कहानी द्वीप लहरी बालसाहित्य रचना अंक जनवरी -जुलाई (हिन्दी साहित्य कला परिषद पोर्ट ब्लेयर का प्रकाशन )पेज 30 पर प्रकाशित हो चुकी है।

नववर्ष 2014 मुबारक हो ।

नए साल का उपहार /सुधा भार्गव

जापानी गुड़िया

उसका गुड़िया प्रेम कुछ निराला ही हैं । सात पूत की माँ और दर्जन भर पोते पोतियों की दादी –नानी माँ बन गई है पर गुड़िया उससे छूटी नहीं । बचपन में उसकी पिटारी कागज,काठ और कपड़े की बनी गुड़ियों से भरी रहती । उठाओ तो बड़ी भारी,खोलो तो कबाड़ा । उसकी शादी के समय पिताश्री ने सोचा –इसके लिए कुछ नई गुड़ियाँ मँगा दी जाएँ वरना यह कबाड़ा ही अपने साथ ले जाएगी। सो राजा टोंयज छाप कंपनी की छोटी –बड़ी,मोटी –पतली पाँच –छ्ह गुड़ियाँ मंगा दीं। मगर इतने से उसकी तृप्ति कहाँ! कलकत्ते ससुराल जाते ही  जाते ही बंगाली वर –बधु खरीद लिए।


 कुछ समय बाद घर में एक जीती -जागती गुड़िया आ गई। सारा समय वह उसका ले लेती पर शोकेस में सजाई गुड़ियों को निहारना न भूलती। बेटी ससुराल गई,बेटे बड़े हो गए तो बाहर घूमना क्या शुरू हुआ घर में गुड़ियों की आबादीबढ्ने लगी। योरोप से 2-3 डॉल खरीद लाई। कनाडा पोती

 के होने में गई तो वहाँ से भी बोलती-चलती-फिरती गुड़िया खरीदना न भूली। उसके इस जुनून 

को सब जानते थे। टोकाटाकी भी न करते। जानते थे रोकने से वह रुकेगी नहीं।

घर में पोती आई तो उसे कलेजे से लगा बैठी। उसे बहुत बरसों बाद जीती-जागती सुंदर सी गुड़िया मिली थी। पोती पर भी दादी की छाप पड़ गई। उसके लिए भी वह नीली –नीली आँखों वाला ,गोरा –चिट्टा गुड्डा खरीद लाई जो देखने में 6 माह का लगता था। पोती तो उससे भी दो कदम आगे 

निकली। मजाल है कोई उसे छू ले। कोई बच्चा घर में आता तो उसे छुपा देती। जब वह अपने

 मम्मी –पापा के साथ लंदन उड़ी तो गुड्डा उसकी गोद में बैठा था। पोती के जाने की बाद दादी माँ टूट सी गई। हाँ, फोन पर बातें करके ,लैपटोंप में स्काईपी पर उसे देखकर अपना कलेजा जरूर ठंडा कर लेती।
दो साल पहले बेटा जापान जाने लगा। पूछा –माँ ,आपके लिए क्या लाऊं ?
-बेटा वहाँ से जापानी डॉल लाना –बड़ी सी। बच्ची की तरह बोली।
  
-ठीक है आपके लिए ले आऊँगा।

-पहले अपने लिए लाओ ।फिर मेरे लिए लाना। जानती थी उसकी पोती को भी डॉल का बहुत शौक है। 
पिछले साल वह लंदन गई। ड्राइंग रूम  में घुसते ही आनंदित हो उठी –अरे वाह !कितनी सुंदर है!

 उसकी निगाह कोने में अटक –अटक जाती । बेटा उन निगाहों को पहचान गया। बोला-

-इस गुड़िया को भारत अपने साथ ले जाना।

--न –न । अगली बार मेरे लिए दूसरी ले आना।
2013 नवंबर में उसे मालूम हुआ ,बेटा जापान जाने वाला है।
फोन खटखटाने में देरी न की –मेरे लिए जापानी गुड़िया जरूर ले आना और हाँ, मिले बहुत दिन हो गए हैं। अगर दिसंबर में आओ तो गुड़िया यहाँ लाना न भूलना।

भाग्य से 28 दिसंबर को बेटा दो रातों को भारत आ गया और माँ के लिए नए साल का

 तोहफा लाना न भूला। उसे देखकर वह उस डॉल की यादों में डूब गई जो उससे बहुत दूर है। नए 

वर्ष 2014 में जो भी मिलने आता है वह उसे जापानी गुड़िया दिखाना नहीं भूलती है और कहती है –

ठीक ऐसी ही जीती-जागती, दौड़ती -भागती  गुड़िया लंदन में भी रहती है ।  

गुड़िया 

समाप्त


बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

शुभ दीवाली --घर -घर जन्मो राम




दीपमणियों की जगमगाहट से भरपूर दीवाली सबको बहुत

शुभ हो।


 इस अवसर पर गणेश पूजन और लक्ष्मी पूजन मंगल कारी और  सुख का झरना बहाने वाला  होता है । इसलिए बहुत  मन लगाकर बच्चों  पूजा करनी है । 
  अब हम तुम्हें एक  कहानी भी  सुनाते हैं जो बड़ी दिलचस्प और जानकारी से भरपूर है ।  


बालकहानी

घर -घर जन्मो राम /सुधा भार्गव

रामा और लाखा दो भाई थे ।उनकी माँ बहुत सोच समझकर घर चलाती थी । न खुद पैसा बेकार की चीजों को खरीदने में नष्ट करती थे और न बच्चों को करने देती थी । उनको रोज एक -एक टॉफी  देती थी  ।लाखा का एक टॉफी से जी  नहीं भरता । रामा अपने भाई को बहुत प्यार करता था ।उससे उसकी ललचाई निगाहें  नहीं देखी जातीं इसलिए अपने हिस्से की टॉफी   उसके लिए बचा कर रख देता ।

दिवाली के दिन भी भाईयों को 20 -20 रुपए के फुलझड़ी और पटाखे मिले । रामा ने कुछ फुलझड़ी और एक बम पटाखा अपने भाई के लिए रख दिया  ।




शाम होते  ही वे घर के पिछवाड़े ,मैदान में जा पहुंचे । अंधेरा होते ही लाखा ने फुलझड़ी छुटानी शुरू कर दी ।

 जल्दी ही खिसियाते बोला –
-भैया ,फुलझड़ी तो खत्म हो गई ।
-ले मेरी भी छुटा ले । रामा बोला ।

उस समय तक  उनके पड़ोस में रहने वाले बच्चे अलटू-पलटू भी आन धमके थे  । वे ऊंची हवेली के रहने वाले थैला भरकर पटाखे लाये । 
उनकी बात सुनकर पलटू ज़ोर से हंसा –
-अरे दो-चार पटाखों से क्या होता है । ये देख-- मेरे पटाखे !झोला भरकर हैं । अब होगा इनका तमाशा –बिन पैसे का तमाशा ।



पलटू ने एक पटाखे में दियासलाई से आग लगाई और ज़ोर से हवा में उछालकर रामा की ओर फेंका । वह तो बाल –बाल बच गया वरना बुरी तरह झुलस जाता ।
-देखा –पटाखे के साथ साथ तुम भी कैसे उछल रहे हो ,बड़ा मजा आरहा है । 
एक जलती      



बमलड़ी उसने नाजुक से पिल्ले पर फेंक दी जो सड़क के किनारे बैठा था । वह जख्मी हो गया और बिलबिलाता वहाँ से भागा ।
अलटू भी फुदकने लगा –वाह भैया वाह !क्या निशाना मारा  है !
रामा को पलटू की यह बात अच्छी न लगी ।
-तुमने पिल्ले को जलाकर ठीक नहीं किया । उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ।
-जले तो जले ...मेरा क्या जाता है । और भी कोई जलेगा तो बड़ा आनंद आयेगा  ----फिरकनी की तरह घूमेगा वह तो।


रामा ने उस बिगडैले हाथी से झगड़ा मोल लेना ठीक न समझा। लाखा का हाथ पकड़ते हुए बोला –
-भैया ,यहाँ से चलो , ऐसे दुष्टों के साथ रहना ठीक  नहीं ।ऐसे ही लोगों के कारण झोपड़े जलकर राख़ हो जाते हैं और बेचारे गरीब की दिवाली आंसुओं में डूब जाती है।    


-कहाँ जा रहे हो ?मैं जाने दूँ तब न –कहकर पलटू ने पटाखा इस प्रकार उछाला कि ठीक रामा –लाखा के सामने जाकर पड़ा ।

लाखा जलते –जलते बचा । उसके साहस को देखकर रामा  हक्का–बक्का रह गया । उसे गुस्सा भी ज़ोर से आया । उसने झपटकर पलटू से झोला छीन लिया और पास के तालाब में फेंक दिया ।
पलटू उसे मारने दौड़ा ।
-खबरदार जो हाथ उठाया । हम किसी से झगड़ा नहीं करते लेकिन हमारा कोई नुकसान करे यह हम सह नहीं सकते । अपना बचाब भी करना जानते हैं । तुम्हारे पटाखे से मेरा भाई जल जाता तो ...... । मैं अपने भाई की रक्षा करना खूब  जानता हूँ ।
पलटू का पहला मौका था जो इस तरह से उससे बातें हुईं वरना सब साथी उससे डरते थे । वह बेमन से एक के बाद एक पटाखे छोड़ने लगा ।

-अरे सब खत्म कर दोगे ---मुझे भी तो दो । उसका छोटा भाई अलटू चिल्लाया ।
-मैं तुम्हें एक भी नहीं दूंगा । ज्यादा चिल्लाया तो अभी पटकियाँ खिला दूंगा ।



दोनों बम की तरह बम -बम कर रहे थे । 
रामा –लाखा दोनों को झगड़ता छोड़ अपने घर चल दिये । दीवाली –पूजन का समय  भी हो गया था ।

ज़्यादातर घर नई दुल्हन की तरह सजे थे । पर रामा का घर मोमबत्तियों से सजा था । 


थाली में रखी  रूई की बत्तियाँ तेल में भीगी मंद –मंद हँसती रोशनी दे रही थीं ।दीपों को देखते  ही लाखा उन्हें जलाकर रखने लगा । 




 पलटू का भवन लाल नीले ,पीले बिजली के लट्टुओं से सजा अलग ही छ्टा दिखा रहा था । अचानक बिजली चली गई । पलटू का घर अंधकार में डूब गया लेकिन दीयों -मोमबत्तियों वाला घर सूरज जैसी चमकीली रोशनी से भरा हँस रहा  था ।

-माँ !माँ दीपों की माला कितनी सुंदर लग रही है। लाखा प्रसन्न हो तालियाँ बजाने लगा।
--हाँ बेटा !असली दीवाली यही है । चौदह वर्ष के बनवास के बाद जब राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे तो वहाँ के रहने वालों ने जगह –जगह दीपक जला कर खुशियाँ  व्यक्त की ।


सीता -राम -लक्ष्मण
 बिजली के लट्टुओं का जन्म तो बहुत बाद में हुआ ।

-ये राम कौन थे ?रामा ने पूछा । 
-राम !अपने माँ-बाप  की बात बहुत मानते थे ।छोटोंको प्यार करते थे ।रावण जैसे  बुरे लोगों से अच्छे लोगों को बचाते थे ।
-माँ,आज मैंने भी अपने भाई को बचाया ।
-तू मेरा राम ही तो है । माँ का प्यार उमड़ पड़ा जिसका धन ये दो पुत्र ही थे ।
-मगर माँ ,पलटू बहुत बुरा है ।
-बेटा बुरे को बुरा कहने से बुराई का अंत नहीं होता । तुम लोगों के साथ रहकर वह जरूर अच्छा हो जाएगा ।अपने अच्छे बर्ताव से उसका दिल बदल दो ।

उन्होंने बड़े प्रेम से गणेश –लक्ष्मी की पूजा की ,राम सीता और उनके छोटे भाई लक्ष्मण के आगे सिर झुकाया और प्रार्थना शुरू की -- 


  
विनती सुन लो  हे रघुराई
दुष्टों ने बड़ी धूम मचाई
घर में रोती अच्छाई
बाहर मुसका रही बुराई।
  
इसे मार भगाना है
इससे हमें बचाना है
हमको खूब पढ़ा दो राम
शक्ति हम में भर दो राम ।

बड़े –बड़े हम काम करेंगे
रावण को नहीं जीने देंगे
दुनिया में हम यश पाएंगे
 पर तुम्हें  नहीं भुलाएंगे,

जय बोलो ,ज़ोर से  बोलो
जय –जय  भगवान की ।

प्रार्थना के स्वरों और घंटी की आवाज से हवा में एक संगीत सा घुल गया । 
अलटू-पलटू अपने घर के अंधकार को चीरते हुए रामा और लाखा के घर की ओर खिंचे चले आए । प्रार्थना खतम होने के बाद रामा –लाखा ने जब पलटकर देखा तो चकित हो गए -पड़ोसी भाई  हाथ जोड़े खड़े थे ।लगता था वे अपने बुरे व्यवहार की क्षमा मांग रहे हों । प्रसन्न हो रामा ने पलटू को और लाखा ने अलटू को गले लगा लिया ।
सच में बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई।

  


सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

जातक कथा -4

http://www.garbhanal.com/Garbhanal%2083.pdf

 मासिक पत्रिका  गर्भनाल के अक्तूबर अंक में भी इस बार  पढ़िये जातक कथा -टूटी डोर 



टूटी डोर /सुधा भार्गव

एक राजा था । धार्मिक कामों को  कराने वाला उसका पुरोहित बहुत होशियार था । एक बार राजा ने प्रसन्न होकर सजा –सजाया एक घोड़ा उसे भेंट किया । वह जब भी उस पर बैठकर राजा के दरबार में जाता , लोग घोड़े की प्रशंसा किए न अघाते । इससे उसका मुख कमल की तरह खिल जाता । एक दिन उसने बड़े सरल भाव से अपनी पत्नी से कहा –सब लोग हमारे घोड़े की सुंदरता का बखान करते हैं । उस जैसा दूसरा कोई घोड़ा नहीं ।

पत्नी ठीक अपने पति के विपरीत थी । उसके हृदय छल –लपट से भरा हुआ था । अपने पति की भी सगी न थी । वह हँसते हुए बोली –घोड़ा तो अपने साज –श्रंगार के कारण सुंदर लगता है । उसकी पीठ पर लाल मखमली गद्दी है । माथे पर रत्न जड़ित पट्टी पहने हुए है और गले में मूँगे -मोतियों की माला ।
तुम  भी उसकी तरह सुंदर लग सकते  हो और तुम्हें  प्रशंसा  भी खूब मिलेगी अगर उसी का साज पहन लो और घोड़ी की तरह घूमते –इठलाते कदम रखो ।

पत्नी की बात का विश्वास करके उसने वैसा ही किया और राजा से मिलने चल दिया । रास्ते में जो –जो उसे देखता –हँसते –हँसते दुहरा हो जाता  और कहता  –वाह पुरोहित जी क्या कहने आपकी शान के ,सूरज की तरह चमक रहे हैं ।
राजा तो पुरोहित को देख  बौखला उठे – अरे ब्राहमन देवता –तुम पर पागलपन का दौरा पड़ गया है क्या ?घोड़े की तरह हिनहिनाते –चलते शर्म नहीं आ रही !सब लोग तुम्हारा मज़ाक उड़ा रहे हैं । अपना मज़ाक उड़वाने का अच्छा तरीका ढूंढ निकाला है । 

पुरोहित जी को काटो तो खून नहीं । उन्हें तो कल्पना भी नहीं थी कि जिस औरत को वे अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहते हैं वह उनकी इज्जत के साथ ऐसा खिलवाड़ करेगी । वे अंदर ही अंदर उबाल खा रहे थे ।
राजा को समझते देर न लगी कि बेचारा पुरोहित अपनी पत्नी के हाथों मारा गया ।
उसको शांत करते हुए बोले-औरत से गलती हो ही जाती है । उसे क्षमा कर दो । रिश्तों की डोर को तोड़ने से कोई लाभ नहीं । दरार पड़ते ही उसे जोड़ देना चाहिए ।
-महाराज ,एक बार डोर टूटने से जुड़ती नहीं ,अगर जुड़ भी गई तो निशान तो छोड़ ही जाती है । अपनी पत्नी के साथ रहते हुए  मैं कभी भूल नहीं पाऊँगा कि उसने मेरा विश्वास तोड़ा है और इस बात की भी क्या गारंटी कि वह भविष्य में मेरा मज़ाक उडाकर अपमानित नहीं करेगी  । ऐसी औरत के साथ न रहना ही अच्छा है ।

राजा को पुरोहित की बात ठीक ही लगी । कुछ दिनों के बाद उसने दूसरी औरत से शादी कर ली और पहली पत्नी को घर से निकाल दिया । 

* * * * *