प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

नाग देवता


सावन का महीना और नागदेव पूजा 





आह !सावन का महीना शुरू हो गया है । रिमझिम बरसते पानी में भींगना ,तेज बारिश में






 छपछप करते कागज की नाव तैराना बच्चों तुम्हें तो बहुत अच्छा लगता होगा ।  हरियाली तीज पर रंगबिरंगे कपड़े पहन कर बहन जब झूला झूलेगी तो तुम जरूर उसे झोटा देना  





 


याद आया इस  महीने राखी का त्यौहार भी तो पड़ेगा जब  

बहन की प्यारी सी  राखी तुम्हारी 


कलाई पर होने से वह  भरी –भरी लगेगी, और तुम------

इतराते-इठलाते  सबको दिखाते घूमोगे । अपनी गुल्लक तैयार रखना ।


तुम्हें  यह जानकार ताज्जुब होगा कि हमारे देश में नागों की भी पूजा होती है ।  इसी महीने नाग पंचमी पर सर्प देवता की पूजा होगी ।जगह जगह सँपेरे घूमते नजर आएंगे ताकि महिलाओं को उनके दर्शन हो सकें। 




घर में भी  नाग का चित्र बनाते हैं और  दूध और आटे से  पूजते हैं|  

   


विश्वास किया जाता है कि इस दिन सर्पों को  पूजने से वे खुश रहते हैं और कोई नुकसान नहीं पहुँचाते पर सच बात तो यह हैं कि जीवों की रक्षा करना ,उनका महत्व समझना हमारी प्राचीन परंपरा है और  लुप्त होती इन परम्पराओं को हमें जीवित रखना है । 

मैं तुम्हें नाग की ही कहानी सुनाती हूँ । नाम है---



नाग देवता /
 सुधा भार्गव 

नन्हीं सी एक चिड़िया थी । नाम था उसका -सुनहरी ।सूरज की किरणें जब उस पर पड़तीं , पंख उसके सोने की तरह चमकने लगते ।





वह जामुन के पेड़ पर रहती थी। जब कोई उसके पास से गुजरता , वह  खुशी से नाच उठती ,चीं-चीं करके डाल -डाल फुदकती।कोई बच्चा आराम करने के लिए जामुन के पेड़ के नीचे रुक जाता   तो चिड़िया कुतर -कुतर कर जामुन  उसकी  जेबों में भर देती  ।बच्चा गूदा-गूदा खाता ,गुठली फ़ेंक देता । इतने में चिड़िया दूसरी  जामुन टपका देती ---बच्चा उछल कर उसे लपक लेता । चिड़िया उसकी कलाबाजी को देख झूम उठती।ऐसा लगता - पेड़ चारों तरफ से आनंद की लहरों से घिरा हुआ है 
  

पेड़ से कुछ ही दूरी पर सांप की एक बाँबी थी। वह उसमें रहता और  अक्सर चिड़िया को देखा करता ।सोचता --यह न जाने क्यों इतनी खुश रहती है।



एक
दिन वह चिड़िया से बोला ---सुनहरी ,
तुम हमेशा हँस -हँस कर गाती रहती हो ,मुझे तो मुस्कराना तक नहीं आता  । तुम्हारा स्वर सुनकर हर कोई गर्दन उठाकर ऊपर ताकने लगता है ---मुझे ----मुझे तो  देखते ही बच्चे -बूढ़े डरकर भागने लगते हैं |

--
मुझे दूसरों की संगति में ऐसा लगता है मानो आकाश के सितारे नीचे उतर कर झिलमिला रहे हों  । मगर तुम --तुम तो उनपर फुफकारते हो या उन्हें डस लेते  हो ।तभी तो तुम्हें देख ते ही सब डर जाते हैं । तुम्हारा यों गुस्सा करना -----क्या ठीक है --?सुनहरी बोली |


-
यह सोचना मेरे साथ अन्याय करना है । मैंने जो माँ -बाप से सीखा वही तो करता हूं।दूसरों को डराने से मेरा  मन  भी बहल जाता है।


-
वाह भाई ! वाह ! तुम्हारा तो मन बहल गया और दूसरे की जान  पर बन  आई । तुम स्वार्थी ----केवल अपने ही बारे में सोचते हो । अपने स्वभाव में बदलाब लाओ । वरना --- खतरनाक समझकर मौका पाते ही  तुम्हें---- लोग पत्थरों से कुचल देंगे ।



नाग तो उसकी बातों से घबरा गया । पर उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि  अपनी आदतें कैसे सुधारे !
वह सुनहरी के सामने दिल खोल बैठा ।

-
दीदी अब तुम्हीं बताओ -- फुफकारना कैसे छोडू । बचपन  में जो आदतें बन जाती हैं वे आसानी से जाती नहीं ---चाहे वे अच्छी हों या बुरी। कसूर न होते हुए भी मैं सजा भुगत रहा हूं ।सब मुझसे नफरत करते हैं ,दूर रहते हैं।


-
अच्छा एक काम करो --कल से तुम अँधेरा होते ही मेरे गीत सुनने के लिए आना लेकिन उजाले में नहीं  । दिनभर तो लोगों का आना -जाना लगा रहता है । तुम्हें देखकर बेकार परेशान हो उठेंगे ।


चिड़िया की बात सुनकर नाग का चेहरा उतर गया ।



 दुखी मन से अपनी बाँबी में जाकर सो गया। 


दूसरे दिन से वह रोज शाम को रेंगता हुआ आता --पेड़ के नीचे मग्न होकर चिड़िया का मधुर गीत सुनता | उसकी मिठास उसके तन-मन में ऐसी  समाई कि वह फुफकारना भूल गया ।


एक रात सुनहरी गाती रही ---नाग सुनता रहा । न वह सोई न वह सोया । सवेरा हो गया --लोगों ने देखा ,एक  नाग आँख बंद किये ध्यान मग्न है  । बस फिर क्या था उसे नाग देवता समझकर सब प्रणाम करने लगे  । कभी दूध और फूल चढ़ाते तो कभी खुशबू वाली माला पहनाते । 







 बच्चे-बच्चे को  भरोसा हो गया कि सांप उनका कोई नुकसान नहीं करेगा ।

चिड़िया की अच्छी संगति  में रहकर सांप ने  अपने बुरे स्वभाव से हमेशा को छुटकारा पा लिया  । अब वह दुष्ट नाग से नाग देवता  बन  गया था ।

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क्या तुम जानते हो ?


सारे साँप जहरीले नहीं होते। 

 ये हमारे बड़े काम के हैं । किसान के तो एक तरह से मित्र हैं । उसकी खेती को नुकसान पहुँचने वाले कीड़े –मकोड़ों और चूहों को देखते ही यह सफाचट कर जाता है ।

 इससे बहुत सी दवाएं बनती है जो हमें मरने से बचाती हैं । 
याद आया इसकी खाल से जूते ,चप्पल और तुम्हारी मम्मी के लिए पर्स भी बनते हैं जो बहुत कीमती होते हैं । 










 यदि साँप नहीं होंगे तो तुम उनका तमाशा कैसे देखोगे ?






अब तो तुम मान ही गए होगे कि साँपों को बिना सोचे समझे 
नहीं मारना चाहिए ।ईशवर ने किसी भी जीव को बेकार नहीं बनाया है 

* * * * *

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

डॉल्फ़िन दुनिया के कहानी किस्से


च्चों 
छुट्टी का मौसम तो चला गया और पढ़ने का मौसम आ गया है ।  पर इन छुट्टियों में जरूर कोई दादी -नानी से मिलने गया होगा  तो कोई सिगापुर ,बैकांक व पटाया। वहाँ   डॉल्फ़िन शो भी  देखे होंगे और लगता होगा  -बार -बार देखूँ ।  डॉल्फ़िन के  चेहरे पर फैली मुस्कान ने तो तुम्हारा  दिल जीत लिया होगा । बड़े ही खिलन्दड़ी स्वभाव की होती है।  तुम्हारे वहाँ पहुँचते  ही  झुकझुककर दर्शकों की तरफ मुड़ जाती होगी  मानो अभिवादन कर रही हो।  उस की चंचलता को देख अजीब स्फूर्ति का अनुभव  होने लगता  है --ठीक कह रही हूँ न !

एक बार मैं भी सिंगापुर गई थी । तुम जैसे बच्चों में तो  उस खूबसूरत मछली को पकड़ने की होड लगी थी। इतने में एक बच्चे की गेंद पानी में गिर पड़ी ,एक डॉल्फ़िन  ने तेजी से तैरकर उसे पकड़ा 




और ट्रेनर को लाकर दे दिया । दूर दूर तक तालियों की गूंज सुनाई देने लगी । 

 मैं बार -बार डॉल्फ़िन को मछली कह रही हूँ पर तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि समुद्र में रहते हुए भी यह मछली नहीं है। यह स्तनपायी जीव है । यह अंडे नहीं देती  बल्कि बच्चे पैदा कर उन्हें दूध पिलाकर  पालती है ।ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी मम्मी तुम्हारा ध्यान रखती हैं ।   सांस भी वह गिल से नहीं , फेफड़ों  से लेती है।  इसी कारण उसे हवा लेने के लिए पानी की सतह पर घड़ी -घड़ी  जाना पड़ता है । 
जिन्होंने डॉल्फ़िन नहीं  देखी  कोई बात नहीं । मैं जो कहानी कहने जा रही हूँ उसमें तुम्हारी रोली -पोली डॉल्फ़िन बहनों   से मुलाक़ात हो ही जाएगी ।

तो सुनो कहानी

रोली पोली हमजोली / सुधा भार्गव 

दो डॉल्फ़िन मछलियाँ थी । उन बहनों का  नाम था रोली -पोली । उन्हें समुद्र में दौड़ लगाना बड़ा अच्छा लगता ।





 एक दूसरे को पटकी खिलातीं और अकसर कमर पर चढ़कर खेल -खेल में एक दूसरे को डुबोने की कोशिश करतीं ।किनारे पर खड़े बड़े - बच्चे उनकी उछलकूद देख खुश हो तालियाँ बजाते ।पोली उनसे मिलने जरूर जाती । उसे बच्चों से प्यार भी बहुत  था 




उस दिन रोली ने कुछ ज्यादा ही मछलियाँ निगल लीं । पेट फूलकर कुप्पा हो गया ।
-चलो ,समुद्र के किनारे -किनारे भागमभाग करते हैं ,मेरा खाना हजम भी हो जाएगा । रोली बोली ।
-तुमने तो मेरे मुंह की बात ही छीन ली । पोली उत्साह से भर उठी ।
आगे रोली पीछे पोली --लगा इनाम पाने की आशा में एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहती हैं ।



किनारे पर खड़े बच्चे तो नहाना ही भूल गए और लगे चिल्लाने --भागो ---भागो --पहली मछली जीतेगी --कुछ चिल्लाये --जीतेगी भई जीतेगी दूसरी मछली जीतेगी । बच्चों का शोर सुनकर वे कुछ ज्यादा ही जोश में आ गईं और दुगुन वेग से डुबकियाँ लगाकर  कलाबाजियाँ दिखाने लगीं । आखिर थक कर किनारे  आ लगीं ।


रोली -पोली को किनारे पर देख बच्चे सहम कर पीछे हट गए पर कुक्की-चुक्की दो बहनों ने आगे बढ़कर प्यार से उनके ऊपर हाथ फेरा । मछलियाँ समझ गईं  -उनको शाबासी दी जा रही है । वे झूम झूमकर उनकी अंगुलियाँ चूमने लगीं ।

चंचल कुक्की रोली -पोली से खेलने के लिए पानी में उतर गई । चुक्की भी उसके पीछे हो ली ।
-तुम हमारी दोस्त बन जाओ और हमें अपनी तरह तैरना सीखा दो । कुक्की बोली ।

-चलो, पहले हम अपनी दुनिया की तुम्हें सैर कराते हैं । दोनों मछलियाँ बोली । 



-अब यहाँ से हमारा  आगे बढ़ना ठीक नहीं । कभी भी शार्क मछली आ सकती है । उफ !बड़ी भयानक होती है !पोली बोली ।

-ओह ,इनको डराओ मत ।हमारे होते हुए शार्क इनके पास  फटक भी नहीं सकती । यदि उसने हमारे पास आने की कोशिश की भी तो हम ज़ोर से सीटी मारकर पहरेदार और गोताखोर को सतर्क कर देंगे । फिर तो वह दुम दबा कर भाग जाएगी ।

इतने में रोली को कुछ दूरी पर शार्क मछली आती दिखाई दी ।
 वह चिल्लाई -पोली ,देखो--देखो शार्क !तुम जल्दी से एक लड़की के आगे खड़ी हो जाओ और मैं दूसरी का ध्यान रखती हूँ । दुश्मन को 

कमजोर नहीं समझना चाहिए । यह करीब दस फुट लंबी होगी । तेजी से पानी काटती अगर हमारी तरफ आ गई तो एक बार में ही हमें निगल जाएगी ।हम लड़कियों के आगे का घेरा मजबूत कर देंगे और जरूरत होने पर दूसरे साथियो को बुला लेंगे 


-मेरे तो हाथ -पाँव फूल रहे हैं । रोली घबराई ।
-डरने से क्या काम चलेगा । हमें ऐसे खतरों से खेलने की आदत डाल लेनी चाहिए ।
शार्क मछली ने तिरछी नजर से देखा -  डॉल्फ़िन बड़े जोश से उछल रही हैं  और वे भयानक से भयानक जलचर का सामना बड़ी बहादुरी से करने  को तैयार हैं ।
 उसने चुपचाप वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी ।


शार्क को भागता देख मछलियाँ हर्षित हो उठीं --हम जीत गए ---हम जीत गए । कुक्की -चुक्की अवाक !
-ऐसा क्या  हो गया जो तुम इतना मटक रही हो?हमें भी तो बताओ ।

-तुम्हें बचाते हुए हमने अभी -अभी एक शार्क मछली को भगाया है । जहां एक ओर समुद्री दुनिया आश्चर्यों से भरी पड़ी है तो दूसरी ओर खतरे  ही खतरे हैं । आगे से इस तरह अकेले समुद्र में नहीं उतर पड़ना । उतरने वाले को कुशल तैराक भी होना चाहिए और बहादुर भी  । पोली ने समझाते हुए कहा ।

-तुम जैसे बचाने वाले दोस्त मिल जाएँ तो फिर कैसी चिंता ?कुक्की ने कहा ।
-तुमने हमें मित्र माना तो मित्रों की बात  सुननी ही पड़ेगी । अब तुम समुद्र से निकलो । तुम्हारे मम्मी -पापा चिंता करते होंगे ।

-ठीक है नए दोस्तों !फिर हम चलते हैं ।



-नए दोस्त  नहीं ,हमें सच्चे दोस्त कहो ।
 रोली  ने अपनी पूंछ हिलाई ।

-ठीक कहा -तुम सच्चे दोस्त ही हो ।
सच्चे दोस्तों --टा--टा--बाई --बाई ,फिर मिलेंगे ।



 जानने योग्य बातें 

क्या तुम राष्ट्रीय जलजीव को जानते हो ?

-समुद्री डॉल्फ़िन के अलावा नदी में रहने  वाली डॉल्फ़िन भी होती है।  समुद्री डॉल्फ़िन देख सकती है और उसकी पीठ पर बड़े पंख होते है। गंगा नदी में रहने वाली गांगेय डॉल्फ़िन देख नहीं सकती। इसे सोंस कहते हैं । यही हमारा राष्ट्रीय जलजीव है 
   
- बुलंदशहर ।अनूपशहर ,नरौरा स्थित उत्तर प्रदेश के वेटलैंड (रामसर साइट )में जलीय जीव का खजाना है । यहाँ बहती गंगा  में और बिहार में सब से ज्यादा डॉल्फ़िन हैं । 





-गांगेय डाल्फिन का गंगा में होना उतना ही जरूरी है जितना बाघ का जंगल में ।

- गंगा को स्वच्छ रखने के लिए प्रकृति का अपना इंतजाम था ।  कहा जाता है कि जब गंगा शिवजी  की जटाओं  से बाहर  निकली तो सबसे  पहले एक जीव बाहर आया जिसे गंगेटिक डॉल्फ़िन कहा जाता है । उसने जटाओं  में जितने  जीव फंस गए थे या मर गए थे उन सबको खाकर उन्हें साफ कर दिया।  आज यही डॉल्फ़िन गंगा के पानी को सड्ने से बचाता है। लेकिन   मछुआरे इसको  अपने स्वार्थ  के लिए मार रहे  हैं और पैसा कमा रहे हैं ।  इससे निकाला तेल और  मांस से बनी दवाओं की बहुत मांग है।  इसी कारण इनकी संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है ।







-  राष्ट्रीय जल जीव को हमें बचाना है । 
     
* * * * * 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

एक-दूसरे को ठीक से समझने मेँ ही बुद्धिमानी है तभी शांति और एकता का बीज पैदा होता है ।

बुद्धिमानों की दुनिया





हम जब भी कांव-कांव की आवाज सुनते है ,हमारे कान  फटने लगते है और कौए को दुतकारते हुये कहते हैं ---अरे भाग यहाँ से --न जाने कहाँ से आगया । चिड़ियों के लिए रोटी डालते हैं और आ गया भूले भटके से  कागा तो कर देते हैं उसकी इज्जत के टुकड़े -टुकड़े --खा गया शैतान । 

पर बच्चों यह ठीक नहीं ।यह न सोचो कि हमारे ही दिमाग होता है । कौवे भी  बड़े बुद्धिमान होते हैं । मैंने खुद अपनी बालकनी में खड़े होकर उन्हें  बड़ी होशियारी से कोयल के बच्चे को बचाते  देखा है  । कैसे ?उसी को कहानी के रूप में लिख डाला है । इसे पढ़कर तुम भी उनकी चतुरता का लोहा मानने लगोगे । 

अब सुनो कहानी 



एक कोयल थी । वह बड़ी आलसी थी । उसने  कोई घोंसला नहीं बना रखा था ,बस डाल-डाल फुदकती और मीठा गाना गाती ।



एक बार उसने अंडे दिये ।
-अब इन अंडों को कहाँ रखूँ ,कैसे देखभाल करूं । इनके रहने के लिए तो मैंने कोई घर भी नहीं बनाया । सोच –सोचकर नन्ही कोयल परेशान हो गई ।

तभी उसे ध्यान आया –मेरे और कौए भाई के अंडे मिलते जुलते हैं ,क्यों  न उसके घोंसले में अपने अंडे रख आऊँ । वह तो पहचान भी नहीं पायेगा । पहचान भी गया तो उन्हें मारने से रहा । बड़े नरम दिल का सीधा -सादा है ,बस उसकी बोली ही  कड़वी है ।

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एक शाम को कोयल अपने अंडे कौवे के घोंसले में रख आई । उस समय कौवा –कौवी दाना चुगने गए थे । कौवे के घोंसले में जाते  समय कोई पक्षी उसे पहचान भी नहीं पाया क्योंकि कोयल भी काली और कौवा भी काला ।

कुछ दिनों के बाद अंडों में से छोटे से कोमल से प्यारे से बच्चे निकल आए ।
-अरे इनमें दो तो कोयल के बच्चे हैं । कौवी आश्चर्य में पड़ गई ।
-कोई बात नहीं । हम अपने बच्चों की देखभाल तो करेंगे ही ,साथ में ये भी पल जाएँगे ।कितनी प्यारी बोली में दोनों चहक रहे हैं । बिलकुल अपनी माँ पर गए है ।कौवा बोला ।

  
    
एक शाम कौवा –कौवी बच्चों के लिए दाना लेकर लौटे तो देखा –कोयल का बच्चा पेड़ के नीचे गिरा पड़ा है ।एक दुष्ट काली  बिल्ली थोड़ी दूर पर बैठी इस ताक में है कि मौका मिले तो बच्चे को खा जाऊं। 


नाजुक सा बच्चा डरा सा --सहमा सा चीं-चीं करता अपने प्राणों की भीख मांग रहा है।   

कौवे ने उसे भगाने के लिए चिल्लाना शुरू किया –कांव –कांव,कांव -कांव  ।लेकिन बिल्ली पर इसका कोई असर न हुआ । वह यह सोचकर आगे बढ्ने लगी –एक कौवा मेरा क्या बिगाड़ लेगा । जितनी देर में वह नीचे आयेगा उससे पहले ही मैं  इस बच्चे को निगल जाऊँगी। 


इस बार कौवा –कौवी मिलकर कांव –कांव करने लगे पर बिल्ली  आगे बढ़ती ही गई । अब तो कौवा –कौवी ने कांव –कांव करके आसमान सिर पर उठा लिया ।
 चारों तरफ से कौवे उड़ –उड़ कर आने लगे ।




कुछ पेड़ पर बैठ गए ,कुछ पेड़ के नीचे । जब कौवों ने देखा –बिल्ली रुकने का नाम ही नहीं ले रही है ,पेड़ के कौवे भी छ्पाक –छपाक नीचे उतर आए 
और सबने मिलकर कोयल के बच्चे के चारों तरफ एक घेरा बना लिया ।  


 सबकी चोंचे बिल्ली की ओर बन्दूक की तरह निशाना साधे तनी हुई थीं –जो कह रही थी –एक कदम भी आगे बढ़ाया तो चोंचों से तुम्हारा शरीर गोद गोदकर छलनी कर दिया जाएगा । यह नजारा देख बिल्ली ऐसी डर कर भागी कि जंगल से बाहर  जाकर ही दम लिया ।


कौवों की खुशी का ठिकाना न था । वे फुदकते हुये चोंच भिड़ाने लगे मानो कह रहे हों –दोस्त हम इसी तरह से मिलकर बुद्धिमानी से  मुसीबत भगाते रहेंगे । देखते ही देखते वे पंख फैलाकर नीले आकाश में उड़ गए ।





कौवा –कौवी  तो उनका किया उपकार भूल ही नहीं सकते थे--- धन्यवाद देते हुये अपने साथियों को टकटकी लगाए  देखते रहे जब तक वे आँखों  से ओझल न हो गए । 



(चित्र -गूगल से साभार )
प्रकाशित -दक्षिण भारत राष्ट्रमत हिन्दी दैनिक अखबार बैंगलोर- 8 .12. 2013 

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

बालकहानी


भोली मुनिया   





नीले
 आकाश में बादल घिर आए । देखते ही देखते वे बरसने भी लगे । ठंडी -ठंडी फुआरों से सारी गरमी शांत हो गयी । हवा के शीतल झोकों से फूलों की डालियाँ हिलने लगीं । कलियाँ पत्तों से झांकने लगीं । फूल हंसने लगे । लेकिन उस बाग़ के एक कोने में मुनिया खड़ी - सुबक रही थी ।





बादल भाई वहां से गुजरे तो सहम गये. सोचने लगे -'सारी धरती खुशी से नाच रही है । ऐसे समय मुनिया को क्या हो गया है !क्या मुझसे कोई गलती हो गयी । '
'मुनिया --मुनिया क्या तुम रो रही हो ?'
'हाँ ,बादल भाई । '

'मगर क्यों ?'
           'मनु मेरा छोटा भाई है । उसने मेरी गुड़िया तोड़ मरोड़ दी है । अब मैं किसके साथ खेलूंगी । '



'क्या तुमने अपनी मम्मी से शिकायत की ?'
'हाँ ,जब मैंने उन्हें अपनी घायल गुड़िया को दिखाया तो मनु को डांटा भी नहीं । कहने लगीं --पागलों की तरह क्यों रोंती हो !दूसरी गुड़िया ला देंगे । मैं उस गुड़िया के सा
थ बहुत दिनों से रहती हूँ । उसके बिना मैं बहुत दुखी हो जाऊँगी मुझे उदास देखकर माँ भी मुझपर हंसती हैं और भाई अंगूठा दिखा -दिखाकर मुझे चिढ़ाता है । '

बादल भाई नीचे उतरे और मुनिया का आंसुओं से भरा चेहरा अपने रुई से मुलायम हाथों में लेकर बोले -

'मुनिया बहन ,अपने लिए इतना मत रोओं वरना दूसरे तो हँसेंगे ही । '
'तुम भी तो रोते हो । कभी धीरे -धीरे ,कभी जोर से । लेकिन तुम पर कोई नहीं हँसता । 'मुनिया ने कहा '।
'यह तुमने कैसे जाना ?।
'जब रिमझिम बरसात होती है तो मैं समझ जाती हूँ तुम धीरे से रो रहे हो । जब
 मूसलाधार पानी बरसता है तो तुम जोर से रो देते हो । परन्तु तुम्हारे आंसुओं की धार में नहाकर कोई खुश होता है तो कोई तुम्हारी तारीफ करता है । मुनिया ने अपने दिल की बात कह दी ।

'तुम्हारा कह
ना एकदम ठीक है । परन्तु तुम्हारे और मेरे रोने में एक अन्तर है। तुम अपने लिये रोती हो मैं दूसरों के लिये रोता हूँ । तुम अपनी भलाई की बात सोचती हो मैं दूसरों के हित को ध्यान में रखता हूँ।

'तुम किस तरह से दूसरों का भला करते हो ?'मुनिया ने पूछा ।
'मेरे पानी बरसाने से सूखे पेड़ -पौधे हरे- भरे हो जाते हैं । खेतों में पानी पड़ने से फसल लहलहाने लगती है जिसे 
देख किसान झूम उठता है । नदी ,तालाब में जल भरने से पशु पक्षी उसे पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं मोर तो पंख फैलाकर एक बा
र नाचना शुरू करता है तो नृत्य करता ही रहता है । मैं इन सबको प्रसन्न करने के लिये ही तो आंसू बहाता हूँ। ' 

'इससे तुम्हें क्या मिलता है?'भोली मुनिया ने पूछा ।
'दूसरों को खुश होता देख मैं भी बहुत खुश होता हूँ । '

'बादल भाई तुम तो दूसरों का बहुत ध्यान रखते हो । मैं तो अपने खिलौने किसी को नहीं छूने देती । कभी कभी तो भइया की गेंद भी छीन लेती हूँ । '
'यह तो अच्छे बच्चों की पहचान नहीं है । 'बादल ने कहा ।
बादल भाई अब मैं भी ऐसे काम करूंगी जिससे दूसरों को सुख मिले । '

मुनिया की बातें सुनकर बादल भाई मुस्करा दिए । बादल के चेहरे पर गुलाब खिले देख मुनिया भी हँस दी । अब वह जल्दी से उड़ चला । मुनिया खड़ी-खड़ी देखती रही जब तक वह उसकी आंखों से ओझल न हो गया ।

शबरी शिक्षा समाचार पत्रिका  के फरवरी २० १३ अंक में प्रकाशित 

* * *