प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

रविवार, 12 जून 2016

बालकहानी -देवपुत्र अंक जून २०१६ में प्रकाशित

दादी क़ा पीपा

वात्सल्य की मिठास उड़ेलती हुई मनोरंजन से भरपूर बालकहानी


 

छंदालाल और बिंदामल  की दोस्ती बचपन से ही चली आ रही थी। दोनों ने ही फौज में भर्ती होने की ठान ली तो ठान ली। दोनों की माँ लाख गिड्गिड़ईं,बाप ने लाल पीली आँखें दिखाईं पर फौजी बन कर ही रहे।  रिटायर हुए तो साथ साथ  पर उसके बाद छंदालाल  शहर में बस गया और बिंदामल अपनी माँ के साथ गाँव में रहने लगा।
   बिंदा ने शादी नहीं की थी लेकिन बच्चों में उसकी जान बसती थी। इसलिए बीच-बीच में अपने दोस्त से मिलने शहर आता और उसके बच्चों पर छप्पर फाड़ ढेर सा प्यार बरसा के लौट जाता।
   एक बार छंदा के घर आते समय बिंदा माँ को भी साथ ले गया। माँ ने कभी गाँव से बाहर पैर रखा नहीं था  फिर शहरी हवा से मुलाक़ात कैसे होती!
   गर्मी के दिन थे। दो मंज़िला सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते बूढ़ी माँ पसीने से लथपथ हो गई। दरवाजे पर ही छ्ंदा की पत्नी ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया और ड्राइंग रूम में बैठाया। एक मिनट उन्होंने इधर उधर नजर दौड़ाई फिर खुश होते हुए बोलीं-बहू ,यह तूने अच्छा किया ,मुझे बरफखाने में बैठा दिया। मेरी तो सारी  थकान ही मिट गई।
-माँ जी यहाँ कमरे को ठंडा करने वाली मशीन मतलब  . सी. चल रहा है।
-अरे बहू ,मैं क्या जानूँ अई. सी. वै. सी. मैं जब बहुत छोटी थी अपने बापू के साथ बरफखाने गई। वहाँ तो घुसते ही बड़ी ठंड लगने लगी।चारों तरफ बरफ की सिल्लियाँ ही सिल्लियाँ पड़ी थीं। उससे यह तेरा बरफखाना अच्छा है। एक बात बता,तूने बरफ कहाँ रख छोड़ी है?
-दादी माँ,वह तो पिघल गई और उसका पानी नाली से बाहर बह गया।नटखट नयन हाथ नचाते हुए बोला।
सबने चुप रहने में ही भलाई समझी क्योंकि दादी ने उसकी बात पर विश्वास कर लिया था।
नयन  की बड़ी बहन परी पानी के 3 गिलास एक ट्रे में रखकर लाई। दादी ने गटागट तीनों गिलास खाली कर दिए और बोलीं पानी तो बड़ा मीठा और ठंडा हैं। लल्ली,एक गिलास पानी और ला,नियत न भरी।
बहन ने जैसे ही फ्रिज खोला,उसकी तरफ इशारा करते हुए दादी ने पूछा-बेटी,यह क्या है?
-पानी ठंडा करने की मशीन हैं. इसे हम रेफ्रीज़रेटर कहते हैं।
- बड़ा लंबा- चौड़ा नाम है इस का तो। मुझसे तो बोला भी न जाए।  
थोड़ी देर में सब खाने बैठे। दादी बोलीं-बेटी, गिलास से मेरी ये प्यास न बुझे। मुझे तो उस पीपे से लोटा भर पानी दे दे। वरना बार-बार तुझे पीपा खोलने उठना पड़ेगा।
पहले तो परी पीपा का मतलब समझी नहीं और जब समझी तो हंसी के उड़ते गुब्बारों को पकड़ न सकी।
बड़ों की बात पर इस तरह  हँसना माँ को जंचा नहीं और उन्होंने उसे गुस्से से घूरा। लेकिन हंसने का  रोग तो ऐसा फैला कि नयन  की बत्तीसी भी खिल उठी।
पेटपूजा होते ही सबकी आँखों से मीठी- मीठी नींद झाँकने लगी। दादी माँ तो सोफे पर ही पसर गईं। गुदगुदे डनलप के सोफे पर उन्हें बहुत आनंद आ रहा था।
बोलीं- मैं तो भैया, न बरफखाना छोड़ने वाली और न रेशम से ऐसे बिछौने को। झपकी यहीं ले लेती हूँ। तुम लोग जहां चाहो जाओ।
-माँ जी दूसरे कमरे में भी ए॰ सी॰ है। आप वहाँ आराम से सो जाइए।
-क्या कहा?यहाँ दूसरा भी बरफखाना है। आह क्या मजा! चल बहू,जल्दी बता कमरा । पाँच बजे तक पैर पसारके सोऊँगी। और हाँ,शाम की रोटी मैं बना दूँगी। तू चिंता न करियो। फूल सी बहू इस जानलेवा गर्मी में कैसी झुलस गई है।
80 वर्ष की उम्र में भी इतना उल्लास व फुर्तीलापन देखकर पूरा परिवार चकित था।
चार बजते ही दादी माँ की नींद टूट गई। मिचमिचाती आँखों को खोलते हुए कड़क आवाज में बोलीं-बिटिया, जरा पीपे में से पानी दे जा और हाँ चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा दे। मैं बस अभी आई।
कुछ ही देर में वे रसोई की तरफ बढ़ गईं। गैस के चूल्हे पर पानी उबलने रख  दिया था। उन्होंने वैसा चूल्हा कभी देखा नहीं था। चकित सी गाल पर हाथ रखते हुए बोलीं-अय दइया,यहाँ तो भट्टी में से आग की बड़ी -बड़ी लपटें निकल रही हैं। मिट्टी का चूल्हा तो कहीं नजर नहीं आता।
नयन  की माँ फुर्ती से कमरे से निकल कर आईं। वे डर गई थीं कि दादी बिना सोचे -समझे गैस के चूल्हे की टटोलबाजी न करने लगें।
-माँ जी ,यह गैस का चूल्हा है । इसमें लकड़ी-कोयला जलाने का खटराग नहीं  और सफाई भी रहती है।
-यह तो जादुई चूल्हा है। लगे, मुझे तो बार बार यहाँ आना पड़ेगा।
-बार बार आने-जाने का झंझट क्यों करो माँ ,यही रह जाओ। उनका बेटा बिंदा बोला।  
-मेरे गाँव के घर का क्या होगा?मेरे खेत ,मेरे बैल? न न बेटा ,गाँव तो मेरे खून में रच-बस गया है। वहीं की पैदाइश ,वहीं पली और ब्याही भी गाँव में । छोडने की बात से तो मेरा कलेजा फटने लगे  है। दो दिन को कहीं चले जाओ पर आखिर में तो अपना घर ही प्यारा लगे है।
बिंदा में अब इतना साहस न बचा कि पुन; माँ से शहर में रहने का आग्रह कर सके। एक हफ्ते में ही दादी माँ सबसे बहुत हिलमिल गई।उनके विनोदी स्वभाव से सब उनकी ओर खिचें चले आते थे।
गाँव जाने के एक दिन पहले बड़ी उदास हो गईं।
बिंदा के दोस्त से बोली-बेटा छ्न्दा,सबको लेकर गाँव जरूर आना। तुम्हें कोई परेशानी न होगी। वहाँ भी पीपा और बरफखाना  है।
दादी के इस धमाके से नयन  के कान खड़े हो गए।
-क्या दादी तुम्हारे घर में फ्रिज जैसा पीपा है।
-हाँ हाँमैंने कहाँ न, है। बड़ा गहरा पीपा है । उसका ही हम ठंडा-मीठा पानी हलक से नीचे उतारे हैं।
बिंदा गहरी सोच में पड़ गया कि माँ किस पीपे की बात कर रही है। अचानक उसके मुंह से निकला-माँ ,कुएं की बात कर रही हो?
-हाँ हाँ ।गाँव का कुआँ क्या पीपे से किसी बात में कम है।
 जोरदार हंसी का हुल्लड़ मच उठा।
-इसमें हंसने की ऐसी क्या बात है । वहाँ तो बरफखाना भी है।
-बरफखानासबके मुंह खुले रह गए।
-अचरज कैसा ?घर के आगे चौरस आँगन में नीम का बड़ा सा पेड़ है। उसके तले ऐसी ठंडी दिलखुश हवा के झोंके लगे है कि शहरी बरफखाना तो उसके आगे भूल ही जाओगे।
-दिन तो कट गया पर दादी रात में गर्मी में कैसे सोना होगा? परी ने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
-रात की चिंता न कर बिटिया! कमरे की खिड़कियाँ तो हम सारी रात खुली रखे है।ऐसी ठंडी हवा घुसे है कि चादर ताननी पड़े ।
इस बार चुलबुला नयन सरल हृदया और स्नेही दादी के बरफखाने पर हंस न सका। उसको बूढ़ी दादी में अपनी दादी नजर आने लगी। वह पुलकित हो उनसे  चिपट गया-दादी  कोई न आए ,मैं छुट्टियों में तुम्हारे पास जरूर आऊँगा।
-अरे केवल तेरी दादी हैं क्या?मेरी भी तो दादी हैं। मैं भी आऊँगी दादी और तुम्हारे चूल्हे की रोटी खाऊँगी। परी इठलाती बोली।
--रे छ्ंदा,तू कैसे चुपचाप खड़ा है।भूल गया जब तू छोटा था तो मेरे हाथ का बना सूजी-बेसन का बना हलुआ कितने शौक से खाता था।
-माँजी मुझे अच्छे से याद है। मैं भी आपके हाथ का हलुआ खाने आ रहा हूँ।
-आजा आजा।  कुछ दिनों को बहू भी चूल्हा चक्की से छुट्टी पाएगी।
दादी का चेहरा चमक उठा। वह तो प्यारे प्यारे पोता-पोती को पाकर निहाल हो गई जिनके लिए न जाने कब से तरस रही थी।
अगले दिन सुबह ही दादी अपने बेटे के साथ गाँव चली गईं पर जाते जाते छंदा के परिवार मेँ अपने वात्सल्य की मिठास घोल गईं।


रविवार, 8 मई 2016

उत्सवों का आकाश -5



मातृत्व दिवस -8मई (जननी महोत्सव)



5


बच्चो मुझे कुछ कहना है -

आज 8 मई को मातृत्व दिवस है और रविवार भी। अपनी प्यारी माँ के साथ खूब जोश के साथ जननी महोत्सव को मना रहे होगे।हाँ याद आया---आज तो तुम्हें उनकी सुख -सुविधा का भी बहुत ध्यान रखना हैं। कुछ स्कूलों में तो कल ही यह दिन मना लिया होगा। यह मातृत्व  दिवस केवल भारत में ही नहीं करीब 49 देशों में बड़े ज़ोर -शोर से उत्सव के रूप में मनाया जाता है। 
    
 कुछ लोग कहेंगे  –ऊँह हम यह दिवस क्यों मनाएँ?यह तो हमारी संस्कृति का अंग नहीं। इसमें विदेशी बू आती है। एक बात समझकर चलना है:दूररदर्शन,कम्प्यूटर,लैपटॉप,मोबाइल,आई पेड,आई फोन ,स्मार्ट वाच से दुनिया बहुत छोटी हो गई हैं। घर बैठे ही हम एक दूसरे के बहुत नजदीक आ गए हैं।मेरे-तुम्हारे के बीच लक्ष्मण रेखा नहीं खींची जा सकती। विभिन्न संस्कृतियों का मेल मिलाप और आदान-प्रदान सहज ही हो जाता है। कब और कैसे हुआ इसका पता ही नहीं चलता। इसको रोका नहीं जा सकता। इसलिए दूसरी संस्कृतियों की अच्छी बातें ग्रहण करके अपनी संस्कृति को समृद्ध बनाया जा सकता है। साल में एक बार अन्य दिनों की तुलना में और ज्यादा समय अपनी माँ का ध्यान रखें,उसे याद करें, उसके साथ रहें तो वात्सल्यमयी को खुशी ही होगी।
अब मैं तुम्हें परी माँ के बारे में बताने जा रही हूँ। ओह,बताने से तो तुम्हें फिर इस कहानी को पढ़ने में आनंद ही नहीं आएगा। अच्छा तुम ही पढ़ लो।

परी माँ

-माँ -माँ भूख लगी है।
-अभी तो सात ही बजे है, तुझे इतनी जल्दी भूख लगने लगी। रोज तो आठ बजे दूध पीकर  जाता है। आज तो स्कूल भी देर से  जाना है।
-ओह दीदी !पेट में चूहे कूद रहे हैं तो मैं क्या करूँ!
-कुछ भी कर पर माँ को मत जगा। तुझे तो मालूम है आज मातृत्व  दिवस है,पूरा दिन माँ का दिन। वह कोई घर का काम नहीं करेगी और न रसोई में घुसेगी। जो करेगी अपने लिए करेगी।
-तो फिर मैं खाऊँगा क्या?
-एक दिन देर से खाएगा  तो क्या हो जाएगा। माँ तो हमारे लिए न जाने कितनी घंटे भूखे रह लेती है। हम स्वस्थ रहें इसके लिए भगवान से प्रार्थना करते हुए उपवास करती है।
चकोर खिसिया गया और रोते -रोते अपने पापा से लिपट गया।
-अच्छे बेटे रोते नहीं –चल मैं तुझे दूध देता हूँ। और हाँ रसीली , तुम माँ के लिए कमरे में ही चाय बना कर ले जाओ।ज्यादा आवाज न करना । जरा सी आहट उसके कानों तक गई कि यहाँ आन धमकेगी।
-पापा रोज तो माँ चाय बनाती है और सबके साथ बैठकर पीती है। आज यह नई बात क्यों?
-आज वे काम करने हैं जिससे तुम्हारी माँ को खुशी मिले ,आराम मिले और सबसे बड़ी बात हम चुप- चुप ऐसा करके उनको चकित कर देना चाहते हैं।
-हम भी तो स्कूल में यही करेंगे।ओह मुझे तो स्कूल के लिए भी तैयार होना है। रसीली, माँ से कहना –स्कूल के लिए सुंदर-सुंदर साड़ी  पहने –एकदम परी माँ की तरह।
रसीली ने चाय बनाकर ट्रे में नए कप रखे साथ में अपने हाथ का बना ग्रीटिंग कार्ड।धीरे -धीरे माँ के कमरे की ओर चल दी। दबे पाँव पीछे –पीछे पापा कब हो लिए उसको भनक भी न पड़ी।
-माँ - माँ उठो।
-बारीक सी आवाज सुन माँ ने आँखें खोल दी। रसीली को चाय की ट्रे लिए खड़ा देख आश्चर्य मिश्रित खुशी उसके चेहरे पर छा  गई।
-अरे बेटा तू तो बहुत बड़ी समझदार हो गई है। अच्छा अब ट्रे रख दे । मैं चाय पी लूँगी। अरे यह कार्ड कैसा? जरा पढ़ूँ तो -‘माँ तुम दुनिया की सबसे प्यारी माँ हो। मातृत्व दिवस मुबारक हो।‘ ओह तो यह बात है।
-आज चाय का प्याला अपने हाथों से तुम्हें पकड़ाऊंगी ठीक वैसे ही जैसे तुम , स्कूल जाने से पहले मेरे हाथ में दूध का गिलास थमा देती हो माँ।  
-तेरे पापा कहाँ हैं ?चाय तो हम साथ -साथ पीएंगे।
-रसोई में छोडकर आई हूँ। अभी पुकारती हूँ।
-तेरे पापा तो वो खड़े।
रसीली ने मुड़कर देखा  –दादी की फोटो के आगे वे हाथ जोड़े खड़े हैं। यह देख उसकी मम्मी की आँखें भर आईं।
-अरे माँ आज आँसू बहाने का दिन नहीं है।
-बेटी,ये खुशी के आंसू है। माँ संसार के किसी भी कोने में हो दूर रहकर भी पास रहती है। रात में लगता है तकिये की बजाय उसका हाथ मेरे सिर के नीचे है। दिन में वही हाथ सिर के ऊपर दिखाई देता है मानो उसके असीस की छतरी तनी हो।उसकी याद! उसकी याद तो हमेशा सुखदाई है।
पापा ने बड़ी श्रद्धा से सिर झुकाया मानो साक्षात माँ उनके सामने मंगल कलश लिए खड़ी हों। फिर बोले –जाने से पहले अपनी माँ के लिए साड़ी निकाल देना । आज तो वाकई में वह तुम्हारी परी माँ लगनी चाहिए। उन्होंने कनखियों से अपनी पत्नी को देखा जो मृदुल मुस्कान से खिली हुई थी।
चकोर अपनी परी माँ के साथ स्कूल चल दिया । घर की सारी  ज़िम्मेदारी आज रसीली और उसके पापा ने ओढ़ ली थी।
                                         *
स्कूल रंगबिरंगी झंडियों से सजा हुआ था।  बच्चे अपनी –अपनी माँ के साथ आ रहे थे। हरकोई  उत्साह से भर हुआ था। बच्चे माँ को आदर देकर इस बात का विश्वास दिला देना चाहते  थे कि उनको वे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। माँ देखना चाहती कि बच्चे उनके लिए क्या करते हैं?
 शिक्षिकाओं ने आगे बढ़कर माताओं का स्वागत किया और वे अपने बच्चों के साथ उनकी कक्षाओं में चली गईं। चकोर और उसके दोस्तों ने हाथ का बना ग्रीटिंग कार्ड अपनी अपनी मम्मी को दिया।साथ ही उपहार के छोटे छोटे पैकिट दिए। उत्सुकतावश तभी पैकिट खोल लिए गए। किसी में हेयर पिन निकला तो किसी में पैन। चकोर ने कागज के फूल  बना कर दिए थे।जो सचमुच के लग रहे थे। हर माँ की खुशी की कोई सीमा न थी। कुछ देर बाद उन्हें ओडोटोरियम ले जाया गया।

एक छोटा सा गोलमटोल बच्चा हिलता –डुलता मंच पर आया। वह कक्षा 2 में पढ़ता होगा। अपने हाथ हिला हिलाकर ऊँची आवाज में बोलने लगा-

मेरी माँ –सबसे अच्छी
रोता तो टॉफी देती
गिरता तो गोदी लेती
 हँसता तो झप्पी देती
हहा हा-----------हहा हा। 

उसके उतरते ही एक मिनट का सब्र किए बिना चकोर अपनी मुस्कान बिखेरता हुआ मंच पर दौड़ पड़ा और मटकता हुआ गाने लगा-

मेरी माँ -----सबसे न्यारी
खूब हँसाती हलुआ खिलाती
लोरी गाकर मुझे सुलाती
पापा की  नीली –पीली आँखों से
माँ हरदम मुझे  बचाती।

आखिरी लाइन सुनकर सब हंस पड़े। चकोर की माँ इतना तो समझ गई कि कविता लिखने वाला रसीली के अलावा और कोई नहीं पर चंचल बेटे ने कविता याद कैसे कर ली ---यह उसकी बुद्धि के बाहर था।   

कुछ समय  बाद माइक से आवाज आई-बच्चों की प्यारी न्यारी माताएं  ,
अपने नन्हें मुन्नों को खुश करने के लिए मंच पर आयें और जो उन्हें आता है वह करके दिखाएँ।
हॉल छोटी छोटी हथेलियों से बजाई तालियों से गूंज उठा। नादानों की आंखें कौतूहल वश मंच पर टिकी रह गईं।
चकोर की माँ ने जैसे ही मंच की ओर  बढ़ना शुरू किया उसके बाल हृदय की धड़कने तेज हो गईं। मन ही मन बुदबुदाने लगा –माँ जरूर गाना गाएगी पर उसने तो बहुत दिनों से गाया ही नहीं हैं। जरूर भूल गई होगी।भगवान -- -बचाओ। 

 माँ ने गान से पहले बच्चों को समझाया-
 तुम्हारी तरह कृष्ण भी बचपन में बहुत शैतान थे।  वे अपने सिर की चोटी बड़े भाई बलराम की तरह लंबी चाहते थे। पर यशोदा माँ का कहना था पहले दूध पी तब तेरी चोटी बढ़ेगी। एक दिन नटखट दूधचोर शिकायत भरे स्वर में कहते हैं  -माँ दूध पीते -पीते मुझे बहुत समय हो गया पर चोटी तो छोटी ही है। केवल कच्चा दूध पीने को देती है मक्खन रोटी तो देती नहीं।फिर चोटी  कैसे बढ़े? 
 इसके बाद सुरीली आवाज में गान शुरू हुआ-

मैया ,कबहि बढ़ेगी चोटी
किती बार मोहि दूध पियत भई,यह अजहू है छोटी
काचो दूध पियावति पचि-पचि,देति न माखन रोटी।

 बच्चे गाना सुनकर बहुत खुश हुए । एक को तो कहते सुना –माँ मुझसे बार बार न कहना-दूध पीओ दूध पीओ। उसकी जगह आइसक्रीम कोल्ड ,कॉफी चलेगी। बच्चे के भोलेपन पर आस -पास बैठे लोग हँसे बिना न रहे । किसी माँ ने कहानी सुनाकर तो किसी ने चुटकुला सुनाकर भी बच्चों का मनोरंजन किया।
कार्यक्रम समाप्त होने पर आँखों में अनोखी चमक लिए चकोर अपनी माँ के साथ घर की ओर चल दिया। कविता की पंक्तियाँ याद कर-कर  माँ को चकोर पर बहुत प्यार आ रहा था। 
                                           * 
घर पहुँचकर चकोर अपने को रोक न सका । माँ के गाल की चुम्बी लेते हुए बोला-- माँ,मेरी परी माँ तुमने तो गाना बहुत अच्छा गाया।
-क्या --?गाना गाया !हमने तो कभी सुना नहीं। चकोर के पापा और बहन दोनों ही अचरज से आँखें झपझपाने लगे।
-हाँ तो रसीली , तेरी माँ का गाना -हो जाए शाम को फिर एक बार।  
-शाम की शाम की देखी जाएगी। अभी तो रसोई में जा रही हूँ।
-एकदम नहीं माँ –हमने कहाँ न ,रसोई काम की एकदम छुट्टी ।
-क्या पागलपन लगा रखा है भूख -हड़ताल करनी है क्या रसीली ?
-आज के दिन क्यों मिजाज गरम कर रही हो। कुर्सी पर जरा बैठो तो—। टेबल पर खाना अपने आप पककर,चलकर आ जाएगा।
-आपकी बातें भी दीन-दुनिया से निराली होती हैं।
तभी राधिका ने देखा उसके दोनों बच्चे प्लेटें चम्मच ला रहे हैं। उनके पापा  भी रसोई में जाकर दाल सब्जी के डोंगे लाने उठ गए। वह बैठी -बैठी बड़ी हैरानी से देख रही थी।
सब खाने बैठे तो रसीली पूंछ बैठी -माँ खाना कैसा बना है?
-पहले यह बता खाना किसने बनाया?
-ओह तुम भी कमाल करती हो । आम खाने से मतलब की गुठलियों के दाम गिनने से मतलब।पापा बोले।
-देखो जी ।अच्छे बच्चे अपनी माँ से कुछ नहीं छिपाते।
-कौन,किस्से क्या छिपा रहा है? बच्चों को तो बस तुम्हें आश्चर्य के समुद्र में गोते लगवाने थे।
-ओह, अब आप ही बता दो। आप तो बच्चों के साथ मिलकर बच्चे बन जाते हैं।
-न—न मैं किसी के बीच नहीं पड़ता ।तुम जानो तुम्हारे बच्चे जाने।  
-माँ खाना पंजाबी ढाबे से मंगवाया है जहां हम अकसर  खाने जाते हैं। रसीली ने धीरे से कहा । डर रही थी कि कहीं डांट न पड़ जाय। 

राधिका अपनी बच्ची की मनोदशा ताड़ गई। ममता का आँचल फड़फड़ा उठा- बेटी मुझे तो सपने में भी इस बात का अंदाजा न था कि तुम दोनों भाई-बहन मुझे इतना प्यार करते हो, इतना ख्याल रखते हो। आओ –मेरे पास आओ ।उसकी स्नेहसिक्त बाँहें बेटा-बेटी को अपने घेरे में लेने को मचल उठीं।   



मंगलवार, 3 मई 2016

शिक्षण काल का मेरा एक अनुभव


अजीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी द्वारा निकलने वाली हिन्दी त्रैमासिक
 पत्रिका खोजें और जानें  में प्रकाशित  /सुधा भार्गव

सिरदर्द


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वह कक्षा २ का छात्र था | गोरा -गोरा ,दुबला -दुबला ,झेंपा सा |देर से बोलना सीखा इसलिए कविता बोलते -बोलते रुक गया तो रुक गयाI दुबारा शब्द  का उच्चारण करने  में लगता जैसे पत्थर  घसीटना पड़ रहा हो उसके इस हाल पर साथी हँस पड़तेI मैडम गुस्से से चिल्लाती --बैठ जाओ --बोलना नहीं आता तो इस स्कूल में बाप  ने क्यों भेज दिया ? भेजते किसी विकलांग स्कूल में या लंगड़े -लूले ,गूंगे -हकले बच्चों  के स्कूल में I बैठ जाती जुगलबन्दी---!  सौरभ की हीन ग्रंथि सक्रीय हो उठतीI  

     एक दिन माँ घरमें गृहकार्य कराने बैठी कुछ पल बाद ही बोली ---मैं अभी बाजार से आ रही हूँ। इतनी देर में इन प्रश्नों के उत्तर लिख लेना माँ गई तो गई ---Iसाड़ियों की सेल का अंतिम दिन था Iउसे तो जाना ही ----- था I-सौरभ खामोशी की गहरी खाई में भटकता माँ की प्रतीक्षा करने लगा I बीच -बीच में एक दो शब्द भी लिख लेताIसंध्या तक माँ आई उसकी कॉपी में झाँका ---अरे ,तू जल्दी क्यों नहीं लिखता----- बोल तो बंद हो ही जाता है हाथ -पैर चलने भी बंद हो जाते हैं क्या ! एक घंटे में आठ लाइनें ही लिखीं हैं --कैसे होगा इतना  होमवर्क !सिरदर्द है --। |
          अगले दिन अधूरा गृहकार्य देखकरअगले दिन अधूरा गृहकार्य देखकर मैडम का चेहरा तमतमा उठा ---पूरा करो स्कूल का काम तभी टिफिन खाने को मिलेगाI--अरे टिफिन टाइम तो ख़त्म !भूख  लग रही है --जल्दी -जल्दी खा लूँ ---सौरभ  ने सोचा I-देखो तो खाने के नाम कितनी जल्दी हाथ चल रहे हैं----- लिखने के नाम हाथ टूट जाते हैं I शिक्षिका ने चिल्लाते हुए उसकी उँगलियों  पर स्केल से प्रहार किया I आँखों में डब डब करते आंसुओं से दिखाई देना बंद हो गया---I-खड़े  रहें अधूरे काम वाले --एक कर्कश आवाज गूंजी Iबच्चे खड़े रहे ,पैर दुखते रहे --बैठने की कोशिश की तो बादलों की सी गर्जना होती रही  ---खबरदार --जो बैठे तो -- ।                                           प्रिंसिपल  को स्कूल का निरीक्षण करते देखा  मैडम की जीभ पर तो  कोयल आन बैठी ------बच्चो ,सब बैठ जाओ, कल का कम पूरा करके घर से लाना Iमैडम को अचानक यह क्या हुआ-- बच्चे समझ न पाए न ही उनके समझने की उम्र थी--- छल -प्रपंच  से दूर मासूमों की दुनिया ---| सौरभ छुट्टी होने पर धीरे -धीरे क्लास से चल दिया -----लो अब तो यह चल भी नहीं सकता व्यंग बाण उसके कलेजे को छेक गया Iघर कब आया पता ही नहीं चला I वह तो ऊपर तक दलदल में फंसा था I-मैं लिख नहीं सकता --क्या बोल भी नहीं सकता !नहीं --नहीं --बोल सकता हूँ |बोलने के लिए ओंठ फडफडा उठे Iचलने में मुश्किल तो हो रही है ---शायद लंगड़ा भी हो गया हूँ--Iमैडम ठीक ही कह रही थी ---मैं लंगड़ा -लूला हूँ --गूंगा भी हूँ I नहीं --नहीं---
--- गूँजते शब्दों की चीख से दूर जाने के लिए उसने दोनों कानों पर कसकर हथेलियाँ जड़ दीँ Iपरीक्षा में तीन प्रश्न छोड़ दिये लेकिन तब भी पास होकर अगली कक्षा ३,सेक्शन सी में  चला गया I सुनने वाला हर कोई चकित ! उस दिन सब की जबान पर एक ही बात ------सुनने में आया है क्लास ३ का सेक्शन सी जिसे भी मिलेगा वह आठ -आठ आँसू  रो उठेगा I

कक्षा ३ के सेक्शन सी का प्रथम दिन , सब अपना नाम नई मैडम को बताने लगेवह लड़का भी --सौरभ ---ब----ब -----
-हाँ !हाँ बोलो !ठीक बोल रहे हो I मैडम बोली I  
उसका हौसला बढ़ा।  जोर देकर बोला ---बैनर्जी I
-शाबास सौरभ !  
प्रथम बार मुस्कान ने उसके चेहरे को गुलाबी चादर में लपेट लिया  Iनई मैडम कक्षा में घूम -घूम कर श्रुति लेख शव्द  बोल रही थीं I पांचवां शब्द  बोलते -बोलते सौरभ के पास आकर रुक गईं घबराया सा केवल तीन शब्द लिख पाया Iचौथा शब्द याद करने की कोशिश कर रहा था कि पांचवां शब्द बोल दिया गया I मैडम को पास खड़ा देख वह पसीने से नहा गया मैडम ने गौर से देखा, एक -एक शब्द कागज के पन्ने पर मोती की तरह जड़ा था I जो भी लिखा था सब ठीक था सांत्वना भरा हाथ उन्होंने सौरभ के कन्धों पर टिका दिया
- -मैं शब्द दुबारा बोलती हूँ ,बेटे लिखने की कोशिश करो Iसाथ ही उन्होंने घोषणा की -जो बच्चे धीरे -धीरे लिखते हैं उनको काम पूरा करने के लिए हमेशा दस मिनट ज्यादा दिये  जायेंगे I
सौरभ  जैसे  बच्चों  की निगाहें मैडम पर टिक गईं ----नई मैडम की बातें  तो एकदम नई -नई हैं I हमको अच्छी भी लगती हैं। 
  
आत्मीयता की फुलझड़ी से बालमन भयरहित हो उमंग से भर उठे I
-सौरभ ,टिफिन जल्दी से खाकर मेरे पास आना I मैं तुम्हारा कार्य पूरा करने में मदद करूंगी 
-इतनी अच्छी मैडम !जरूर आऊंगा |वह  मन ही मन बुदबुदाया
  हलके क़दमों से मैडम के सामने वाली कुर्सी पर वह  बैठ गया I लिखना शुरू किया ----ओह ये उँगलियाँ जल्दी क्यों नहीं चलतीं--। 

 पहली बार सौरभ को अपने पर गुस्सा आया I उसने उँगलियों में कलम  फंसाकर उसे खींचने की कोशिश की I हाथ कुछ ज्यादा गतिमान हुए I नई  मैडम इस परिवर्तन को भांप गईं I उन्हें विशवास हो गया कि सामान्य बच्चों की तरह  सौरभ भी एक दिन लिख सकेगा I उधर सौरभ मन की सलाई पर दूसरी तरह के फंदे डाल रहा था --मैं घर जाकर भी लिखूँगा देखता हूँ ये उँगलियाँ कैसे नहीं चलतीं I घर में बैठा वह एक घंटे से कलम चला रहा था I यह कैसी अनहोनी ---खुद लिख रहा है ---काम भी पूरा I माँ सकते में आ गई
सौरभ अपने में ही लीन रहने  लगा या नई मैडम के ख्यालों में I एक वही तो थीं जिन्होंने उसको समझा, बाकी तो उसकी कोमल भावनाओं और सुकुमार शरीर पर आघात करके आगे बढ़ गये  Iएक बार पीछे मुड़कर न देखा-- उस पर क्या बीत रही है !वार्षिक परीक्षा में हिन्दी में सबसे ज्यादा अंक पाकर उसने जीत हासिल की I आश्चर्य की लहर फिर एक बार आई और सुनने वालों को समूचा भिगोकर चली गई I

यह नई मैडम और कोई नहीं मैं ही हूँ I हर कक्षा में सौरभ  जैसे  बच्चे होते हैं I यदि  धैर्य रखते हुए उनकी  ओर प्रेम का हाथ बढ़ाकर हौंसला बढ़ाया जाय तो उन्हें  सफलता अवश्य मिलेगी

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

4-उत्सवों का आकाश

कुछ कहना है कुछ सुनना है

बच्चों होली का उत्सव बीत गया पर उसकी यादें तुम्हें अब भी गुदगुदा रही होंगी। गुदगुदाएं भी क्यों न।तुमने मस्ती करने में कोई कसर तो छोड़ी नहीं।गुलाल की बेतहाशा आंधी उड़ाई ,रंगों की जी भर बरसात की और तुम्हारे चेहरे! उफ उनका तो भूगोल ही बदल गया। कोई भालू नजर आ रहा था तो कोई लाल मुंह का बंदर। कोई लंगूरा तो कोई जेवरा। इन रंगों का छुटाना भी मुश्किल हो गया होगा। न जाने कितने लीटर पानी काम में लेना पड़ा। पर बच्चों क्या कभी तुमने सोचा कि तुम्हारे इस उत्सवोआनंद के पीछे न जाने कितनों की दुखभरी कहानी छिपी है। मेरे ख्याल से इसका तुम्हें रत्तीभर आभास न होगा क्योंकि किसी ने बताया ही नहीं।चलो मैं बताती हूँ। अरे मुझे भी बताने की जरूरत नहीं। नई कहानी पढ़ने से तुम खुद ही समझ जाओगे कि उत्सव के आकाश के नीचे कभी-कभी कितना अनर्थ होता है और फिर अच्छे बच्चों की तरह समझदारी से कदम उठाओगे।

प्यासे की मुस्कान(बाल कहानी)


होली के हुड़दंग के बाद बच्चे स्कूल गए। अब भी उनके चेहरों से रंग नहीं छूटे थे। उनकी आवाजें भी होली के रंगों में डूबी थीं। टिफिन का समय होते ही वे मुखर हो उठीं।
-मैंने तो धम्मू के इतना चटक लाल रंग लगाया—इतना चटक कि साबुन मलते-मलते उसके हाथ दुखने लगें होंगे और रंग भी न छूटा होगा। कमलू बड़ी शान से बोला।
-मैंने तो अपनी बहना चमेलिया के चेहरे पर तो लाल के साथ –काला रंग भी पोत दिया। एक दम भूतनी लग रही थी भूतनी। गेंदू भला कैसे चुप रहता।
-अरे वह डब्बू  है न डब्बू जो हमेशा अपनी शेख़ी ही बघारता रहता है, उसको तो मैंने अपने तीन साथियों के साथ घेर कर ही दम लिया और  पिचकारी से रंगों की वो बरसात की-- वो बरसात की कि भागा चूहे की तरह अपनी जान बचाकर।मुंह क्या उसका तो सारा बदन चितकबरा हो गया होगा। बदन रगड़ते रगड़ते बच्चू की खाल भी छिल गई होगी।हा –हा –हा।  बजरंगी ने अपना बजरंगपना दिखाया।  
-अरे गुलाब, तूने अपने होंठ क्या गोंद से चिपका लिए हैं! तेरी होली कैसी रही?
-मैं कमती कमती—केवल सूखे गुलाल से खेला।
-क्यों ?तबीयत तो ठीक है।
-अब तो ठीक हूँ पर होली के एक दिन पहले से मैं बहुत परेशान हो गया था।
-किसने तुझे परेशान किया जरा बता तो अभी उसकी अकल ठिकाने लगाता हूँ। 
-अरे बजरंग चुप से बैठ। उसकी क्या अकल ठिकाने लगाएगा। वह तो वैसे ही बहुत दुख में है।
चहकते बच्चे चुप हो गए और उस दुखी बच्चे के बारे में जानने को आतुर हो उठे।
-हमें भी तो कुछ बता या खुद ही उसके बारे में सोच -सोचकर आधा होता रहेगा। दोस्त है तो दिल की बात कहने में हिचक कैसी। बजरंग बोला।
-होली से पहले मैं छुट्टी के बाद घर जा रहा था कि रास्ते में मैले-कुचैले कपड़े पहने एक लड़का मिला। वह भागता हुआ मेरे पास आया और रोते-रोते बोला-
–भैया सुबह से पानी की एक बूंद गले से नहीं उतरी है।सड़क के किनारे लगे नल से एक  बूंद पानी नहीं टपका। गंदे नाले का पानी पीने की कोशिश की पर बदबू के कारण उल्टी हो गई। भूखा तो मैं रह लूँ पर प्यासा कैसे रहूँ।गला सूखा जा रहा है। मुझे थोड़ा सा पानी पिला दो। उसने मेरी पानी की बोतल की ओर इशारा किया।

रास्ते के लिए मैं हमेशा थोड़ा सा पानी बचाकर रखता हूँ। वह बचा पानी मैंने उसे पिला दिया।
मेरे थोड़े से पानी से उसमें इतनी ताकत आ गई यह देख मुझे बड़ा ही सुख मिला । मेरे दिमाग में आया यदि मैं रोज थोड़ा थोड़ा पानी बचा कर इस जैसे प्यासों को पानी पिलाऊँ तो न जाने कितनों के सूखे गले तर हो जाएंगे। बस तभी से मैं कम पानी में काम चलाने की आदत डाल रहा हूँ।
-बात तो तू ठीक कह रहा है। होली खेलने के बाद रंग छुटाते- छूटते न जाने कितना पीने वाला साफ पानी बहा होगा।रोजाना से चौगुना पानी--। कमलू बोला।
-पानी बचाने के लिए ही मैं केवल गुलाल से खेला। मेरा गुलाल तो एक लोटे पानी से ही धुल गया और बाल्टी भर पानी से नहा लिया।
-बाल्टी से!अरे आजकल बाल्टी से कौन नहाता है। फब्बारे के नीचे खड़े होकर इतना मजा आता है कि कुछ पूछो मत। मन करता है गर्मी में घंटों नहाते रहो। चंचल गेंदू ने गरदन मटकाई।
-अरे वाह अपने आनंद के लिए दूसरों के हिस्से का पानी खराब करते रहो और उसे पीने को भी न मिले।यह कहाँ का न्याय है। मैंने तो सोच लिया है जरूरत से ही पानी खर्च करूंगा। और हाँ ,कल से पानी की बोतल भी बड़ी लाऊँगा।क्या मालूम फिर कोई प्यासा मिल जाए।
- दोस्त,मैं भी तेरी तरह पानी बचाऊंगा और अपने हिस्से का बचा पानी काम वाली को दे दिया करूंगा । उस बेचारी को पीने का साफ पानी लाने के लिए घर से काफी दूर जाना पड़ता है। काम पर आने को जरा भी देरी हुई तो माँ उसकी तरफ बंदूक तानकर खड़ी हो जाती हैं। सच ऐसे लोगों पर बड़ी दया आती है।
-बेचारे –ये तो लगता है डांट से ही पेट भरते हैं। गुलाब ने गहरी सांस ली।
-गुलाब तूने हमसे अपने मन की बात कही तो पानी बचाने की तरकीब मालूम हुई ।हमारे  मोटे दिमाग को तो यह सूझा ही नहीं। यह बात तो दूसरे दोस्तों को भी बतानी पड़ेगी। केवल दया दिखाने से तो काम चलेगा नहीं, प्यासों के लिए कुछ करना ही पड़ेगा।
-दोस्तों को ही नहीं मम्मी -पापा को भी कहना पड़ेगा-पानी सोच समझ कर खर्च करें।बजरंग ने अपनी आवाज बुलंद की।
-बाप रे पापा! बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे।
-मैं तो अपने पापा से जरूर कहूँगा। तुम्हें यह जानकर हैरानी होगी कि बाथरूम में वे एक –एक घंटा लगा देते हैं।
-एक घंटा!कमलू चौंका।
हाँ!कभी –कभी तो एक घंटे से भी ज्यादा। 
-बजरंग,मुझे तो लगता है,यह कोई बीमारी है। किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
-तू ठीक कह रहा है । उन्हें बीमारी ही है, इलाज की भी कोशिश की पर सुनें तब न।
- कौन सी बीमारी है?सबके एक साथ स्वर उभरे।
-गाना सुनने की बीमारी।
-एँ---।
-गाना सुनते समय यदि उनको कोई डिस्टर्ब कर दे तो खूंखार शेर की तरह गुर्राने लगते हैं। बाथरूम में तो उन्होंने  छोटा सा स्पीकर लगा लिया  है। ऑफिस से आते ही बस घुस गए बाथरूम में और चालू हो गया स्पीकर। चलते शावर के नीचे गाने सुनते -गुनगुनाते एक घंटा यूं ही निकल जाता है और उनको पता भी नहीं लगता।
-मतलब ,एक घंटे नल चलता रहता है। यह तो कुछ ज्यादा ही है।
-ज्यादा नहीं –बहुत ज्यादा।
-क्यों रे बजरंग ,पानी कम खर्च करने की बात  तू अपने पापा से कह सकेगा? तुझे डर नहीं लगेगा?
-डर काहे का—अगर वे शेर है तो मैं बजरंगवली हूँ । उसने अपनी मजबूत कलाई हवा में घूमा दी।
इस निराले अंदाज को देख उसके दोस्तों की हँसी फूट पड़ी।

टिफिन टाइम खतम होते ही गुलाब,कमलू ,गेंदू और बजरंगबली ने  एक दूसरे का हाथ थामा और  कक्षा की ओर कदम बढ़ा दिए। इन सबके दिलों में कुछ करने की चाह थी और वह चाह थी प्यासे चेहरों पर मुस्कान लाना।

बुधवार, 23 मार्च 2016

3-उत्सवों का आकाश

विश्व कविता दिवस  

 इस अवसर पर मेरे प्रिय कवि हास्य सम्राट काका हाथरसी की कुछ यादें जिन्होंने मुझे सिखाया -खूब हंसो,हँसते रहो और हँसते -हँसते हर मुसीबत का सामना करो।

उनको हार्दिक नमन



बच्चों 
21 मार्च को कविता दिवस था।जिसका मतलब ही है खूब कविता पढ़ो,लिखने की कोशिश करो और कविता दूसरों को सुनाओ।
कभी न सोचो तुम्हारी कविता ठीक नहीं। उसमें तो तुम्हारे मन की मिठास घुली है। तुम जैसी सरल और निर्मल है। फिर तो ठीक ही ठीक होगी।

इस दिन मुझे अपने प्रिय कवि बहुत याद आए।शुरू से ही काका हाथरसी की कविताएं बहुत पसंद थीं।हमेशा सोचा करती,कैसे वे ऐसी गुदगुदाने वाली कविताएं लिख लेते हैं। उनका कविता पाठ बड़े शौक से सुना करती थी। उनकी दो किताबें जो मैंने बहुत पहले खरीदी थीं अभी तक अलमारी में सावधानी से रख छोड़ी हैं।


काका हाथरसी हास्य रचनावली-नोक झोंक –प्रथम संस्कारण 1982,मूल्य केवल  60रुपए।  
श्रेष्ठ हास्य व्यंग  कविताएं 9काका हाथरसी ,गिरिराज शरण )संस्कारण 1981,मूल्य 35 रुपए ।
इनकी कीमत देखकर तो तुम जरूर चौंक गए होगे।आश्चर्य से जरूर मुंह से निकला होगा –इतनी सस्ती।  

इनको पढ़ -पढ़ कर खूब हँसती थी और सहेलियों को सुनाती थी।साथ ही सपने देखा करती कि मैं हास्य कवि बनूँ। इस तरंग में अल्हड़ बीकानेरी ,जैमिनी हरियाणवी ,बरसाने लाल चतुर्वेदी ,शैल चतुर्वेदी ,सरोजिनी प्रीतम और हुल्लड़ मुरादाबादी की कविताएं खूब पढ़ीं और सुनी। कभी रेडियो पर तो कभी दूरदर्शन में। होली के अवसर पर तो हास्य कवियों का खूब धूमधड़ाका रहता ही है।सो हास्यकवि सम्मेलन में जाकर घंटों के लिए जम जाती थी। 

बहुत दिनों से मैं काका हाथरसी को पत्र लिखने की कोशिश कर रही थी। जब भी लिखने बैठती दिल बैठने लगता इतने महान कवि मेरा पत्र पाकर न जाने क्या सोचेंगे,जबाब देंगे भी या नहीं!पर एक दिन 1990 में हिम्मत जुटाकर मैंने उन्हें काँपते हाथों से पत्र लिख ही डाला। क्या लिखा वह तो याद नहीं पर ताज्जुब!उनका जबाव अगले ही हफ्ते आ गया। 



पत्र पाकर मैं तो उछल पड़ी। एक बार नहीं उसे सौ बार पढ़ा होगा। ऐसे महान थे काका हाथरसी जो अति व्यस्त होते हुए भी मुझ जैसे लोगों की भावनाओं की कदर करते थे। इस पत्र का एक -एक शब्द मेरे लिए अमूल्य और ऊर्जावान है।   

 मैंने उसका जबाब भी दिया। पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-



  मैंने जब  बच्चों को कलकता बिरला हाई स्कूल में पढ़ाना शुरू किया तो काका हाथरसी की कविताओं का मंच पर  छात्रों से  कविता पाठ कराती थी।एक बार तो मैंने उनके प्रहसन को आधार बनाकर एकांकी नाटक भी लिखा और वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बच्चों ने मंच पर खेला। खतम होने पर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अपने प्रोग्राम की सफलता  देख मेरे तो पैर जमीन पर पड़ते ही न थे।
लेकिन इस सबका श्रेय किसको जाता हैं ?मेरे प्रिय कवि काका हाथरसी को।

तो प्यारे बच्चो ,यदि तुम्हें कविता में दिलचस्पी है,उसका आनंद लेना है,कविता लिखनी है तो मनपसंद कवियों को खूब पढ़ो। देखना, पढ़ते- पढ़ते तुम्हारी कलम भी चलने लगेगी। कवि काका हाथरसी को भी पढ़ो तो अच्छा है।हँसते -हँसते पेट फूल जाएगा। 
हाँ याद आया -काका हाथरसी ने अपनी किताब में एक हास्य कवि सम्मेलन लिखा है। उसमें कुछ कवियों की कविताएं बहुत मजेदार है। 

कवि पिलपिला जी की कविता सुनो-
पिल्ला बैठा कार में,हम सब ढोते बोझ
भेद न इसका मिल सका ,बहुत लगाई खोज 
बहुत लगाई खोज ,रोज पिल्ला साबुन से नहाता 
देवी जी के हाथ से दूध रोटी खाता 
कहे पिलपिला वर मांगत मैं चिल्ला-चिल्ला  
अगले जन्म में भगवन ,हमको बनाना पिल्ला। 

खिल गए न गालों पर हजार गुलाब। अब कवयित्री शवनम का कीर्तन सुनो। अच्छा लगे तो तुम दादी माँ के साथ इस कीर्तन को कर सकते हो। 

जै रघुनंदन जै सियाराम,जानकी बल्लभ सीताराम 
हलुवा में हरि बसत हैं,घेवर में घनश्याम 
मक्खन में मोहन बसें,रबड़ी में श्री राम 
रसगुल्ला में शालिग्राम ,जै रघुनंदन जै सियाराम    
रसगुल्ला में शालिग्राम ,जै रघुनंदन जै सियाराम
बोलो सियावर राम चंद्र की जै।   
अरे ,चारों तरफ हंसी के गुब्बारे ही उड़ते नजर आ रहे हैं। हँसना तो वैसे भी सेहत के लिए अच्छा है। 
विश्व कविता दिवस 
बच्चों-बड़ों सबको बहुत- बहुत मुबारक हो।