प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - - ।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

बालकहानी

मन की रानी/सुधा भार्गव 




    ठंडी –ठंडी मस्त हवा के झोंके मन को लुभाने लगे । सूझे पत्ते फड़फड़ाकर हँसते ,फुदकते ,दौड़ लगाते । झाड़ी में बैठी एक स्ट्रोबरी चंचल हो उठी । झटके से झुकी ,डाल नीचे हो गई । उसका  मन किया धरती पर लोटती –पोटती सूखे पत्तों का पीछा करे । तभी पीछे से माँ ने उसे अपनी ओर खींच लिया –ज्यादा न झुक ,गिर जाएगी । स्ट्राबरी डर गई । डाल में लगे पत्तों की अंधेरी गुफा में अपने को उसने तुरंत छिपा लिया। 


   स्ट्रोबरी रात में टुकुर –टुकुर तारे देखती । पत्तों के बीच में से आती झीनी रोशनी से अपना मन बहलाती । एक बार वह उकताकर आलसी की तरह उबासी लेने लगी । तभी कनखियों से उसने बादल देखा । उससे बात करने को पत्तों से अपना सर निकाला । बादल को वह बहुत अच्छी लगी । उसने प्यार से पानी की एक बूंद उस पर टपका दी । स्ट्रोबरी उसमें नहाकर ताजी हो गई । पहले से ज्यादा चमकने लगी । पीछे से किसी ने उसे अपनी ओर खींच लिया –क्या कर रही है ,ठंड लग जाएगी । उसकी छोटी-छोटी आँखों में आँसू भर आए।

Image result for drop of water clipart-हिम्मत रखो !ऐसे आँसू न बहाओ। यदि तुम धरती पर आना चाहती हो तो आ जाओ ।  मेरा घर बादल है । उसे छोडकर धरती पर आई हूँ । धरती पर आकर तुम्हें बहुत प्रसन्नता होगी । यह बहुत सुंदर है । इसका लहंगा हरा ,ब्लाउज पीला है । वह चांदी का मुकुट पहने है । बूंद ने दिलासा दी।  
-आऊँ कैसे ?
-जैसे मैं आई हूँ । घर से तुम्हें बाहर निकलना ही होगा ,तभी तो  दूसरी निराली दुनिया की सैर कर सकोगी  । बूंद ने कहा ।
-स्ट्रोबरी में हिम्मत आई और आँखें मटकाकर इधर –उधर देखने लगी –कहीं कोई देख तो नहीं रहा । माँ तो जरूर कहती  –खेलने –कूदने की जरूरत नहीं ,चोट लग जाएगी । बिना हिले डुले डाली से चिपकी रह ।

उसने बिना शब्द किए झाड़ी से अपना पूरा शरीर निकाला । दम लगाकर उछली । डाली से टूटकर धम्म से मिट्टी मेँ जा पड़ी । प्यारा सा मुखड़ा धूल से भर गया । फिर भी ताजी हवा मेँ  सांस लेने से उसके अंग मुस्कराने लगे । हवा भी खुश , स्ट्रोवरी की खुशबू से जो भर गई थी।

बूंद आगे बढ़ी । उसने स्ट्राबरी को उठाया । झपझप करके धूल झाड़ी । बोली -चलो मेरे साथ।
-कैसे चलूँ ?घर में मुझे न देखकर माँ रोएगी । बहनें तो सो भी न पाएँगी । स्ट्राबरी उनकी याद में उदास हो गई।
- कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है । बूंद ने स्ट्रोबरी को समझाया।

स्द्रोबरी आगे बढ्ने लगी । पीछे मुड़कर भी देखती जाती ।उसे माँ का प्यार पुकारता सा लगा । तभी मुर्गे ने बांग दी । झाड़ी में सब जाग गए । स्ट्रोबरी को न देखकर कोहराम मच गया । 

माँ ने छाती पीट ली –हाय मेरी स्ट्रोबरी जान से गई । किसी ने साबुत का साबुत निगल लिया होगा।
बहन बोली –भालू स्ट्रोबरी को खा गया है । अपनी लपलपाती जीभ होठों पर फेर रहा होगा –वाह !क्या रसीली गूदेदार हैं । बड़ी निडर बनती थी।

बहन ने पत्तियों को हटाकर बाहर नजर घुमाई । उसे स्ट्रोबरी की एक झलक मिल गई। वह चिल्लाई –लौट आओ –लौट आओ । जान को खतरा है । स्ट्रोबरी ने अपनी चाल और तेज कर दी । उसे झाड़ी मेँ कैद होना मंजूर न था । खुली हवा मेँ सांस लेने का सुख वह जान चुकी थी।

नाजुक स्ट्रोबरी बूंद के साथ –साथ चलते थक गई । वह धीमें स्वर में बोली –मुझे धरती से जल्दी मिलाओ न । 
-तुम धरती पर ही तो खड़ी हो । बूंद ने कहा।
-यह तो बहुत लंबी -चौड़ी है । मेरे घर से बहुत बड़ी है। आश्चर्य से स्ट्रोबरी ने आँखें झपकाईं ।
-अब पूरी धरती ही तुम्हारा घर है । चलो ,तुम्हें भाई से मिलाती हूँ।  
-बूंद एक पेड़ के नीचे ठहर गई । स्ट्रोबरी उसकी ऊंचाई देखती ही रह गई ।
-पेड़ भाई ,तुम्हारा घर कहाँ  है ?उसने पूछा ।
-यह धरती मेरा भी घर है । इसी की मिट्टी में मेरा जन्म हुआ है ।
-तब तो हम सबका घर एक ही हैं । हमें हिल मिलकर रहना होगा।
  -तूम तो बड़ी समझदारी की बात करती हो । मुझसे  छोटी हो पर बुद्धिमानी में बड़ों –बडों को हरा दोगी । पेड़ बोला । 
Image result for strawberry plant clipartस्ट्रोबरी अपनी तारीफ सुनकर इतराने लगी । पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए वह उत्साहित हो उठी ।
बोली –मुझे जल्दी से धरती का मुकुट दिखाओ।  
-अभी दिखाती हूँ –कहकर बूंद बर्फ ढकी चोटी पर बैठ गई । वहीं से ज़ोर से बोली –बर्फ से ढकी चोटियाँ ही धरती का शानदार मुकुट हैं । तुम भी यहाँ आ जाओ ।

स्ट्रोबरी तो उमंग के पंखों पर सवार थी । उसने बर्फ पर चढ़ना शुरू किया । जरा सा चढ़ती ,फिसल जाती । फिर चढ़ती –फिर फिसल जाती । वह बार –बार ऐसा करती रही । ठंड से बदन अकड़ गया लेकिन बूंद के पास जाने की इच्छा नहीं छोड़ी।


सूरज को उस पर दया आ गई ।वह ज़ोर से चमका । किरणों की गर्मी से बर्फ जगह –जगह से पिघल गई।स्ट्रोबरी सरलता से चोटी पर चढ़ी और ऊंचाई से धरती की सुंदरता देखी ।उसके रूप पर वह मुग्ध हो गई । बर्फ पर सुनहरी किरणों के पड़ने से नीली ,पीली रोशनी निकल रही थी जिसमें धरती नहाकर खिल उठी।  

-मुझे अब हरा और पीला ब्लाउज भी दिखा दो । बच्चे की तरह स्ट्रोबरी मचल उठी ।
-चोटी से नीचे झाँको!पृथ्वी हरी –हरी घास का मखमली लहंगा पहने हुए है और सरसों के लहलहाते पीले खेत उसका  ब्लाउज हैं । सभी तो दिखाई दे रहा है । सुरभि का सितार बजाते रंग बिरंगे बाग –बगीचे हमें बुला रहे हैं । सूरजमूखी  का फूल मस्त होकर नाचना चाहता है । उस पर मंडराती तितलियाँ कुछ गाती सी लग रही हैं।
--मेरा  मन भी करता है नाचने को –गाने को । भोली सी स्ट्राबरी बोली ।
-किसने रोका है तुम्हें !खूब नाचो –खूब गाओ ।
-मुझे कोई नहीं रोकेगा !क्या तुम्हें पूरा –पूरा विश्वास है ?झाड़ी वाले घर में तो मैं अपने मन से कुछ कर ही नहीं सकती थी । हर समय टोकाटाकी होती  –यह मत करो ,वह मत करो ।
- हाँ –हाँ !मैं अच्छी तरह जानती हूँ । इस धरती पर तुम अपने मन की रानी हो । बूंद ने उसे यकीन दिलाना चाहा ।
-सच में !
आह तब तो मैं--------



खाऊँगी –खेलूँगी
नाचूँगी –गाऊँगी ,
ताल में उछलूँगी
झरने में नहाऊँगी ,
पीछे पड़ी यदि गिलहरी
चोटी पर चढ़ जाऊँगी।

स्ट्राबरी अपने में ही खोई थी । उसे पता ही न चला कि कब –कब में बूंद दूसरी दिशा में हवा के साथ उड़ गई । उसे अब दूसरों का भला करना था ।


समाप्त  Related image
(प्रकाशित)


सोमवार, 21 सितंबर 2015

बाल कथा

अंतर्जाल पत्रिका अनहदकृति में प्रकाशित 

http://www.anhadkriti.com/sudha-bhargava-story-bhoori-maa

भूरी माँ

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जानवर के अगाध स्नेह के आगे आज का सभ्य मानव मूक 
नैपाली कक्षा चार में पढ़ता था। माँ दांतों की डॉक्टर और बाप दिल का पर न उसके दाँत ठीक थे और न दिल ही खुश था। स्कूल से आकर वह नौकरानी के पास रहता। रविवार को भी उसकी माँ और पापा घर में नहीं होते थे। फिर तो छुट्टी का दिन उसे पहाड़ लगने लगता। आया घर का काम निपटा कर सोने की ताक में रहती। अकेलेपन से उसका जी घबराता और बुरे विचार उसे बेचैन किए रहते –यदि मैं गिर गया तो कौन उठाएगा, मुझे बुखार चढ़ गया तो दवा-दारू कौन करेगा। दोस्तों को फ़ोन करता तो वे एक मिनट बातें करते, फिर धम से रिसीवर नीचे रख देते। वे अपने भाई–बहनों मे मस्त। माँ की उसे याद सताती पर डायल करते–करते उँगलियाँ थम-सी जाती–उन्होंने कह रखा था कम से कम फ़ोन करना क्योंकि मरीज़ों को देखते समय उनका दिमाग़ बँटता है। सारे दिन फ़्रिज में रखे टॉफ़ी–चाकलेट खाने से उसके दाँत गड़बड़ा गए। घर में कोई समझाने वाला तो था नहीं जो मन में आता करता। यहाँ तक कि घर की चारदीवारी में इंसान कीआवाज़ सुनने को उस बालक के कान तरस जाते। मन को समझाने के लिए दूरदर्शन के चैनल बदलता रहता, कब नींद ने उसे थपकी देकर सुला दिया पता नहीं, पर टी वी चलता रहता। ठंड से उसके पैर पेट से जा लगते मगर चादर ओढ़ाने वाली नौकरानी पहले से ही व्यस्तता का बहाना बना कर अपना पीछा छुड़ा लेती।

शाम के पाँच बजते ही वह पास के पार्क में घूमने निकल जाता। दोस्त तो संध्या घिरते ही अपने–अपने घरों का रास्ता नापते पर वह लावारिस-सा घूमता रहता। थक कर पेड़ के नीचे बैठा माँ का इंतज़ार करता। ज्यों-ज्यों अंधेरा होता, उसके अंदर का अंधेरा बढ़ता जाता।
एक दिन माँ के आने पर चुपचाप वह उसके पीछे घर में दाख़िल हुआ ।

- नैपी,तुम अकेले इतनी देर तक बाहर क्यों थे? रामकली तुमने इसे क्यों नहीं बुलाया?
- मेमसाहब। बाबा रोने लगते हैं। उन्हें देखकर हमारा कलेजा फटने लगता है। बाहर रहते हैं तो पेड़–पौधों को ही देखकर मन बहलाते रहते हैं।
- न जाने क्यों यह भूत की तरह मुंह लटकाए रहता है। इसे मैंने क्या नहीं दिया। अभी नया मोबाइल दिया। खूब गाने सुनो, पिक्चर खींचो–कौन रोकता है! कल ही नए जूते–टी शर्ट लेकर आई हूँ।
- रोहिणी नाराज होने की बात नहीं। वह तुम्हारा साथ चाहता है। शांत भाव से घर में प्रवेश करते हुए नैपाली के पापा बोले।
- तब क्या मैं अस्पताल जाना बंद कर दूँ। आप क्यों नहीं अपनी प्रेक्टिस बंद करके उसकी देख-रेख करते।
- मैं तब भी माँ की कमी पूरी नहीं कर पाऊँगा। माँ, माँ ही होती है।
- मैं अपना कैरियर बर्बाद नहीं कर सकती।
- मैं तो केवल यह चाहता हूँ कि उसे थोड़ा समय दो और बेटा होने के नाते उसका अधिकार  बनता है। बच्चे को जन्म देने से पहले तुम्हें सोच लेना चाहिए था कि उसके प्रति तुम्हारा कर्तव्य भी है, उसे निभा पाओगी या नहीं।
पति की तर्कसंगत बात से रोहिणी चुप हो गई। माँ–बाप के बीच गरमागर्मी होने पर नैपाली अख़बार लेकर बैठ गया।
हठात बोला –माँ देखो न, इसमें लिखा है–बिल्ली ने एक छोटे बच्चे की जान बचाई। मुझे भी एक बिल्ली का बच्चा ला दो। आप लोगों के पीछे से यदि मुझे कुछ हो गया तो वह बचा लेगी।
उसके मन का भय उसकी ज़बान पर आ गया। उसमें पनपती असुरक्षा की भावना को महसूस कर रोहिणी भी हिल गई।
दूसरे दिन वह क्लीनिक से लौटते समय सफ़ेद बालों वाला बिल्ली का प्यारा-सा बच्चा उठा लाई। भूरी–भूरी आँखें, रेशम से बाल, नैपाली तो उसकी झलक पाते ही उछल पड़ा। अपने हाथों से बड़ी सावधानी से ऐसे उठाया जैसे माँ नवजात शिशु को उठाती है। उसका चुंबन ले सीने से लगा लिया। वह सोचने लगा–मेरी तरह यह भी अपनी माँ को याद करेगा पर मैं इसे इतना प्यार दूंगा कि माँ की कमी खलेगी ही नहीं।
नैपी बिल्ली के बच्चे को भूरी ही कहता। वह उससे इस तरह हिल-मिल गई थी मानो उसकी दुनिया नैपी ही हो।

स्कूल जाते समय वह बड़े रौब से कहता–रामकली! घर का काम हो न हो पर भूरी का पूरा ध्यान रखना। वह भी उसकी बात न टालती। उसे नैपी से पूरी सहानुभूति थी। उसे लगता –नैपी के माँ–बाप नोट छापने की मशीन बन कर रह गए हैं।
एक छोटे से जीव ने नैपी की दिनचर्या ही बदल दी। अंधेरे गए बाहर तक घूमने पर तो उसने ताला लगा दिया। शाम को भूरी को घुमाता, मैदान में दौड़ाता और उसमें अच्छी आदतें डालने की कोशिश में रहता। भूरी दूध–रोटी खाती तो वह भी खाने बैठ जाता। भूरी के रूप में उसे एक साथी मिल गया जिसकी उसे परवाह थी और भूरी को नैपी की। एक मिनट को वह उसकी आँखों से ओझल हो जाता तो म्याऊँ –म्याऊँ करती पूरे घर में ढूंढ आती।

एक बार रामकली कुछ दिनों को अपने गाँव गई। पीछे से नैपी को वायरस फ़ीवर हो गया। अस्पताल जाने से पहले उसकी माँ ने दवाइयों का लिफ़ाफ़ा बेटे के सिरहाने रख दिया और कहा –ठीक से दवा लेते रहना। कोई बात हो तो मुझे फ़ोन कर देना। पड़ोसी आंटी को घर की चाबी दिये जा रही हूँ। वे आकर तुम्हारा हाल–चाल पूछ जाएंगी।
माँ से रुकने के लिए कहना बेकार था। वह अनमना-सा उनके आदेश सुनता रहा। दोपहर होते–होते उसका बुख़ार बढ़ने लगा। ज्वर के ताप से वह बड़बड़ाने लगा–भूरी मुझे बचा लो --भूरी अपना नाम सुनकर चौंक गई। अपने साथी के सिरहाने बैठकर उसने धीरे से पंजा उठाया और उसका सिर सहलाने लगी। बुख़ार की गर्मी का शायद उसको अनुमान लग गया था। वह रसोई के वाशबेसिन पर चढ़ गई। पंजे से नल की टोंटी घुमाई और बहते पानी के नीचे अपना सिर रख दिया। जब उसके बाल अच्छी तरह भीग गए, एक छलांग में अपने छोटे मालिक के पास आन बैठी। उसके माथे पर झुककर उसने अपना सिर हिलाया। झरझरा कर उसके बालों से ठंडे पानी की बूंदे नैपी के चेहरे पर गिरने लगीं। उसको ठंडक महसूस हुई और आँखें खोल दी लेकिन फिर से उस पर बेहोशी छाने लगी। भूरी घबरा कर इधर–उधर चक्कर काटने लगी। कुछ  मिनटों की कसरत के बाद वह दूसरी मंजिल की खिड़की से पाइप के सहारे नीचे कूद गई। पड़ोसिन आंटी का दरवाज़ा भड़भड़ करने लगी। वह यहाँ कई बार नैपी के साथ आ चुकी थी। आंटी भूरी को देखकर चौंक गईं। भूरी उनके कदमों में लोटकर बाहर जाने की ओर इशारा करने लगी। आंटी अनहोनी की आशंका से काँप उठी। उन्होंने नैपी के घर की चाबी उठाई और भूरी के पीछे चल दीं।

दरवाजा खोलते ही आंटी से पहले भूरी घर में घुस गई। नैपाली के सिरहाने दो पैरों से खड़े होकर वह अजीब-सी आवाज़ निकालने लगी। आँखों की चमक से लगता था वह बहुत खुश है और उसे पूरा भरोसा है कि उसके साथी को कष्ट से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा।

आंटी ने नैपाली के माथे पर हाथ रखा। वह तवे की तरह जल रहा था। उन्होंने उसे दवा देकर रोहिणी को फ़ोन किया–तुम तुरंत चली आओ। बेटे की तबियत ठीक नहीं। भूरी के कारण आता संकट टल गया।

आंटी ने ठंडे पानी की पट्टियाँ नैपी के माथे पर रखनी शुरू कर दी और भूरी! उसको किसी तरह चैन नहीं मिल रहा था। वह बार–बार दरवाज़े तक जाती, एक–दो बार उचककर बाहर झाँकती फिर निराश-सी म्याऊँ कहकर लौट आती। उसे शायद रोहिणी के आने का इंतज़ार था।

रोहिणी को आने में आधा घंटा लग गया। बदहवास-सी बेटे के पास आकर खड़ी हो गई। वह अपने बेटे की ओर एकटक देखे जा रही थी और अपने को अपराधी महसूस कर रही थी। तभी नैपी की आँखें खुलीं, उसने कमज़ोर-सी आवाज़ में पुकारा---भूरी–भूरी। भूरी फुदककर अपने साथी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने पंजे में लेकर चाटने लगी । जो कर्तव्य माँ का था वह भूरी-माँ बनी निभा रही थी।

जानवर के अगाध स्नेह के आगे आज का सभ्य मानव मूक था।
 रोहिणी के मुख से केवल इतना निकला–बेटा, मुझे माफ़ कर दे ।
सुधा भार्गव 
बैंगलोर



शनिवार, 15 अगस्त 2015

बालकहानी


मेरे तुम्हारे सपने /सुधा भार्गव



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      पराग  के पैदा होते ही उसके माँ –बाप की आँखों में सपने तैरने लगे । उनकी जो इच्छाएँ पूरी नहीं हुई थीं उनको वे अपने बेटे द्वारा पूरा करना चाहते थे ।
बच्चा तीसरी कक्षा में ही आया था कि कमल और उसकी पत्नी अपने बेटे का भविष्य बुनने लगे ।
-मेरा बेटा तो इंजीनियर बनेगा। 
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-न-- न ,मेरा बेटा तो - - - -डॉक्टर  बनेगा ।


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-
बस हर बात में आप मनमानी करना चाहते हैं।
-
अच्छा बाबा ,जो तुम कहोगी वही बनेगा ।
-
ऐसी बात नहीं।  मेरी इच्छा पूरी न कर पाया तो आपकी इच्छा पूरी करेगा  बेटा तो हम दोनों का है ।

    कमल तो सपनों का बीज बोकर दफ्तर चला जाता पर उसकी पत्नी दिलोजान से उसमें खाद देने में लग जाती । बेटे पर पूरी तरह नजर रखती कि कहीं खेलने –कूदने में ही तो सारा समय खराब नहीं कर रहा ।
     एक दिन बेटा भागता हुआ आया –माँ ,सुबह की पढ़ाई खतम कर दी है । अब मैं खेलने जाऊंगा 
-
पर बेटा    ---आज तो छुट्टी है कुछ तो पढ़ाई पर ज्यादा  ध्यान दो ।
-
क्या पढूँ ?
-
रिवीजन ही कर लो ।
-
रिवीजन- -- मतलब पन्नों को उलट – पुलट करूं। रिवीजन के नाम तो मुझे उबकाई आने लगी है।  एक ही पाठ दस बार पढ़ो----,उफ !लगता है पागल हो जाऊँगा
चलो आपकी बात मान लेता हूँ पर अभी से कह देता हूं शाम को नहीं रुकूंगा ,फुटबॉल खेलने जाऊँगा ।
-ओह बहस न कर ,जा पढ़ । उसकी शर्त सुनकर माँ झुँझला उठी ।
    
पराग ने   सोते –जम्हाइयाँ लेते समय काटा ।  बस नाम को किताब हाथों में ले रखी थी ।   दिन ढलते जूते कसे और निकल गया घर से बाहर पर यह क्या ! वहाँ तो पापा खड़े मिल गये --
-
कहाँ चले बेटा --?
आवाज में मिठास थी पर पराग कड़वाहट से भर गया ।
-
खेलने जा रहा हूं ।
-जल्दी आना कुछ ख़ास बात करनी है ।
-
ठीक है पापा ।
पराग अपने पर काबू न रख सका और बड़बड़ाने लगा --
मेरे खेलने के समय ही बातें आन टपकती हैं । वैसे पापा इतने खोये -खोये रहते हैं कि मेरा पास खड़ा होना भी  पता नहीं चलता । कोई नहीं चाहता कि मैं खेलूं ।
    पराग खुशी- खुशी घर लौटा पर ेखाने की मेज पर पापा को बैठा देख उसका मुंह लटक गया ।
-
आओ बेटा  ,अब तो तुम कक्षा 5 में आ गए हो ।   हमारी इच्छा है तुम पढ़ने में रात –दिन एक कर डालो ताकि और अच्छे स्कूल में दाखिला हो सके । तुम्हारे लिए एक टीचर भी रख देंगे ।उसकी सहायता से ज्यादा अंक पा सकते हो । 
हमने तो कह दिया जो कहना था ,अब तुम बताओ - - -तुम क्या चाहते हो !।
    -
पापा आपकी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ रही --पर हाँ ,मैं बहत कुछ करना चाहता हूं । नीले आसमान के नीचे हंसती धरती पर खिले फूलों को छूना चाहता हूं । गुनगुनी धूप में साथियों का हाथ पकड़ तितलियों का पीछा करना चाहता हूं ,फुटबॉल की तरह उछलना चाहता हूँ लेकिन कैसे करूं! आप लोगों ने मेरा सारा समय छीन लिया है।  क्या करूं—कहाँ जाऊं?मुझे ,मेरा कुछ समय तो लौटा दो पापा !पराग कहते –कहते बिलख पड़ा ।
उसका  फड़फड़ाना  माँ बाप से न देखा गया ।
उन्होंने उसे गले लगाते बड़े कातर स्वर में कहा –बच्चे हम तो तुम्हारे लिए सोने -चांदी सा भविष्य चाहते थे पर यहाँ तो तुम अपने वर्तमान में ही खुश नहीं हो तो आने वाले दिनों का स्वागत कैसे करोगे ?
 -पापा , मैं जानता हूँ पढ़ना बहुत जरूरी है पर इस समय  खुश रहने के लिए और भी तो कुछ चाहिए।
कमल और उसकी पत्नी को पहली बार एहसास हुआ कि वे बच्चे को बहुत जल्दी बड़ा होना देखना चाहते हैं ,उससे उसका बचपन छीनना चाहते हैं ताकि उनके सपने पूरे हों । उन्होंने अपनी भूल सुधार का निश्चय किया।
- आज से हम अपनी किसी इच्छा का बोझ तेरे सिर पर नहीं लादेंगे । सारी टोकाटाकी बंद । तू खेलेगा –कूदेगा –पढ़ेगा और अपने सपनों के झूले में झूलता बड़ा होगा। कमल ने दुलराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा।  
-सच पापा । चांदी के सिक्कों सी उसकी खनकती हंसी से कमल और उसकी पत्नी के चेहरे भी चमक उठे ।  
समाप्त
सुधा भार्गव
बैंगलोर

(यह कहानी देवपुत्र बाल मासिक अगस्त अंक2015  में प्रकाशित हुई है।)


शनिवार, 25 जुलाई 2015

कहानी

 

बाबा की छड़ी/सुधा भार्गव 

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-बाबा –बाबा, खाना खाने चलो।
-चलता हूँ चलता हूँ  –जरा छ्ड़ी तो लेने दे।
-छ्ड़ी लेकर क्या करोगे?मैं हूँ न आपकी छड़ी। लो मेरा हाथ पकड़ लो।
बाबा के चेहरे पर मुस्कान आकर पसर गई। 

रसोई के पास आसन बिछाते हुए छुटकी बोली -जूते उतारकर धीरे से बैठना बाबा।
-माँ –माँ आज मैं बाबा को खाना खिलाऊंगी।
-किसने मना किया है –खिलाओ। उनके सामने पहले मैं थाली रख दूँ कहीं गेरगार न दे। उसके बाद तुम गरम-गरम रोटी खिलाना।
-पर जरा जल्दी रोटी सेक दो। बाबा को भूख लगी होगी। क्यों बाबा ठीक कह रही हूँ न।
-रोटी ले जाना छटंकी। है छुटकी सी लेकिन बातों मे बड़ों -बड़ों के कान काटती है। माँ रसोई से ही बड़बड़ाई।
-ओह बहू डांटो मत।बिटिया तो चिड़िया की तरह चहकती ही अच्छी लगती है।
छटंकी चिड़िया की तरह फुदकती ही रोटी लाई और बोली -
-बाबा जल्दी से थाली के पास से हाथ हटाओ वरना गरम फुलके से हाथ जल जाएगा। 
बाबा ने आधी रोटी के छोटे छोटे टुकड़े कर के चिड़ियों को डाल दिए ,चौथाई रोटी का भगवान का भोग लगा हाथ जोड़ लिए। 
-अब तो एक गस्सा रह गया,बाबा खाओगे क्या!रुको दूसरी लाती हूँ।
एक रोटी खाते ही बाबा का नाजुक पेट भर गया। बोले –बस अब मैं खा चुका।
-एक रोटी से पेट भर गया! न –न एक रोटी और लेनी पड़ेगी।
-बेटा ,अब नहीं खा सकता।
-क्यों? आपने खाया ही क्या है। अरे आज तो मीठा दही भी नहीं है। माँ—माँ—दही जल्दी लाओ । बाबा उठे जा रहे हैं। और हाँ जरा ज्यादा सा लाना। उन्होंने रोटी भी कम खाई है।

छुटकी की माँ ने थाली में दही की कटोरी रख दी।
-अरे बहू ,इतना सारा --। तू भी इस छुटकी के कहने मेँ आ गई।
-ओह!आप खाओ तो ,बचेगा तो मैं खा लूँगी। देखो बाबा आप ठीक से खाते नहीं हो। तभी कमजोर होते चले जा रहे हो। डॉक्टर अंकल से आपकी इस बार शिकायत जरूर करूंगी।
-अरे पटाका –ले –सब दही खतम कर देता हूँ। बस खुश!
-खुश –बहु--त खुश!छुटकी ने दोनों हाथ फैला दिए। आप पानी पीकर अब आराम करने चलो। अरे ,आप तो चल दिए। अपनी छड़ी को तो भूल गए।
बाबा ने हँसकर उसकी उंगली पकड़ ली। 

कमरे मेँ घुसते ही छुटकी का लाउडस्पीकर चालू हो गया-बाबा पलंग पर झटके से न लेटना- कल आपकी कमर मेँ दर्द हो रहा था। याद है न।
-याद न भी हो तो क्या है!मेरी पटाका ने याद तो दिला ही दिया।
-बाबा आप तो बड़े भुलक्कड़ होते जा रहे हो। फिर कुछ भूल रहे हो। छटंकी ने अपना सिर थाम लिया।
बाबा अपनी पोती को चकित से  ताकने लगे और पूछा –क्या--?
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-उफ!पान।

-बच्चे पान खाने की तो मुझे आदत है—कैसे भूल सकता हूँ। मैंने आप जान कर पान की नहीं कहा। तुझे फिर एक चक्कर लगाना पड़ता।
-रुको मैं अभी आई—पान लाई।
-तुझे पान लगाना भी आ गया।
-मैं पान नहीं लगा सकती । देखा न पानदान  कितनी ऊंचाई पर रखा है। मेरे तो हाथ ही नहीं पहुँचते। थोड़ी लंबी हो जाऊं फिर पान  मैं ही लगाऊँगी।
-पान तो घर मेँ सब खाते है। पान लगाते लगाते तेरे नन्हें से हाथ थक जाएंगे।
-छुटकी पल भर को सोच में पड गई। फिर धीरे से बोली –एक बात कहूँ!
-कह –।
-वो कोई मेरे बाबा है। मैं तो केवल अपने बाबा को पान लगाऊँगी। फिर मटकती उछलती कमरे से बाहर हो गई।
पोती के प्यार में बाबा भीग कर रह गए और लगा मानो गुलाब से महकते सुखों से  उनकी जेबें भर गई हों।   


 
फोटोग्राफी -सुधा भार्गव