प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

बुधवार, 23 मार्च 2016

3-उत्सवों का आकाश

विश्व कविता दिवस  

 इस अवसर पर मेरे प्रिय कवि हास्य सम्राट काका हाथरसी की कुछ यादें जिन्होंने मुझे सिखाया -खूब हंसो,हँसते रहो और हँसते -हँसते हर मुसीबत का सामना करो।

उनको हार्दिक नमन



बच्चों 
21 मार्च को कविता दिवस था।जिसका मतलब ही है खूब कविता पढ़ो,लिखने की कोशिश करो और कविता दूसरों को सुनाओ।
कभी न सोचो तुम्हारी कविता ठीक नहीं। उसमें तो तुम्हारे मन की मिठास घुली है। तुम जैसी सरल और निर्मल है। फिर तो ठीक ही ठीक होगी।

इस दिन मुझे अपने प्रिय कवि बहुत याद आए।शुरू से ही काका हाथरसी की कविताएं बहुत पसंद थीं।हमेशा सोचा करती,कैसे वे ऐसी गुदगुदाने वाली कविताएं लिख लेते हैं। उनका कविता पाठ बड़े शौक से सुना करती थी। उनकी दो किताबें जो मैंने बहुत पहले खरीदी थीं अभी तक अलमारी में सावधानी से रख छोड़ी हैं।


काका हाथरसी हास्य रचनावली-नोक झोंक –प्रथम संस्कारण 1982,मूल्य केवल  60रुपए।  
श्रेष्ठ हास्य व्यंग  कविताएं 9काका हाथरसी ,गिरिराज शरण )संस्कारण 1981,मूल्य 35 रुपए ।
इनकी कीमत देखकर तो तुम जरूर चौंक गए होगे।आश्चर्य से जरूर मुंह से निकला होगा –इतनी सस्ती।  

इनको पढ़ -पढ़ कर खूब हँसती थी और सहेलियों को सुनाती थी।साथ ही सपने देखा करती कि मैं हास्य कवि बनूँ। इस तरंग में अल्हड़ बीकानेरी ,जैमिनी हरियाणवी ,बरसाने लाल चतुर्वेदी ,शैल चतुर्वेदी ,सरोजिनी प्रीतम और हुल्लड़ मुरादाबादी की कविताएं खूब पढ़ीं और सुनी। कभी रेडियो पर तो कभी दूरदर्शन में। होली के अवसर पर तो हास्य कवियों का खूब धूमधड़ाका रहता ही है।सो हास्यकवि सम्मेलन में जाकर घंटों के लिए जम जाती थी। 

बहुत दिनों से मैं काका हाथरसी को पत्र लिखने की कोशिश कर रही थी। जब भी लिखने बैठती दिल बैठने लगता इतने महान कवि मेरा पत्र पाकर न जाने क्या सोचेंगे,जबाब देंगे भी या नहीं!पर एक दिन 1990 में हिम्मत जुटाकर मैंने उन्हें काँपते हाथों से पत्र लिख ही डाला। क्या लिखा वह तो याद नहीं पर ताज्जुब!उनका जबाव अगले ही हफ्ते आ गया। 



पत्र पाकर मैं तो उछल पड़ी। एक बार नहीं उसे सौ बार पढ़ा होगा। ऐसे महान थे काका हाथरसी जो अति व्यस्त होते हुए भी मुझ जैसे लोगों की भावनाओं की कदर करते थे। इस पत्र का एक -एक शब्द मेरे लिए अमूल्य और ऊर्जावान है।   

 मैंने उसका जबाब भी दिया। पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-



  मैंने जब  बच्चों को कलकता बिरला हाई स्कूल में पढ़ाना शुरू किया तो काका हाथरसी की कविताओं का मंच पर  छात्रों से  कविता पाठ कराती थी।एक बार तो मैंने उनके प्रहसन को आधार बनाकर एकांकी नाटक भी लिखा और वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बच्चों ने मंच पर खेला। खतम होने पर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अपने प्रोग्राम की सफलता  देख मेरे तो पैर जमीन पर पड़ते ही न थे।
लेकिन इस सबका श्रेय किसको जाता हैं ?मेरे प्रिय कवि काका हाथरसी को।

तो प्यारे बच्चो ,यदि तुम्हें कविता में दिलचस्पी है,उसका आनंद लेना है,कविता लिखनी है तो मनपसंद कवियों को खूब पढ़ो। देखना, पढ़ते- पढ़ते तुम्हारी कलम भी चलने लगेगी। कवि काका हाथरसी को भी पढ़ो तो अच्छा है।हँसते -हँसते पेट फूल जाएगा। 
हाँ याद आया -काका हाथरसी ने अपनी किताब में एक हास्य कवि सम्मेलन लिखा है। उसमें कुछ कवियों की कविताएं बहुत मजेदार है। 

कवि पिलपिला जी की कविता सुनो-
पिल्ला बैठा कार में,हम सब ढोते बोझ
भेद न इसका मिल सका ,बहुत लगाई खोज 
बहुत लगाई खोज ,रोज पिल्ला साबुन से नहाता 
देवी जी के हाथ से दूध रोटी खाता 
कहे पिलपिला वर मांगत मैं चिल्ला-चिल्ला  
अगले जन्म में भगवन ,हमको बनाना पिल्ला। 

खिल गए न गालों पर हजार गुलाब। अब कवयित्री शवनम का कीर्तन सुनो। अच्छा लगे तो तुम दादी माँ के साथ इस कीर्तन को कर सकते हो। 

जै रघुनंदन जै सियाराम,जानकी बल्लभ सीताराम 
हलुवा में हरि बसत हैं,घेवर में घनश्याम 
मक्खन में मोहन बसें,रबड़ी में श्री राम 
रसगुल्ला में शालिग्राम ,जै रघुनंदन जै सियाराम    
रसगुल्ला में शालिग्राम ,जै रघुनंदन जै सियाराम
बोलो सियावर राम चंद्र की जै।   
अरे ,चारों तरफ हंसी के गुब्बारे ही उड़ते नजर आ रहे हैं। हँसना तो वैसे भी सेहत के लिए अच्छा है। 
विश्व कविता दिवस 
बच्चों-बड़ों सबको बहुत- बहुत मुबारक हो।   


गुरुवार, 10 मार्च 2016

2-उत्सवों का आकाश

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जंगल की होली /सुधा भार्गव

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बच्चो -हम तुम तो होली खेलते ही हैं मगर क्या तुमने कभी पक्षियों और पशुओं को भी होली खेलते -जलाते सुना है? अगर नहीं ,तब तो तुम्हें यह कहानी पढ़नी ही पड़ेगी।  जरा देखो तो--- 
होली खेलते- खेलते रंगबिरंगी सुंदर चिड़ियाँ तो खुशी के मारे चीं-चीं--चीं कर  इठला रही हैं  और पशुओं के अंदर बहता प्यार का झरना तो पहले से भी ज्यादा तेजी से कलकल बहने लगा है। अरे यह भालू --यह तो हमारी तरफ ही आ रहा है।  सबसे पहले इसी से मिलते हैं।   

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   एक गोलमटोल भालू  था। जिसका नाम था मटल्लू वह डंडे से टिक-टिक की आवाज करता गुल्लू किसान के खेत की रखवाली किया  करता । किसान होली खेलने का बड़ा शौकीन था इसीलिए हर वर्ष इस अवसर पर अपने गाँव चला जाता। इस साल भी जाने लगा तो भालू दुखी सा हो गया। 

    गिड़गिड़ाते बोला-- गुल्लू भैया ,इस बार गाँव न जाओ।हमारे  साथ होली मनाना। 
-तू  तो बड़ा भोला है-- अरे दो लोग में क्या होली मनती है । 
-दो!दो कहाँ ?हम दोस्त तो दस हैं --देखते ही  देखते सारा जंगल होली खेलने आ जाएगा। 
-खेलने की होली तो कल है। पहले तो आज शाम को  होलिका जलाई  जायेगी और उसके लिए लकडियाँ इकट्टी करनी पड़ेंगी।समय तो बहुत कम है। तू अपने दोस्तों के साथ इतनी जल्दी लकड़ियाँ जुटा पाएगा?
-हाँ –हाँ क्यों नहीं।  ,
-तब ठीक है । मैं अभी आता हूँ,मुझे कुछ काम याद आ गया है।

भालू जोर से चिल्लाया -
गोरी कबूतरी,काली कोयलिया 
रिंकू हाथी ,चिंकू घोड़ी 
जल्दी जल्दी आ जा ,
सूखी लकड़ी जुटा जाओ  
होलिका आज  जलानी है  
खुशियाँ खूब मनानी हैं।

सब लस्टम-पस्टम दौड़े आये। हैरानी से बोले -
ओए मटल्लू , होलिका क्यों जलानी है ?
- यह तो मुझे भी नहीं मालूम । वह तो गुल्लू भैया ही बताएँगे। 

-हाँ—हाँ,इसे क्या मालूम!शरीर से तो यह मोटा है ही ,बुद्धि भी इसकी मोटी  है।
-ओह कोयलिया क्यों सताती है तू इसे बार बार। देखो—देखो, भैया आ गए-भैया  आ गए। कबूतरी गुटर-गूं,गुटर-गूं कर उठी।
*

सबने किसान को घेर लिया,भैया बताओ न !होली क्यों जलाते हैं ?
-क्योंकि आज के दिन होलिका जल गई थी।
-वह क्यों जल गई ?चिंकू घोड़ी दुखी हो उठी।
-क्योंकि उसने अपने बुरे भाई राजा हिरण्याकश्यप का साथ दिया।
-होलिका का भाई बुरा क्यों था?
-ओह !एक के बाद एक प्रश्न ---अरे इसकी बड़ी लंबी कहानी है।
-तो सुना दो न भैया ,कहानी तो हमें बहुत अच्छी लगती है।
-अच्छा सुनो-  राजा अपने को भगवान से भी बड़ा समझता था और अपने बेटे प्रह्लाद से कहता –बस मेरी  पूजा करो। जब बेटे ने उसकी बात न सुनी तो उसे कई बार जान से मारने की कोशिश की पर उसके तो एक खरोंच भी नहीं आई। इससे राजा परेशान हो उठा।
 उसकी एक बहन होलिका भी थी। उससे अपने भाई का कष्ट देखा न गया। बोली –भैया, मैं आग से नहीं जल सकती। कहो तो प्रह्लाद को गोदी में लेकर आग में बैठ जाऊं।  
भाई बड़ा खुश -अरे बहन यह तूने अच्छा बताया । प्रह्लाद जल कर खाक हो जाएगा हा—हा—हा। देखता हूँ इस बार वह कैसे बचता है?

होलिका प्रह्लाद को लेकर आग की ऊंची- ऊंची लपटों के बीच बैठ तो गई पर कुछ ही देर में उसके बिलखने-चिल्लाने की आवाज आने लगी –अरे मुझे बचाओ—मुझे बचाओ।
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 जब तक आग की लपटें शांत हुईं होलिका बुरी तरह जल चुकी थी।
-क्या प्रह्लाद भी जल गया?घोड़ी ने बेचैनी से पूछा। 
-नहीं।वह तो बच गया क्योंकि वह अच्छे काम ही करता था। जलती तो होलिका भी नहीं क्योंकि उसे आग में न जलने का भगवान से  वरदान मिला था पर वह यह भूल गई कि किसी को नुकसान पहुँचाने से भगवान गुस्सा हो जावेंगे और वरदान का असर न होगा।  
-अच्छा हुआ होलिका जल गई --होलिका जल गई –अच्छे का बोलबाला,गंदे का मुँह काला।  कोयल कूक उठी । 
अच्छा शाम होने वाली है  सबको मिलकर होलिकादहन की तैयारी भी करनी है। अपने अपने काम में लग जाओ।
*
कोयलिया –और कबूतरी  उड़ चले । चोंच में तिनके भर कर लाये और खुले  मैदान में रख दिए । हाथी सूखी  टहनियों का गट्ठर अपनी सू  में लपेट लाया और तिनकों पर रख दिया ।भालू के दोनों हाथ भूसे से भरे थे । उसने भी भूसा गट्ठर पर धीरे से रख दिया 
किसान भी समय पर आ गया । कुछ बड़ी -बड़ी लकड़ियाँ उसने भी  घास -फूस और टहनियों के ढेर पर डाल दीं और  बोला – बहुत पहले  होलिका लकड़ियों के ढेर पर ही बैठकर जली थी। हर वर्ष इसी तरह हम उसे जलाकर खाक कर देते हैं ताकि सबको याद रहे कि उसकी तरह गलत रास्ते पर चलने वालों की किसी को भी जरूरत नहीं होती। 

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इस ढेर में आग लगाने से पहले मुझे  होलिका  से प्रार्थना करनी है  कि जिस तरह से उसने बालक प्रहलाद को कष्ट देने की कोशिश की वैसा वह किसी के बच्चे के बारे में न सोचे।
 होलिका के  जलते ही चारों और रोशनी फैल गई । आग की जब लपटें ऊपर उठने लगीं,किसान टहनी में लगीं गेहूँ की बालियाँ भूनने लगा । गेहूँ के छिलके उतारे और  आस -पास खड़े पशु-पक्षियों को देते हुए बोला  -होली के दिनों में हम किसान मस्ती से झूम उठते हैं क्योंकि नई फसल कटती है। जितनी ज्यादा फसल उतनी ज्यादा खुशी की लहरें । लो  नया  अनाज चखो  फिर प्यार से एक दूसरे के गले मिलो।   
सबने बढ़कर दाने लिए और अपनी भाषा में चिल्लपौं करने लगे।  
कोयलिया और कबूतरी चोंच से चोंच भिड़ाकर प्रेम के गीत गाने लगीं। हाथी अपनी सू से सबको छूता और फिर उसे अपने  मस्तक से लगा लेता मानो स्नेह की बौछारों में भीगना -भिगाना चाहता हो  रिंकू घोड़ी किसान के पास हिनहिनाकर उसके आगे -पीछे घूमने लगी ।
*
होलिका तो जल गई पर कल होली कैसे खेलेंगे ?रंग तो हैं ही नहीं। चिंकू घोड़ी बोली। 
 -मेरे होते हुए चिंता न करो । मेरे दादा कहते थे टेसू के फूलों से भी तो होली खेली जाती है।चलो तुम्हें उससे मिलवाता हूँ। किसान  बोला।
-कहाँ जा रहे हो?तुम्हारे पास ही तो खड़ा है -तुम्हारा टेसू ।
-तुम टेसू हो?ऊँह किसने रख दिया तुम्हारा नाम टेसू। ढेर सारे लाल-लाल फूल तुम पर आलती पालती मारे बैठे है। तुम्हारा नाम तो लाल लंगूर होना चाहिए।

-कोयलिया तू तो मेरी बड़ी हंसी उड़ाती है। पर तू इतना मीठा बोलती है कि अपनी छोटी बहन की बात पर गुस्सा भी नहीं आता। लाल लंगूर तो नहीं पर कुछ लोग मुझे आग का गोला जरूर कहते हैं।
-आग का गोला !आग लगाने वाला । जरूर तूने चिड़ियों के घोंसले जला डाले होंगे।
-क्या पागलपने की बात कर रही है। क्या मैं ऐसा दुष्ट लगता हूँ?मैं जब अपने परिवार के साथ खड़ा होता हूँ तो आकाश के नीचे लाल -लाल फूलों की चादर सी तन जाती है। दूर से उसे देखने पर लगता है मानो जंगल में आग लग गई हो।   अब कहने को तो मुझे सुग्गा पेड़ भी कहते हैं । 
-सुग्गा --मजाक कर रहे हो क्या ?तुम क्या टें—टें टीटाराम—सीताराम करते हो?मटल्लू बोला।
-मेरा फूल देखो --इसकी लाल -पीली पंखुड़ी तोते की चोंच की तरह मुड़ी है । 


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-चोंच मुड़ी  तो है--मान गए सुग्गा भाई। 
-अच्छा टेसूराम , हमें होली खेलनी है अपने कुछ फूल दे दो।किसान बोला ।  
-क्यों नहीं –क्यों नहीं। टेसू इतनी जोर से हिला कि खूब सारे फूल जमीन पर टपक पड़े।  
किसान ने सारे फूल बटोर लिए और बोला –इन्हें में पानी में भिगो दूंगा। सुबह तक होली का रंग तैयार ।
                                 *
अगले दिन भालू की दोस्त मंडली देर तक सोती रही पर वह खरगोश की घबराहट भरी आवाज सुन  जल्दी जाग गया था। आवाज की ओर ठुमक-ठुमक दौड़ा -दौड़ा गया तो देखा- खरगोश टेसू के पानी से  भरी बालटी  में डुबकियाँ लेता बोलने की कोशिश कर रहा हैं-
-रिंकू-चिंकू मैं डूबा रे –मटल्लू बचाले। मटल्लू भालू ने उसे तुरंत ऊपर खींचा और झुंझलाया -यह क्या तमाशा है !
-मैं सुबह उठकर पानी में झांका। उसमें मैं बहुत सुन्दर लग रहा था।  अपने को  पकड़ने को झुका तो गिर गया धड़ाम से ।
उसके भोलेपन पर भालू को हँसी आ गई । इतने में रिंकू हाथी और चिंकू घोडी भी आन पहुंचे । कोयलिया और कठफोड़वी चोंच में पानी भरकर एक  दूसरे पर डालने लगीं। किसान को देखते ही उसे भी पल भर में सबने ऊपर से नीचे तक भिगो दिया । 

इन पशु -पक्षियों की निराली होली देखकर गुल्लू किसान  अवाक् था ।सोच रहा था -इस बार गाँव न जा कर उसने अच्छा ही किया। यहाँ   न छल -कपट न ईर्ष्या की भावना, बस इनके बीच प्यार की एक धारा बह रही है  जिसे इंसान ने सुखा दिया है।

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शनिवार, 30 जनवरी 2016

1-उत्सवों का आकाश (नया साल)

 अंतर्जाल पत्रिका , अंक जनवरी-मार्च 2016  में प्रकाशित 
http://amstelganga.org



                  आनंद की बारिश


नए साल में बच्चों की दुनिया में बच्चों का और बड़ों  का स्वागत हैI हम इसमें पूरे एक वर्ष रहेंगेI न कोई डर होगा न कोई चिंताI बस हँसेंगे- हंसाएंगे .,अपने हिस्से की रोटी दूसरों को खिलाएंगे जिसका कोई न होगा उसके हम सब कुछ बन जायेंगे।  यदि आप   भी हमारा साथ देना चाहते है तो अवश्य आइयेI आपके आने से —-
नये वर्ष की धूप में,
पल- पल चमक उठेगा I
नव वर्ष की छाँह में
आँखों में गुलाब खिलेगा।

धरती के इस शोर गुल को सुनकर मटकू बादल चंचल हो उठा और लगा झाँकने नीचे लालची निगाहों से। वैसे तो आकाश की गोद में दुबका पड़ा था, जनवरी का महीना .कड़ाके की ठण्ड भला उसे कहाँ बर्दाश्त !पर अब अपने पर काबू रखना उसके लिए मुश्किल ही हो गया। मटकता हुआ मुस्कराता हुआ चल दिया नीचे  आनंद की बारिश में भीगने।

उस दिन बच्चे अपनी ही धुन में थे ,किसी को उसकी तरफ देखने की फुरसत ही नहीं थी।
मटकू कुछ देर तो इंतजार करता रहा शायद कोई उससे बोले। जब कोई नहीं बोला तो उसी ने पूछ लिया-
-यह काटा -काटी क्या कर रहे हो ?
-अरे तुम्हें यह भी नहीं मालूम –! नया साल आने वाला है। हमें नए -नए कपडे पहनने हैं, घर सजाना है, चाकलेट खानी है , .गुब्बारे भी फोड़ने हैं।  उफ!बहुत सारे काम करने हैं ।
-मुझे भी कोई काम बता दो,मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ !
-हाँ हाँ क्यों नहीं! उपहारों के पैकिट पर लाल -पीले रिबिन बाँध दो।
तभी उसकी निगाह सलोनी पर पड़ी जो पेड़ के नीचे घुटनों के बीच  अपना सिर टिकाए बैठी थी।
-’सारी धरती खुशी से नाच रही है। ऐसे समय सलोनी को क्या हो गया है !इसे भी बुला लूँ  जरा
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सलोनी ओ सलोनी

कोई जबाब न आने पर वह उसके पास उड़ चला और प्यार से उसका सिर ऊपर किया । मटकू को देख तो उसकी आँखों से झर झर आँसू बहने लगे।
-यह क्या!तुम रो रही हो?
हाँ मटकू !
-मगर क्यों ?
-मनु मेरा छोटा भाई है। भाई होते हुए भी उसने मेरी गुड़िया तोड़ मरोड़ दी । अब मैं किसके साथ खेलूंगी?
-क्या तुमने अपनी मम्मी से अपने शैतान भाई की शिकायत की?
हाँ ,जब मैंने  अपनी घायल गुड़िया को दिखाया तो उन्होंने भाई  को डांटा भी नहीं। उल्टे मुझे कहने लगीं पागलों की तरह क्यों रोंती है।दूसरी गुड़िया ला देंगे।
मटकू वे मेरा दर्द नहीं समझतीं। मैं उस गुड़िया के साथ बहुत दिनों से रहती हूँ। उसके बिना मैं बहुत दुखी हूँ । मुझे उदास देखकर माँ भी मुझपर हंसती हैं और भाई अंगूठा दिखा -दिखाकर मुझे चिढ़ाता है ।
मटकू सलोनी का आंसुओं से भरा चेहरा अपने रुई से मुलायम हाथों में लेकर बोला -
-सलोनी बहन ,अपने लिए इतना मत रोओ वरना दूसरे तो हँसेंगे ही।
तुम भी तो रोते हो। कभी धीरे -धीरे ,कभी जोर से । लेकिन तुम पर कोई नहीं हँसता। यह तुमने कैसे जाना ?
-जब रिमझिम बरसात होती है तो मैं समझ जाती हूँ तुम धीरे से रो रहे हो । जब मूसलाधार पानी बरसता है तो तुम जोर से रो देते हो।परन्तु तुम्हारे आंसुओं की धार में नहाकर कोई खुश होता है तो कोई तुम्हारी तारीफ करता है। सलोनी ने अपने दिल की बात कह दी ।

-तुम्हारा कहना एकदम ठीक है।परन्तु तुम्हारे और मेरे रोने में एक अन्तर है। तुम अपने लिये रोती हो, मैं दूसरों के लिये रोता हूँ। तुम अपनी भलाई की बात सोचती हो ,मैं दूसरों के हित को ध्यान में रखता हूँ।

-तुम किस तरह से दूसरों का भला करते हो?

मेरे पानी बरसाने से सूखे पेड़ -पौधे ,हरे- भरे हो जाते हैं। खेतों में पानी पड़ने से फसल लहलहाने लगती है जिसे देख किसान झूम उठता है । नदी ,तालाब में जल भरने से पशु पक्षी उसे पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं ।मोर तो पंख फैलाकर एक बार नाचना शुरू करता है तो नृत्य करता ही रहता है। मैं इन सबको प्रसन्न करने के लिये ही तो आंसू बहाता हूँ।

इससे तुम्हें क्या मिलाता है?’
दूसरों को खुश होता देख मैं भी बहुत खुश होता हूँ । 
- मटकू तुम तो दूसरों का बहुत ध्यान रखते हो । मैं तो अपने खिलौने किसी को नहीं छूने देती । कभी कभी तो भइया की गेंद भी छीन लेती हूँ ।
-यह तो अच्छे बच्चों की पहचान नहीं है।
-मटकू,नए साल में मेरा तुमसे वायदा रहा मैं भी ऐसे काम करूंगी जिससे दूसरों को सुख मिले ।

सलोनी की बातें सुनकर बादल मुस्करा दिया और बोला-मेरी अच्छी बहना, चलो मेरे साथ जरा उपहार लाल-पीले रिबिन से सजा दो।
-उपहार के पैकिट तो बहुत छोटे हैं ।बड़े -बड़े होते तो कितना अच्छा होता।
- कोई उपहार छोटा या बड़ा नहीं होता यह तो प्यार की निशानी है। जिसे उपहार दिया जाता है इसका मतलब तुम उसे प्यार करते हो ।
-तब तो मुझे तुमको भी उपहार देना चाहिए ।तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।
-मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार यही है कि हमेशा खिलखिलाती रहो और अपने भाई से ,अपने दोस्तों से मिलजुलकर रहो।

अच्छा साथियों अब मैं चला । हवा में हाथ हिलाता हुआ मटकू जल्दी ही बच्चों की आँखों से ओझल होने लगा।
बच्चे भी एक साथ चिल्लाये

मटकू धीरे-धीरे जाना
जल्दी-जल्दी आना
हमें   न   भुलाना 
नया साल मुबारक 
  हो---------------। 

- सुधा भार्गव