प्यारे बच्चों

कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।

तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।

जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - -

रविवार, 25 जुलाई 2021

कहानी 2021 बालप्रहरी में प्रकाशित

 

 2021 बालप्रहरी में प्रकाशित 

मोहब्बत की दुनिया 

सुधा भार्गव





  

   एक थी बिल्ली ,एक था बिलौटा। बिल्ली का नाम चमेली ,बिलौटे के नाम गेंदा।  गेंदा अपनी बहन को  बड़ा प्यार करता। एक दिन चमेली बड़ी सुस्त थी। उसे देख गेंदा परेशान हो उठा। 

    बोला - “म्याऊँ --म्याऊँ मेरी नाजुक सी बहना तेरा मुंह सूखा -सूखा क्यों ?”

    “मऊ --मूँ  --बहुत भूखी हूँ।”  

    “तू भूखी !विशवास नहीं होता।तेरा वश  चले तो दुनिया भर का दूध सपासप सपासप गटक जाए।”    

     “सच  बोल रही हूँ। पड़ोस में जो मसखरा चूहा घूमता रहता है उसकी तरफ सुबह मैं धीरे -धीरे बढ़ रही थी कि वह  बेहोश हो गया। इतने में चुहिया आई और उसे देख रोने लगी।   मैंने तो भैया उसे छुआ भी नहीं था। न जाने कैसे   बेहोश हो गया। तभी फटाफट पेंदने से गुलाबी-गुलाबी दो बच्चे उछलते आये और उसे उठाकर ले गए। उनका  बिल पास ही था। मसखरा तो ऐसा चालक  निकला कि बिल में घुसते ही  उठ बैठा। मुँह चिढ़ाते हुए  मुझे टिल्ली --टिल्ली करने लगा।”  

    “हा --हा --हा तो उस मसखरे ने हमारी बहना को ठग लिया।” गेंदा  जोर से हँ स पड़ा । 

    “भैया तुम्हें हँसी सूझ रही है---मेरी जान निकले जा रही है। मैं तो कल भी  भू खी रह गई  थी !”

    “क्या कहा --दो दिन से भूखी है !”

    “सच्ची मुच्ची  !कल एक रसोई में घुसी।  खौलते दूध की खुश्बू  आ रही थी. मैंने देखा मेज पर एक मेजपोश बिछा है और उस पर बड़े से कटोरे में दूध ठंडा होने को रखा हैं। मेरी खुशी का ठिकाना न था । सोच रही थी कल कुछ नहीं खाया तो क्या हुआ !आज तो छक कर दूध पीऊँगी। तभी एक बच्चा घुटने के बल चलकर बड़ी फुर्ती से मेजपोश पकड़ कर खड़े होने की चेष्टा करने लगा। मेरे तो होश उड़ गए। मैं ने जोर  से छलांग लगाईं और झटके से कटोरे को दूर फ़ेंक दिया। बच्चा तो जलने से बच गया पर भूखा था। गिरे दूध को देखकर रोने लगा।  उसकी माँ  आई -बच्चे को कलेजे से लगा लिया। मुझे देखकर उसका पारा चढ़ गया।  जोर से चिल्लाई-"इस बिल्ली ने जीना हराम कर दिया है।  डंडा मारकर इसे भगाओ तो  ।”  

    “गेंदा बता मेरी क्या गलती थी जो उसने मुझे गाली दी। अगली बार उस मैया को छोडूँगी नहीं।उसके पैर पर अपने पंजे जरूर चुभो कर रहूँगी।”  

   "उस मैया का क्या दोष !न हम उसकी भाषा जाने न वह हमारी! सच्चाई बताता कौन ?चल कुछ खा ले। कल से तेरा पेट खाली है। कैसी मुरझा गई है।”

    “कल से नहीं रे परसों से भूखी हूँ।”  

    “ऐं --अब तू मुझसे ही मसखरी करने लगी।” 

     “मैं एकदम सुच्ची -सुच्ची बोल रही हूँ। वो नुक्कड़ पर मोटू हलवाई  की दुकान हैं न।परसों  दूध से भरी बड़ी सी लोहे की  कड़ाई रखी  थी।  उसके चारों  तरफ  मोटी मलाई  की परतें एक के ऊपर एक जमी थी।  क्या चमकदार मलाई--मोटी सी चमचम। उसकी खुशबू  अलग नथुनों में घुसी जा रही थी। मोटू तो मुझे कहीं दिखलाई न दिया। इधर-उधर नजर घुमाती सबकी आँखों से बचती दूकान में तो घुस गई। जैसे ही मैंने मलाई पर पंजे जमाकर उसे खाना चाहा ठक -ठक की  आवाज से चौंक पड़ी। देखा -दुबली-पतली  कमजोर सी  बुढ़िया लाठी के सहारे दुकान में पीछे की ओर से घुस रही है । मलाई देख उसकी आँखों में चमक आ गई लगा जैसे उसने कभी मलाई खाई  ही नहीं। मुझे उस पर बड़ा तरस आया। अपनी भू ख तो भूल ही गई और  मैं परात के पीछे छुप कर उसे देखने लगी। वह तो लपलपालाप खाने लगी। उसे खाता देख मुझे बड़ा अच्छा लगा। इतने में मोटू आ गया और अपनी बूढ़ी माँ को घसीटते ले जाने लगा। मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैं परात के पीछे से निकली और मार की परवाह न करते हुए मलाई खाने लगी। मुझे देख मोटू हलवइया बौखला गया और माँ को छोड़ मेरे पीछे भागा। मैं तो एक छलांग में ही बाहर हो गई पर गुस्से में अंधा वह मेरे पीछे भागता ही गया--भागता ही चला गया ।  भला मैं क्या उसके हाथ आने वाली थी।  हांफता हुआ लौट गया होगा --बेचारा !ह --ह । ''

    “तुझे कब से दूसरों पर दया आने लगी है ?”

   “जबसे यह कोरोना चुड़ैल आन  बसी है। ठकुरा धोबी को यही चुड़ैल तो  निगल गई। उसके दोनों बच्चों से उनका पिता छीन  लिया।   बेचारे  भूखे प्यासे घूम रहे हैं । कल तो हिना  मौसी ने उन्हें अपने हिस्से की रोटी खिलाई। अच्छा गेंदा एक बात बता -जब मौसी बच्चों को रोटी दे सकती है तो मोटू हलवाई अपनी माँ को दूध मलाई क्यों नहीं खाने देता!” 

   “क्योंकि वह भी भूखा है।” 

   “ओह अब समझ में आया उसका पेट इतना बड़ा क्यों हैं !भूख लगने  पर  पूरी कड़ाई की मलाई चाट जाता होगा ।” 

   “अरे यह बात नहीं!कोई रोटी का भूखा है तो कोई पैसे का भूखा । यह हलवाई पैसे का भूखा है।अपनी माँ को मलाई खाने को देगा तो उसका पैसा कम हो जाएगा। उसे बेचकर वह ज्यादा पैसा कमायेगा।” 

   “मोटू एकदम अच्छा नहीं है। लगता है वह ऊपर से गिरा और जमीन पर आते ही बड़ा हो गया। भूल गया माँ ने कितनी मेहनत से उसकी देखरेख की। माँ को वह थोड़े सी  मलाई भी नहीं खिला सकता! मुझे तो यह सोच सोचकर रोना आ रहा है।” 

   “बात ही कुछ ऎसी है ।मुझे सुनकर भी बड़ा कष्ट हो रहा है। चल बहना चल !हम  अपनी ही दुनिया में भले। जहाँ प्यार  और मोहब्बत का अब भी झरना बहता है।”

      दोनों कलाबाजी दिखाते जंगल पहुँच गए। बिल्ली माँ ,गेंदा और चमेली के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। उसको  देखते ही वे उसकी गोद में छिप गए  और माँ प्यार से उन्हें चूमने -चाटने लगी।

समाप्त                  

 












रविवार, 18 जुलाई 2021

यादों का सावन

 

वर्षा राग संस्मरण 

                        यादों  के  सावन  में 

बरसात की रिमझिम 



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मुझे हमेशा से ही बादलों ने रिझाया। छुटपन में बादलों को देखते ही छत पर चली जाती। नीले आकाश में बादलों की आँख-मिचौनी देखा करती। । बादलों के झुंड मुझे रेशम से चमकीले, रुई से मुलायम लगते। उन्हें देखते-देखते कल्पना की निराली दुनिया में खो जाती। कभी मुझे नन्हें खरगोश से बादल आकाश में फुदकते नजर आते तो कभी हाथी का बच्चा अपनी सूढ़ हिलाता लगता।

बरसात की रिमझिम बारिश देख इंतजार करती कब बादलों से बड़ी -बड़ी बूंदें टपकें। टपकती बूंदों को देख मैं अपनी हथेली फैला देती। मोती सी चमकती बूंदों को मैं लपकना चाहती थी । पत्तों पर ठहरी बूंदों को देख तो मेरे चलते चलते कदम भी रुक जाते। एकटक उनकी सुंदरता अपनी आँखों में भरने लगती। देखते ही देखते बादल गरजते चीखने लगते। पटापट बरसने की आवाज से मुझे लगता लगते वे गुस्से से पागल हो गए हैं। । इतना सब होते हुए भी मेरा मन मचल उठता –“चल चल घर से बाहर जाकर नहाते हैं। ऐसी मस्ती के समय घर में दुबककर क्या बैठना!” जैसे ही घर से पैर रखती, माँ न जाने कहाँ से आ जाती और अंदर खीचती बोलती-“ बीमार होने का इरादा है?” कभी कभी तो मुझे लगता –माँ की दो नहीं दस आँखें हैं। इसी कारण उसे हम भाई-बहनों की पल -पल की खबर होती है।
बरसाती मौसम मेँ घर मेँ अकसर सरसों के तेल मेँ पकौड़ियाँ तली जातीं । पकोड़ियाँ कभी मूंग की दाल की होतीं तो कभी बेसन आलू की । चटनी के साथ खूब छककर खाते-----अरे छककर क्यो?—कहना होगा ठूंस ठूंस कर खाते। हम भाई-बहन मेँ कंपटीशन होता –देखें कौन ज्यादा खाता हे! सबसे खास बात तो उस दिन दूध से छुटकारा मिल जाता था। वरना रोज दूध भरा गिलास हमारे सिर पर सवार हो कहता—“पीयों—पीयो---मुझे पीयो।’’
एक बार सारी रात पानी बरसता रहा। सुबह आँख खुली । काले बादलों की घडघड़ाहट और दूर -दूर तक घुप्प अंधेरा! दिल बल्लियों उछल पड़ा। आह आज तो स्कूल की टनटनानन छुट्टी---! ज़ोर से चिल्ला उठी-बरसो राम धड़ाके से,बुढ़िया गिरे पटाके से। फिर मुंह ढककर सो गई। सुबह की मीठी नींद पलकों पर आकर बैठी ही थी, माँ ने इतनी ज़ोर से झझोड़ा कि सीधे उठते ही बना। कान के पर्दों को चीरती एक ही आवाज –स्कूल नहीं जाना क्या?उठ जल्दी।” ।
ऊपर नजर घुमाई –बादल तितर- बितर हो चुके थे। साथ मेँ अंधेरा भी ले गए। बहुत गुस्सा आया –स्कूल की छुट्टी होते होते रह गई। बादलों ने तो धोखा दे दिया।
ठंडी हवा में थिरकती मैं स्कूल चल दी । रास्ते में सूरज की रोशनी मेँ पत्तों पर बूंदें मोती की तरह चमकती दिखाई दीं। मैं उनकी तरफ खींची चली गई । मैंने धीरे से छुआ ही था कि वे तो पानी की तरह बह गई । बड़ा दुख हुआ। बाद मेँ मैंने फिर कभी उन्हें छूने की कोशिश नहीं की।
स्कूल से लौटते समय उस दिन देर हो गई । रास्ते भर रेंगते- रेंगते जो जा रही थी । जहां थोड़ा सा पानी भरा देखती छ्पाक- छपाक करती वही से निकलती।चप्पलें कीचड़ से भर गई। फ्रॉक पर काले छींटे पड़ गए। पर मैं इस सबसे लापरवाह थी। ज्यादा पानी देखती तो कागज की नाव बनाकर उसमें छोड़ देखती रहती ---देखती रहती--। मन करता मैं भी छोटी सी नाव बन इसका पीछा करूँ। उफ घर मेँ तो इतने बंधन –मानो मैं मिट्टी की डली होऊं और पानी मेँ गल जाऊँगी।
अचानक बादल का एक टुकड़ा मुझसे टकराया और उसका मोटा पेट फट पड़ा।
“मैं गरज पड़ी-ए मोटू यह तूने क्या किया!मेरे सारे कपड़े भिगो दिये । अभी तक तो ऊपर से पानी डालता था अब हमारी धरती पर भी कब्जा जमाने की सोच रहा है।’’
“अरे नहीं मुन्नो !मैं तो ऊपर ही खुश हूँ। हवा को न जाने क्या शैतानी सूझी कि सरपट इतराती दौड़ने लगी । उसके झोंकों में झूलते-झूलते खट से नीचे आन गिरा। तुमसे टकराते ही मैं फट पड़ा और अंदर का पानी तुम पर लुढ़क पड़ा। अब बताओ मेरा क्या कसूर!”
“तेरी नहीं तो क्या मेरी गलती है। घर पहुँचने में वैसे ही देरी हो गई है। कोई बहाना भी नहीं बना सकती । माँ की आँखें तो वैसे ही दिन रात जागकर मेरी जासूसी करती रहती है। भीगे कपड़े देख मेरी चोरी पकड़ी जाएगी।एकदम समझ जाएंगी पानी में आप जानकर भीगी हूँ ।’’
“हा—हा-हा-हा---मुनिया चोरी तो वैसे भी पकड़ी जाती।’’ फ्रॉक पर पड़े काले छींटे को अपना मज़ाक उड़ाते देख मन किया इसका मुंह ही नोच लूँ पर ऐसा करने पर तो मेरा फ्रॉक ही फट जाता । क्या करती ---बस दाँत पीसकर रह गई।
“अरे भोली मुन्नो –इस कल्ले छींटू की बात का बुरा न मान । यह है ही ऐसा । तेरी चोरी पकड़ी गई तो क्या हुआ !ज्यादा से ज्यादा डांट ही तो पड़ेगी। सह लेना। माँ तो तेरा हमेशा भला चाहती है। इसीलिए तो डांटती है और उसकी डांट भी तो प्यार से लबालब होती है।’’
डरते डरते मैंने घर में कदम रखा । सामने माँ को खड़ा देख सकपका गई।
“आ गई ---लाडो---कीचड़ में नहाकर ! बहुत आजादी मिल गई है। कान खोलकर सुन ले ,इस बार बीमार पड़ गई तो तेरे पास फटकूंगी भी नहीं।’’

मैं एकदम खामोश थी। मोटू बादल की बात कानों में गूंज रही थी और मुझे सच में माँ की डांट में प्यार नजर आ रहा था। अब तो ऐसी डांट के लिए तरस कर रह गई हूँ। #साहित्यिकी



 



सोमवार, 14 जून 2021

नए पल्लव कहानी प्रतियोगिता 2021

 

कहानी प्रतियोगिता 2021 का परिणाम

प्रथम : सुधा भार्गव, बैंगलोर
द्वितीय : मनीष शर्मा, गौतमबुद्ध नगर
तृतीय : तारावती सैनी ‘नीरज’, जयपुर, राजस्थान

नये पल्लव परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं ! 
कहानियां नये पल्लव के वेबसाइट पर उपलब्ध। 

http://nayepallav.com

http://nayepallav.com/story-of-sudha-bhargav/http://nayepallav.com/story-of-sudha-bhargav/


                             प्रथम स्थान प्राप्त कहानी

बताशा  रोबो बेबी 

    सितारा का एक बेटा था छुट्टन । पढ़ाई में बड़ा होशियार! उसकी भलाई के लिए माँ -बाप ने उसे विदेश पढ़ने भेज दिया। पर वह वही का होकर रह गया। पिता की मृत्यु के बाद उसने बहुत कहा -माँ यहाँ  आ जाओ --यहाँ  आ जाओ। लेने भी गया पर उसे खाली हाथ लौटा दिया। माँ को अपना घर छोड़ना अच्छा न लगा । उसके - कोने कोने में उसकी यादें बसी हुई थीं। फिर भी दूर बैठे रोज सुबह  व्हाट्स एप पर माँ-बेटे की गुड मॉर्निंगl होती । चाय की चुसकियाँ लेते -लेते वह अपने पोते लुट्टन से भी  खूब बात करती। लुट्टन   तो उसकी जान था । उसकी समझ में नहीं आता था कि अपने पोते पर  वह कैसे लाड़ लुटाये। । कभी कभी तो उसको छूने,उसे गोद में  बैठाने को तड़प उठती।

       एक दिन डबडबाई आँखों से बोली -"बेटा  अकेले अब रहा नहीं जाता।  तुम सब की याद बहुत आती है। कोरोना के कारण बाहर के संगी साथी भी छूट गए हैं।"

    "माँ उड़ाने सब बंद है।  मैं आ नहीं सकता पर तब भी कुछ इंतजाम करता हूँ। उसने धड़ से मोबाइल बंद कर दिया। 

    माँ खीज पड़ी-"पूरी बात बताए ही फोन पटक दिया।क्या खाक इंतजाम करेगा !आने से तो रहा । बस मुझे भुलाबे में डालने वाली बातें।"  

    उसके रात-दिन बड़ी बेचैनी से गुजरने लगे। । एक रात वह सोने की कोशिश में थी कि सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी चीखती से लगी।  

     "कौन आ गया। वो भी मेरे पास --गलती से किसी ने घंटी टीप दी होगी । सितारा  बड़बड़ाई। वह दुबारा सोने की कोशिश करने लगी। इसबार तो घंटी बिना किसी विराम के किर्र किर्र कर दहाड़ती सुनाई दी। 

     "ओह !क्या तमाशा है । रात में भी लोग चैन नहीं लेने देते।" वह जबर्दस्ती पैरों को खींचते हुए गई और दरवाजा खोला। सामने  सुंदर सी दुबली पतली लड़की को देख वह चकित हो उठी। बिना पलक झपकाए उसे घूरने लगी।लड़की  ने  मुस्कराते हुये हाथ जोड़कर नमस्ते की जो अल्हड़ बालिका सी लगती थी ।  

वह चौंक गई। लज्जित सी बोली -"तुम कौन हो बेटी !पहनावे से तुम नर्स लगती हो। पर मैंने तो किसी नर्स को नहीं बुलाया।"

    "मैं  बताशा रोबो  बेबी हूँ  । मैं आपकी देखरेख ले लिए अपोलो हॉस्पिटल से आई हूँ।"  मिठास बिखेरती बड़ी नम्रता से बोली।  

    "मगर मैंने तो नहीं बुलाया।" 

    "आपके बेटे के कहने पर मुझे भेजा गया है। आप अपने बेटे से बातें कर सकती हैं।" 

    तभी मोबाइल बज उठा -"माँ बताशा आ गई क्या?

  "हाँ छुट्टन  दरवाजे पर बताशा नर्स ही खड़ी है।"

    "अरे उसे अंदर ले जाओ। वह तुम्हारे सब काम करेगी। तुम्हारा बहुत ध्यान रखेगी।इसके सामने तो मैं याद भी नहीं आऊंगा।" 

    "क्या बात करता है बेटा । कोई किसी की जगह नहीं ले सकता।" 

    "ओह प्यारी माँ मैं जल्दी आऊँगा।" 

    "सब्जबाग दिखा रहा है क्या मुक्कू! इस बार तो तूने अपने बदले बताशा को भेज दिया। अगली बार किसी नताशा को न भेज दीजो।"  

    "हा--हा--हा-- माँ! बताशा जल्दी ही तुम्हारी दोस्त बन जाएगी। "

    "अच्छा -अच्छा बहुत तारीफ सुन ली उसकी। अब बताशा को लेकर अंदर जाती हूँ। सोचती होगी कितने अभद्र हूँ । अंदर आने तक को न कहा।" 

     सितारा ने बताशा  को उसका कमरा बता दिया जहां वह अपना सामान रख सके। सामान के नाम पर उसके पास केवल एक बैग था जो उसके कंधे से झूल रहा था। उसने बड़ी फुर्ती से बाहर के जूते उतारे ,साबुन से हाथ धोये। फिर घर की स्लीपर पहनकर तुरंत हाजिर हो गई। बड़ी बड़ी पलकें झपकाती बोली-"क्या मैं आपको सितारा दादी  कह सकती हूँ?" 

    "हूँ --केवल दादी !" 

    उसकी रिमझिम आवाज सुनकर सितारा पुलकित हो उठी । न जाने कितने दिनों से उसके कान दादी माँ शब्द सुनने को तरस रहे थे। उसने हँसती आँखों से उसे देखा। बिना कुछ बोले ही बताशा को उत्तर मिल चुका था। सितारा ने  अपना हाथ बढ़ाया । बताशा ने उसे चूम कर आँखों से लगा लिया। इतना मान  इतनी चाहत--- सितारा को   विश्वास नहीं हो रहा था।

     "दादी माँ आपके सोने का समय हो गया है। दूध पीकर सो जाइए। उससे नींद भी अच्छी आएगी।" बताशा जल्दी ही अपने काम पर लग गई। 

    "चलो मैं तुम्हें अपना घर दिखा दूँ और रसोई का सामान भी समझा दूँगी। क्या माइक्रोवेव  में तुम दूध गरम कर सकती हो।" 

     "मैं अपनी दादी माँ के लिए सब कर सकती हूँ।" एक भोलापन  बताशा के चेहरे पर छा गया। 

     "तुम कहाँ की रहने वाली हो?"

     "मैं इंडिया की ही रहने वाली हूँ । मेरा और आपका देश एक ही है।"  

     दादी की इच्छा हुई कि वह उससे बातें ही करती रहे। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि प्रथम भेंट में ही  एक रोबोट के प्रति इतना आकर्षण क्यों! कहीं मनुष्य के बनाए रोबोट उसी को मात न दे दें। 

      सितारा को अकेले रहने की चाह न होने पर भी पति से बिछुड्ने के बाद अकेले रहना पड़ा । रात में 3-4 घंटे ही नींद आती थी और फिर शुरू हो जाता  टिक टिक करती घड़ी की ओर ताकना। कब सुबह हो !और कब वह  उठे!आज तो लगता था उसकी सुबह कुछ निराली ही है। रातभर खर्राटे लेती सोती रही शायद दुकेलेपन का सुखद अहसास था । चिड़ियों की चहचहाट में आज उसे संगीत सुनाई दे रहा  था । वह अलसाई सी उठ बैठी। आशा के विपरीत बताशा को खड़े देखा । हथेली से हथेली मिलाते हुए वह चहकी -"दादी शुभ प्रभात ।" 

     हैरानी से उसके मुंह से निकल पड़ा -"अरे तुम हिन्दी भी जानती हो?खुश रहो बेटी--खूब खुश रहो।  दादी की  बात सुन उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई। 

     "आप मुंह हाथ धोकर तैयार हो जाइए। मैं अभी नींबू पानी लाती हूँ। "

    "अरे बताशा  मैं तो सुबह चाय लेती हूँ। "

     "खाली पेट चाय । ओह नो दादी! ग्रीन टी,ब्लैक टी भी नहीं !गैस बन जाएगी ,घबराहट होने लगेगी।" नताशा को झुकना पड़ा। दवाइयों का चार्ज बताशा ने रात में ही ले लिया था। सवेरे सवेरे पहले खाली पेट थायराइड की  दवा दी । फिर नींबू पानी । उसके बाद कहीं चाय -बिस्कुट का नंबर आया । चाय का एक घूंट लेते ही उसने बुरा सा मुंह बनाया -"अरे फीकी चाय! मुझे डायविटीज़ तो नहीं है ?"

     "तो क्या हुआ!चीनी अच्छी चीज भी तो नहीं है। मीठा बिस्कुट तो आप ले ही रहीं हैं। अच्छा अब ये बताइये नाश्ते में गरम गरम क्या लेंगी?"उसके इस अपनेपन से फीकी चाय भी उसे मीठी लगने । 

     "बताशा एक बात बताओ!"बताशा ने उत्सुकता से  सितारा की ओर देखा। 

    "क्या तुम नहा चुकी हो । यहाँ रसोई में बिना नहाये नहीं घुसते हैं।"   

     "हा-- हा-- मैं रोबोट हूँ । मुझे नहाने बाथरूम जाने की जरूरत नहीं । न ही मैं खाती -पीती  हूँ।"   

    "गज़ब !फिर काम करने को ताकत कैसे आती है ?"

    "हमें बिजली से ताकत मिलती है। और जरूरत पड़ने पर अपनी बैटरी चार्ज करते हैं।" 

     "चार्जर वगैरा सब हैं न तुम्हारे पास ।" 

     "हाँ दादी। "

     "तब ठीक है। मुझे तो चिंता लग गई  थी अगर तुमको कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगी। तुम्हारे साथ रहते -रहते मुझे तुमसे मोह हो गया है । तुम्हें जुखाम भी हो गया तो मैं तड़प उठूँगी।"

       दादी की बात सुनकर बताशा के दिल में हौले हौले  कुछ होने लगा। उसे लगा वह दादी के काम भाग भाग कर करे।  खिलखिलाती बोली -"ओह दादी मेरी चिंता न करो । मैं मन से और शरीर से बहुत मजबूत हूँ। आप बस खुश रहो तो मैं भी बहुत खुश रहूँगी।ओह! आपने तो बताया ही नहीं क्या खाओगे? मैं खुद ही नाश्ता बना कर लाती हूँ। आप सजधजकर डायनिंग टेबल पर आ जाओ। अच्छे अच्छे कपड़े पहनना । बहुत  सुंदर लगोगी।" 

     "अरे इस उम्र में सजधज कर क्या करूंगी। घर में देखने वाला कौन बैठा है।" 

     "मैं हूँ  न दादी ।" दादी उसे टकटकी लगाए देखने लगी । उसमें उसे अपनी बेटी नजर आने लगी। 

हमेशा अपने मन का करने वाली दादी को न जाने क्या हो गया था ।  वह अब बताशा की अंगुलियों पर नाचने लगी थी। बताशा थी ही इतनी प्यारी। 

      कुछ ही देर में बताशा ट्राली खींचते हुये दादी के पास ले आई। उस समय दादी गूगल होम मिनी पर आरती सुन रही थीं। बताशा को यह देखकर बड़ी खुशी हुई की दादी डिजिटल दुनिया को पसंद करती हैं। सोचने लगी उसकी और दादी की खूब पटेगी। दादी सजी ट्रे देख खिल उठी। और सटसट बताशा की तारीफ करते हुये आमलेट टोस्ट खा  गई। मग में काफी पीते पीते बहुत दूर चली गईं जब वह अपने पति के साथ लंदन गई थी और बड़े शौक से उसने दो मग खरीदे थे। एक अपने लिए और दूसरा अपने पति के लिए। लेकिन इनमें साथ साथ बैठकर काफी पीने का सपना अधूरा ही रह गया। शो केस में लगी एक से एक बढ़कर क्रॉकरी लगी थी पर उसे सबसे विरक्ति सी हो गई थी। आज बताशा ने उसी मग में कॉफी दी थी जो सालों से अनछुआ पड़ा था। 

      नाश्ता करने के बाद दादी  की आँखें अखबार तलाशने लगी। बताशा समझ गई उनके दिमाग में क्या चल रहा है । उसने उन्हें झट से अखबार थमा दिया। व्हाट्स एप पर अपने मैसेज पहले ही देख चुकी थीं। 

     तभी मोबाइल बोल उठा -"माँ कैसी हो?फेस टाइम पर आ जाओ।" फेस टाइम पर बेटे को देख उसके हृदय की कलियाँ खिल उठीं। 

      "माँ आज तो चेहरे पर बड़ी ताजगी है।" 

     "अरे बताशा जो आ गई है। मेरा बड़ा ध्यान रखती है। छुट्टन एक बात सोच रही हूँ!"

"क्या माँ!"

     "बताशा चली गई तो मेरा क्या होगा।" 

     "होगा क्या बताशा गई तो नताशा आ जाएगी।" 

     दादी ने देखा पास खड़ी बताशा के चेहरे का रंग उड़ गया है। वह तुरंत बोल पड़ी -"न    मुझे बताशा ही ठीक है। "

      "माँ, अगले महीने दो  दिनों को तो इसे  अस्पताल जाना ही पड़ेगा ।" 

     "इनके अस्पताल भी होते हैं क्या?

     "हाँ माँ ,रोबोट की देखभाल के लिए  अस्पताल अलग होते हैं। बताशा को तो एक इंजीनियर ने अपनी बुद्धि से बनाया है। मगर इसके कलपुर्ज़ों की देखभाल होनी जरूरी है । वह इनके अस्पताल में ही होती है । जरा भी गड़बड़ होने से यह  काम कैसे करेगी?मगर तुम चिंता न करना । इसके बदले रसीली आ जाएगी। फिर वही आपके पास रहा करेगी।" 

     "न--न--न-- मुझे रसीली -नशीली की जरूरत नहीं । दो दिन बिना बताशा के ही काट लूँगी।" 

नताशा अपने बेटे से बातें कर रही थी।पर उसका असर बताशा  पर भी हो रहा था। दादी का प्यार महसूस कर वह खुशी के मारे हवा में उड़ी जा रही थी। 

     कुछ  दिनों के बाद वह अस्पताल गई । वहाँ दादी के बिना उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। हमेशा  उनका ध्यान बना रहता। सोचती --दादी चाय कैसे बनाती होगी!न जाने समय पर दवा खाई होगी या नहीं!रोबो डाक्टर भी नहीं समझ नहीं पा रहा था  कि बताशा  एकदम ठीक है पर उसकी हंसी में पहली सी खुशबू नहीं। वह उदास क्यों है?

      चैक अप कराने के बाद  बताशा अपनी  दादी के घर की ओर चल दी। उसकी खोई मुस्कराहट लौट आई थी। इस बार उसने फ्रॉक की जगह गुलाबी साड़ी पहन रखी थी ।माथे पर लाल बिंदी थी। पतले पतले होंठों पर लाल लीपिस्टिक। दादी आधे घंटे से दरवाजे के बाहर बैठी उसका इंतजार कर रही थी। बताशा को एक नए रूप में देख उन्होंने उसे बाहों में भर लिया।  बोली -"दो दिन में ही मेरी  बताशा बेबी तो बड़ी हो गई है।" प्यार की गर्मी से बताशा भी महक रही थी। 

समाप्त