कल सपने में देखा -मैं एक छोटी सी बच्ची बन गई हूं । तुम सब मेरा जन्मदिन मनाने आये हो । चारों ओर खुशियाँ बिखर पड़ी हैं ,टॉफियों की बरसात हो रही है । सुबह होते ही तुम में से कोई नहीं दिखाई दिया ।मुझे तो तुम्हारी याद सताने लगी ।
तुमसे मिलने के लिए मैंने बाल कुञ्ज के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिये हैं। यहाँ की सैर करते समय तुम्हारी मुलाकात खट्टी -मीठी ,नाटी -मोती ,बड़की -सयानी कहानियों से होगी । कभी तुम खिलखिला पड़ोगे , कभी कल्पना में उड़ते -उड़ते चन्द्रमा से टकरा जाओगे .कुछ की सुगंध से तुम अच्छे बच्चे बन जाओगे ।
जो कहानी तुम्हें अच्छी लगे उसे दूसरों को सुनाना मत भूलना और हाँ ---मुझे भी वह जरूर बताना ।
इन्तजार रहेगा ----! भूलना मत - - ।
बालकुंज
मंगलवार, 1 मार्च 2022
बालकहानी
गुरुवार, 27 जनवरी 2022
इंद्रप्रस्थ भारती मासिक पत्रिका
भूरी-भूरी आँखों वाला एक बालक था जिसका नाम था गुट्टू। शरारत तो उसके अंग अंग में समाई हुई थी । बातूनी इतना मानो उसके पेट में कोई गपोड़िया गहरा कुआं हो जो खाली होने का नाम ही नहीं लेता था ।
वह अपनी दादी को बहुत प्यार करता था। कुछ दिनों से उनका बाहर जाना बंद था पर गुट्टू से उनकी खूब चटर पटर होती रहती। गुट्टू खुश कि उसकी कोई बात तो सुनने वाला है --दादी खुश कि चलो समय कट रहा
है ।
कभी कभी उसकी दादी बहुत उदास हो जाती ।उसे वे दिन याद आते जब अपनी सहेली रामकली और हरप्यारी के साथ मंदिर जाती। कभी आइसक्रीम का स्वाद लेने पोते के साथ बाजार चल पड़ती । अब तो आह भर कर ही रह जाती --न जाने वो दिन लौटकर आएंगे भी या नहीं।
एक दिन दादी बड़बड़ा उठीं-
“ क्या तमाशा लगा रखा है !कभी लॉक डाउन ख़तम हो जाता तो कभी फिर से लोकडाउन शुरू कर देते ।पर क्या फर्क पड़ता ---हम राम तो घर में पहले की तरह ही लॉक हैं। जिंदगी में कभी इतने दिन लगकर घर में न रही।न जाने क्या पाप किया था जो ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं।"
फिर ऊंची आवाज में बोली,"ओ लक्खी बेटा -मुझे आज जरा कार में बैठाकर सैर करा ला।सुना है कुछ बाजार खुल गए हैं । और हाँ मेरे साथ मेरा गुट्टू भी चलेगा। बेचारा चारदीवारी में कैद होकर रह गया है।”
“माँ ले तो चलूँगा पर किसी दुकान पर नहीं उतरोगी ।”
“तो फिर जाकर क्या करूँगी । आधा घंटा तैयार होने में लगाऊँ ,नई साड़ी की तह ख़राब करूँ और कार में ही बैठी रहूं । रहने दे --मैं घर में ही भली। घर में बैठी रहूँ या कार में बात तो एक ही हुई ।” बूढ़ी मॉ झल्ला उठी ।
माँ की व्याकुलता देख बेटा उदास हो गया । उसका मन बहलाने को बोला-“अच्छा माँ तुझे कुछ खरीदना हो तो बता, मैं एमोजॉन से मंगा देता हूँ ।”
"ये अम्माजान तेरी कौन सी आ गई!सामान बेचे है क्या ?"
"ओह मेरी माँ यह एमोजॉन बहुत बड़ी दुकान है । घर बैठे ही सामान पहुंचा देगी ।"
“अरे मुझे कुछ न खरीदना । दूकान पर जाकर कोई जरूरी है कि खरीदो ही खरीदो । नई सुन्दर चीज देख आँखें भी तो मुस्कुराती हैं । मन खुशी से हवा में उड़ने लगता । तभी तो बाजार जाने को मन मचल उठा। ।”
इतने में गरमी से तपती गौरी बहू घर में घुसी । उसका खाली थैला देख गुट्टू के पापा और उसकी बूढ़ी माँ दोनों ही चकित हो गए ।
“एक घंटे में तुम्हें कोई सब्जी नहीं मिली!गुट्टू के लिए चार आम ही ले आतीं ।”गुट्टू के पापा बोले ।
“आपको आमों की पड़ी है बाहर जाकर देखिये कितनी लम्बी लाइन है । ज्यादातर लोगों ने मास्क ही नहीं लगा रखे ।दुकानों पर भुक्कड़ों की तरह टूटे पड़ रहे हैं। २ गज की बात छोड़ो दो इंच की भी दूरी नहीं बना रखी है । लगता है कोरोना उनका दोस्त है----किसी भी हालत में उनके पास नहीं फटकेगा । उफ !मैंने तो दूर खड़े बहुत इन्तजार किया---- अब बारी आये --अब बारी आये ।मेरी तो बाबा हिम्मत जबाब दे गई भीड़ में घुसने की ।”
“पहले की तरह होम डिलीवरी क्यों न करवा ली बहू । दुकानें तो खुल गई हैं।”दादी बोली ।
“माँ, मालिकों ने दुकाने तो खोल दी हैं पर उनकी मदद को कोई कर्मचारी न आया होगा ।”बेटे ने समझाया ।
“ओह समझी । अब तो घर में बैठे मुझे भी कुछ करना पड़ेगा। हो गया बहुत आराम !मेरा पोता कहाँ है?--अरे गुट्टू --ू ओ गुट्टू कहाँ हैं बच्चे ?”
खरगोश की तरह फुदकता गुट्टू आन खड़ा हुआ -प्यारी दादी तुम्हारा गुट्टू आ गया!”
“तेरी मुठ्ठी में क्या है रे ?”
वह मुट्ठी खोलता बोला-”पांच गुट्टे!कल तुमने पांच गुट्टे का खेल सिखाया था न!उसी को बार- बार खेल रहा था। आज तो तुम्हें हरा कर रहूँगा।”
“ओह,पचगुट्टा--हो--हो --हो।” दादी जोर- जोर से हंसने लगी। हँसी थमी तो बोली-”गुट्टू आज मैं तुझे दूसरा खेल सिखाऊंगी ।”
“माँ मुझे भी सिखा दो।”गुट्टू का लक्खी पापा बोला।
“अरे तू बड़ा हो गया है--तुझे क्या सिखाऊँ !”
“माँ मैं भी तो तेरा बच्चा हूँ ।कभी कभी मन करता है पहले की तरह तू मेरे बालों में अपनी अंगुलियां घुमाये --मेरे नखरे उठाये ।मुझे तो लगे तू मुझसे ज्यादा अपने पोते को प्यार करने लगी है। "
"क्या कह रहा है !जो मन में आता बोल देता। रे--रे तेरी कोई जगह ले सकता है क्या!”बेटे के दिल में अपने लिए इतनी चाहत देख माँ का दिल बाग़ -बाग़ हो गया ।
“अच्छा चल पिछवाड़े ---वो हमारी फुलबाड़ी है न ,उसी के पास सागबाड़ी बनाते हैं। ।सब्जियों की किल्लत कुछ तो कम होगी ।”
“ओह दादी किचिन गार्डन !पर बिना माली के कौन जमीन खोदेगा ,कौन उनकी देखभाल करेगा।
"अरे मैं सब जानूँ हूँ। मेरा चाचा किसान था । सारे दिन खेतों में तितली की तरह उड़ती रहती।
"पर माँ कुछ भी बोने के लिए तो बीजों की जरूरत होगी ।तुम बताओ क्या -क्या चाहिए मैं एमोजोन से मँगा दूँगा।”
“तूने तो एजी --ओजी की रट लगा रखी है ।बीज तो रसोई में ही मिल जायेंगे।”फिर अपनी बहू को दमदार आवाज लगाई -”ओ गौरी ज़रा सुन तो--थोड़ा सा साबुत कुचला धनिया ,मेथी दाना ,सौंफ ,पुदीना ,और सूखी मिर्चे तो दे दे। आज इन्ही से अपनी साग-भाजी की बगिया शुरू करती हूँ।”
“अरे वाह दादी वाह !फिर तो मेथी दानों से मिथिला रानी ,धनिये से धन्नो रानी छनकने लगेंगी । अब खाने को मिलेंगे मेथी के पराँठे और धनिये की चटपटी सब्जी। "
"मन के गुब्बारे ज्यादा न फोड़ । चलकर कुछ कामकर । देख तेरे पापा ने क्यारियाँ बना दी हैं। तू इनमें से पत्थर और घास बीनकर निकाल। "
दादी ने एक मिनट की भी देर किए बिना अपने अनुभवी हाथों से एक में कुचला धनिया दूसरी में मेथी दाना और तीसरी में सौंफ छिड़क दी। पुदीना उठाकर बड़ी चतुरता से उसकी जड़ें काटी और मिट्टी में घुसेड़ दीं।
“,दादी मिर्ची तो सूखी बीमार सी लग रही हैं। इसे फ़ेंक दो । मैं फ्रिज से अभी मोटी ताजी निकालकर लाता हूँ ।” गुट्टू बोला ।
“अरे ठहर तो --कुछ ही दिनों में ये सूखी मिर्ची ही हरी -हरी मोटी मिर्चों को जन्म दे देंगी।”
गुट्टू और उसके पापा अचरज से दादी माँ को देखने लगे । दादी ने भी कमाल कर दिया। मिर्ची को तोड़ा और झट से उसके बीज अलग एक क्यारी में फैला दिए । उसकी आँखों में खुशी झिलमिलाने लगी।रोज दिन में दो बार तो वह अपनी बगिया के चक्कर लगा ही लेती पर अकेली नहीं अपने दुलारे पोते के साथ । उसके बिना तो दादी की दाल गलती ही न थी। इंतजार करती कब छोटी -छोटी सुकुमार कोंपलें निकले! कब हवा में सौंफ और मेथी की खुशबू घुल जाए! दादी की देखभाल और प्यार का यह असर हुआ कि जल्दी ही नन्हें पौधे हँसते -खिलखिलाते निकल आये । दादी को देख उसकी और झुक झुक जाते और कहते - दादी माँ तुम बहुत बहुत प्यारी हो । कच्ची सौंफ की पत्तियां बहुत बारीक थीं ।उनके सुंदर गुच्छे तो हवा में लहराते दादी के पैरों को चूमने लगे । धीरे से फुसफुसाते -तुम हमारी भी दादी हो । हमें भूलना नहीं ।
धीरे -धीरे दादी की बगिया महकती हुई बढ़ती गई । गुट्टू को इस बगिया में बड़ा आनंद आता। उसमें छोटे -छोटे लाल टमाटर अपनी गोल गोल आँखें घुमाते उसकी ओर देखते तो लगता वे उसी का इंतजार कर रहे हों । अदरक -मूली को किसी की चिंता न थी । वे तो बड़े मजे जमीन में पैर पसारती सोती रहतीं। पर लौकी बड़ी सावधानी से मचान पर चढ़ कर पहरा देती । गुट्टू को तोरई बड़ी अच्छी लगती क्योंकि वह उसी की तरह शैतान थी । उसकी बेल ने बांस से बनी छत पर बड़ी तेजी से कब्जा जमा लिया। उससे लटकती तोरई खूब इतराती और हवा में मस्ती से कलाबाजियाँ करती। लौकी को छेड़ने के लिए आप जानकर उसके सिर से बार -बार टकराती --टक--टक --। गुट्टू यह देखकर खूब उछलता और तालियाँ बजाता। बेचारी लौकी अपना सिर थाम कर रह जाती। पर गुस्सा जरा भी न करती । तोरई को छोटी बहन समझकर माफ कर देती । पोधीना, धनियाँ ,मेथी की कोमल पत्तियाँ हवा में झूमतीं तो लगता जैसे हरा लहंगा पहने नन्ही-नन्ही परियाँ गुट्टू से मिलने आई हैं। उसका मन करता उन्हें गले लगा ले।
दादी -पोते के प्यार को पाकर सब्जियाँ बहुत खुश हुईं।और तेजी से बढ्ने लगीं। ज्यादा उगने पर दादी ने उन्हें पास-पड़ोस में भेजना शुरू कर दिया । पड़ोसी तो अवाक रह गए। --दादी का यह कैसा करिश्मा !घर बैठे ही ताजी सब्जी। गुट्टू की तो बस पूछो ही मत। जब भी मौका मिलता फोन पर डट जाता और शुरू हो जाते चतुर दादी के किस्से । थोड़े दिनों में ही गुट्टू की दादी मोहल्ले भर की बगिया दादी बन गई।
समाप्त
शनिवार, 6 नवंबर 2021
बालकहानी- पायस ऑनलाइन डिजिटल मासिक बालपत्रिका
अनोखे दीपक
सुधा भार्गव
"अरे सिट्टू कल दीवाली है। सबके चेहरे गुलाब की तरह खिले हैं और तू -तू इतना उदास ?तेरी माँ ने डांट पिला दी है क्या ? कर रहा होगा कोई शैतानी।वह भी क्या करे ! है भी तो तू एक नंबर का उधमबाज ।"
"ओह दादू !न जाने क्या बोलते जा रहे हो । मेरी तो सुनो।"
"मेरा सिट्टू तो आज बड़ा सीरिअस है। चल बता तेरे दिमाग में क्या तूफान उठ रहा है?"
"दादू इस बार दीवाली कैसे मनाऊँगा । माँ ने चीनी लाईट खरीदने को मना कर दिया है और पापा --उन्होंने तो वह झालर भी कूड़ेदान में फेंक दी जो पिछले साल खुद ही बड़े शौक से खरीदकर लाये थे। न जाने उनको अचानक क्या हो गया है।"
"बेटा ,दीवाली पर दूसरे देश की बनी लाइट ,झालर,पटाखे हम खूब खरीदते हैं। इससे हमारा पैसा विदेशों में चला जाता है । इसे तो रोकना होगा।
"पर बिना उनके दीवाली की रौनक तो गई। "
"कैसे चली गई। फुलझड़ी ,झालर हमारे देश में भी तो बनती हैं। उनको खरीदकर घर का पैसा घर में ही रहेगा।अपने देश के बने मिट्टी के दिये जलाकर अंधेरे को भागा देंगे ।एकदम स्वदेशी दीवाली मनेगी स्वदेशी दीवाली। टन टनाटन टन दीयों की बारात सजी होगी । उसमें शामिल होने को लक्ष्मी जी भी भागी चली आएगी।" दादू भी सिट्टू के साथ दूसरे सिट्टू लगने लगे।
"हमारे घर में भी ---। तब तो हम मालमाल हो जाएँगे। पर बिजली की लाइट तो बहुत रोशनी देती है। उतनी रोशनी करने के लिए तो हजारों दिये चाहिए । इतने दीये आएंगे कहाँ से दादू। ''
"हूँ --बात तो तुम्हारी ठीक है। इस वर्ष तो हजारों दीपक की माँग होगी। अरे वो देखो मनमौजी कुम्हार आ रहा है । चलो इसी से पूछते हैं।"
दादू और सिट्टू को देखते ही मनमौजी गदगद हो उठा । बोला---"भैया हमारे तो दिन फिर गए। लो मुंह मीठा करो। शुद्ध घी के हैं। घरवाली ने बनाए हैं। इस बार तो हजारों दीये बनाने पड़ेंगे । दो जगह से हजार -हजार के दो ऑर्डर भी मिल गए । चमत्कार हो गया। लक्ष्मी की किरपा समझ लो।"
"हाँ मनमौजी अब तो हर दीवाली पर तुम खुशकिस्मती का दिया जलाओगे। तुम्हारे कारण ही हम भी स्वदेशी दीवाली धूमधाम से माना पाएंगे । मेरे पोते को तो विश्वास ही नहीं हो पा रहा है कि बिना विदेशी पटाखों और दीयों के दिवाली भी मन सकती है।"
"मनमौजी काका लाखों दीये कैसे बनाओगे? दो दिन बाद ही तो दीवाली है।मुझे तो बड़ी चिंता हो रही है। दीये नहीं मिले तो हमारी दीवाली भी गोल ही समझो। "परेशान सा सिट्टू बोला।
"अरे बिटुआ हमने तो दो माह पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है । देखते जाओ हम मिट्टी के ऐसे सुंदर- सुंदर दीये बनाएँगे कि मन ललच ललच जाएगा। मैं तो सोच रहा हूँ इस बार मिट्टी के साथ गोबर मिलाकर दीये बनाऊँ।"
"छीं छीं --गोबर की बदबू ही बदबू फैल जाएगी। कौन खरीदने आयेगा ?मेरा तो सुनते ही जी मिचला रहा है।"सिट्टू ने नाक कसकर बंद कर ली।
"वह तो मैंने तुम्हें बता दिया वरना बनने के बाद तो पता ही नहीं चलता कि गोबर के बने हैं। इससे मिट्टी की बचत भी हो जाएगी और दीवाली के बाद ये खाद बनाने के काम आ जाएँगे। इनको गमलों में या किचिन गार्डन में डाल सकते हैं।"
"अरे वाह ये तो जादू के दीये हो गए। तब तो मैं अपने कमरे से बाहर रखे गुलाब -चमेली के गमले में दीये रख दूंगा। उनके जादू से गुलाब बड़े बड़े हो जाएँगे। "सिट्टू एकाएक चहक उठा।
"यह तो मनमौजी तुमने पते की बात कही। न किसी तरह की गंदगी न प्रदूषण । गोबर के दीये तो एक तरह से इकोफ्रेंडली हुये। पर तुम इन्हें बनाओगे कैसे। तुम्हारा बेटा तो काम में हाथ बँटाना ही नहीं चाहता।"
"अरे बाबू हम बोले न !हमारे तो भाग जग गए। अब तो मेरा सारा परिवार इसमें लग गया है। सबके दिमाग में नई नई बातें उमड़ घुमड़ रही हैं। सुरगू की तो क्या कहूँ !कहाँ उसे मिट्टी छूने से चिढ़ थी और अब शहर न जाने की कसम खा ली है । एक दिन बोला- -बापू तेरे साथ रहकर अपने दादा-परदादा के धंधे को आगे बढ़ाऊंगा।
"हमारे लिए तो गोबर के दीये नई बात है। हमने तो कभी सुना नहीं!"दादू बोले।
"जरूरत पड़ने पर तरकीब अपने आप ही जन्म ले लेवे हैं। हमारे पास गोबर का पहाड़ है पर उसकी कीमत कभी समझी ही नहीं। "
"काका गोबर से दीपक बनाते कैसे हो?जल्दी बताओ। फिर मैं अपने दोस्तों को बताकर उन्हें हैरान कर दूंगा।"सिट्टू बहुत कुछ जानने को उतावला था।
"अरे बड़ा सरल है बनाना बच्चे । सूखे गोबर को पहले महीन पीस लेवे हैं। फिर उसमें मिट्टी मिलाकर गूँथना पड़े हैं। मेरी दोनों बिटियाँ तो छोटे छोटे हाथों से बड़े अच्छे दिये बनावे हैं। बनाती चली जाएंगी --बनाती चली जाएंगी। थकती भी नहीं। ऐसा जुनून छाया हुआ है सब पर दीपक बनाने का। 2-3 दिनों तक धूप में सूखने के बाद तुम्हारी काकी बहुत से रंगों से उनपर चित्रकारी कर देती है।
मैं तो गोबर में कपूर भी थोड़ी सी डाल दूँ हूँ जिससे हवा खुशबू से भर जाये।"
"पहले के दीयों से गोबर के दीये तो एकदम अलग है।हीरो है हीरो ।क्यों दादू ठीक कह रहा हूँ न !"
"इसकी एक बड़ी खासियत है । यह तेल नहीं सोखता दूसरे जलते समय इसमें घी और कपूर की खुशबू भी आती है। "मनमौजी बोला।
"अरे वाह !यह नया दीया तो कमाल का है! जब मैं छोटा था दीवाली पर बहुत सारे मिट्टी के दिये खरीदे जाते थे। पहले पानी में कई घंटों के लिए डूबा देते थे। फिर हम भाई बहन उन्हें निकाल एक पेपर पर फैला देते या धूप में रख देते। माँ कहा करती ऐसा करने से दीये ज्यादा तेल नहीं पीते। गोबर के दीये से तो तेल भी बच गया और पानी में भिगोने का झंझट भी खतम । ऐसे नए नए विचार तुम्हें कब से सूझने लगे !"दद्दू उत्साहित से बोले।
'पहले कभी दिमाग में आया ही नहीं बाबू कि लोग बदल रहे हैं समय बदल रहा है ।लोगों की पसंद बदल रही है । उसके अनुसार अपने काम करने के तरीके में में बदलाब लाना चाहिए। उठने की तो कोशिश की नहीं ,अपना काम छोटा है हम छोटे हैं यह सोचकर अपने को अपनी ही आँखों में गिरने लगे। आत्मनिर्भर भारत की पुकार से हम जाग गए । नतीजा आपके सामने है।"
"मनमौजी ,दीपक रोशनी ही नहीं करता बल्कि हमारे अंदर के अंधकार को भी मिटाता है। सच्चे अर्थों में तो इस दीवाली पर तुमने ही दीपक जलाया है।" मनमौजी अपनी तारीफ सुनकर फूला न समाया ।
"काका अब तो मेरा दोस्त कक्कू भी दीवाली मना लेगा । मैं अभी उसे जाकर बताता हूँ कि गोबर के दीये कम तेल पीते हैं। बड़ा खुश होगा। उसकी माँ के पास बहुत कम पैसे रहते हैं न । वह ज्यादा तेल नहीं खरीद पाती।"
"अरे बेटा दीवाली के समय खाली हाथ न जा। ये ले दस गोबर के दीये । उसे मेरी तरफ से दे दीजो।"
मनमौजी तुमने गोबर से दीये बनाकर जैसे बड़ा काम किया है वैसे ही तुम्हारा दिल भी बड़ा है। मेरे लिए भी 100 दीये रख देना । लो ये रुपए एडवांस में।"
"अरे बाबू इतनी जल्दी क्यों?। बाद में ले लूँगा।"
"न मनमौजी !आई लक्ष्मी वापस नहीं करते ।मुस्कुरा कर उसने रुपए ले लिए।"
मनमौजी का अंग अंग खुशी से गुनगुना रहा था। उसका सारा परिवार बड़े उत्साह से अनोखे दीये बनाने में जुट गया।
समाप्त
शुक्रवार, 5 नवंबर 2021
उत्सवों का आकाश
भाई दूजोत्सव
न्यारी प्यारी दुनिया
सुधा भार्गव
भोर ही चिड़ियों की चहचहाट सुन घूघर का मन नाच उठा । कहने को तो वह दो बच्चों की माँ हो गई थी। लेकिन आज भाईदूज के दिन बचपन की उस चौखट पर जाकर खड़ी हो गई जहां भाई का हाथ पकड़ जिद किया करती थी मुझे क्लिप चाहिए,मुझे तो चूड़ियाँ चाहिए पर आज तो उसे कुछ और ही चाहिए था भाई से नहीं भगवान से। यही कि हे भगवान मेरे भाई की लंबी उम्र करो। वह खूब खुश रहे।
जल्दी से घर के कामों को निबटाने लगी साथ ही कुछ गुनगुनाती भी जाती। अपने बेटे गुलाल को देखते ही बोली-"अरे जल्दी नहा धोले। अपनी बहन को भी जगादे ।
" अरे परसों ही तो जल्दी जल्दी नहाया था। दीवाली फिर आ गई क्या!"
“तू ठीक कह रहा है । आज मेरे मन की दीवाली है। मेरा मन तो तेरे मामा में ही अटका रहता है। बड़ा प्यारा भाई है। दोपहर को तेरा मामा मुझसे टीका करवाने आने वाला है। खाना भी उसका यही हैं।"
"अच्छा! मामा के आप टीका करोगी!"
"अरे इसमें हैरत की क्या बात है। जैसे तेरी बहन तुझे टीका लगाएगी वैसे ही मैं अपने भाई के लगाऊँगी।जब मैं छोटी थी तब से टीका करती आई हूँ।"
"ओह आपके समय भी भाई दूज होती थी!" भोले भण्डारी गुलाल ने पूछा।
बेटे की मासूमियत पर घूघर ज़ोर से खिलखिला उठी । प्यार से उसे बाहों में लेती बोली - "बेटा इस त्यौहार का सम्बंध तो भाई बहन से है । सुनते हैं बहुत पहले दो भाई -बहन थे। बहन का नाम यमुना और भाई का नाम यम। दोनों में बड़ा प्यार । यमुना बहुत सरल स्वभाव की थी । सब उससे मिलना चाहते। पर यम को तो देखते ही लोग इधर उधर दुबकने लगते। वह उनके प्राण लेने आया करता था। यमुना यह देख बड़ी परेशान हो जाती।
"यमुना कैसी बहन थी !उसने अपने भाई को इतना गंदा काम करने को मना भी नहीं किया !"
"अरे वह तो बड़ी चतुर थी। दूसरों के भाइयों को बचाने की तरकीब निकाल ही ली उसने।"
"क्या तरकीब निकाली माँ?" वह जानने को उतावला हो उठा।
"एक बार उसने यम भाई को दीवाली के दो दिन बाद दूज के दिन घर बुलाया । उसके लिए बड़ा स्वादिष्ट भोजन बनाया और अपने हाथों से भाई को खिलाया। यम बड़ा खुश हुआ और बोला- "बहन तुझे क्या चाहिए?"
"भैया मुझे न रुपया पैसा चाहिए और न हीरे मोती । बस तुम इसी तरह हर साल आज के दिन मेरे पास आते रहना। लेकिन एक इच्छा है।"
"जल्दी बता तेरी क्या इच्छा है। मैं चुटकी बजाते ही उसे पूरा कर दूंगा।"
"भैया, अगर मेरी तरह कोई बहन आज के दिन अपने भाई को घर बुलाकर टीका करे और उसे खाना खिलाए तो उसे तुम्हारा कोई डर न रहे।इस बात का मुझसे वायदा करो।
यमराज ने यमुना की बात मान ली। तभी से दूज के दिन बहन भाई की रक्षा के लिए टीका करती चली आ रही है। नाम भी इसका भाईदूज पड़ गया।"
"माँ भाईदूज की कोई कहानी सुनाओ न ।" गुलाब बोला।
"अरे अभी समय कहाँ?पहले नहा- धोकर तुम दोनों भाई - बहन तैयार हो जाओ। जब तेरी बहन टीका करेगी तब सुना दूँगी।"
दोनों भाई बहन कहानी सुनने के लालच में नए- नए कपड़े पहनकर जल्दी ही हाज़िर हो गए। अब तो माँ को कहानी सुनानी ही पड़ी।उसने शुरू की कहानी -
चटपटी चाट
सुनो गुलाल और मेरी गुलबानो
भाई दौज का त्योहार आने वाला था । भाइयों की मंडली बातों में मगन थी।कोई कहता—मैं तो अपनी बहन को घड़ी दूंगा ---अरे मैं तो उसे बातूनी गुड़िया दूंगा –ऊह--मेरी बहन के पास तो गुड़ियाँ बहुत हैं उसे पैन देना ठीक रहेगा,पढ़ाई में काम आएगा। । गूगल खड़ा सोच रहा था –"मैं अपनी बहन चंपी को क्या दूँ? मैं तो इनकी तरह पैन -घड़ी दे भी नहीं सकता लेकिन उसे बहुत प्यार करता हूँ और कुछ न कुछ जरूर दूंगा।"
घर जाकर अपनी गुल्लक उलट- पुलट की । बड़ी बेचैनी से सिक्के गिनने शुरू किए –एक –दो ---तीन । अरे ये तो 20 रुपए ही हुए।सब तो खर्च नहीं कर सकता । दादा जी हमेशा कहते हैं गुल्लक को कभी खाली नहीं छोड़ना चाहिए इसलिए 10 रुपए मैं इसी में रख देता हूँ। गुल्लक बंद करके दिमागी घोड़े दौड़ाने लगा –कान के कुंडल तो दस रुपए में आ ही जाएंगे पर उसके तो कान ही नहीं छिदे हैं। पहनेगी कैसे?गले की माला कैसी रहेगी? न बाबा उसे नहीं ख़रीदूँगा। कोई चोर गले से खींचकर ले गया तो --। दस रुपयों की तो बहुत सी टॉफियाँ आ जाएंगी पर उन्हें तो वह मिनटों में चबा जाएगी । अच्छा किताब खरीद लेता हूँ । पहले मैं पढ़ लूँगा फिर वह पढ़ लेगी । हम दोनों के ही काम आ जाएगी।
किताब कैसी दी जाए ?वह फिर उलझ गया । कहानी की किताब तो उसे देना बेकार है पहले से ही उसके पास किताबों का ढेर लगा है । तब क्या दूँ?चुटकुलों की किताब ठीक रहेगी । पढ़ते –पढ़ते खुद भी हँसेगी और दूसरों को सुनाएगी तो उन्हें भी गुदगुदी होने लगेगी । अपने दिमाग की खेती पर वह मंद-मंद मुस्कराने लगा जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। दस रुपए उसने जेब के हवाले किए और इठलाता हुआ बाजार चल दिया । तभी चंपा दरवाजा रोककर खड़ी हो गई –"क्यों भैया, इस बार भी क्या रुपए देकर टरका दोगे। वैसे तुम बहुत सयाने हो।पिछली बार पाँच रुपए का नोट दिया था । अगले दिन वापस भी ले लिया। बड़े प्यार से बोले थे-ला छोटी बहना पाँच का नोट,तुझसे खो जाएगा। इस बार तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाली।"
"मेरी चंपा ,इस बार रुपये तो नहीं दूंगा पर जो भी दूंगा उसमें मेरा भी थोड़ा हिस्सा रहेगा।"
"जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती। मीनू-छीनू के भाई बहुत अच्छे हैं। वे उन्हें गुड़ियाँ देते हैं,बिंदी-चूड़ी देते हैं और तुम –तुम ही एक ऐसे भाई हो जो देकर ले लेते हो या उसमें हिस्सा-बाँट करने की सोचते हो।
"तूने भी तो घर में आकर मेरे हिस्से का प्यार बाँट लिया। अकेला होता तो मम्मी-पापा का सारा प्यार मैं लूटता। न जाने क्या सोचकर माँ ने तुझे कल्लो भंगिन से पाँच किलो नमक के बदले ले लिया।"
चंपा खिसियाकर रो पड़ी। "माँ—माँ—देखो ग़ुगलू मुझे तंग कर रहा है।"
माँ के आने से पहले ही वह वहाँ से खिसक गया। जानता था,हर बार की तरह माँ उसे ही डांटेगी।
गूगल बड़ी शान से किताबों की दुकान पर जा पहुंचा कि बन जाएगा उसका काम चंद मिन्टों में। वहाँ जाकर तो उसका दिमाग घूम गया जब उसने देखा किताबों का पहाड़!कहीं लिखा था इतिहास ,कहीं भूगोल,कहीं संगीत तो कहीं चित्रकला। मन ललचाने लगा-यह भी ले लूँ—वह भी ले लूँ पर जेब में थे केवल 10 रुपए। अचानक उसकी निगाहें एक किताब से जा टकराईं जिसका नाम था ‘चटपटी चाट’। उसकी जीभ चटकारे लेने लगी। उसने तुरंत उसे खरीद लिया और रंगबिरंगे कागजों से सजाकर बीच में भोले मुखड़ेवाली चम्पा की फोटो चिपकाई । नीचे लिखा था –
दो चुटइया वाली चम्पी को /भइया की चटपटी चाट
भाईदूज के दिन चम्पा ने बड़े उत्साह से अपने भैया को टीका किया । बेचैनी से इधर उधर तांक-झांक भी कर रही थी–देखें क्या देता है गुगलू उसे।
गूगल ने चम्पा के हाथों में किताब थमा दी पर यह क्या---वह तो चम्पा की जगह चंपी लिखा देख तुनक पड़ी—"नहीं लेती तुम्हारी किताब –लो वापस लो –अभी लो। मेरा नाम ही बदल दिया !क्यों बदला बोलो –बोलो।"
"अरी बहन इसे खोल तो। इसमें चाट -पापड़ी ,गोलगप्पे,समोसे भरे हुए हैं।''
"यह जादू की किताब है क्या जो खोलते ही पानी से भरे गोलगप्पे प्लेट में सजे धजे हाजिर हो जाएंगे और कहेंगे-हुजूर हमें खाइये।" उसने झुककर ऐसी अदा से कहा की गुल्लू को हंसी आ गई।
"हाँ—हाँ –आ जाएंगे पर इन्हें बनाने में कुछ मेहनत तो करनी पड़ेगी।"
"कौन बनाएगा?"
"मेरी बहना और कौन?" गुटक्कू ने उसे खिजाने की कोशिश की।
"मुझे तो खाना आता है बनाना नहीं।" मासूम चम्पा बोली।
"कोई बात नहीं। बड़ी होने पर बना देना। मैं इंतजार कर लूँगा।"
"मैं बड़ी कब होऊँगी?"
"यह तो मुझे भी नहीं मालूम। चलो माँ से पूछते हैं।"
तभी गुल्लू के दोस्तों ने खेलने के लिए आवाज लगा दी। वह तो वो गया वो गया। रह गई चम्पा। माँ को खोजती आँगन में आई।
''माँ-माँ मैं कब बड़ी होऊँगी?"
माँ ऐसे प्रश्न के लिए तैयार न थी। एक पल बेटी का मुख ताकती रही फिर दुलारती बोली-"मेरे बेटी को बड़ी होने की क्या जरूरत आन पड़ी। तू छोटी ही ठीक है।''
"भैया चटपटी चाट की किताब लाया है । समझ नहीं आता उसके लिए कैसे बनाऊँ?वह कह रहा था बड़ी होने पर मुझे सब आ जाएगा।"
"मैं किसी दिन चाट बना दूँगी। खिला देना अपने चटटू भैया को । अपने मतलब के लिए यह किताब खरीद लाया है।"
"ऐसे न बोलो । मेरा भैया बहुत अच्छा है। माँ आज ही उसके लिए कुछ बना दो।" चम्पा गिड़गिड़ाते हुए बोली।
माँ उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी इसलिए चाट पापड़ी बनाने को तैयार हो गई। एक तरह से वह इन भाई-बहन के स्नेह को देख खुश भी थी। आखिर गुल्लू अपनी बचत के पैसों से बहन के लिए उपहार लेकर आया था। इस त्याग का मूल्य किताब से कहीं—कहीं ज्यादा था।
खेलने के बाद गुल्लू की भूख चौगुनी हो जाया करती थी। हाथ-पैर-मुंह धोकर चटपट रसोई की तरफ जाने लगा । भुने जीरे की खुशबू से उसकी नाक कुछ ज्यादा ही मटकने लगी। उसी समय चम्पा प्लेट लेकर आई-"गूगल चाट- पापड़ी खाएगा?
"भला चाट कैसे छोड़ सकता हूँ?मगर इतनी जल्दी बन कैसे गई!"
"माँ ने कहा कि मेरे बड़े होने से पहले भी चाट बन सकती है। मैं माँ को देख कुछ कुछ सीख रही हूँ। माँ ने तो जादू से कुछ मिनटों में ही चाट बना दी।"
"जुग जुग जीओ मेरी छोटी बहना!अब तू जल्दी जल्दी सीखती जा और मैं जल्दी जल्दी खाता जाऊं। हे भगवान हर जनम में चंपा को ही मेरी बहन बनाना।"
'चम्पा को तंग न कर। अभी उसके खाना बनाने के दिन नहीं। खेलने-खाने के दिन हैं।"
"ओह माँ,मगर मेरे तो खाने के दिन हैं। फिर मैंने उसे खेलने को मना तो नहीं किया। मैं तो बस यह चाहता हूँ कि रोज कुछ चटर-पटर चटपटा मिल जाए। आज आलू की चाट तो कल आलू की टिक्की—आह तो परसों पानी से भरे मटके की तरह फूले गोलगप्पे ।"
"बस बस बंद कर पेट का राग अलापना। मैं सब जानती हूँ स्कूल से आकर तुझे दूध पीना तो पसंद नहीं इसी कारण यह किताब उठा लाया।"
"ओह माँ, भैया को डांटो मत। यह किताब तो सबके काम आने वाली है। हाँ याद आया -- मुझे भी तो गुगलू को कुछ देना होगा।
'मुझे तो उपहार मिल गया—दुनिया का सबसे अच्छा --।"गूगल हवा में हाथ हिलाते बोला।
"किसने दिया?"चम्पा हैरान थी।
"माँ ने।"
"मुझे भी तो दिखाओ।"
"चल दिखाता हूँ।"
गुगल ने उसे शीशे के सामने ला खड़ा किया।
"दिखाई दिया?/"
"क्या दिखाई दिया--! इसमें तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा । बस मैं ही मैं दीख रही हूँ ।"
"यही तो हैं मेरा प्यारा सा उपहार जो मुझे माँ ने दिया है।"
चम्पा खुशी की लहरों में डूब सी गई जिसमें उसे गुगल का चेहरा ही नजर आ रहा था,वह तो उसके लिए दुनिया का सबसे अच्छा भाई था।
***
लो बच्चों कहानी खतम हुई। कैसी लगी?"माँ बोली ।
"इतनी अच्छी !"गुलबानो ने अपने दोनों हाथ फैलाते हुए कहा।
"मां मैं भी गूगल की तरह अपनी बहन को इतना इतना प्यार करूंगा।" गुलाल ने भी पूरी शक्ति लगाकर दोनों हाथ दो दिशाओं की ओर तान दिये।
"अच्छा अब चलूँ ,मेरा भाई भी आने वाला है।"घूघर ने अपने बच्चों से कहा।
गुलाल अपनी माँ को जाता देख सोच रहा था -'यमुना अपने भाई को प्यार करती थी ,गूगल अपनी बहन को प्यार करता था ,मैं अपनी बहन को प्यार करता हूँ ,माँ भी अपने भाई को बहुत प्यार करती है!
यह भाई बहन की दुनिया सच में बड़ी न्यारी है और प्यारी भी है!'
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021
बालकहानी
नटखट नोटबुक
सुररी अपनी किताबों से
खूब काम लेता। कभी पन्ने पलटता हुआ पढ़ता ,कभी उन्हें देख
प्रश्नों के उत्तर लिखता। काम खतम होने पर उन्हें इधर-उधर पटक देता। एक बार
डिक्शनरी झुँझला उठी- यह लड़का एकदम मतलबी है ! काम निकलते ही हमें बेदर्दी से फेंक
देता है । कल मुझे इतने झटके से रखा कि पूरी कमर
की कमर दर्द कर रही है।
“दीदी ,तुम ठीक कह रही हो। यह दुष्ट मुझे तो
घुमाते हुए मेज पर इतनी ज़ोर से पटकियाँ खिलाता है कि मेरी खाल जगह - जगह से छिल गई
है । देखो न कैसी लग रही हूँ –एकदम बदसूरत। एक दिन ऐसी गायब हो जाऊँगी कि ढूँढे से
न मिलूँ। बच्चू को दिन में ही तारे नजर आने लगेंगे। स्कूल में भी खूब डांट पड़ेगी।’’नोटबुक बोली।
“तू
छोटी सी है पर है बड़ी खोटी। कोई शरारत करने
की जरूरत नहीं।” एटलस ने उसे समझाने की कोशिश की। उस
समय तो नोटबुक चुप हो गई पर उसे सबक सिखाने की ताक में रहने लगी।
रात में सुररी ने गणित के कुछ सवाल किए और निबंध लिखा। आदतन किताबों को
लापरवाही से फेंक पैर पसार कर सो गया। नोट बुक को मौका मिल गया। वह धीरे-धीरे
सरकती हुई मोटी डिक्शनरी के पीछे छिप गई।
सुबह स्कूल जाते समय सुररी हड़बड़ाकर चिल्लाया-“माँ—माँ
मेरी नोट बुक नहीं मिल रही।”
“देख वहीं कहीं होगी। कितनी बार कहा है अपनी किताबें जगह पर रखा कर पर
नहीं--- जहां काम किया वहीं छोड़ दिया।’’
“ओह बहू यह बड़बड़ाने का समय नहीं । सुररी की मदद कर दे वरना बस छूट जाएगी।
बस तो तेरे बेटे की छूटेगी पर हो जाएगी कवायद मेरे बेटे की। ऑफिस जाने से पहले उसे
स्कूल छोड़ने जाना पड़ेगा।’’ दादी हँसते हुए बोली।
माँ को सुररी की मदद करने जाना ही पड़ा । उसके जाने के बाद उसने एक गहरी सांस ली।
“इतनी लंबी सांस लेने की क्या जरूरत पड़ गई।’’ बाथरूम
से निकलते हुए सुररी के पिता ने पूछा।
“न लूँ तो क्या करूँ। अब चैन जाकर मिला है। आपका बेटा तो कोई काम करता
नहीं।’’
“पहले उसे सिखाओ तो—तभी तो करना सीखेगा। उसकी अलमारी देखी है-- धूल से पटी!
एकदम कबाड़खाना। एक बार इसमें किताब गई फिर तो खोजते ही रह जाओ। बेचारी किताबें भी
अपनी किस्मत को रोती होंगी। आज तुम उसके सामने अलमारी
साफ करके किताबें ठीक से लगाना। फिर वह अपनी किताबों की देखरेख खुद करने लगेगा।’’
“करने से रहा। महाआलसी है।’’
“न करे तो कोई बात नही! कुछ दिन तक तुम रोज किताबों की अलमारी की साज-सज्जा
करो। देखना--- एक दिन उसपर जरूर असर होगा।पर मुझे एक बात का शक है!”
“शक! कैसा शक?”
“यही कि तुम्हें किताब लगानी आती है या नहीं!”
“क्यों, उसमें है ही क्या?”
“मुझे मालूम है तुम कर सकती हो पर मैंने ऐसे ही पूछ लिया। तुमको न ही कभी
उसकी अलमारी झाड़ते देखा और न ही लुढ़कती रबर-पेंसिल को उठाते देखा। जहां बेटा किताब
छोड़ जाता है वही बेचारी लावारिस की तरह पड़ी रहती है।’’
‘हूँ--किताबें लगाना बड़े झमेले का काम है। उन्हें ठीक करने के नाम से मेरा जी मिचलाने लगता है।’’
“तब तुम्हारा यह काम कौन करता था!”
“मेरी माँ और कौन!”
“ओह अब पता लगा बेटे मेँ किसका असर आया है।’’
“किसका असर आया?”माँ तुनक उठी।
“तुम्हारा और किसका !”
“आप तो बस मेरे दोष ही ढूंढते रहते हैं।”
“उफ नाराज हो गई। अच्छा बाबा माफ करो। मैं ही उसकी किताबें ठीक से रख देता
हूँ। मैंने तो हमेशा से अपनी कॉपी-किताबें सावधानी से रखीं। तभी तो पुरानी होकर भी
नई सी चमकती रहती हैं।’’
“अरे कहाँ चली महारानी --। थोड़ा इस काम में दिलचस्पी लो। वरना बेटे को कैसे
बताओगी?
“मुझसे अच्छी तरह तो आप ही सिखा दोगे। मैं अभी आपके लिए गरम-गरम समोसे बना
कर लाती हूँ। और हाँ,आज आपको एक ज्यादा मिलेगा।’’सुररी की मम्मी ने मीठी सी मुस्कान
बिखेरते हुए कहा।
“यह मेहरबानी क्यों!”
“स्वच्छता अभियान छेड़ कर आपने मुझे खुश कर दिया । अब आपको खुश करने की मेरी
बारी है।’’
“समोसे के नाम से तो मेरे मुंह में पानी आ गया। अब तो मुझे ही किताबों के साथ कवायद करनी पड़ेगी।’’ सुररी
के पिता भी हँस दिये।
किताबों की खुशी का तो ठिकाना ही न था। आपस में फुसफुसाने लगीं-“आज से तो
हमारे अच्छे दिन आ गए। साफ सुथरे घर में पैर पसारेंगे और आनंद से रहेंगे।कितना
अच्छा हो यदि सुररी भी अपने पिता की तरह सफाई पसंद बच्चा बन जाय। यदि वह हमारा
ध्यान रखेगा तो हम भी उसका ध्यान रखेंगे।”
“उसे यह कौन समझाये कि हम उसके दोस्त हैं,दुश्मनों
जैसा व्यवहार करना बंद करे। एक किताब ने गहरी सांस छोड़ी।”
“मैं समझा सकती हूँ।”नोटबुक फिर मटकती सामने आई।
“तू तो उसे बहुत तंग करती है।”
“इस बार तो ऐसा तंग करूंगी कि सुररी को बदल कर रख दूँगी।बस पवन देवता मेरा
साथ दे दें। वे इतनी तेजी से उड़ें कि मुझे भी अपने साथ उड़ा ले चलें।”
कहने भर की देर थी कि हवा वेग से बह चली। नोटबुक ने जानबूझकर अलमारी से
बाहर छलाँग लगा दी। इस चक्कर में उसका एक पन्ना उससे अलग हो गया। हवा के झोंके उसे
अपने साथ ले चले। सुररी ने देखा तो उसके गुम होने के डर से घबरा उठा। उसे पकड़ने
पीछे-पीछे भागा। उस पन्ने पर बहुत सी खास बातें लिखी हुई थीं। हाँफते-हाँफते
चिल्लाया-“नोटबुक के पन्ने रुक जाओ –रुक जाओ। तुम्हारे बिना
मैं स्कूल का काम कैसे करूंगा।?”
“मैं नहीं रुकूँगा। तुम मेरा ध्यान नहीं रखते --फिर मैं तुम्हारी बात क्यों
सुनूँ!”
“एक बार रुक जाओ—मैं तुम्हारी हर बात मानूँगा।”
“मानोगे?”
“हाँ –हाँ –मानूँगा।”
“क्या तुम मेरा और मेरे साथियों को अपना मित्र समझकर उसकी देखरेख करोगे?”
“हाँ—हाँ करूंगा।’’
हवा तुरंत मुसकुराती धीमी बहने लगी।नोटबुक का पन्ना दीवार से टकराकर रुक
गया। सुररी की सांस में सांस आई। उसने बड़े अपनेपन से पन्ने को हाथ में थाम लिया।
उस पर लगी मिट्टी को हटाकर तुरंत पन्ने को नोट बुक में गोंद से चिपकाया। नोटबुक
अपनी जीत पर बड़ी खुश थी । अलमारी में बैठीं किताबें नटखट नोटबुक का लोहा मान गई।
समाप्त
सुधा भार्गव
बैंगलोर




